भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबुद्धावतारका प्रयोजन ५७३
बुद्धावतारका प्रयोजन
कुछ लोगोंके प्रश्न होते हैं कि ‘बौद्धमतप्रवर्तक बुद्धदेव भगवान्के नवें अवतार माने जाते हैं, हर एक संकल्पके देश-कालसंकीर्तनमें ‘बौद्धावतारे’ पढ़ा जाता है, फिर उनसे प्रतिष्ठापित धर्म अधर्म कैसे हो सकता है?’ कुछ लोग यह भी कहने लगते हैं कि ‘बुद्धने वेदों और वैदिक धर्मका खण्डन नहीं किया, किंतु वैदिक धर्ममें फैले हुए पाखण्डोंका खण्डन किया है। आगे चलकर बौद्ध धर्ममें अनाचार फैल जानेसे भगवान्ने ही श्रीशंकराचार्यरूपसे अवतीर्ण होकर उसे दूर किया।’ इसपर वैदिकोंका कहना है कि अवश्य ही बुद्ध भगवान्के अवतार थे, परंतु जिन पुराणोंमें बुद्धावतारका वर्णन है, वहीं उसका प्रयोजन भी कहा गया है। यह ठीक है कि गीताके कथनानुसार भगवान्का अवतार धर्मग्लानि एवं अधर्माभ्युत्थानको मिटाने और धर्मसंस्थापनके लिये ही होता है। इसी दृष्टिसे बुद्धावतारका भी यह प्रयोजन अवश्य होना चाहिये। यहाँ यह समझ लेना चाहिये कि जैसे वैदिक धर्ममें अधिकारियोंकी प्रवृत्ति न होना दोष है, वैसे ही अनधिकारियोंकी प्रवृत्ति होना भी दूषण ही है और जैसे अधिकारियोंको कर्मोंमें प्रवृत्त करना आवश्यक है, वैसे ही अनधिकारियोंकी निवृत्ति भी आवश्यक है। ये दोनों ही कर्म दुष्कर हैं। आज जो पुराणश्रवण और मन्दिरशिखरदर्शनसे ही कृतकृत्य हो सकते हैं, वे ही नव्य लोगोंके बहकानेमें आकर शास्त्रमर्यादाके विपरीत वेदाध्ययन तथा मन्दिर-प्रवेश चाहते हैं और हितैषियोंके समझानेसे भी नहीं मानते हैं। किसी समय ठीक ऐसी ही स्थिति हो गयी थी। वेदाध्ययन तथा तदुक्त अग्निहोत्रादि कर्मके अनधिकारी देवताओंके अभिनव करनेकी दृष्टिसे इन कर्मोंमें प्रवृत्त हो गये और यज्ञ-व्याजसे पशुवध तथा सुरापानका विस्तार करने लगे। शास्त्रोंमें यज्ञके अंगरूपसे यद्यपि पशुवध अनुमोदित है तथापि यज्ञ-व्याजसे उदर-पोषणार्थ पशुवध पाप ही है। इस तरह धर्मकी ओटमें अधर्मका प्रचार होने लगा। उस समय किसीके समझाने- बुझानेसे भी उनकी उन कर्मोंसे निवृत्ति असम्भव थी। ऐसी स्थितिमें उन्हें उन कर्मोंसे निवृत्त करनेके लिये भगवान्को उनके श्रद्धेय बनकर प्रकट होनेकी आवश्यकता प्रतीत हुई। बस, इसीलिये बुद्धावतार हुआ। बुद्धदेव महाविरक्त और सिद्ध थे। उन्होंने अपने चमत्कारोंसे उन असुरस्वभाववालोंके मनोंको मोहित कर लिया, फिर वेदों और वेदोक्त धर्मोंसे उनकी अश्रद्धा उत्पन्न कर दी। जब बुद्धदेवमें ऐसे लोगोंकी पूर्ण श्रद्धा उत्पन्न हो गयी, तब उन्होंने जो कुछ भी कहा, उसपर उन लोगोंने पूर्ण विश्वास किया। बस, वे भी वेद और वेदोक्त धर्मकी निन्दा करने लगे। जो किसीके समझानेसे भी असम्भव था, वह सरल हो गया। इस कार्यके सम्पन्न हो जानेपर बुद्धदेवने उस रूपसे फिर दूसरी बात कहना अनुचित समझा। बादमें जब बुद्धके चमत्कारके प्रभावसे धर्माधिकारियोंको भी अपने धर्मसे अश्रद्धा होने लगी, तब फिर भगवान्को अवतार-ग्रहणकी आवश्यकता प्रतीत हुई। अतः वेद एवं तदुक्त धर्मोंमें श्रद्धा स्थिर करनेके लिये भगवान् फिर शंकराचार्यरूपमें प्रकट हुए और बौद्धमत-खण्डन करके वैदिक धर्मकी स्थापना की। इस तरह दोनों ही अवतारोंकी सार्थकता हो जाती है। वैदिकगण जैसे भगवान्को अनादि मानते हैं, वैसे ही वेदोंको भी। अतएव ‘नास्तिको वेदनिन्दकः’ के आधारपर वेदनिन्दकको ही नास्तिक कहा जाता है। तुलसीदासजीने भी कहा है— कल्प कल्प भरि एक एक नरका। परहिं जे दूषहिं श्रुति करि तरका ॥ अतएव आस्तिक लोग भगवान्से भी अधिक सम्मान वेदोंका करते हैं। नैयायिक आदि परमेश्वर- निर्मित होनेसे वेदोंका प्रामाण्य मानते हैं, परंतु वेदान्तियोंका कहना है कि यदि परमेश्वरनिर्मित होनेसे वेदोंका