भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रामाण्य है तो यह कहना होगा कि परमेश्वरमें क्या प्रमाण है ? यदि वेदको प्रमाण कहें, तब तो 'अन्योन्या- श्रयदोष' अवश्य होगा अर्थात् वेदके आधारपर ईश्वरसिद्धि और ईश्वरनिर्मित होनेसे वेदप्रामाण्यसिद्धि। कहा जा सकता है कि 'क्षित्यङ्कुरादिकं सकर्तृकं कार्यत्वाद् घटवत्' इत्यादि अनुमानोंसे परमेश्वरकी सिद्धि होगी और ईश्वरनिर्मित होनेसे वेदोंका प्रामाण्य सिद्ध होगा। पर यह पक्ष भी ठीक नहीं है; क्योंकि अनुमानसे ईश्वरसामान्यकी ही सिद्धि होती है, ईश्वरविशेषकी नहीं, जैसे धूमसे वह्निसामान्यकी ही सिद्धि होती है, वह्विविशेषकी नहीं। अनुमानसिद्ध परमेश्वर 'वेदकार' है या 'बौद्धागमकार', 'बाइबिलकार' है या 'कुरानकार' यह नहीं कहा जा सकता। इस तरह कौन परमेश्वर है, यह सिद्ध नहीं होता। जिन-जिन युक्तियोंसे नैयायिक, वैशेषिक 'वेदकार' को परमेश्वर सिद्ध करेंगे, उन्हीं युक्तियोंसे 'बाइबिल' आदिके अनुयायी