भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 585, कुल 778 में से
संदर्भ में पढ़ेंनिराकारसे साकार [५७५]
गौका दुग्ध होनेसे आदर करते हैं, न कि सर्वज्ञ परमेश्वरकी उक्ति होनेसे— 'सर्वोपनिषदो गावो दोग्धा गोपालनन्दनः।' यहाँ विज्ञगण भगवान्की सर्वज्ञताका उपयोग अकृत्रिम वेदका सिद्धान्त निर्णय करनेमें करते हैं। सर्वज्ञनिर्मित भी ग्रन्थ कृत्रिम होनेसे वैसा आदरणीय नहीं होता, जैसा कि अकृत्रिम अपौरुषेय वेद। अतएव आस्तिकगण बुद्धकी पूजा करते हुए भी वेदविरुद्ध होनेसे उनकी उक्तिका आदर नहीं करते। श्रीकृष्णकी उक्तिका वेदसम्मत होनेसे आदर करते हैं। एक बार भीष्मजी अपने पिताका श्राद्ध कर रहे थे, उस समय उनके पिताका दिव्य हस्त प्रकट हुआ। भीष्मने उसे पहचाना और वैदिकोंसे प्रश्न किया कि 'क्या हस्तपर पिण्डदान करनेकी विधि है?' वैदिकोंने कहा—'नहीं, वेदी और कुशाओंपर ही पिण्ड-प्रदानकी विधि है।' तब भीष्मने हस्तपर पिण्ड न देकर कुशाओंपर ही पिण्डदान किया। भीष्मके पिता बड़े प्रसन्न हुए और कहा कि 'मैं तुम्हारी शास्त्रश्रद्धा देखनेके लिये ही प्रकट हुआ था।' इस दृष्टिसे वेद ही मुख्य शास्त्र है, तदुक्त कर्म ही मुख्य धर्म है, उनकी मर्यादा-रक्षार्थ ही बुद्धदेव एवं शंकराचार्यका अवतार हुआ। वैदिक धर्मसे यद्यपि प्राणिमात्रका कल्याण हो सकता है, परंतु अधिकारके अनुसार ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य— त्रैवर्णिक उपनयनादि संस्कारसम्पन्न होकर वेदाध्ययनके अधिकारी हैं। शेष, अन्त्यज आदि वेदोपबृंहणरूप इतिहास-पुराण-श्रवणके अधिकारी हैं। राजसूयमें क्षत्रियका अधिकार है, ब्राह्मणका नहीं और वाजपेयमें ब्राह्मणका ही अधिकार है, क्षत्रियादिका नहीं। जैसे वैद्यके औषधालयकी सभी औषधें सब रोगियोंके लिये उपयुक्त नहीं हैं, वैसे ही वेदोक्त सभी कर्म सबके लिये उपयुक्त नहीं हैं। किंतु वहाँ अधिकारकी चर्चा आवश्यक है। इन सब विचारोंका ध्यान रखनेसे बुद्धदेवको भगवान्का अवतार मानते हुए भी उनके उपदेशको अधर्म बतलानेमें कोई विरोध नहीं पड़ता। यदि साधारण दृष्टिसे देखें तो भी इससे वैदिक धर्मकी अनुपमेय उदारताका ही परिचय मिलता है। वैदिक धर्मको छोड़कर क्या संसारका कोई ऐसा धर्म है, जिसने अपने विरोधीको भगवान्का अवतार मानकर उसका आदर किया हो?
निराकारसे साकार
कुछ लोगोंका कहना है कि निर्गुण, निराकार, निर्विकार परब्रह्म परमात्मा साकार नहीं हो सकता। यद्यपि इस विषयपर समाजियों एवं सनातनियोंके मध्य अनेक बार शास्त्रार्थ हो चुके हैं। उनके शास्त्रार्थोंमें युक्तियोंकी प्रधानता थी और वेदमन्त्रोंसे ईश्वरका साकार होना सिद्ध करनेकी बातका प्राधान्य था, परंतु आजकल कभी अपनेको वेदान्ती कहनेवाले लोग भी अवतारके अस्तित्वका अपलाप करने लगते हैं। उनका कहना है कि 'ईश्वरो नावतरति, व्यापकत्वात्, आकाशवत्' अर्थात् ईश्वर अवतार नहीं लेता, क्योंकि वह व्यापक है, जैसे आकाश, इस अनुमानसे ईश्वरका अवतार बाधित हो जाता है। इसपर कहा जा सकता है कि इस अनुमानका दृष्टान्त ही असिद्ध है; क्योंकि आकाश भी वायुरूपमें अवतीर्ण होता है। वायु, तेज, जलादि क्रमेण पृथ्वीरूपसे भी उसीका अवतरण होता है। यदि कहा जाय कि यह तो वेदान्तियोंके मतानुसार हुआ, परंतु नैयायिकोंके मतसे क्या उत्तर है ? तो यह कहना पड़ेगा कि व्यापकत्व हेतु अनैकान्तिक है; क्योंकि व्यापकत्व नैयायिकोंके आत्मामें रह जाता है, परंतु वहाँ अवतरण होता है। साकार होना ही अवतार पदार्थ है। जब नैयायिकोंके व्यापक आत्मा देहवान् हो जाते हैं, तब परमात्मा देहवान् क्यों नहीं हो सकता ? इसपर यदि कहा जाय कि आत्माके कर्म होते हैं, परंतु परमात्माके कर्म नहीं