भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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भारतमें ही अवतार क्यों ? ५६७ देवता भी भारतमें जन्म चाहते हैं। जैसे गृहके एक देशमें भी रहकर दीपक समस्त भवनको प्रकाशित करता है, शरीरके एक देश हृदयमें ही अन्तरात्माकी अभिव्यक्ति होती है, परंतु समस्त शरीरका प्रकाश और कार्य उसीसे होता है, वैसे ही भारतवर्ष समस्त भूमण्डलकी नाभि है। पुराणोंके अनुसार जम्बूद्वीप अन्य समस्त द्वीपोंका मध्य है। उसीमें मेरु है और उसीका सारांश भारतवर्ष है। अतः यही सबका हृदय है। जैसे व्यापक होते हुए भी आत्माका हृदयमें ही विशेष रूपसे प्राकट्य होता है, वैसे ही व्यापक धर्म और शास्त्र एवं उनके पालक भगवान्‌का भारतमें विशेष रूपसे प्राकट्य होता है। भारतके ही ज्ञानालोक और धर्मके प्रभावसे विश्व आलोकित और धार्मिक हुआ। मनु कहते हैं— एतद्देशप्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मनः। स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन्पृथिव्यां सर्वमानवाः॥ (मनुस्मृति २।२०) अर्थात् इस देशसे उत्पन्न हुए ब्राह्मणसे पृथ्वीपर सब मनुष्य अपना-अपना आचार सीखें। शरीरके हस्त-पादादि अन्यान्य अंगोंके शुष्क हो जानेपर भी जीवन रह सकता है, परंतु हृदयके शुष्क हो जानेपर फिर जीवन नहीं रह सकता। इस तरह समस्त देशोंके धर्म और ईश्वरसे च्युत हो जानेपर भी विश्व रह सकता है, परंतु उसके हृदय भारतके धर्मशून्य होनेपर विश्वका संहार निश्चित है। इसीलिये भारतके धर्म और शास्त्रसे विमुख होते ही विश्वके नाशकी सम्भावना होती है। जैसे सर्वांगकी अपेक्षा हृदय-रक्षाका ध्यान अधिक होता है, वैसे ही यहाँ धर्म और शास्त्रोंके रक्षार्थ भगवान्‌का प्राकट्य होता है। वैदिक धर्म एवं संस्कृतिसे च्युत भिन्न-भिन्न देशोंके लोग यद्यपि अग्निहोत्रादि त्रैवर्णिक कर्मके अधिकारी नहीं रह गये तथापि सामान्य-धर्म या मानव-धर्मके अधिकारी हैं। अतः इतिहास-पुराणादिके श्रवणद्वारा वैदिक धर्मसे उनका भी कल्याण हो ही सकता है, परंतु अनुकूलोंके लिये ही सदुपदेश सफल होता है, प्रतिकूलोंके प्रति किसीका कोई वश नहीं। जो वेद, शास्त्र और वैदिक धर्मसे द्वेष करते हैं, वे भारतीय ब्राह्मण ही क्यों न हों, उन्हें कौन समझा सकता है? सभी जीव भगवान्‌के अंश होनेसे उन्हें प्रिय हैं, वे कभी भी भगवान् और भगवदीयोंके उपेक्ष्य नहीं हैं। अतः उन देशों और समाजोंमें भी किसी-न-किसी रूपमें उनकी उच्छृंखलता वारणकर कुछ सत्पथपर लानेके लिये किसी-न-किसी विभूतिद्वारा किसी-न-किसी धर्मका वहाँ भी स्थापन और प्रसार किया जाता है। कुछ-न-कुछ नियमन या पाशविक भावोंका नियन्त्रण वहाँ भी होता ही है, परंतु वास्तविक धर्म और उसके बोधक शास्त्रका भी संरक्षण कहीं-न-कहीं होना ही चाहिये। इसलिये विश्व-हृदय भारतवर्षमें सदा ही वेदादि शास्त्रोंकी रक्षा और तदुक्त धर्मोंकी रक्षाके लिये भगवान्‌का प्रादुर्भाव होता है। अन्यान्य देशोंमें भी कहा जाता है कि कहीं परमेश्वरके 'दूत' या 'पुत्र' का प्रादुर्भाव होता है, परंतु भारतमें तो स्वयं भगवान्‌का ही प्रादुर्भाव होता है। वहाँ वैदिक धर्मकी रक्षा और प्रकाशसे समस्त विश्वका प्रकाश और उसकी रक्षा हो सकती है। शरीरके सभी स्थानोंमें आत्माका प्रकाश नहीं होता, इससे आत्माकी संकीर्णताकी कल्पना नहीं की जा सकती। इसी तरह भारतमें ही वैदिक धर्म और शास्त्रोंकी रक्षाके लिये यहाँ ही भगवान्‌का प्रादुर्भाव हो, इससे उनके शास्त्र और धर्ममें संकीर्णता नहीं कही जा सकती। योग्यता और अधिकारके व्यक्त होनेपर प्राणिमात्रका परम कल्याण वैदिक धर्मसे ही हो सकता है। इन्हीं सब भावोंको ध्यानमें रखनेसे यह समझमें आता है कि भगवान् भारतमें ही क्यों अवतार लेते हैं।