भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 576

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५६६ भक्तिसुधा इसी तरह धर्मके विषयमें सर्वज्ञकल्प अनादि वेदशास्त्रको छोड़कर भिन्न-भिन्न सामाजिक निर्णयोंका कोई भी मूल्य नहीं। शास्त्रोंमें संशोधनकी कल्पना नितान्त अल्पज्ञता गीताके अनुसार वेदशास्त्र ही कार्य-अकार्य कर्मोंके निर्णायक शास्त्र हैं। गीतामें शास्त्रके नाते वेदोंका ही नाम आता है—‘वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यः’ (गीता १५।१५), ‘ऋक्सामयजुरेव च’ (गीता ९।१७), ‘वेदानां सामवेदोऽस्मि’ (गीता १०।२२) गीता और उसके उद्गम-स्थान महाभारतके श्रोता, वक्ता, प्रणेता और भिन्न-भिन्न प्रसंगोंमें वर्णित सभी महापुरुष वैदिक संस्कृति, सभ्यताके ही माननेवाले थे। अतः गीताके शास्त्र, वेद और वेदाविरुद्ध वेदानुयायी स्मृति, इतिहास, पुराण आदि ही हैं। इन शास्त्रोंके अविरुद्ध और इनके अनुसार वर्ण, आश्रमके लौकिक, वैदिक सभी गीतोक्त कर्म हैं। लौकिक कर्मोंमें भी जितने अंशमें शास्त्रैक- समधिगम्यता है, मुख्य रूपसे वही विधेय है। अन्यांश लोकप्राप्त होनेपर भी शास्त्राविरुद्ध होनेसे उनका गीता-धर्ममें संनिवेश है। ये शास्त्र और धर्म यद्यपि विश्वभरके ऐहिक-आमुष्मिक सर्वविध कल्याणके मूल हैं, अधिकारके अनुसार सभी लोग इनसे लाभ उठा सकते हैं तथापि यदि कालक्रमसे इनका ह्रास होनेके कारण कोई इन्हें संकीर्ण या संकुचित कहे तो यह उसीका दोष है। वस्तुस्थिति प्राणियोंके मानने-न-माननेकी परवाह नहीं करती। लोकपरिवर्तनके पीछे परिवर्तित होनेवाली वस्तु तात्त्विक नहीं होती। किसी भी संस्थाके नियमोंका अनुसरण उसके सदस्योंको करना पड़ता है। उच्छृंखलताके कारण जो सदस्य उसके नियमोंको न मानें तो वे सदस्य ही संस्थासे निकाल बाहर किये जाते हैं। उन उच्छृंखल व्यक्तियोंके कारण संस्थाके नियमोंमें परिवर्तन नहीं किया जाता। वैदिक धर्म एवं संस्कृतिके विधायक एवं संचालक वेदशास्त्रोंके नियमोंका जो लोग उल्लंघन करते गये, वे क्रमेण इससे बहिर्भूत होते गये। ये नियम परमेश्वरीय एवं दृढ़ भित्तिके आधारपर थे। अतः इनमें कुछ भी हेर-फेर न हुआ। जो लोग हेर- फेरकी कल्पना करते हैं, वे वैदिक शास्त्रोंकी विवेचन-पद्धति ही नहीं जानते; क्योंकि यहाँ तो सर्वज्ञ भगवान्‌के स्वाभाविक निःश्वाससम्भूत ऋक्, साम, यजुः, मन्त्र, ब्राह्मण, सूत्र, कल्प, इतिहास, पुराण सभीकी अनादिता मान्य है। सब देश, काल एवं परिस्थितियोंको सोच-समझकर सब तरहके परिवर्तन-अनुवर्तनका निर्णय पहलेसे ही स्थिर है। सत्यका पालन करनेवालोंकी संख्या यद्यपि बहुत कम है तथापि वह संकीर्ण धर्म नहीं कहा जा सकता। परम तत्त्वका साक्षात्कार यद्यपि करोड़ोंमें किसी एकको प्राप्त होता है, यहाँतक कि उसे चाहनेवाले भी अति स्वल्प हैं, तो भी वह परमावश्यक व्यापक ही धर्म है। इसी तरह वैदिक शास्त्र और धर्म यद्यपि व्यापक और सार्वभौम ही है तथापि कालक्रमसे लोगोंमें उच्छृंखलताके बढ़ जानेसे अधिक देश और लोग हमसे च्युत हो गये। इसमें स्थित रहनेवाले भारतमें भी थोड़े ही रह गये। भारतवर्ष समस्त भूमण्डलकी नाभि है शास्त्रोंको देखनेसे विदित होता है कि स्वर्गादिके समान भूलोकमें भी बहुत-से खण्ड भोगभूमि ही थे, कर्मभूमि नहीं। अतः मानव-धर्म या साधारण अहिंसा, सत्य आदि धर्मोंकी ही वहाँ प्रतिष्ठापना की गयी। पहलेसे भी विशेष रूपसे भारत ही कर्मभूमि समझा जाता था। यहाँ ही वर्णधर्म, आश्रमधर्म, यज्ञ-योगादि सम्पूर्ण वैदिक धर्मोंका पूर्ण विकास था। यहाँ कर्म, उपासना, ज्ञानकी सिद्धि सरलतासे होती थी। शतक्रतु इन्द्र यहींके कर्मोंसे ऐन्द्र पदको प्राप्त करता है। इसीलिये