भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभारतमें ही अवतार क्यों ? ५६५ धर्माधर्मके निर्णयमें बुद्धिबल नहीं, शास्त्र ही प्रमाण है बुद्धिमानोंको विदित है कि परिमित प्रज्ञा- क्रिया-शक्तिसम्पन्न मनुष्योंके लौकिक हिताहितका विवेचन कुछ अंशोंमें भले ही सम्भव हो, परंतु अलौकिक, पारलौकिक सुखों एवं सुख-साधनोंके विज्ञानकी ओरसे वे सर्वथा अन्धे ही हैं। अर्थ और कामविषयक उद्योगों और नीतियोंमें देशकाल-भेदसे निःसीम परिवर्तन सम्भव हो सकते हैं। अतः उन विषयोंमें नीति-निर्धारण करना मानवके लिये असम्भव नहीं है। परंतु सर्वज्ञकल्प प्रजापति, बृहस्पति, शुक्र, मनु आदि नीतिज्ञोंकी नीतिको आधार मानकर तदनुसार परिवर्तन या अनुवर्तन अधिक सुविधाजनक एवं निरुपप्लव होता है। किन-किन चेष्टाओंसे परलोकमें क्या दुःख और क्या सुख होगा, इसका परिज्ञान अल्पज्ञ जीवके लिये नितान्त असम्भव है। देश, काल, परिस्थितिके अनुसार धर्माधर्मका परिवर्तन निःसीम नहीं है। वस्तुतः अव्यवस्थित परिवर्तन नीतिमें भी असम्भव है, फिर धर्ममें तो वह कथमपि सम्भव ही नहीं है। कहीं भी लक्षणके अनुसार लक्ष्यका निर्णय हुआ करता है। प्रत्यक्ष विषयमें जहाँ लक्षण-निर्धारण करना होता है, वहाँ अव्याप्ति, अतिव्याप्ति, असम्भव दोषोंसे रहित ही लक्षण हुआ करता है। परंतु जो लक्ष्य अप्रत्यक्ष है, उसका निर्णय लक्षणोंके ही अनुसार हुआ करता है। लक्षण (सूत्र) जहाँ नहीं घटता, वह लक्ष्य ही अशुद्ध समझा जाता है। परंतु आज प्राणियोंके आचरणके अनुसार धर्माधर्मका निर्णय किया जाने लगा है। आजकलके लोगोंमें वस्तुस्थितिकी अपेक्षाकर परिवर्तनके अनुवर्तन करनेका स्वभाव हो गया है। धर्मके लक्षणानुसार धर्मका निर्णय करना एक बात है, परिस्थिति और आचरण देखकर तदनुकूल धर्मकी परिभाषा बनाना दूसरी बात है। गीताकी दृष्टिमें यत्किंचित् हलचल या चेष्टा धर्म नहीं है। कारण, वह तो बिना विधान किये भी प्रकृति-सम्भव गुणोंकी प्रेरणासे स्वयं ही होगा। अतः 'कुरु कर्मैव' (गीता ४।१५) इत्यादि वाक्योंमें विहित कर्म वही है, जो रागप्राप्त नहीं है, किंतु शास्त्रसे ही जिनकी कर्तव्यता विदित होती है। इसीलिये कहा गया है कि कार्य-अकार्यकी व्यवस्थामें एक शास्त्र ही प्रमाण है। अतः शास्त्रविधानको जानकर ही कर्म करे—'ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि ॥' (गीता १६।२४) यह शास्त्र भी अव्यवस्थित, समय-समयके समाजसे निर्धारित यत्किञ्चित् नियम नहीं है; क्योंकि समयानुसार कभी भौतिकवादियोंका ही समाज और दल विजयी एवं उन्नत हो सकता है, कभी अध्यात्मवादियोंका ही दल विस्तृत हो सकता है। बहुत-से व्यक्तियोंका ही समाज बन जाता है। व्यक्तियोंकी बुद्धियोंका कोई ठिकाना नहीं रहता, बड़े-से-बड़े व्यक्ति साधारण- से-साधारण विषयमें भ्रान्त हो जाते हैं। उस समय उन्हें यही दृढ़ निश्चय होता है कि हम जो कुछ भी समझ रहे हैं, वह बिलकुल सत्य है। परंतु कालान्तरमें उन्हें अपने भ्रम और प्रमादोंका स्वयं बोध होता है। रज, तमके प्रभावसे बुद्धिसत्त्व आच्छन्न रहता है। बिना परमात्मभाव व्यक्त हुए योगाभ्याससे भी वह अत्यन्त निरावरण नहीं होता। अतः अज्ञान, भ्रम आदि जीवोंके सामने किसी-न-किसी कक्षामें खड़े ही मिलते हैं। व्यक्तियोंके समूहोंमें—समाजमें भी यही दशा होती है। अतः धर्म-अधर्मके निर्णयमें व्यक्ति, समाज या बहुमतका कोई भी मूल्य नहीं है। नैतिक, आर्थिक अभ्युदयमें भी केवल व्यक्ति या समाजकी निर्धारित नीतिके सहारे सदा विजय नहीं हो सकती। अतः वहाँ भी मन्वादि सर्वज्ञोंके आर्थिक, नैतिक विज्ञानके अनुसार ही सफलता होती है। फिर धर्मके विषयमें तो कहना ही क्या है? चिकित्साके विषयमें एक विज्ञ चिकित्सकके सामने दूसरे विषयके लाखों विद्वानोंकी भी सम्मतिका कुछ भी मूल्य नहीं।