भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 574

५६४ | भक्तिसुधा होते हैं या अन्यान्य देशोंमें भी ? यदि भारतमें ही, तब वे भगवान् कैसे ? वे तो अखिल विश्वके नियामक और ईश्वर हैं। समस्त विश्वको पाप- पंकसे उद्धृत करके उसे धर्मात्मा बनाना उनका कर्तव्य है। अतः विश्वकी ही धर्मग्लानि, अधर्माभ्युत्थान मिटाकर धर्मसंस्थापनकी आवश्यकता है। विश्वके ही साधुओंके पालन और दुष्कृतियोंके संहारकी आवश्यकता है, फिर भगवान्‌का उक्त कार्योंके लिये भारतमें ही क्यों अवतार होता है ? समदर्शी, सर्वसम भगवान्‌को सभी देशोंमें अवतार ग्रहण करके पूर्वोक्त कार्य करना चाहिये। यदि सभी देशोंमें भगवान्‌के अवतार होते हैं तो वे अवतार-पुरुष कौन-कौन हैं ? साथ ही यह भी स्पष्ट होना चाहिये कि क्या सभी देशोंमें जो प्रचलित धर्म हैं, उनके भी स्थापक और पालक भगवान् ही हैं ? यदि ऐसा ही है तो भिन्न देशों एवं समान देशोंमें भी कालभेदसे विरुद्ध धर्मोंकी स्थापना क्यों की जाती है ? एक सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान् भगवान्‌के प्रतिष्ठापित और पालित धर्मोंमें ऐसा विरोध और भिन्नता क्यों ? एक-एक धर्मके प्रतिष्ठापकोंने दूसरे धर्म-प्रतिष्ठापकोंका विरोध करके, यहाँतक कि दूसरे धर्मोंका नाशतक करके धर्मान्तरोंकी स्थापनाएँ की हैं। ऐसी स्थितिमें वे सभी धर्म हों या उनके प्रतिष्ठापक और पालक भगवान् हों— यह कैसे कहा जाय ? इस प्रश्नपर विचार करते हुए प्रथम यह देखना चाहिये कि गीताके श्लोकमें कौन-सा धर्म विवक्षित है। इसी निर्णयसे यह निर्णय भी हो जायगा कि साधु कौन और दुष्कृति (असाधु) कौन ? कारण भगवत्संस्थापित धर्ममें परिनिष्ठित ही साधु और उससे विमुख असाधु समझ लिये जायेंगे। इसमें सन्देह नहीं कि आजकल गीता और गीतोक्त धर्म-कर्मको सार्वभौम या व्यापक बनानेकी बुद्धिसे बहुत व्यापक अर्थ किया जाता है। यद्यपि गीताकी दृष्टिसे गीतोक्त धर्म-निर्णय करनेमें सरलता है। कारण गीताने ही यह निश्चय कर दिया है कि शास्त्रैकसमधिगम्य कर्म ही गीताको मान्य है तथापि आधुनिक विवेचकोंकी शास्त्रपर भी वही व्यापकताकी भावना है। उनका कहना है कि यदि केवल वेद ही शास्त्र हों और शास्त्रैकसमधिगम्य वर्णाश्रमानुसार श्रौत-स्मार्त कर्म ही धर्म हो, तब तो गीतामें संकीर्णता आ जाती है, जो गीता-जैसे सार्वभौम ग्रन्थके स्वरूपानुरूप नहीं है। इतने बड़े संसारमें छोटा-सा भारतवर्ष, वहाँके भी कुछ समूहोंमें ही वेद-शास्त्र और तदुक्त धर्मोंका आदर और प्रचार है। जब गीताका भी वही शास्त्र और धर्म है, तब तो वह एक देशकी ही वस्तु हो जाती है। फिर वह सार्वभौम एवं सर्वमान्य ग्रन्थ नहीं हो सकता। अतः भिन्न-भिन्न देश, कालकी परिस्थितिके अनुसार बुद्धिमान् विवेचकोंद्वारा निर्धारित किये गये कर्तव्याकर्तव्य- निर्णायक ग्रन्थ ही शास्त्र हैं। उन्हीं शास्त्रोंके अनुसार, नैतिक, आर्थिक, वैयक्तिक, सामूहिक अभ्युदयके अनुकूल चेष्टा या हलचलें ही कर्म या धर्म हैं, या उन-उन देशों एवं कालोंके प्राणियोंके लौकिक- पारलौकिक कल्याणोंके लिये सर्वमान्यप्राय बुद्धिमान् महापुरुषोंद्वारा रचित कार्य-अकार्यके निर्णायक ग्रन्थ ही शास्त्र हैं। उन शास्त्रोंके अनुसार सब तरहके अभ्युदयानुकूल देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धिके जो कर्म हैं, वे ही धर्म हैं। ऐसा माननेमें ही गीताकी सर्वमान्यता सुरक्षित रहती है। यद्यपि इन महानुभावोंकी दृष्टि तो अच्छी है, वे गीताको सार्वभौम बनाकर उसका उपकार ही करना चाहते हैं तथापि उसके सिद्धान्त और अभिप्रायको बाँधकर उसे सार्वभौम बनाना सम्भवतः उन्हें वाञ्छनीय न हो। स्वरूपकी रक्षा होते हुए ही उन्नति, उन्नति है। स्वरूपविनाशसे उन्नति, उन्नति कदापि नहीं कही जा सकती।