भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशम्भुर्यच्चरणोदकं स्वशिरसा धत्ते च मूर्तित्रयात् कृष्णो वै पृथगस्ति कोऽप्यविकृतः सच्चिन्मयो नीलिमा। (प्रबोधसुधाकर २४२) महात्मा तुलसीदास भी कहते हैं—व्यापक, निरंजन, निर्विकार परमात्मा ही कौसल्याकी गोदमें रामचन्द्र होकर प्रकट होते हैं— ब्यापक ब्रह्म निरंजन निर्गुन बिगत बिनोद। सो अज प्रेम भगति बस कौसल्या कें गोद॥ (रा०च०मा० १।१९८) अघासुरके मुखमें कृष्ण-प्रवेशको 'भागवत' ने शुद्ध सच्चिदानन्द ब्रह्मका ही प्रवेश माना है। बछड़ों और ग्वाल-बालोंके अघासुरके मुखमें समाविष्ट होनेपर कृपामय भगवान् आनन्दकन्द कृष्णचन्द्र भी उसके मुखमें प्रविष्ट हुए। प्रभुने जिस समय अपनी महिमासे अघासुरको मार दिया, अमृतवर्षिणी कृपादृष्टिसे ग्वाल- बालोंको जिलाया, उसी समय अघासुरके शरीरसे एक ज्योति निकली और कृष्णके स्वरूपमें प्रविष्ट हो गयी। यह सुनकर परीक्षित्को आश्चर्य हुआ कि गो-ब्राह्मण- मांस-रुधिराशी अघासुरको ऐसी दुर्लभ गति क्यों और कैसे मिली? इसपर शुकाचार्य भगवान् बोले— सकृद् यदङ्गप्रतिमान्तराहिता मनोमयी भागवतीं ददौ गतिम्। स एव नित्यात्मसुखानुभूत्यभि- व्युदस्तमायोऽन्तर्गतो हि किं पुनः॥ (श्रीमद्भा० १०।१२।३९) अर्थात् जिनके श्रीअंगकी मंगलमयी मानसी प्रतिमाको सौभाग्यशाली लोग एक बार भी हृदयमें रखकर भागवती गतिको पा जाते हैं, फिर मायासे असंस्पृष्ट, नित्य, चिदानन्दात्मा वह भगवान् ही जिसके अन्दर प्रविष्ट हो गये, उसे भागवती गति प्राप्त कर लेनेमें क्या आश्चर्य है? अतएव प्रभुके प्रादुर्भावका प्रयोजन भी धर्मग्लानि-अधर्माभ्युत्थान- निवृत्तिपूर्वक धर्मस्थापन, साधुपरित्राण, दुष्कृति-विनाशके अतिरिक्त अमलात्मा परमहंसोंको भक्तियोगका विधान करना है। प्रकृति-प्राकृत-प्रपंचातीत, शुद्ध परब्रह्म कृष्ण ही दिव्य लीलाशक्तिके योगसे सगुण, सच्चिदानन्दरूपमें प्रकट होकर योगीन्द्र, मुनीन्द्रोंके निर्मल मनोंको आकर्षित करते हैं। प्रकृति या प्राकृतप्रपंच उन सत्यानृत-विवेकी अमलात्मा परमहंसोंका मन नहीं खींच सकते, अतएव उनका भजनीय शुद्ध ब्रह्म ही है। भेद इतना ही है कि जैसे इक्षुरसका ही परिणाम सिता, शर्करा, कन्दकी मिठास इक्षुरससे विलक्षण होती है, वैसे ही शुद्ध सच्चिदानन्दसे तत्त्वतः अपृथक् होनेपर भी भगवान्का सगुण स्वरूप अद्भुत चमत्कारपूर्ण होता है। जैसे इक्षुदण्डमें दैवात् मीठा फल लग जाय या चन्दन-वृक्षमें मनोहर पुष्प लग जाय, वैसे ही परमानन्द-रसरूप निर्गुण ब्रह्ममें सगुण, साकार ब्रह्मका होना है। यही तो कारण है कि निर्गुण ब्रह्मानुभवी जनकादिकोंका चित्त भी रामचन्द्रके सगुण, साकार स्वरूपपर मुग्ध हो गया था— सहज बिरागरूप मनु मोरा। थकित होत जिमि चंद चकोरा॥ इन्हहि बिलोकत अति अनुरागा। बरबस ब्रह्मसुखहि मन त्यागा॥ (रा०च०मा० १।२१६।३, ५) साकाररूपमें प्रकट भगवान्के दर्शनमें विलक्षणता जैसे केवल नेत्रसे सूर्य-दर्शनकी अपेक्षा दूरवीक्षण यन्त्रोपहित नेत्रसे सूर्य-दर्शनमें चमत्कार होता है, वैसे ही केवल निर्मल अन्तःकरणसे ब्रह्म देखनेकी अपेक्षा पवित्र अन्तःकरणसे लीलाशक्तिद्वारा साकाररूपमें प्रकट भगवान्के दर्शनमें विलक्षणता होती है। निरुपाधिक स्वरूप निरतिशय है, इसमें भी कोई बाधा नहीं। यद्यपि अन्यान्य प्रपंच भी ब्रह्मका ही परिणाम या विवर्त है तथापि वह तामसी, राजसी प्रकृति— रजस्तमोलेशानुविद्ध सत्त्वात्मिका प्रकृतिसे आवृत रहता है। भगवत्स्वरूप विशुद्ध सत्त्वात्मिका योगमाया या दिव्य लीलाशक्तिसे साकार रूपमें प्रकट ब्रह्म निरावरण ही रहता है। जैसे दूरवीक्षणादि नेत्र और सूर्यके मध्यमें रहकर सूर्य-स्वरूप-दर्शनमें सहायक होता है, अन्य पाषाणादि सूर्य-दर्शनका प्रतिबन्धक हो जाता है, वैसे