भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
शम्भुर्यच्चरणोदकं स्वशिरसा धत्ते च मूर्तित्रयात् कृष्णो वै पृथगस्ति कोऽप्यविकृतः सच्चिन्मयो नीलिमा। (प्रबोधसुधाकर २४२) महात्मा तुलसीदास भी कहते हैं—व्यापक, निरंजन, निर्विकार परमात्मा ही कौसल्याकी गोदमें रामचन्द्र होकर प्रकट होते हैं— ब्यापक ब्रह्म निरंजन निर्गुन बिगत बिनोद। सो अज प्रेम भगति बस कौसल्या कें गोद॥ (रा०च०मा० १।१९८) अघासुरके मुखमें कृष्ण-प्रवेशको 'भागवत' ने शुद्ध सच्चिदानन्द ब्रह्मका ही प्रवेश माना है। बछड़ों और ग्वाल-बालोंके अघासुरके मुखमें समाविष्ट होनेपर कृपामय भगवान् आनन्दकन्द कृष्णचन्द्र भी उसके मुखमें प्रविष्ट हुए। प्रभुने जिस समय अपनी महिमासे अघासुरको मार दिया, अमृतवर्षिणी कृपादृष्टिसे ग्वाल- बालोंको जिलाया, उसी समय अघासुरके शरीरसे एक ज्योति निकली और कृष्णके स्वरूपमें प्रविष्ट हो गयी। यह सुनकर परीक्षित्को आश्चर्य हुआ कि गो-ब्राह्मण- मांस-रुधिराशी अघासुरको ऐसी दुर्लभ गति क्यों और कैसे मिली? इसपर शुकाचार्य भगवान् बोले— सकृद् यदङ्गप्रतिमान्तराहिता मनोमयी भागवतीं ददौ गतिम्। स एव नित्यात्मसुखानुभूत्यभि- व्युदस्तमायोऽन्तर्गतो हि किं पुनः॥ (श्रीमद्भा० १०।१२।३९) अर्थात् जिनके श्रीअंगकी मंगलमयी मानसी प्रतिमाको सौभाग्यशाली लोग एक बार भी हृदयमें रखकर भागवती गतिको पा जाते हैं, फिर मायासे असंस्पृष्ट, नित्य, चिदानन्दात्मा वह भगवान् ही जिसके अन्दर प्रविष्ट हो गये, उसे भागवती गति प्राप्त कर लेनेमें क्या आश्चर्य है? अतएव प्रभुके प्रादुर्भावका प्रयोजन भी धर्मग्लानि-अधर्माभ्युत्थान- निवृत्तिपूर्वक धर्मस्थापन, साधुपरित्राण, दुष्कृति-विनाशके अतिरिक्त अमलात्मा परमहंसोंको भक्तियोगका विधान करना है। प्रकृति-प्राकृत-प्रपंचातीत, शुद्ध परब्रह्म कृष्ण ही दिव्य लीलाशक्तिके योगसे सगुण, सच्चिदानन्दरूपमें प्रकट होकर योगीन्द्र, मुनीन्द्रोंके निर्मल मनोंको आकर्षित करते हैं। प्रकृति या प्राकृतप्रपंच उन सत्यानृत-विवेकी अमलात्मा परमहंसोंका मन नहीं खींच सकते, अतएव उनका भजनीय शुद्ध ब्रह्म ही है। भेद इतना ही है कि जैसे इक्षुरसका ही परिणाम सिता, शर्करा, कन्दकी मिठास इक्षुरससे विलक्षण होती है, वैसे ही शुद्ध सच्चिदानन्दसे तत्त्वतः अपृथक् होनेपर भी भगवान्का सगुण स्वरूप अद्भुत चमत्कारपूर्ण होता है। जैसे इक्षुदण्डमें दैवात् मीठा फल लग जाय या चन्दन-वृक्षमें मनोहर पुष्प लग जाय, वैसे ही परमानन्द-रसरूप निर्गुण ब्रह्ममें सगुण, साकार ब्रह्मका होना है। यही तो कारण है कि निर्गुण ब्रह्मानुभवी जनकादिकोंका चित्त भी रामचन्द्रके सगुण, साकार स्वरूपपर मुग्ध हो गया था— सहज बिरागरूप मनु मोरा। थकित होत जिमि चंद चकोरा॥ इन्हहि बिलोकत अति अनुरागा। बरबस ब्रह्मसुखहि मन त्यागा॥ (रा०च०मा० १।२१६।३, ५) साकाररूपमें प्रकट भगवान्के दर्शनमें विलक्षणता जैसे केवल नेत्रसे सूर्य-दर्शनकी अपेक्षा दूरवीक्षण यन्त्रोपहित नेत्रसे सूर्य-दर्शनमें चमत्कार होता है, वैसे ही केवल निर्मल अन्तःकरणसे ब्रह्म देखनेकी अपेक्षा पवित्र अन्तःकरणसे लीलाशक्तिद्वारा साकाररूपमें प्रकट भगवान्के दर्शनमें विलक्षणता होती है। निरुपाधिक स्वरूप निरतिशय है, इसमें भी कोई बाधा नहीं। यद्यपि अन्यान्य प्रपंच भी ब्रह्मका ही परिणाम या विवर्त है तथापि वह तामसी, राजसी प्रकृति— रजस्तमोलेशानुविद्ध सत्त्वात्मिका प्रकृतिसे आवृत रहता है। भगवत्स्वरूप विशुद्ध सत्त्वात्मिका योगमाया या दिव्य लीलाशक्तिसे साकार रूपमें प्रकट ब्रह्म निरावरण ही रहता है। जैसे दूरवीक्षणादि नेत्र और सूर्यके मध्यमें रहकर सूर्य-स्वरूप-दर्शनमें सहायक होता है, अन्य पाषाणादि सूर्य-दर्शनका प्रतिबन्धक हो जाता है, वैसे
निराकारसे साकार ५७९ ही दिव्य लीलाशक्ति परमात्म-स्वरूप दर्शनमें सहायक होती है, अन्य राजसी, तामसी शक्तियाँ प्रतिबन्धक होती हैं। साकाररूपमें किसी भी भावसे चित्त लगानेसे प्राणीका कल्याण कोई तो प्रकृतिसे पृथक् ही भगवान्की अन्तरंगा शक्ति मानते हैं, कोई महाशक्तिके अन्तर्गत होनेपर भी उसे दिव्य मानते हैं। जैसे गुलाबके बीजमें कण्टक, पत्र, नाल, स्कन्धादिकी उत्पादिनी शक्तिसे सौन्दर्य- माधुर्य-सौरस्य-सौगन्ध्य-सम्पन्न फूलको उत्पन्न करनेकी शक्ति विलक्षण होती है, वैसे ही प्रपंचोत्पादिनी अन्यान्य शक्तियोंकी अपेक्षा सगुण, साकार भगवान्के प्राकट्यानुकूला लीलाशक्तिमें चमत्कारपूर्ण विलक्षणता रहती है। सारांश यह है कि शुद्ध परब्रह्म ही निराकार रूपसे ही सगुण, साकार रूपमें प्रकट होते हैं। तभी उनको भाव, कुभाव, अनख, आलस किसी तरहसे भी भजनेसे प्राणियोंकी सद्गति हो जाती है। इसीलिये कहा है— नृणां निःश्रेयसार्थाय व्यक्तिर्भगवतो नृप। अव्ययस्याप्रमेयस्य निर्गुणस्य गुणात्मनः॥ (श्रीमद्भा० १०।२९।१४) अर्थात् प्राणिमात्रके कल्याणार्थ अव्यय, अप्रमेय, निर्गुण, गुणान्तरात्मा भगवान्का साकार स्वरूपमें प्राकट्य होता है। इस स्वरूपमें काम, क्रोध, स्नेह, किसी तरह भी चित्त लगानेसे प्राणीका कल्याण हो जाता है— कामं क्रोधं भयं स्नेहमैक्यं सौहृदमेव च। नित्यं हरौ विदधतो यान्ति तन्मयतां हि ते॥ (श्रीमद्भा० १०।२९।१५) ठीक ही है, जैसे कोई चिन्तामणिको दीपक समझकर उसे लेने चले तो भी वहाँ दीपक नहीं, अपितु चिन्तामणि ही मिलेगी, वैसे परात्पर, पूर्णतम, पुरुषोत्तम, शुद्ध सच्चिदानन्द परब्रह्मको कोई जार समझकर, कोई शत्रु, मित्र, कुछ भी समझकर प्रवृत्त हो, परंतु वहाँ मिलेगा शुद्ध परब्रह्म परमात्मा ही, प्राकृत वस्तुकी प्राप्ति नहीं होगी। अतएव कुछ व्रजांगनाएँ जारबुद्धिसे भी कृष्णको भजकर मुक्त हो गयीं— तमेव परमात्मानं जारबुद्ध्यापि सङ्गताः। जहुर्गुणमयं देहं सद्यः प्रक्षीणबन्धनाः॥ (श्रीमद्भा० १०।२९।११) पति, भ्राता आदिसे अवरुद्ध होनेके कारण कुछ व्रजांगनाएँ मदनमोहनके वेणुनादसे आकर्षित होनेपर वृन्दावनचन्द्र कृष्णचन्द्रके पास न जा सकीं। वे कृष्णकी भावनासे भावितमनस्का होकर, आँख मींचकर वहीं ध्यान करने लगीं। प्रियतम कृष्णके दुःसह विरहजन्य तीव्रतापसे उनके अशुभ कर्म विधूत हो उठे और ध्यानप्राप्त अच्युतके आश्लेष (परिरम्भण)- जन्य आनन्दोद्रेकसे सम्पूर्ण शुभ कर्मोंका भी फल समाप्त हो गया अथवा उनके दुःसह, प्रेष्ठ-विरहजन्य तीव्रतापसे विश्वके ही अशुभ कर्म काँप उठे और ध्यानप्राप्त अच्युतके आश्लेषसे संसारके सम्पूर्ण मंगल अपनेको कम जानकर दुर्बल हो गये। इस तरह सद्यःप्रक्षीणबन्धना होकर जारबुद्धिसे भी उन्हीं परमात्माको प्राप्त होकर वे व्रजांगनाएँ गुणमय पंचकोशों या तीनों देहोंसे मुक्त हो गयीं। सगुणस्वरूपका चिन्तन सरल एवं सुगम भावुकोंने तो इस सगुण स्वरूपके चिन्तनको सरल, सुगम, श्यामीभूत ब्रह्म ही बतलाया है। अद्वैतसिद्धिकारका ही कहना है कि जो लोग निर्गुण, निराकार, निर्विकार ब्रह्मकी उपासना, ध्यानाभ्यासवशीकृत मनसे करते हैं, वे करें, पर मेरे तो लोचन-चमत्कारके लिये वही तत्त्व प्रस्फुरित हो, जो कालिन्दी-पुलिनमें श्यामतेज रहता है— ध्यानाभ्यासवशीकृतेन मनसा तन्निर्गुणं निष्क्रियं ज्योतिः किञ्चन योगिनो यदि परं पश्यन्ति पश्यन्तु ते। अस्माकं तु तदेव लोचनचमत्काराय भूयाच्चिरं कालिन्दीपुलिनेषु यत्किमपि तन्नीलं महो धावति॥ किन्हीं भावुकोंने व्रजांगनाओंके पुंजीभूत प्रेमको ही कृष्ण माना है, किन्हींने यदुओंके मूर्तीभूत भागधेयको ही कृष्ण माना है, श्रोत्रियोंने श्रुतियोंके गुप्त वित्तको
ही श्यामीभूत ब्रह्म कृष्ण माना है— पुञ्जीभूतं प्रेम गोपाङ्गनानां मूर्तीभूतं भागधेयं यदूनाम्। एकीभूतं गुप्तवित्तं श्रुतीनां श्यामीभूतं ब्रह्म मे सन्निधत्ताम्॥ किसीका कहना है कि पूर्णानुरागरससार- सरोवरसमुद्भूत पंकज श्रीकृष्ण है, किसीने कहा नहीं, सच्चिदानन्दरससार-सरोवरसे ही इस कृष्ण-कुवलयका प्राकट्य हुआ है। वह ऐसा कुवलय है कि भृंगों (भक्तमनोमिलिन्दों)-ने अभीतक उसका आघ्राण किया ही नहीं। चाहे ऐसा कह लें कि यद्यपि वे अनादि कालसे ही उस कृष्णके सौन्दर्य-कुवलयमधुका पान कर रहे हैं तथापि उन्हें प्रतिदिन, प्रतिक्षण उसमें नवीनताका ही स्फुरण होता है अर्थात् प्रतिक्षण ही उसमें नवीनताका ही भान होता रहता है— 'तस्याङ्घ्रियुगं नवं नवम्' इसी तरह कवीन्द्ररूप अनिलोंने अभीतक इस कुवलयके यशःसौरभका अपहरण नहीं किया अर्थात् उन्हें भी नवीनताकी ही स्फूर्ति होती है। ऊर्मीकणभरोंसे—सांसारिक षडूर्मियोंसे— यह कुवलय आहत नहीं हुआ। इतना ही क्यों, आजतक किसीने इसे देखा भी नहीं है— अनाघ्रातं भृङ्गैरनपहृतसौगन्ध्यमनिलै- रनुत्पन्नं नीरेष्वनुपहतमूर्मीकणभरैः। अदृष्टं केनापि क्वचन च चिदानन्दरससो यशोदायाः क्रोडे कुवलयमिवौजस्तदभवत्॥ (आनन्दवृन्दावनचम्पू २।११) देवकीने मुक्त मुनीन्द्रोंका अन्वेष्टव्य एक अद्भुत फल उत्पन्न किया, व्रजेन्द्रगेहिनी नन्दरानीने उसे पाला, श्रीव्रजसीमन्तिनियोंने उस फलका अनुभव किया— मुक्तमुनीनां मृग्यं किमपि फलं देवकी फलति। तत्पालयति यशोदा प्रकाममुपभुञ्जते गोप्यः॥ (पद्यावली २९९) श्रुतियोंमें सगुण-साकाररूपकी अवधारणा सच्चिदानन्द परब्रह्मका सगुण, साकार रूप होता है, यह 'केनोपनिषद्' में भी प्रसिद्ध है। देवासुर-संग्राममें परमेश्वरके अनुग्रहसे देवताओंको जय मिली, परंतु देवताओंने समझा कि हमारे ही परिश्रमका यह फल हुआ। भगवान्ने समझ लिया कि यदि इन्हें भी गर्व हुआ तो असुरोंसे इन देवताओंमें अन्तर ही क्या रह जायगा? असुषु प्राणोपलक्षितेषु अनात्मसु रमन्ते ये ते असुराः। अथवा अशोभने अनात्मनि रमन्ते ये ते असुराः। अर्थात् अशोभन अनात्मामें रमण करनेवाले असुर कहलाते हैं। भगवान् यह सोचकर परम प्रकाशमय सगुण, साकार, दिव्य रूपमें प्रकट हुए। उस स्वरूपको देखते ही देवता घबड़ाये और 'सपक्षका है या विपक्ष का' यह जाननेके लिये अग्नि, वायु और इन्द्रको भेजा। अग्नि, वायु उस परमात्माके सामने एक तृण भी उठाने एवं जलानेमें समर्थ न हुए। दोनों देवताओंके लौटनेपर इन्द्र गये। इन्द्रको आते देखते ही वे प्रभु अन्तर्हित हो गये। इन्द्र लज्जित होकर वहीं उस स्वरूपकी जिज्ञासासे तप करने लगे। बहुत दिनोंके तपसे भगवती उमा (ब्रह्मविद्या) प्रकट हुईं और उन्होंने ब्रह्मका परिचय कराया। ब्रह्मज्ञानी होनेसे ही देवताओंमें अग्नि, वायु, इन्द्र प्रधान हैं। उनमें भी इन्द्रने पहले ब्रह्मका परिचय प्राप्त किया, अतः वही श्रेष्ठ माने गये हैं। 'ब्रह्म ह देवेभ्यो विजिग्ये' इत्यादि श्रुतियोंमें ये बातें स्पष्ट हैं। 'छान्दोग्य' में भी सूर्यमण्डलान्तर्गत एक हिरण्मय, हिरण्यश्मश्रु, तेजोमय परम पुरुषका वर्णन आता है, वह भी सच्चिदानन्द ब्रह्मका ही सगुण, साकार रूप है। यह बात उत्तरमीमांसाके 'अन्तस्तद्धर्मोपदेशात्' इस सूत्रमें भी स्पष्ट है। आचार्य श्रीशंकरभगवान् कहते हैं कि परमात्माका माया (विशुद्ध सत्त्व)-के योगसे विग्रह बन सकता है। यद्यपि वह भूतगुणों—शब्दादिसे युक्त प्रतीत होता है तथापि वह शुद्ध सच्चिदानन्द ब्रह्म ही है। शब्दादिमत्ताकी प्रतीति उसमें भ्रान्ति ही है। 'कैवल्योपनिषद्' में 'उमासहायं परमेश्वरं विभुम्' इस वचनसे भी उमा-महेश्वरका स्वरूप वर्णित है। 'अतो देवा अवन्तु नो यतो विष्णुर्विचक्रमे। पृथिव्याः सप्तधामभिः' इस मन्त्रमें बतलाया गया है कि विष्णुगायत्र्यादि सप्त छन्दोंद्वारा देशपर विविध
क्रमण-चरण-विन्यास करते हैं। 'इदं विष्णुर्वि चक्रमे त्रेधा नि दधे पदम्। समूढमस्य पाꣳसुरे स्वाहा'। इस मन्त्रसे ज्ञात होता है कि त्रिविक्रमावतारधारीने इस प्रतीयमान विश्वको अपने चरणोंसे आक्रान्त किया है, अपने चरणसे तीन प्रकारसे पादविन्यास किया है। इन विष्णुके धूलियुक्त पादस्थानमें सम्पूर्ण विश्व अन्तर्भूत होता है। 'त्रीणि पदा वि चक्रमे विष्णुर्गोपा अदाभ्यः। अतो धर्माणि धारयन्' इसमें भी कहा गया है कि किसीके द्वारा जिसकी हिंसा नहीं हो सकती, उस सर्वजगत्के रक्षक विष्णुने अग्निहोत्रादि कर्मोंका पोषण करते हुए पृथिव्यादि स्थानोंमें अपने तीन पदोंसे क्रमण किया। इस तरह अनेक श्रुतियोंमें परमात्माके सगुण, साकार रूपका वर्णन है। 'प्रजापतिश्चरति गर्भे अन्तरजायमानो बहुधा वि जायते। तस्य योनिं परि पश्यन्ति धीरास्तस्मिन् ह तस्थुर्भुवनानि विश्वा।।' यहाँ भी कहा है कि प्रजापति गर्भके भीतर आता है, वह स्वरूपसे अज होकर भी अनेक रूपोंसे प्रकट होता है, उसके प्राकट्यका धर्मरक्षणादि प्रयोजन धीर लोग जानते हैं। 'या ते रुद्र शिवा तनूरघोराऽपापकाशिनी। तया नस्तन्वा शन्तमया गिरिशन्ताभि चाकशीहि॥' 'नीलग्रीवाः शितिकण्ठाः' इत्यादि अनेक स्थानोंमें परमेश्वरका ही नीलकण्ठ महादेवरूपमें वर्णन मिलता है। एषो ह देवः प्रदिशोऽनु सर्वाः पूर्वो ह जातः स उ गर्भे अन्तः। स एव जातः स जनिष्यमाणः प्रत्यङ् जनास्तिष्ठति सर्वतोमुखः ॥ इस मन्त्रमें कहा गया है कि यही ईश्वर सब दिशाओंमें व्याप्त होकर, पहले गर्भमें रहकर प्रकट हुआ, वही सर्वतोमुख परमेश्वर पहले अनेक रूपसे उत्पन्न हुआ है और आगे भी उत्पन्न होगा। अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्। प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया॥ (गीता ४।६) इस श्लोकपर निम्नलिखित अभिप्राय केशव काश्मीरीका है- 'यद्यपि मैं अज हूँ अर्थात् जीवोंके समान कर्मनिमित्त अपूर्व देह-ग्रहण नहीं करता, अव्ययात्मा=पूर्वदेहवियोगरहित हूँ तथापि अपनी प्रकृति (स्वभाव) - असंगत्व, अजेयत्व, अनतिक्रमणीयत्वादिको न छोड़कर ही अपनी माया - संकल्पसे लोकहितार्थ जन्म लेता हूँ।' इस व्याख्यानमें 'प्रकृति' का अर्थ स्वभाव और 'माया तु वयुनं ज्ञानम्' इस 'निघण्टु' वचनसे 'माया' का अर्थ ज्ञान लिया गया है। 'अजायमानो बहुधा विजायते' (मुद्गल० ३।१) इस श्रुतिसे भी यही सिद्ध किया गया है। 'आनन्दरूपममृतं यद् विभाति' (मुण्डक २।२।७), 'आदित्यवर्णं तमसः परस्तात्' (श्वेता० ३।८), 'हिरण्यश्मश्रुर्हिरण्यकेशः आप्रणखात्सर्व एव सुवर्णः' (छान्दोग्य० १।६।६) इत्यादि श्रुतियोंसे भगवान्का सगुण स्वरूप मालूम पड़ता है। 'यो वेत्ति भौतिकं देहं कृष्णस्य परमात्मनः। मुखं तस्यावलोक्याऽपि सचैलं स्नानमाचरेत् ॥ स सर्वस्माद्बहिष्कार्यः श्रौतस्मार्तविधानतः।' 'न भूतसङ्घसंस्थानो देहोऽस्य परमात्मनः।' अस्यापि देव वपुषो मदनुग्रहस्य स्वेच्छामयस्य न तु भूतमयस्य कोऽपि। (श्रीमद्भा० १०।१४।२) इत्यादि 'भारत' 'भागवत' आदिके वचनोंसे भी भगवान्के स्वरूपको अभौतिक कहा गया है, भौतिक माननेवालेको पातकी बतलाया गया है। मधुसूदनजी कहते हैं कि सर्वज्ञ ईश्वरको धर्माधर्म न होनेसे उनका जन्म नहीं बन सकता। नये देहेन्द्रियादिका ग्रहण जन्म और पूर्वगृहीतका वियोग मृत्यु कहलाता है। ये दोनों ही बातें अज, अव्यय परमात्मामें सम्भव नहीं हैं। यदि ईश्वरका शरीर स्थूल भूतकार्य हो या व्यष्टिरूप हो तो जाग्रदवस्थाभिमानी जीवोंके तुल्य ही ईश्वर भी होगा। समष्टिरूप हो तो विराट् जीवरूप होगा। यदि सूक्ष्मभूतका कार्य है या व्यष्टिरूप है तो स्वप्नावस्थाभिमानी होगा और यदि समष्टिरूप हो तो हिरण्यगर्भ होगा। परमेश्वरका
५८२ भक्तिसुधा भौतिक स्वरूप जीवाविष्ट हो ही नहीं सकता। कुछ लोग कहते हैं कि जीवाविष्ट शरीरमें ही 'भूतावेशन्याय' से ईश्वरका प्रवेश होता है, परंतु यह ठीक नहीं; क्योंकि यदि इस शरीरमें जीवको ही सुख-दुःखादि भोग होता है, ईश्वरको नहीं, तब तो अन्तर्यामीरूपसे सर्वत्र ही परमेश्वरका प्रवेश सिद्ध है, फिर ऐसा शरीर-विशेष स्वीकार करना व्यर्थ ही है। यदि उस शरीरमें जीवका भोग नहीं बनता, तब तो उसे जीवशरीर भी नहीं कहा जा सकता, अतः ईश्वरका भौतिक शरीर कथमपि नहीं बन सकता। इन्हीं बातोंका निराकरण करते हुए भगवान् कहते हैं कि 'मैं अज और अव्यय होता हुआ भी, ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्त समस्त प्राणियोंका ईश्वर होकर भी, अपनी विचित्र शक्तिवाली अघटितघटनापटीयसी उपाधिभूत मायाको अपने चिदाभाससे वशीभूत करके मायाके परिणामविशेषोंसे ही देहवान्के समान उत्पन्न- सा प्रतीत होता हूँ। अनादि माया ही यावत्कालस्थायी होनेसे नित्य कहलाती है। वही मुझमें जगतकारणता सम्पादन करती है। वह मेरी इच्छासे ही प्रवर्तमान होकर विशुद्ध सत्त्वमयी मेरी मूर्ति कहलाती है। उस मूर्तिसे विशिष्ट मुझमें अजत्व, अव्ययत्व, ईश्वरत्व उपपन्न हो जाता है।' अतएव श्रुति कहती है— 'आकाशशरीरं ब्रह्म' (तैत्तिरीयोपनिषद् वल्ली १ अनुवाक ६) आकाश अर्थात् माया ही भगवान्का शरीर है। यहाँ शंका हो सकती है कि भौतिक शरीर न होनेपर भगवान्में मनुष्यत्वादि-प्रतीति कैसे होगी? इसका समाधान यह है कि आत्ममाया (भगवान्की माया)-से ही लोकानुग्रहके लिये भगवान्में मनुष्यत्वादि- प्रतीति होती है। यही बात 'मोक्षधर्म' में लिखी है— माया ह्येषा मया सृष्टा यन्मां पश्यसि नारद॥ सर्वभूतगुणैर्युक्तं नैवं त्वं ज्ञातुमर्हसि। (महा०, शान्ति० ३३९।४५-४६) एतत् त्वया न विज्ञेयं रूपवानिति दृश्यते॥ इच्छन् मुहूर्तान्नश्येयमीशोऽहं जगतो गुरुः। (महा०, शान्ति० ३३९।४४-४५) अर्थात् हे नारद! मुझ कारणोपाधि परमेश्वरको जो भूतगुण-शब्दादिसे युक्त देख रहे हो, यह मेरी माया ही है। मुझ कारणोपाधिको कोई चर्मचक्षुसे नहीं देख सकता। कुछ लोग परमेश्वरमें देह-देहि-भाव ही नहीं मानते। उनका कहना है कि सच्चिदानन्दघन, निर्गुण, परिपूर्ण परमात्मा ही भगवान्का देह है। भगवान्से पृथक् भौतिक या मायिक उनका कोई भी विग्रह नहीं है। 'आकाशवत्सर्वगतश्च नित्यः', 'अविनाशी वा अरेऽयमात्मा अनुच्छित्तिधर्मा' इत्यादि श्रुतियों और 'असम्भवस्तु सतोऽनुपपत्तेर्नात्माऽश्रुतेर्नित्य- त्वाच्च ताभ्यः' इत्यादि सूत्रोंसे यही विदित होता है कि वस्तुतः भगवान् जन्म-विनाशरहित, सर्वभासक, सर्वकारण, मायाका अधिष्ठान होनेसे सर्वभूतोंके ईश्वर होकर भी अपने एकरस, सच्चिदानन्दघनस्वभावमें ही अवस्थित रहकर देह-देहिभावके बिना ही देहिवत् व्यवहरण करते हैं। अदेह सच्चिदानन्दघनमें देहकी प्रतीति कैसे होती है? इसका उत्तर 'आत्ममायया' से ही दे दिया है। निर्गुण, शुद्धरस, देहदेहिभावशून्य भगवान्में देहरूपसे प्रतीति मायामात्र है। यही 'श्रीमद्भागवत' में भी— कृष्णमेनंमवेहि त्वमात्मानमखिलात्मनाम्। जगद्धिताय सोऽप्यत्र देहीवाभाति मायया॥ (१०।१४।५५) अहो भाग्यमहो भाग्यं नन्दगोपव्रजौकसाम्। यन्मित्रं परमानन्दं पूर्णं ब्रह्म सनातनम्॥ (१०।१४।३२) इत्यादि वचनोंसे यह स्पष्ट कहा गया है कि सम्पूर्ण प्राणियोंके अन्तरात्मा श्रीकृष्ण ही हैं, वे ही अपनी मायासे जगत्के हितके लिये देहवान्से प्रतीत होते हैं। नन्दगोपव्रजवासियोंका लोकोत्तर सौभाग्य था कि पूर्ण सच्चिदानन्दघन उनका मित्र होकर प्रकट हुआ था। कुछ लोग निरवयव, निर्विकार परमानन्दका ही अवयवावयविभाव वास्तविक ही मानते हैं, परंतु
'नियुक्तिकं ब्रुवाणश्च नास्माभिर्विनिवार्यते' इस न्यायसे उनके लिये हम कुछ कहना नहीं चाहते। यदि ऐसा सम्भव हो तो रहे। श्रीशंकरानन्दजीका इस विषयमें कहना है कि यद्यपि 'कर्मणा जायते जन्तुः कर्मणैव प्रलीयते' इस वचनके अनुसार कर्मोंसे ही प्राणीका जन्म और विनाश होता है, परमेश्वरमें जन्महेतु पुण्य-पाप न होनेसे जन्म असम्भव है तथापि मायाद्वारा परमेश्वरका जन्म असम्भव नहीं, अतएव अज, अव्यय, निरवयव होनेपर भी भगवान्का जन्म मायासे हो जाता है। कहा जा सकता है कि श्रीकृष्ण परमेश्वरका कर्मनिमित्त जन्म न होनेपर भी उनका कोई नियन्ता अवश्य होगा। इसी भ्रमको दूर करनेके लिये भगवान्ने कहा है—'भूतानामीश्वरोऽपि सन्' (गीता ४।६) अर्थात् प्राणियोंका ईश्वर होनेपर भी 'एष सर्वेश्वरः' (माण्डूक्य० ६) इत्यादि श्रुतिके अनुसार सबका नियन्ता परमात्मा ही है, वह किसीके नियोगका विषय नहीं है। इस तरह अज, अव्यात्मा, ईश्वर होकर भी अपनी दैवी प्रकृति मायाका सहारा लेकर वे उत्पन्न हो सकते हैं। वह्निके दग्धृत्व शक्तिके समान परमेश्वरकी अभिन्न शक्ति ही उनकी माया है। यही बात 'देवात्मशक्तिं स्वगुणैर्निगूढाम्'' (श्वेताश्वतर० १।३) इत्यादि श्रुतियोंसे कही गयी है। उसी मायासे भगवान् जन्मवान्से प्रतीत होते हैं। वस्तुतः भगवान् निष्कल एवं निष्क्रिय ही हैं। इस विषयमें श्रीआनन्दतीर्थका कहना है कि भगवान् अज और अव्ययात्मा होकर भी प्रकृतिसे जात, वसुदेवादिसे जात होकर प्रतीत होते हैं। इस मतमें भगवान्का देह ही अव्यय है, उसीको नाना अवतारोंका निधान और अव्यय बीज माना है— 'एतन्नानावताराणां निधानं बीजमव्ययम्।' (श्रीमद्भागवत १।३।५) इस मतमें आत्ममायाका अर्थ आत्मज्ञान है; क्योंकि प्रकृतिका निर्देश पृथक् आ चुका है। 'मतिः क्रतुर्मनीषा माया' इत्यादि कोशमें 'मनीषा' के अर्थमें 'माया' शब्द आया है। श्रीमद्रामानुजाचार्यका कहना है कि भगवान् अपने अजत्व, अव्ययत्व, सर्वेश्वरत्वादि सम्पूर्ण ऐश्वर्योंको न छोड़ते हुए ही अपनी प्रकृति अर्थात् स्वभावमें अवस्थित रहकर ही स्वेच्छासे अवतीर्ण होते हैं। 'आदित्यवर्णं तमसः परस्तात्', 'य एषोऽन्तरादित्ये हिरण्मयः' इत्यादि श्रुतियोंने भगवान्के सगुण, साकार स्वरूपका स्पष्टीकरण किया है। इनके मतमें भी 'माया तु वयुनं ज्ञानम्' इत्यादि अभियुक्तियोंसे मायाका अर्थ ज्ञान ही है। तथा च आत्ममायया- का अभिप्राय है आत्मसंकल्प। अतः भगवान् आत्म- संकल्पसे ही, अपने अपहतपाप्मत्वादि ऐश्वर्यस्वभावको न छोड़ते हुए ही देव-मनुष्यादिरूपसे प्रतीत होते हैं। 'अजायमानो बहुधा विजायते' इस श्रुतिका भी अभिप्राय यही है कि भगवान् इतरपुरुषसाधारण जन्मसे रहित होनेपर भी स्वसंकल्पसे देवादिरूपसे जायमान होते हैं। श्रीनीलकण्ठजीका कहना है कि 'अजोऽपि सन् अव्ययात्मा' इस श्लोकद्वारा देहविशिष्ट परमात्माका ही अजत्व, अव्ययत्व कहा गया है। देहादिरहित केवल आत्माका अजत्व, अव्ययत्व तो 'न त्वेवाहं जातु नासम्' (गीता २।१२) इत्यादि श्लोकोंसे पहले ही कहा जा चुका है। 'भूतानामीश्वरोऽपि सन्' इस अंशसे देहविशिष्ट परमेश्वरका ही ईश्वरत्व सिद्ध किया गया है, अन्यथा देहादिसे निकृष्ट अस्मदादि भी ईश्वरत्व तत्त्वमस्यादि वचनोंसे स्पष्ट ही है। आदित्यान्तर्यामी परमेश्वरका हिरण्यश्मश्रुत्वादि- विशिष्ट देह जन्म-मरणवाला है, यह कोई नहीं कह सकता; क्योंकि फलकी पराकाष्ठा हिरण्यगर्भ-देहकी प्राप्ति ही है, हिरण्यश्मश्रुत्वादिविशिष्ट स्वरूप तो अकर्मज होनेसे नित्य ही है। भगवद्विग्रहका उपादान कुछ लोगोंका कहना है कि 'पुरुषो ह वै नारायणोऽकामयत। अत्यतिष्ठेयं सर्वाणि भूतानि। अहमेवेदं सर्वं स्याम्। इति स एतं पुरुषमेधं पञ्चरात्रं यज्ञक्रतुमपश्यत्' इत्यादि 'शतपथ' के वचनसे मालूम होता है कि पंचरात्राख्य कर्मविशेषका
५८४ भक्तिसुधा फल ही नारायणका सर्वभूतातिक्रमणलक्षण ईश्वरत्व है। परंतु यह कहना ठीक नहीं; क्योंकि यहाँ 'नारायण' शब्दसे हिरण्यगर्भ ही विवक्षित है। स्वभावसे ही पूर्णकाम परमेश्वरमें कामना नहीं हो सकती। कहा जा सकता है कि 'सोऽकामयत' इत्यादि वचनोंसे परमेश्वरमें भी कामना प्रसिद्ध है। परंतु यह कहना ठीक नहीं; क्योंकि 'आप्तकामस्य का स्पृहा' (माण्डूक्यकारिका १।९) 'लोकवत्तु लीलाकैवल्यम्' (ब्रह्मसूत्र २।१।३३) इत्यादि स्मृति-सूत्रोंसे निष्काम परमेश्वरमें भी लीलासे ही अनन्त ब्रह्माण्डका सर्जन कहा गया है, अतः भगवान्का शरीर कर्मफल नहीं है, अतएव भौतिक भी नहीं है; क्योंकि विराट् और सूत्रात्मासे अतिरिक्त भौतिक शरीर नहीं होता। यहाँ शंका होती है कि फिर भगवद्विग्रहका उपादान क्या है ? अविद्या उपादान है, ऐसा नहीं कहा जा सकता; क्योंकि स्वप्रकाश ज्ञानस्वरूप परमात्मामें अविद्याका होना सम्भव नहीं है। जीवकी अविद्या भगवान्के शरीरका उपादान है, ऐसा भी नहीं कह सकते, क्योंकि ऐसी स्थितिमें भगवच्छरीरको शुक्ति-रजतादिकी तरह कल्पित ही कहना पड़ेगा। शुद्ध चैतन्य ही भगवान्का शरीर है, यह भी नहीं कहा जा सकता; क्योंकि बोध या चैतन्यकी साकाररूपसे प्रसिद्धि नहीं है। यदि कथंचित् चैतन्यको ही भगवान्का शरीर मान लिया जाय तो चैतन्यके समान ही भगवद्विग्रह भी अतीन्द्रिय होगा। ऐसी स्थितिमें प्रश्न बना रहता है कि भगवान्के विग्रहका उपादान क्या है ? इसके उत्तरमें नीलकण्ठजी कहते हैं कि भगवान् अपनी प्रकृतिका ही आश्रय लेकर आत्ममायासे प्रकट होते हैं। जीवात्मा अनात्मभूता तेजोवन्नात्मिका या पंचभूतात्मिका प्रकृतिका सहारा लेकर जन्म ग्रहण करता है, भगवान् प्रत्यक्चैतन्यसे अभिन्न स्वरूपभूतका ही सहारा लेकर अर्थात् किसी दूसरे उपादानकी अपेक्षा न करके ही अपनी मायासे देव, मनुष्यादिरूपमें प्रकट होते हैं। जैसे कोई मायावी स्वयं अपने स्थानसे अप्रच्युत स्वभाव रहकर ही अदृश्य होकर, स्थूल-सूक्ष्म भूतोंको बिना गृहीत किये ही, केवल मायासे सूत्रमार्गसे आकाशपर चढ़ते हुए अपने सदृश ही एक दूसरे मायावीको रचता है, ठीक वैसे ही कूटस्थ चिन्मात्र भगवान् अपनी मायासे चिन्मय शरीरको रचते हैं, सूत्रारोहणके समान बाल-यौवनादि अवस्थाओंको दिखलाते हैं। मायावी और भगवान्में इतना ही भेद होता है कि मायावी मायाका उपसंहरण करता हुआ दूसरे मायावीका भी उपसंहार कर लेता है, भगवान् माया और विग्रह दोनोंका ही उपसंहरण नहीं करते। इस दृष्टिसे हिरण्यश्मश्रुत्वादिविशिष्ट चैतन्यको 'अन्तस्तद्धर्मोप- देशात्' (ब्रह्मसूत्र १।१।२०) इस सूत्रसे वियदादिका उपादान और सर्वेश्वर बतलाया गया है। अतएव अन्यत्र भी 'नित्यैव सा जगन्मूर्तिः' (श्रीदुर्गासप्तशती १।६४) इत्यादि वचनोंसे भगवन्मूर्तिको नित्य कहा गया है। देवानां कार्यसिद्धयर्थमाविर्भवति सा यदा ॥ उत्पन्नेति तदा लोके सा नित्याप्यभिधीयते । (श्रीदुर्गासप्तशती १।६५-६६) इत्यादि वचनोंसे स्पष्ट कहा गया है कि नित्य भगवन्मूर्तिका ही प्रयोजनवशात् प्रादुर्भाव ही उत्पत्ति शब्दसे कहा गया है। भगवान् श्रीशंकराचार्यका कहना है कि अज, जन्मरहित तथा अव्ययात्मा, अक्षीणज्ञानशक्तिस्वभाव ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्त समस्त भूतोंके ईश्वर होकर भी भगवान् (जिसके वशमें सारा जगत् है और जिससे मोहित होकर अपने अन्तरात्मा प्रत्यक्चैतन्याभिन्न वासुदेवको नहीं जानता, उस अपनी) वैष्णवी मायाको स्ववश करके आत्ममायाद्वारा देहवान् एवं उत्पन्नसे प्रतीत होते हैं। यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत । अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥ (गीता ४।७) अर्थात् जब-जब प्राणियोंके अभ्युदय-निःश्रेयसके साधनभूत वर्णाश्रमादि लक्षण धर्मकी ग्लानि होती है और अधर्मका अभ्युत्थान होता है, तब-तब मैं अपने
आत्माका सृजन करता हूँ। सन्मार्गस्थ साधुओंके परित्राण एवं पापकमी प्राणियोंके विनाशार्थ तथा धर्मकी सम्यक् स्थापनाके लिये मैं भिन्न-भिन्न युगोंमें अवतीर्ण होता हूँ। इस विषयमें श्रीमद्रामानुजाचार्यका कहना है कि जो धर्मात्मा वैष्णवाग्रगण्य मेरे समाश्रयणमें प्रवृत्त हैं और वाक् तथा मनसे मेरे नाम, कर्म और स्वरूपोंको अतीत होनेसे मेरे दर्शनके बिना अपने धारण-पोषणके भी सुखको न प्राप्त करते हुए अणुमात्र कालको भी हजारों कल्पके समान मानते हैं, जिसके सम्पूर्ण गात्र प्रशिथिलप्राय हैं, उन्हें अपने स्वरूप, चेष्टित, अवलोकन, आलाप आदि दानसे उनके परित्राणके लिये, तद्विपरीतोंके विनाशके लिये, क्षीण वैदिक धर्मका स्वस्वरूप- प्रदर्शनद्वारा स्थापनके लिये देव, मनुष्य आदि रूपमें भगवान् अवतीर्ण होते हैं। जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः। त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन॥ (गीता ४।९) अर्थात् मेरे दिव्य, अलौकिक मायारूप जन्म तथा साधु-परित्राणादि कर्मको जो तत्त्वतः जानता है, वह इस देहको छोड़कर मुझे प्राप्त हो जाता है, पुनः उत्पन्न नहीं होता। इस विषयमें श्रीमद्-रामानुजाचार्यका कहना है कि कर्मोंकी मूलभूत त्रिगुणात्मक प्रकृतिके संसर्गरूप जन्मसे रहित, सर्वसर्वेश्वरत्व, सर्वज्ञत्व, सत्यसंकल्पत्वादि समस्त कल्याणगुणोंसे युक्त, साधुपरित्राण और मेरा समाश्रयण ही है एक मुख्य प्रयोजन जिसका, उस मेरे दिव्य, अलौकिक जन्म- चेष्टितको जो तत्त्वतः यथावत् जानता है, वह वर्तमान देह छोड़कर पुनः जन्मग्रहण नहीं करता, मुझे ही प्राप्त हो जाता है। मेरे अलौकिक जन्म, चेष्टितके यथार्थ ज्ञानसे समस्त मेरे समाश्रयणके विरोधी पाप नष्ट हो जाते हैं, प्राणी मुझे सर्वथा प्राप्त कर लेता है। प्राकट्यके विषयमें विभिन्न अभिमतोंकी मीमांसा और निष्कर्ष इन पूर्वोक्त श्लोकों और व्याख्यानोंसे यह स्पष्ट है कि भगवान्का सगुण, साकार, सच्चिदानन्द स्वरूप बनता है। प्रपंच-सत्यत्ववादी लोग तो भगवान्का साकार विग्रह उनकी लीलाशक्तिसे मानते ही हैं। कुछ लोग ऐसा मानते हैं कि दिव्य अचित् तत्त्वसे भगवान्का विग्रह बनता है और अनेक लोग यह मानते हैं कि चिदानन्द तत्त्व ही साकार विग्रहवान् होकर प्रकट होता है। अद्वैत वेदान्तके अनुसार एक पक्षमें विशुद्धसत्त्व ही से भगवान्का विग्रह बनता है, उसीको माया भी कहा जा सकता है। इसी दृष्टिसे भगवान्के विग्रहको मायामय भी कहा जाता है। 'भागवत' में कहा गया है कि प्रभो! आप प्राणियोंके कल्याणके लिये विशुद्ध सत्त्वका समाश्रयण करते हैं—'सत्त्वं विशुद्धं श्रयते भवान् स्थितौ' (श्रीमद्भागवत १०।२।३४) यह भी कहा गया है कि यदि आप विशुद्ध सत्त्वमय विग्रह न धारण करते तो अज्ञानका भेदन करनेवाला अपरोक्ष ज्ञान ही न उत्पन्न होता। सर्वेन्द्रियों तथा अन्तःकरण-वृत्तियोंके भासक रूपमें आत्माका बोध हो सकनेपर भी निष्प्रपंच, निरुपद्रव, सर्वभेदविवर्जित, स्वप्रकाश, निरावरण तत्त्वका अपरोक्ष साक्षात्कार होना दुर्लभ होता, परंतु आपके सगुण, साकार विग्रहका ध्यान करनेसे चित्तकी एकाग्रता, निर्वृत्तिकता होनेसे द्रष्टा-दर्शन-दृश्य-भेदशून्य, सर्वाभावभासक, अखण्ड, अद्वैततत्त्वका बोध हो जाता है— सत्त्वं न चेद्धातरिदं निजं भवेद् विज्ञानमज्ञानभिदापमार्जनम् । गुणप्रकाशैरनुमीयते भवान् प्रकाशते यस्य च येन वा गुणः॥ (श्रीमद्भा० १०।२।३५) भगवान्का विग्रह भगवदिच्छामय है, इस पक्षमें भी विशुद्ध सत्त्व ही भगवान्की इच्छा है— अस्यापि देव वपुषो मदनुग्रहस्य स्वेच्छामयस्य न तु भूतमयस्य कोऽपि। नेशे महि त्ववसितुं मनसान्तरेण साक्षात्तवैव किमुतात्मसुखानुभूतेः॥ (श्रीमद्भा० १०।१४।२)
४. चतुर्थ तरंग: नाम-महिमा, अनन्यता, शरणागति एवं भक्ति सुधा उपसंहार
५८६ भक्तिसुधा कुछ लोग कहते हैं कि भक्तकी भावना ही भगवान् है। भक्तकी भावना बहुत प्रधान है, भक्त- भावनाके अनुसार भगवान् अपना रूप बनाते हैं, केवल भावना ही भगवान् नहीं है— यद्यद्धिया त उरुगाय विभावयन्ति तत्तद्वपुः प्रणयसे सदनुग्रहाय॥ (श्रीमद्भा० ३।९।११) अर्थात् भक्त लोग भक्तियुक्त प्रज्ञासे आपके जैसे-जैसे रूपकी भावना करते हैं, आप वैसा-ही- वैसा स्वरूप धारण कर लेते हैं। विशुद्ध सत्त्व एवं लीलाशक्तिके योगसे निर्विकार, निराकार परमात्मा ही साकार होकर प्रकट होते हैं। जैसे जलके बर्फ बननेमें शैत्य निमित्त होता है, वैसे ही निराकार, निर्विकार परमात्माके साकार होनेमें विशुद्ध सत्त्व निमित्त होता है। दूसरे पक्षका सिद्धान्त यह है कि कूटस्थ, निर्विकार शुद्ध परमात्मा ही देहवान्-सा प्रतीत होता है, वस्तुतः देहदेहिभाव है ही नहीं। कृष्णचन्द्रका जन्म, कर्म सब कुछ दिव्य है अर्थात् सब कुछ विशुद्ध ब्रह्म ही है, ब्रह्मसे अतिरिक्त और कोई भी वस्तु नहीं है। भगवान्की अचिन्त्य शक्ति अन्यान्य प्रापंचिक शक्तिसे विलक्षण परम शुद्ध होनेपर भी अनिर्वचनीयता- अंशमें समान ही है। इस तरह अद्वैत-सिद्धान्तकी सुरक्षाके साथ-साथ ही भगवान्का सगुण, साकार स्वरूप भी सिद्ध हो जाता है। सर्वथापि भगवान्के अवतारमें अवान्तर मतभेद होनेपर भी किसी सनातनधर्मीको विवाद नहीं है। भगवान् भाष्यकार शंकराचार्य तो अपने 'प्रबोधसुधाकर' नामक ग्रन्थमें बड़े समारोहसे सगुण-निर्गुणका ऐक्य कहते हैं। उन्हीं आचार्यचरणोंने बदरीनारायण, हृषीकेश (भरतजी) आदि अनेक मूर्तियोंकी स्थापना की है। अद्वैत- सम्प्रदायके अनेक आचार्योंने सगुण, साकार भगवान्के स्वरूपका समर्थन किया है। अतः यह कथन कथमपि संगत नहीं है कि निराकार ब्रह्म साकार नहीं हो सकता। निर्गुण या सगुण ध्याता, ध्यान और ध्येय श्रीभगवान्के स्वरूपमें अन्तरात्मा और अन्तःकरणके आकर्षित हो जानेपर सहजमें ही प्रत्यक् चैतन्याभिन्न अखण्डानन्द स्वरूपका साक्षात्कार हो जाता है। श्रीकपिलदेवजीने अपनी माँ श्रीदेवहूतिजीको प्रथम असंग, अनन्त, निराकार, निर्गुण परतत्त्वका सम्यक् उपदेश करनेके अनन्तर उसमें स्थितिके लिये सगुण स्वरूपका वर्णन करके उसके ध्यानकी परमावश्यकता बतलायी है। अति मधुर सुन्दर भगवान्के स्वरूपमें चित्त जैसे-जैसे अधिक आकर्षित होता है, वैसे-ही- वैसे उसकी निर्मलता और स्वच्छता बढ़ती है एवं चित्तके अधिकाधिक स्वच्छ होनेपर प्रभुस्वरूपमें चित्तकी और अधिक आसक्ति होती है। जैसे अयस्कान्त मणि (चुम्बक)-में स्वच्छ लौहका अत्यधिक आकर्षण होता है, वैसे ही अमलान्तरात्माका भगवत्स्वरूपमें अत्यधिक आकर्षण होता है। प्रेमानन्दके उद्रेकमें मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ और सर्वांगका शैथिल्य तथा नैश्चल्य हो जाता है। लौकिक प्रेममें भी वाङ्निरोध, कण्ठावरोध आदि देखा ही जाता है। फिर अलौकिक भगवान्के प्रेमानन्दमें सर्वकरण-शैथिल्य तथा नैश्चल्य होना भी श्रीभरत और रामके सम्मिलनमें प्रसिद्ध ही है— परम पेम पूरन दोउ भाई। मन बुधि चित अह्मिति बिसराई ॥ कोउ किछु कहइ न कोउ किछु पूँछा। प्रेम भरा मन निज गति छूॅंछा ॥ (रा०च०मा० २।२४१।२; २४२।७) इस तरह भगवान्के मधुर मुखचन्द्र तथा श्रीचरणारविन्दकी दिव्य नखमणि-चन्द्रिकाओंमें मनको एकाग्र करनेसे मन भी प्रेमोन्मादमें विह्वल हो उठता है। प्रथम बाह्य विषयोंसे मनको हटाकर अनन्त-कोटि सूर्यके दिव्य-प्रकाशको तिरोहित करनेवाले श्रीभगवान्के परम प्रकाशमय मनोहर श्रीअंग और दिव्यातिदिव्य
निर्गुण या सगुण ५८७ भूषण-वसन तथा सांगोपांग परिकरादिका चिन्तन किया जाता है। पश्चात् प्रेम और अनुरागकी वृद्धिमें श्रीचरणारविन्द या अमृतमय मुखचन्द्रमें ही मनकी एकाग्रता सम्पादन की जाती है। प्रेम-प्राखर्यमें मनकी इतनी शिथिलता होती है कि परम मधुर भगवान्से भिन्न वस्तुके चिन्तनकी तो चर्चा ही क्या ? साक्षात् श्रीभगवान्के अनन्त कोटि चन्द्रसागर-सार-सर्वस्व निष्कलंक पूर्णचन्द्रकी मधुर दीप्तिको लजानेवाले सुस्मित मुखचन्द्रको ग्रहण करनेमें भी वह असमर्थ हो जाता है। इस तरह सर्व प्रपंचोंसे हटकर अपने ध्येयमें स्थित मनको जब ध्येय-ग्रहणमें भी सामर्थ्य न रहा, तब जो वेदान्तवेद्य सच्चिदानन्द भगवान् अभीतक ध्येयरूपमें स्थित थे, वे ही अब ध्येय-ध्यान-ध्याता और उन तीनोंके अभावके प्रकाशरूपसे अभिव्यक्त होते हैं। ध्याता-ध्यान-ध्येय, प्रमाता-प्रमाण-प्रमेय आदि त्रिपुटियोंका ऐसा स्वभाव है कि इनमें एकके मिटनेसे तीनों ही मिट जाते हैं। एकमेकतराभावे यदा नोपलभामहे। त्रितयं तत्र यो वेद स आत्मा स्वाश्रयाश्रयः ॥ (श्रीमद्भा० २।१०।९) ध्येय न रहनेपर ध्यान भी नहीं रहता; क्योंकि ध्येयाकार मानसी वृत्तिको ही ध्यान कहा जाता है और ध्यानरूपा वृत्तिके आश्रय अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्यको ही ध्याता कहा जाता है। अतः जब ध्यान नहीं, तब ध्यानका आश्रयभूत ध्याता भी नहीं उपलब्ध होता है और ध्याता तथा ध्यानके न होनेपर ध्याताके ध्यानका विषयीभूत ध्येय भी कैसे उपलब्ध हो सकता है। इस तरह जो सर्वावभासक भगवान् अभी ध्येय-रूपसे स्थित थे, वे ही किसी समयके सर्वाभावभासक तथा इस समय सर्वाभावके भासकरूपसे अभिव्यक्त हो जाते हैं। इस तरह प्रभुके अमृतमय मुखचन्द्रके माधुर्यामृत- सौन्दर्यामृतपानसे उन्मत्त मनकी शिथिलता और निश्चलता होते ही ध्यान-ध्येय-ध्याताके भाव तथा अभावके भासक शुद्ध प्रत्यक्इडन्तरात्मा स्वरूपसे अनन्त अखण्ड व्यापक आनन्दघन भगवान् प्रकट हो जाते हैं। इस तरह सहजमें ही भगवान् अपने ही मधुर स्वरूपमें मनको खींचकर और अपने माधुर्य सौन्दर्यामृत- पानसे मनको विभोरकर, त्रिपुटी मिटाकर, सर्वाभावभासक शुद्ध सच्चिदानन्दरूपमें प्रकट होकर भक्तको सदाके लिये कृतार्थ कर देते हैं। भागवतके द्वितीय स्कन्धमें भी विराट् आदि भगवान्के स्थूलरूपके ध्यानके अनन्तर अनन्त कोटि ब्रह्माण्ड-नायक प्रभुकी मधुर मंगलमयी मूर्तिका ध्यान बताया गया है। चित्तकी पूर्ण एकाग्रता होनेपर भगवान्के अखण्ड, अनन्त, स्वप्रकाश बोधस्वरूपका साक्षात्कार ध्यान कहा गया है। उक्त स्वरूपमें दृढ़ निष्ठाके लिये पुनः-पुनः भगवान्के मधुर स्वरूपके श्रीचरणोंका पुनः- पुनः ध्यान और अनुरागसहित परिरम्भण कहा गया है— 'हृदोपगुह्यार्हपदं पदे पदे॥' (श्रीमद्भा० २।२।१८) भगवान्के अचिन्त्य, अनन्त, मधुर मंगलमय स्वरूपमें प्रेम और भजन सर्वसाधन तथा सर्वफल स्वरूप है। अतएव इसमें साधक तथा सिद्ध दोनोंकी ही प्रवृत्ति होती है— साधन सिद्धि राम पग नेहू। मोहि लखि परत भरत मत एहू॥ (रा०च०मा० २।२८९।८) प्रभुके श्रीचरणारविन्द-सौगन्ध्यामृत-सिन्धुके एक बिन्दुके समास्वादन करनेसे सनकादि, शुकादि-जैसे ब्रह्मनिष्ठ महामुनीन्द्र भी मुग्ध हो जाते हैं— तस्यारविन्दनयनस्य पदारविन्द- किञ्जल्कमिश्रतुलसी मकरन्दवायुः । अन्तर्गतः स्वविवरेण चकार तेषां सङ्क्षोभमक्षरजुषामपि चित्ततन्वोः ॥ (श्रीमद्भा० ३।१५।४३) अतएव श्रीजनकजी-जैसे विदेह तत्त्वनिष्ठोंकी यह अनुभूतियाँ हैं— सहज बिरागरूप मनु मोरा। थकित होत जिमि चंद चकोरा ॥ इन्हहि बिलोकत अति अनुरागा। बरबस ब्रह्मसुखहि मन त्यागा ॥ (रा०च०मा० १।२१६।३, ५)
५८८ भक्तिसुधा
ठीक ही है, तभी तो कहा जाता है कि अमलान्तरात्मा परमहंस महामुनीन्द्रोंको भक्तियोगका विधान करनेके लिये ही अदृश्य, अग्राह्य, अचिन्त्य अव्यपदेश्य भगवान् अद्भुत सौन्दर्य-माधुर्य-सुधा- जलनिधि दिव्यमूर्ति धारण करते हैं। अन्यथा छोटे कार्योंके लिये ब्रह्मका अवतार वैसा ही है, जैसा मच्छर हटानेके लिये तोपका प्रयोग; परंतु समस्त नामरूप-क्रियात्मक प्रपंचसे व्यावृत्तमनस्क अमलात्मा परमहंसोंको भजनानन्द प्रदान करनेके लिये प्रभुका दिव्य स्वरूप धारण परमावश्यक है। दिव्य स्वरूप-धारणका प्रयोजन अद्वैत-ब्रह्मनिष्ठ परमहंसोंको भक्तियोग प्रदानकर उन्हें श्रीपरमहंस बनाना यही प्रभुके प्राकट्यका मुख्य प्रयोजन है। जैसे मिश्रित क्षीर-नीरका हंस विवेचन करता है, वैसे सांख्यसिद्धान्तके अनुसार प्रकृति प्राकृत-प्रपंचसे पृथक्, असंग अनन्त चेतनतत्त्वका विवेचन करनेवाले हंस कहे जा सकते हैं; परंतु वेदान्त-सिद्धान्तके अनुसार तो दृक्, दृश्य, आत्मा, अनात्मा या परात्पर पूर्णतम सर्वभासक भगवान् और प्रकृति प्राकृत-प्रपंचका ऐसा सम्बन्ध है, जैसे मुक्ताहार और उसमें कल्पित सर्पका। अर्थात् सत्य एवं अनृतका जैसे आध्यासिक सम्बन्ध है, वैसे ही दृश्य प्रकृति और उसके भासक एवं अधिष्ठानभूत भगवान्का आध्यासिक सम्बन्ध है। अतः सत्य एवं अनृतके विवेचनसे जैसे सत्य ही अवशिष्ट रहता है, अनृतका सर्वथा अभाव हो जाता है, वैसे ही दृक्-दृश्यका भी विवेचन करनेपर अनृतस्वरूप दृश्य प्रकृतिका अभाव हो जाता है, केवल सर्वदृक् भगवान्का अवशेष रह जाता है। ऐसे वेदान्तसिद्धान्तानुसार सत्यानृतरूप क्षीर- नीरका विवेचनकर नीरस्थानीय दृश्यको मिटाकर परम सत्य भगवान्में ही स्थित होनेवाले परमहंस कहे जा सकते हैं; परंतु—‘नैष्कर्म्यमप्यच्युतभाववर्जितं न शोभते ज्ञानमलं निरञ्जनम्।’ (श्रीमद्भा० १।५।१२) ‘सोह न राम पेम बिनु ग्यानू।’ (रा०च०मा० २।२७७।५) इत्यादि अभियुक्तोक्तियोंके अनुसार विदित होता है कि बिना भगवान्के मधुर मंगलमय स्वरूपमें पूर्णानुराग हुए उच्च ज्ञान भी सुशोभित नहीं होता। अतः भक्तियोगसे ज्ञानको सुशोभित करके परमहंसोंको श्रीपरमहंस बना देना ही प्रभुके मधुर मंगलमय स्वरूप धारण करनेका मुख्य प्रयोजन है; क्योंकि भजनीयके बिना भक्तियोग बन ही नहीं सकता। भगवत्तत्त्वसे भिन्न प्रपंच जिनकी दृष्टिमें है ही नहीं, उनका भजनीय सिवा भगवान्के और क्या हो सकता है। रहा भगवान्का अचिन्त्य अनन्त अव्यपदेश्य निराकारस्वरूप, सो उस स्वरूपमें तो वे परिनिष्ठित ही हैं। महावाक्यजन्य परब्रह्माकार वृत्तिके साथ ब्रह्मका सम्बन्ध जानकर मन, बुद्धि एवं सर्वेन्द्रियाँ तथा रोम- रोम भी प्रभुके साथ सम्बन्धके लिये लालायित होते हैं। इन्द्रियाँ स्वयम्भूसे पराङ्मुख रची जाकर अपना हिंसन किया जाना इसीलिये समझती हैं कि उन्हें उनके प्रियतमसे बहिर्मुख कर दिया गया है—‘पराञ्चि खानि व्यतृणत् स्वयम्भूः।’ (कठ० २।१।१) महर्षि वाल्मीकि आदिकवि भी यही कहते हैं कि जिसने श्रीरामचन्द्रको स्नेहभरी दृष्टिसे नहीं देखा और श्रीरामचन्द्रने अनुकम्पाभरी दृष्टिसे जिसे नहीं देखा, वह सर्वलोकमें निन्दित है और उसकी स्वात्मा भी उसकी विगर्हणा करती है— यश्च रामं न पश्येत्तु यं च रामो न पश्यति। निन्दितः सर्वलोकेषु स्वात्माप्येनं विगर्हते॥ (वा०रा० २।१७।१४) जैसे कमलनयन पुरुषके वे अतिशोभन नयन व्यर्थ हैं, जिनका रूप-दर्शनमें कभी उपयोग न हुआ, वैसे ही ज्ञानीके भी प्रारब्ध-भोगपर्यन्त अनिवार्य रूपसे रहनेवाले देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, अहंकारादि व्यर्थ और नीरस ही हैं, यदि इन सबका सदुपयोग प्रभुके सौन्दर्य-माधुर्य-सौरस्यामृत आदिके समास्वादनमें न हुआ।
निर्गुण या सगुण ५८९ करणग्रामोंकी सार्थकता किसमें ? इसीलिये श्रीव्रजांगनाओंने भी कहा है कि नेत्रवानोंके नेत्रादि करण-ग्रामोंकी सार्थकता और इनका चरम फल यही है कि श्रीव्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्णचन्द्रके अनुरागभरे कटाक्षपातसे युक्त वेणुचुम्बित अमृतमय मुखचन्द्रके सौन्दर्य-माधुर्यामृतका निर्निमेषनयनोंसे पान किया जाय; घ्राणसे सौगन्ध्यामृत और त्वक्से सुस्पर्शामृतका आस्वादन किया जाय, अन्यथा इन करणग्रामोंका होना बिलकुल व्यर्थ ही है—'अक्षण्वतां फलमिदं न परं विदामः।' (श्रीमद्भा० १०।२१।७) इस प्रकार अन्तरात्मा, अन्तःकरण, प्राण, इन्द्रिय, देह तथा रोम-रोमको अपने दिव्यरससे सरस और मंगलमय बनानेके लिये ज्ञानीके निर्वृत्तिक मनपर अविषय रूपसे प्रकट वही वेदान्त- वेद्य सच्चिदानन्दघन भगवान् अनन्तकोटि कन्दर्पके दर्पको दूर करनेवाले दिव्य सौन्दर्य-माधुर्य-जलनिधि मधुरातिमधुर स्वरूपसे प्रकट होकर अपने स्नेहद्वारा भावुकके द्रवीभूत अन्तःकरणको अपने रंगमें रँग देते हैं। यद्यपि सर्वोपाधिविनिर्मुक्त ब्रह्म निरतिशय परप्रेमास्पद और परमानन्दरूप है, उससे अधिक प्रेमास्पदता और परमानन्दरूपताकी कल्पना कहीं नहीं हो सकती; तथापि जबतक प्रारब्धका अवशेष है, तबतक ज्ञानीको भी अन्तःकरणरूप उपाधिपर ही ब्रह्मका दर्शन होता है। अन्तःकरणसे ब्रह्मदर्शन वैसा ही समझना चाहिये जैसे नेत्रसे सूर्यदर्शन। परंतु जैसे दूरवीक्षण यन्त्रकी सहायतासे नेत्र द्वारा सूर्यका अति दिव्य स्पष्ट स्वरूप दिखायी देता है, वैसे ही दिव्य लीला-शक्तिसे वही भगवत्तत्त्व जब परम मनोहर सगुण-रूपमें प्रकट होता है, तब अन्तःकरणसे उसमें विलक्षण चमत्कार अनुभूत होता है। परंतु प्रारब्ध-क्षय हो जाने, सर्वोपाधियोंके मिटने तथा साक्षात् सूर्यरूप हो जानेपर जो सूर्यको आत्मरूप उपलब्ध होता है, वह तो सर्वथा ही अनुपमेय है। जैसे श्रीवृषभानुनन्दिनी दर्पणमें अपने मुखचन्द्रकी मधुरिमाका अनुभव करती हैं। अस्वच्छ दर्पण आदिकी अपेक्षा स्वच्छ आदर्शपर किंवा श्रीकृष्णके वक्षःस्थलपर उन्हें अपने मुखचन्द्रकी मधुरिमा अधिक भासित होती है, परंतु उनके मुखचन्द्रका जो मुख्य माधुर्य है, वह तो उनके अन्तरात्मभूत प्रियतम श्रीकृष्णको ही विदित हो सकता है। किंचित् भी व्यवधान रहनेपर रसास्वादनमें कमी ही रहती है, अतएव भावुकोंका कहना है कि यदि मधुर रूपमें ही चक्षु हो, तभी रूप-माधुर्यका और यदि पुष्पमें ही घ्राण हो, तब ठीक सौगन्ध्यका आस्वादन हो सकता है। यह बात तो ठीक यहीं घटती है कि परमानन्द-सारसर्वस्व श्रीकृष्ण ही अपनी मधुरिमा (माधुर्याधिष्ठात्री श्रीवृषभानुनन्दिनी)-का अनुभव करते हैं। वैसे ही काल्पनिक भेदसे ज्ञानी अपने स्वरूपभूत भगवान्के मधुर रूपका अनुभव करते हैं। यद्यपि वस्तु वही है तथापि अचिन्त्य दिव्य लीला-शक्तिके अद्भुत प्रभावसे ज्ञानियोंका भी मन प्रभुके इस मधुर स्वरूपमें बलात् आकर्षित हो जाता है। जैसे फल, वृक्ष, अंकुर, बीज यद्यपि भूमिके ही स्वरूप-विशेष हैं तथापि फलमें भूमि, बीज, अंकुर, वृक्ष इन सभीकी अपेक्षा विलक्षण सौन्दर्य-माधुर्य-सौगन्ध्य-सौरस्य होता है एवं गुलाबके बीज या नालमें जैसे शाखा-उपशाखा, कण्टक-पत्र आदिके उत्पादन करनेकी शक्ति है, वैसे ही पुष्पके उत्पादन करनेकी शक्ति है, परंतु कण्टकादि-उत्पादिनी शक्तिकी अपेक्षा सौगन्ध्य-माधुर्य-सौन्दर्य-सम्पन्न पुष्प उत्पादन करनेकी शक्ति विलक्षण है, वैसे ही भगवान्की महाशक्तिमें भी प्रपंचोत्पादिनी शक्ति है और उससे परम विलक्षण परात्पर पूर्णतम भगवान्की स्वरूपभूत मधुर मनोहर मंगलमयी मूर्तिको प्रादुर्भाव करनेवाली शक्ति भी है। उसी अचिन्त्य दिव्य लीला-शक्तिके योगसे निराकार भगवान् उसी तरह साकार होते हैं, जैसे शैत्यके योगसे निर्मल जल बर्फरूपमें अथवा संघर्ष- विशेषसे अव्यक्त अग्नि या विद्युत् दाहक और प्रकाशक- रूपमें व्यक्त होता है। निराकार ब्रह्मकी अपेक्षा भी भगवान्की मधुर मूर्तिमें वैसे ही चमत्कार भासित होता है।
५९० भक्तिसुधा परमानन्दघन ब्रह्म अद्भुत रसमय है इक्षु (ईख)-दण्ड और चन्दन-वृक्ष ही मधुर और सुगन्धित होते हैं। यदि कदाचित् इक्षुमें सुमधुर फल और चन्दन-वृक्षमें अति-सुन्दर और सुगन्धित पुष्प प्रकट हों तो उनकी मधुरता और सौगन्ध्यकी जितनी ही बड़ाई की जाय उतनी ही कम है। इसी तरह अनन्त ब्रह्माण्डान्तर्गत आनन्दबिन्दुका उद्गमस्थान अचिन्त्य अनन्त परमानन्दघन ब्रह्म ही अद्भुत रसमय है। फिर उसके फलरूप मधुर मंगल स्वरूपमें कितना चमत्कार हो सकता है, यह सहृदय ही जान सकते हैं। इक्षुरससार शर्करासिता आदिका सार जैसे कन्द होता है, वैसे ही औपनिषद परब्रह्म-रससार भगवान्का मधुर मनोहर सगुण स्वरूप है। तभी किसीने श्रीकृष्णको देखकर कल्पना की थी कि क्या यह श्रीव्रजांगनाओंका प्रेमरससार-समूह है अथवा सात्वतवृन्दका मूर्तिमान् सौभाग्य है, किंवा श्रुतियोंका गुप्तवित्त ब्रह्म ही श्यामल मोहमयी मूर्तिको धारण करके प्रकट हुआ है— पुञ्जीभूतं प्रेम गोपाङ्गनानां मूर्तीभूतं भागधेयं यदूनाम्। एकीभूतं गुप्तवित्तं श्रुतीनां श्यामीभूतं ब्रह्म मे सन्निधत्ताम्॥ इसी तरह— शृणु सखि कौतुकमेकं नन्दनिकेताङ्गणे मया दृष्टम्। धूलीधूसरिताङ्गो नृत्यति वेदान्तसिद्धान्तः॥ परमिममुपदेशमाद्रियध्वं निगमवनेषु नितान्तखेदखिन्नाः। विचिनुत भवनेषु वल्लवीनामुपनिषदर्थमुलूखले निबद्धम्॥ कुछ महानुभाव निगमाटवीके ब्रह्मतत्त्वान्वेषकोंके परिश्रमपर दयार्द्र होकर उनके अन्वेष्टव्य ब्रह्मको यशोदाके उलूखलमें बँधा हुआ बतला रहे हैं तो कुछ श्रीमन्नन्दरायके प्राङ्गणमें धूलिधूसरित वेदान्तसिद्धान्तके नृत्यका कौतुक बता रहे हैं। परम कौतुकी प्रभुमें ये सभी कौतुक ही तो हैं। इतनेपर भी लोगोंके प्रश्न होते हैं कि निराकार भगवान् साकार कैसे हो सकते हैं, परंतु इस ओर उनका ध्यान नहीं जाता कि जब कौतुकी कृपालुकी लीलासे निराकार जीव साकार होता है; क्योंकि सर्वमतसे जीव निराकार तथा निरवयव है और स्पर्शविहीन आकाश स्पर्शयुक्त वायुके रूपमें तथा रूपरहित वायु रूपवान् तेजके रूपमें और रसगन्धविहीन तेज जलके रूपमें और रसयुक्त जल गन्धवती पृथ्वीरूपमें अवतीर्ण होता है, तब क्या वे निराकार होकर भी साकार रूपमें प्रकट नहीं हो सकते ? द्रुतचित्तपर भगवान्का प्राकट्य ही भक्ति है भावुकके द्रुतचित्तपर निखिल-रसामृत-मूर्ति भगवान्का प्राकट्य ही 'भक्ति' पदका अर्थ होता है। आशय यह है कि अन्तःकरण लाक्षा (लाख)-के समान कठिन द्रव्य है, परंतु तापक अग्निके साथ सम्बन्ध होनेसे जैसे लाक्षा पिघलती है, वैसे ही स्नेह- रागादि तापक भावोंके साथ सम्बन्ध होनेसे अन्तःकरण भी पिघलता है। यही कारण है कि रागास्पद कामिनी तथा द्वेषास्पद सर्पादि पदार्थोंको ग्रहण करता हुआ चित्त पिघलकर अपनेमें उन पदार्थोंके स्वरूपोंको अंकित कर लेता है। इसीलिये उनका विस्मरण न होकर पुनः-पुनः स्मरण होता है। उसे तृण आदिकी स्मृति इसीलिये कम होती है कि उनमें राग-द्वेष या भय आदि नहीं हुए। अतः चित्तकी द्रुति वहाँ नहीं हुई। भावुकोंका कहना है कि लाक्षा जबतक कम पिघली होती है, तबतक उसमें कोई रंग व्यापक और स्थिर नहीं होता, अतः तापक अग्निके सम्बन्धसे लाक्षा इतनी पिघलायी जाय कि सौ पर्तके कपड़ेमें छानने- लायक हो जाय। तब गंगाजलके समान निर्मल और द्रवीभूत उस लाक्षामें जो रंग छोड़ा जाय, वह लाक्षाके अणु-अणुमें, सर्वांशमें व्यापक तथा स्थिर होता है, फिर चाहे लाक्षा भी चाहे कि मैं अपनेसे रंगको पृथक् कर दूँ या रंग ही चाहे कि मैं पृथक् हो जाऊँ, परंतु दोनों ही पृथक् होनेमें असमर्थ हैं। ठीक इसी तरह भगवद्विषयक राग आदिसे गंगाजलके समान निर्मल और द्रवीभूत चित्तमें परमानन्दघन भगवान्का प्राकट्य होनेपर फिर पिघलती हुई लाक्षामें रंगकी तरह सर्वांशमें व्यापक तथा स्थिर रूपसे भगवान्की स्थिति होती है। फिर तो भावनाके प्रभावसे अपरिच्छिन्न अनन्त आन्तर
रसकी अभिव्यक्ति अन्तःकरण प्राण तथा रोम-रोममें सर्वत्र फैल जाती है और आन्तर तथा बाह्य रूपसे सर्वथा ही भगवान्का अनुभव होने लगता है। अपने प्रियतम भगवान्के स्वरूपमें होनेवाले तीव्र राग और उनके विरह-व्यथामय तीव्र तापसे भावुकके गुणमय सर्व कोशोंका भस्मीभाव हो जाने और भावनामय भगवत्-सम्मिलनसौख्य रससे मन, प्राण, इन्द्रिय, देह तथा रोम-रोमके आप्यायन होनेपर बाह्य-आभ्यन्तर-सर्वरूपसे भगवत्तत्त्वका अवगाहन होता है। इस तरह जब अनिमित्ता भागवती भक्ति गुणमय कोशोंको जला देती है, तभी निरुपाधिक एवं निरावरण होकर भावुक अपने भगवान्से मिल सकता है। भगवद्विरह-व्यथा-तापमयी भक्तिसे जिसके अन्नमयादि पंचकोशरूप त्रिविध तनु नहीं तप्त हुए, वे परमतत्त्वामृतके समास्वादनके अधिकारी नहीं हो सकते। यही 'अतप्ततनूर्न तदामोऽश्नुते' इस श्रुतिका आशय है। 'तपसा कृच्छ्रा-दिना भगवद्विरहजन्यतीव्रतापेन शक्तिपरिणामभूतेन ज्ञानाग्निना वा न तप्ता तनूर्यस्य स तत् परमात्म-तत्त्वामृतं नाश्नुते।' कृच्छ्रादि तप, भगवद्विरह-जन्य तीव्र ताप और भक्तिके परिणामभूत ज्ञानाग्निसे जिनके स्थूल, सूक्ष्म, कारण-ये तीनों तनु नहीं संतप्त हुए, वे परमतत्त्वका आस्वादन कैसे कर सकते हैं? इसीलिये अनिमित्ता भागवती भक्तिको सिद्धिसे भी श्रेष्ठ कहा जाता है। जैसे निगीर्ण अन्नको जाठराग्नि पचा डालती है, वैसे ही अनिमित्ता भक्ति पंचकोशोंको जीर्ण कर देती है— अनिमित्ता भागवती भक्तिः सिद्धेर्गरीयसी। जरयत्याशु या कोशं निगीर्णमनलो यथा ॥ (श्रीमद्भा० ३।२५।३३) भक्ति ही ज्ञानरूपमें परिणत होकर मूल अविद्याका भी विध्वंस करती है। भट्टोजिदीक्षित 'क्लृपि संपद्यमाने च' इस वार्तिकके उदाहरणरूपमें कहते हैं—'भक्तिर्ज्ञानाय कल्पते, ज्ञानाकारेण परिणमते।' भक्त और भगवान्का अभिन्न सम्बन्ध श्रीमद्भागवतके माहात्म्यमें ज्ञान, वैराग्य—ये श्रीभक्तिके ही पुत्र बतलाये गये हैं। ज्ञान, भगवत्प्राप्ति, मुक्ति आदि यद्यपि भक्तिके फल हैं तथापि फलकी अपेक्षा साधनमें ही अधिक प्रीति युक्त होती है। यद्यपि धनका फल भोग, धर्म, मोक्ष ही है तथापि लोभी धनके संग्रह और रक्षाके सामने भोग, धर्म, मोक्ष इन सभी पुरुषार्थोंको तिलांजलि दे देते हैं; क्योंकि उनकी यही दृढ़ धारणा है कि यदि साधन है, तब सब साध्य सहजमें ही सिद्ध हो सकते हैं। माता योग्य पुत्रकी उत्पत्तिसे ही सौभाग्यवती समझी जाती है और पुत्र माताकी भक्तिसे ही सौभाग्यवान् होता है। अतः जहाँ ज्ञान, भक्तिका फल है, वहाँ भक्ति, ज्ञान तथा ज्ञानियोंकी भी परम पूज्य एवं भजनीय देवता है। द्रवीभूत लाक्षामें एकमेक हुए रंगकी तरह भक्तके प्रेमार्द्र हृदयमें एकमेक हुए भगवान् यदि चाहें तो भी पृथक् नहीं हो सकते— विसृजति हृदयं न यस्य साक्षा- द्धरिरवशाभिहितोऽप्यघौघनाशः । प्रणयरशनया धृताङ्घ्रिपद्मः स भवति भागवतप्रधान उक्तः ॥ (श्रीमद्भा० ११।२।५५) बरबस भी जिनके मंगलमय नामसे बड़ी-से- बड़ी पापराशि नष्ट हो जाती है, ऐसे परम-स्वतन्त्र सर्वशक्तिसम्पन्न भगवान् जिसके अन्तःकरणमें स्नेहार्द्रतारूप प्रणयपाशमें बँधकर निकल न सकें, वही प्रधान भागवत होते हैं। तभी तो किसी प्रेमीने रागसे पिघले हुए अपने अन्तःकरणमें उसी द्रवावस्थारूप प्रणयपाशसे प्रभुको बाँधकर उनकी सर्वज्ञता सर्वशक्तिमत्ता-महाशक्तिको भी कुण्ठित करके निःशंक होकर कहा है—'अच्छा, यदि आप मेरे हृदयसे निकल सको तो मैं आपके पौरुषको समझूँ'— हस्तमुत्क्षिप्य यातोऽसि बलात्कृष्ण किमद्भुतम्। हृदयाद्यदि चेद्यासि पौरुषं गणयामि ते॥
ऐसे ही भक्त भगवान्को यदि अपने हृदयसे पृथक् करना चाहे तो भी नहीं कर सकता। इसीलिये तो व्रजांगना श्रीकृष्णसे अपना मन हटानेके लिये उनमें दोषानुसन्धान करती हैं—‘हे सखि! असितों (कालों)- से सख्य नहीं ही करना चाहिये, परंतु क्या करें; श्यामसुन्दर श्रीव्रजेन्द्रनन्दनकी कथा और कथार्थ तो हमलोगोंके लिये दुस्त्यज ही है।' एक सखी श्रीकृष्ण- प्रेममें मूर्च्छित अपनी प्रियतमा सखीके उपचारमें लगी हुई थी। इतनेमें ही दूसरी सखी आकर कृष्णकी कुछ चर्चा चलाने लगी। उपचारमें लगी हुई सखी वारण करती हुई कहती है— सन्त्यज सखि तदुदन्तं यदि सुखलवमपि समीहसे सख्याः। स्मारय किमपि तदितरद्विस्मारय हन्त मोहनं मनसः॥ हे सखि! यदि अपनी प्रिय सखीको विश्रान्ति लेने देना चाहती है तो यहाँ उन (श्रीव्रजराजकुमार)- की चर्चा न चला, परंतु किसी और बातकी याद दिलाकर किसी तरह मनमोहनको इसके मनसे भुला दे। महामुनीन्द्रगण बाह्य विषयोंसे मनको हटाकर श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दमें मन लगाना चाहते हैं, किंतु ये व्रजदेवियाँ अपने मनमोहन श्रीकृष्णसे मन हटाकर अन्य विषयोंमें लगाना चाहती हैं। योगीन्द्रगण अपने हृदयमें जिसके स्मृति-लेशके लिये लालायित हैं, उन्हीं सर्वप्राणि-परप्रेमास्पद जीवनधन प्रभुको वे हृदयसे निकालना चाहती हैं। ठीक ही है, पूर्ण द्रवीभूत लाक्षा और उसमें स्थायिभावापन्न रंग, इन दोनोंका इतना अद्भुत घनिष्ठ सम्बन्ध हो जाता है कि दोनोंका ही परस्पर पृथक् होना असम्भव है। उसी तरह भगवद्भावनासे द्रवीभूत अन्तःकरणपर भगवान्की स्थायिभावापत्ति होनेसे फिर परस्परका पार्थक्य असम्भव हो जाता है। यद्यपि जीवका भगवान्के साथ स्वाभाविक सम्बन्ध इससे भी बहुत अधिक घनिष्ठ है, जैसे तरंगोंकी समुद्रके बिना स्थिति ही नहीं, वैसे भगवान्के बिना जीवकी सत्ता ही नहीं। सो तें ताहि तोहि नहिं भेदा। बारि बीचि इव गावहिं बेदा॥ (रा०च०मा० ७।१११।६) भगवान्का स्वरूप ही प्रेम है तथापि स्वरूप-साक्षात्कारके पहले यह स्वाभाविकी निरतिशय निरुपाधिक प्रीति असम्भव है, अतः भगवान् और उनमें स्वाभाविकी प्रीति ये सभी उस द्रवावस्थारूप प्रणयके ही पराधीन हैं। इसीलिये किसी महानुभावने कहा है कि— अहो चित्रमहो चित्रं वन्दे तत्प्रेमबन्धनम्। यदबद्धं मुक्तिदं मुक्तं ब्रह्म क्रीडामृगीकृतम्॥ अहो आश्चर्य! मैं तो उस प्रेमबन्धनका वन्दन करता हूँ, जिससे बँधकर सबको मुक्ति देनेवाला और स्वयं नित्यमुक्त ब्रह्म भी भक्तोंका खिलौना बन जाता है। वस्तुतः निरतिशय निरुपाधिक परप्रेमास्पद पूर्णतम पुरुषोत्तमका स्वरूप ही प्रेम है। लोकमें यद्यपि प्रेम और उसका आश्रय एवं विषय ये तीनों पृथक् होते हैं तथापि अलौकिक दिव्य- प्रेममें तीनों ही एक हैं। अतएव ‘आत्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति।' (बृहदारण्यक० २।४।५) इत्यादि वचनोंसे निरुपाधिक प्रेम और प्रेमास्पदका अभेद कहा गया है—‘प्रेमी प्रेम-पात्रनमें बतायी है अभेद वेद।' इसीलिये ‘जल बीचि सम कहिअत भिन्न न भिन्न। बंदउँ सीता राम पद' (रा०च०मा० १।१८) इत्यादि वाक्योंसे महानुभावोंने मुख्य प्रेमी और प्रेमास्पद सीता और राममें अभेद कहा है। जैसे अमृत और उसकी मधुरिमाका अतिघनिष्ठ तादात्म्य-सम्बन्ध होता है, वैसे ही परमानन्दसुधासिन्धुसार-सर्वस्व श्रीमद्राघवेन्द्र रामचन्द्र और उनकी माधुर्याधिष्ठात्री परमाह्लादिनी हृदयेश्वरी श्रीजनकनन्दिनीका भी अत्यन्त घनिष्ठ स्वरूपभूत ही सम्बन्ध है अर्थात् सर्वान्तरंग एवं सर्वसे सन्निहितमें ही सर्वोत्कृष्ट सम्बन्ध होता है। अन्तरंगता और सान्निध्यकी समाप्ति या पर्यवसान-निरतिशयता प्रत्यगात्मामें ही होती है। अतः प्रत्यक्-चैतन्याभिन्न भगवान्में ही प्राणियोंका मुख्य प्रेम होता है।
निर्गुण या सगुण ५९३ ज्ञानीजन परमार्थतः भगवान्को अपना अन्तरात्मा समझकर पुनः काल्पनिक भेदका अवलम्बन करके भगवान्को भजते हैं। 'पारमार्थिकमद्वैतं द्वैतं भजनहेतवे। तादृशी यदि भक्तिः स्यात् सा तु मुक्तिशताधिका॥' पारमार्थिक अद्वैत और भजनके लिये द्वैत, बस इस भावनासे यदि भक्ति हो, तब तो यह भक्ति अपरिगणित मुक्तियोंसे भी श्रेष्ठ है; क्योंकि अद्वैत-प्रबोध बिना यह द्वैत सर्वानर्थका मूल ही है। राग, द्वेष, शोक, मोह—सबका प्रसव इस द्वैतसे ही होता है; परंतु बोध हो जानेपर भक्तिके लिये स्वमनीषाकल्पित द्वैत तो अद्वैतसे भी अति सुन्दर है— द्वैतं मोहाय बोधात् प्राक् जाते बोधे मनीषया। भक्त्यर्थं कल्पितं द्वैतमद्वैतादपि सुन्दरम्॥ भगवान् निर्गुण भी हैं और सगुण भी। उनकी उपासना भेदभावना तथा अभेदभावना दोनों ही प्रकारसे हो सकती है। स्वयं श्रीमुखकी उक्ति है कि— ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते। एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम्॥ (गीता ९।१५) कोई भक्तियोगसे, कोई ज्ञानयोगसे मेरा यजन करते हुए उपासना करते हैं। कुछ लोग एकत्वभावसे और कुछ पृथक्त्वभावसे मुझ विश्वतोमुखकी उपासना करते हैं। ज्ञानी अत्यन्त निष्काम तथा निष्कपट होकर भगवान्को भजता है। अतएव 'ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्', (गीता ७।१८) 'एकभक्तिर्विशिष्यते' (गीता ७।१७) इत्यादि स्थलोंमें श्रीभगवान्ने ही ज्ञानीको अपनेमें अनन्य प्रीतिमान और उसे निज अन्तरात्मा ही बतलाया है। भगवद्भावापन्न भगवान्के अन्तरात्मस्वरूप ज्ञानीको भगवान्से भिन्न कोई वस्तु ही दृष्टिगोचर नहीं होती। इसीलिये मुक्तोपसृप्य भगवान्को प्राप्त कर लेनेसे मुक्तिकी भी स्पृहा मिट जाती है। अतएव— न किञ्चित् साधवो धीरा भक्ता ह्येकान्तिनो मम। वाञ्छन्त्यपि मया दत्तं कैवल्यमपुनर्भवम्॥ (श्रीमद्भा० ११।२०।३४) ये भक्त उसी तरह कभी निर्विकल्प समाधिसे भगवान्के अंकमें उनके साथ एकमेक होकर विराजमान होते हैं और कभी श्रद्धाभक्तिसे भगवान्के श्रीचरणकमलके सौन्दर्य-माधुर्यादिका सेवन करते हैं, जिस तरह प्रेयसी कभी प्रियतमके अंकमें एवं वक्षस्थलपर यथेष्ट क्रीड़ा करती है और कभी सावधानीसे प्रियतमके पादपद्मका आराधन करती है। प्रियतमहृदये वा खेलतु प्रेमरीत्या पदयुगपरिचर्याम्प्रेयसी वा विधत्ताम्। विहरतु विदितार्थो निर्विकल्पे समाधौ ननु भजनविधौ वा तुल्यमेतद्द्वयं स्यात्॥ जैसे चतुरा नायिका प्रियतमके साथ एकमेक होकर भी व्यवहारमें अपने प्रियतमको चैलांचलके व्यवधान (घूँघट-पटकी ओट)-से ही देखती है। बहुरि बदनु बिधु अंचल ढाँकी। पिय तन चितइ भौंह करि बांकी॥ खंजन मंजु तिरीछे नयननि। निज पति कहेउ तिन्हहि सियँ सयननि॥ (रा०च०मा० २।११७।६-७) ठीक वैसे ही ज्ञानी यद्यपि अपने निरतिशय निरुपाधिक प्रत्यक्-चैतन्याभिन्न भगवान्के साथ सर्वथा एकमेक ही रहते हैं तथापि व्यवहारमें भेद-भावनासे ही अपने भगवान्की भक्ति करते हैं। विश्वेश्वरोऽपि सुधिया गलितेऽपि भेदे भावेन भक्तिसहितेन समर्पनीयः। प्राणेश्वरश्चतुरया मिलितेऽपि चित्ते चैलाञ्चलव्यवहितेन निरीक्षणीयः॥ अन्तरात्मा, अन्तःकरण, प्राण, इन्द्रियाँ तथा रोम- रोममें आन्तर-बाह्य सर्वरूपसे प्रभुका सुमधुर स्वरूप अनुभव करनेके लिये ही ज्ञानीजन भक्तियोगसे श्रीपरमहंस हो जाते हैं और वे ही शुद्ध प्रेमी होते हैं। अतः इनके लिये प्रभुका प्रादुर्भाव है। ऐसे ही शुद्ध-प्रेमियोंमें
५९४ भक्तसुधा श्रीव्रजांगना प्रभृति थीं, जिन्हें श्रीकृष्णके विरहमें एक क्षण भी सहस्रों युगके समान प्रतीत होते थे और श्रीकृष्णके सम्मिलनमें सहस्र कल्प भी क्षणहीके समान प्रतीत होते हैं। इस तरह जो प्रभुके बिना प्राण- धारण ही नहीं कर सकते, उनके लिये भी प्रभुका प्राकट्य होता है। इस शुद्ध तत्त्वनिष्ठ प्रेमीके लिये मुख्यरूपसे प्रभुका प्राकट्य होता है। फिर तो मुमुक्षुओंके लिये, किं बहुना प्राणिमात्रके कल्याणके लिये भी प्रभुका प्राकट्य होता है। इसी वास्ते तो श्रीशुकदेवजीने प्राणिमात्रके निःश्रेयसको ही प्रभु-प्राकट्यका प्रयोजन कहा है—'नृणां निःश्रेयसार्थाय व्यक्तिर्भगवतो नृप। अव्ययस्याप्रमेयस्य निर्गुणस्य गुणात्मनः ॥' (श्रीमद्भा० १०।२९।१४) यहाँ 'नृणां' से 'नरमात्राभिमानिनां' यह अर्थ समझना चाहिये। जैसा कि 'न कर्म लिप्यते नरे' यहाँपर श्रीशंकराचार्य भगवान्ने 'नरे' का 'नरमात्राभिमानिनि' यह अर्थ किया है। भावार्थ यह हुआ कि ज्ञानी और उपासकोंसे भिन्न साधारण अज्ञ-प्राणियोंके निःश्रेयसके लिये निर्गुण निराकार निर्विकार भगवान्का सगुणरूपमें प्राकट्य होता है। भगवान्में चित्त लगानेसे परम कल्याण अतएव काम, क्रोध, ईर्ष्या, भय, स्नेह आदि किसी भी भावसे भगवान्में चित्त लगानेसे प्राणियोंका कल्याण हो जाता है, अर्थात् यहाँ ज्ञानके बिना भी प्राणियोंका कल्याण हो जाता है। जैसे विष-बुद्धिसे भी अमृतपान करनेसे अमृतत्व-लाभ होता है, वैसे ही ब्रह्मबुद्धि बिना भी जिस किसी तरह भी श्रीकृष्णका सेवन करनेसे भगवत्प्राप्ति हो ही जाती है; क्योंकि वस्तु-शक्ति ज्ञानकी अपेक्षा नहीं करती। यद्यपि यों तो जब 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' (छान्दोग्य० ३।१४।१) इत्यादि श्रुतियोंके अनुसार सब कुछ ब्रह्म ही है, फिर प्राकृत स्त्री-पुत्र आदिके प्रेमियोंको भी मुक्त हो जाना चाहिये; क्योंकि जब सब वस्तु ब्रह्मकी है, ज्ञानकी अपेक्षा है ही नहीं, फिर पत्नी-सेवन भी ब्रह्मसेवन क्यों न माना जाय? इत्यादि शंकाएँ होती हैं। तथापि भगवान् निरावरण ब्रह्म हैं और प्रपंच सावरण ब्रह्म है। बस, इसी भेदसे भगवान्का सेवन ज्ञान बिना भी कल्याणकारक है और प्रपंच-सेवन ज्ञान बिना प्रपंचका ही प्रापक है। जैसे मेघके सम्बन्धसे आदित्यका रूप छिप जाता है; परंतु दिव्य उपनेत्र या दूरबीनके सम्बन्धसे आदित्यका स्वरूप आवृत नहीं होता; किंतु अतिदिव्य स्वरूपमें स्पष्ट होता है, वैसे ही प्रपंचोत्पादिनी मलिन शक्तिके सम्बन्धसे प्रपंचरूपमें प्रकट ब्रह्मका निजी दिव्यरूप तिरोहित या आवृत हो जाता है; परंतु दिव्य लीलाशक्तिके योगसे दिव्य मधुर सगुण साकार श्रीराम श्रीकृष्णरूपमें प्रकट परब्रह्मका स्वरूप आवृत नहीं होता; किंतु दिव्य स्वरूपमें प्रकट होता है। अतः निरावरणरूपमें ज्ञानकी आवश्यकता नहीं, सावरण- रूपमें ही है। सत्त्वादिगुणकृत प्रभावसे विनिर्मुक्त होनेके कारण ही ये निर्गुण भी कहे जाते हैं। इसी आशयसे 'हरिर्हि निर्गुणः साक्षात्' (श्रीमद्भा० १०।८८।५) इत्यादि उक्तियाँ हैं। इन्हें जार-बुद्धिसे समाश्रयण करके भी कुछ व्रजांगनाएँ मुक्त हो गयीं— 'तमेव परमात्मानं जारबुद्ध्यापि सङ्गताः। जहुर्गुणमयं देहं सद्यः प्रक्षीणबन्धनाः ॥' (श्रीमद्भा० १०।२९।११) जैसे चिन्तामणिमें दीपक-बुद्धिसे भी प्रवृत्त होनेसे प्राप्ति चिन्तामणिकी ही होती है, वैसे ही निरावरण श्रीकृष्ण परमात्मामें किसी भी बुद्धिसे प्रवृत्त क्यों न हो, प्राप्ति अखण्ड अनन्त निरावरण ब्रह्मकी ही होगी।
तृतीय खण्ड—भक्तितत्त्व भगवत्प्राप्ति प्रायः लोग पूछा करते हैं कि 'क्या भगवत्प्राप्ति इसी जन्ममें हो सकती है?' उनके प्रश्नका उत्तर है—ऐसा एक ही जन्ममें हो सकता है या अनेक जन्मोंमें, इसका कोई नियम नहीं है, किंतु जब भी भगवान्के प्रति प्रेमका गाढ़ उदय हो जाता है, भगवान् तभी मिल जाते हैं— हरि ब्यापक सर्बत्र समाना। प्रेम तें प्रगट होहिं मैं जाना॥ (रा०च०मा० १।१८४।५) अनेक जन्मोंतक भी यदि प्रेमका संचार न हो तो भगवान् नहीं प्राप्त होते, प्रेम प्रकट हो जानेपर भगवान् एक ही जन्ममें मिल जाते हैं। जिस समय भक्त भगवान्से मिलनेके लिये अत्यन्त उत्कण्ठित होकर स्वाध्याय, ध्यान आदिको प्राप्त होता है; उस समय भगवान्को अवश्य प्रकट होना पड़ता है। आप्तकाम, पूर्णकाम, आत्माराम, परम निष्काम भगवान् परम स्वतन्त्र हैं तथापि भक्तप्रेममें पराधीन होना उनका एक स्वभाव है। अनुभवी लोगोंने कहा है— अहो चित्रमहो चित्रं वन्दे तत्प्रेमबन्धनम्। यद्बद्धं मुक्तिदं मुक्तं ब्रह्म क्रीडामृगीकृतम्॥ 'अहो! कोई निर्गुण, निराकार, निर्विकार ब्रह्मको, कोई सगुण-साकार ब्रह्मको भजते हैं, परंतु मैं तो उस प्रेमबन्धनको भजता हूँ, जिससे बँधकर अनन्त प्राणियोंको मुक्ति देनेवाला, स्वयं नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त ब्रह्म भक्तोंका खिलौना बन जाता है।' जिस समय भक्त भगवान्के बिना न रह सके, उस समय भगवान् भी भक्तके बिना नहीं रह सकते। जैसे पंखरहित पतंग-शावक अपनी माँको पानेके लिये व्याकुल रहते हैं, जैसे क्षुधार्त वत्सतर (छोटे गोवत्स) माँका दूध चाहते हैं, किंवा परदेश गये हुए प्रियतमसे मिलनेके लिये प्रेयसी विषण्ण (व्याकुल) होती है, हे कमलनयन! मेरा मन आपको देखनेके लिये वैसे ही उत्कण्ठित होता है— अजातपक्षा इव मातरं खगाः स्तन्यं यथा वत्सतराः क्षुधार्ताः। प्रियं प्रियेव व्युषितं विषण्णा मनोऽरविन्दाक्ष दिदृक्षते त्वाम्॥ (श्रीमद्भा० ६।११।२६) भगवान्में उत्कट प्रीति होनेपर तत्क्षण ही भगवत्प्राप्ति इस प्रकारकी सोत्कण्ठ भक्तकी प्रार्थनासे भगवान् द्रुत होकर भक्तसे मिलने दौड़ पड़ते हैं। हाँ, यह ठीक है कि भगवत्सम्मिलनकी ऐसी उत्कट उत्कण्ठा सरल नहीं है, किंतु जन्म-जन्मान्तरों, युग-युगान्तरोंके पुण्यपुंजसे ही भगवान्में उत्कट प्रीति प्राप्त होती है। इसीलिये उपनिषदोंने कहा है कि ब्राह्मणादि अधिकारी यज्ञ, तप, दान और अनशनादि सत्कर्मोंसे उन परमतत्त्व भगवान्को जाननेकी उत्कट इच्छा उत्पन्न करते हैं— 'तमे तं ब्राह्मणा यज्ञेन दानेन तपसानाशकेन विविदिषन्ति।' (बृहदारण्यकोपनिषद् ४।४।२२) जब उस परमतत्त्वकी जिज्ञासा ही उत्पन्न करनेमें अनेक जन्मोंके सत्कर्मोंकी अपेक्षा होती है, तब स्पष्ट ही है कि जिसे भगवत्सम्मिलनकी उत्कट कामना है, जिसे भगवान्के न मिलनेसे महती व्याकुलता है, वह केवल इसी जन्मका सत्कर्मी नहीं, अपितु पहले जन्मोंसे भी उसका इस सम्बन्धमें प्रयत्न चल रहा है। इस दृष्टिसे ध्रुवकी जन्मान्तरीय तपस्याओं तथा 'बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।' (गीता ७।१९) इत्यादि वचनोंकी संगति लग जाती
५९६ भक्तिसुधा है। प्रेमके उत्कट हो जानेपर उसी क्षण भगवान्का दर्शन होता है। फूल तोड़नेमें विलम्ब हो सकता है, किंतु उस समय भगवान्के मिलनेमें किंचित् भी विलम्ब नहीं होता। भगवान् प्राणियोंके अन्तरात्मा, सर्वसाक्षी हैं, उनको पानेमें कौन कठिनाई— कोऽतिप्रयासोऽसुरबालका हरे- रूपासने स्वे हृदि छिद्रवत् स्वतः। (श्रीमद्भा० ७।७।३८) —इत्यादि बातोंकी भी संगति लगती है। भगवत्प्राप्तिमें अत्यन्त प्रयत्न करनेकी अपेक्षा बतलानेके लिये शास्त्रोंने भगवान्को अत्यन्त दुर्लभ कहा है, निराशा मिटाकर उत्साह बढ़ानेके लिये भगवान्को अत्यन्त सुगम भी कहा है— 'दूरात्सुदूरे अन्तिकात् तदु अन्तिके च।' भगवान् दूर-से-दूर और समीप-से भी समीप हैं। नामरूपकी उपयोगिता नामरूपक्रियासे अतीत—अनाम, अरूप, निष्क्रिय परमतत्त्वकी प्राप्तिके लिये ही प्राणीको अनेक क्रियाओं, नामों एवं रूपोंका अवलम्बन करना पड़ता है। अनामके नामकरण एवं अरूपके रूपकी कल्पना सचमुच अपरमेयको परिमित और निःसीमको सीमित करना है। किसी महानुभावने कहा है— गत्यानया व्यापकता हता ते स्तुत्यानया वाक्परता हता ते। दृष्ट्यानयागोचरता तथा हता ममापराधस्त्रितयं क्षमस्व॥ अर्थात् 'हे नाथ! इतने दूर आपके दर्शनार्थ चलकर मैंने आपकी व्यापकतापर तथा दर्शनसे आपकी अगोचरतापर अविश्वास किया और स्तुतिसे आपकी वाक्परताकी भी अवहेलना की। हे दयामय! इन मेरे तीन अपराधोंको कृपया आप क्षमा करना।' जैसे प्राणी व्यष्टि-नामरूपकी उपाधिमें आसक्त होकर व्यक्तिगत स्वार्थके लिये समष्टि-हितका विघातक बन जाता है या समष्टि-हितके कार्योंमें भी सम्मान, ख्याति या धन-लाभादि स्वार्थोंको ही प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूपमें प्रधानता देने लगता है; वैसे ही सर्वाधार, परमतथ्य, पारमार्थिक वस्तुमें भी नाम- रूपोंकी कल्पनाओंसे ही नाना विपत्तियोंको खड़ा करता है। सच बात तो यह है कि नामविशेष और रूपविशेषके अभिमानवालोंको व्यक्तिगत विशिष्ट नामों और रूपोंसे स्तुतिकी स्पृहा होती है। ग्राहसे पीड़ित गजराजने निर्विशेष परब्रह्मका ही स्तवन किया। उस स्तवनमें किसी व्यक्तिविशेष या नामरूपकी व्यंजना नहीं थी। उसने यही कहा कि— ॐ नमो भगवते तस्मै यत एतच्चिदात्मकम्। पुरुषायादिबीजाय परेशायाभिधीमहि॥ (श्रीमद्भा० ८।३।२) मैं उस परमतत्त्वको नमन करता हूँ, जिससे जड़ विश्व चेतित हो रहा है, जो निखिल विश्वका आदि बीज और परेश है, जिससे तथा जिसमें विश्व उत्पन्न तथा स्थित होता है और जिससे उसका धारण होता है। उस स्वयम्भूको नमस्कार है, जो पर-अपर कार्य- कारणसे अतीत है। भिन्न-भिन्न नामरूपके अभिमानी देवगण गजेन्द्रकी स्थिति देखते थे, उसकी स्तुति भी सुन रहे थे, उसको मुक्त करनेमें समर्थ भी थे, परंतु उनके नामरूपमें उनकी स्तुति नहीं थी, इसीलिये उनकी प्रवृत्ति गजेन्द्रके रक्षणमें नहीं हुई। उसकी रक्षा तो उसीसे हुई, जो किसी नामरूपविशेषका अभिमानी नहीं था। जो सभी नामों तथा रूपोंको अपना ही मानता था। आज भी सामाजिक क्षेत्रोंमें व्यक्तिगत ख्याति या सम्मानकी ओर ध्यान न देकर सभी नामों और ख्यातियोंको अपना ही समझकर कार्यमें अग्रसर
नामरूपकी उपयोगिता ५१७ होनेवाले विरले ही होते हैं। नामरूपकल्पनाका दुष्परिणाम किसीसे छिपा नहीं है। पृथक्-पृथक् परमेश्वरके नाम और उपचारपद्धतियोंपर ही आज भिन्न-भिन्न सम्प्रदायोंमें द्वन्द्व मच रहा है। ईसाई, मुसलमान, आर्यसमाज, ब्रह्मसमाजके अतिरिक्त सनातनधर्मियोंमें ही नामरूपोंपर इतने साम्प्रदायिक भेद उपस्थित हैं कि जिसकी कल्पना भी साधारण बुद्धिवालेके मनमें नहीं हो सकती। शिव, विष्णु, शक्ति, गणेश, सूर्य आदि भिन्न-भिन्न देवताओंके उपासक अपने-अपने इष्ट और अपनी-अपनी उपासना- पद्धतिका ही महत्त्व सिद्ध करनेके लिये दूसरोंकी निन्दा और खण्डनमें कुछ भी कसर नहीं रखते। इतना ही क्यों, विष्णुके ही विविध स्वरूपोंमें इस नाम या इस रूपसे मुक्ति होती है, दूसरेसे नहीं; श्रीकृष्णका वन्दन अमुक वेश-भूषामें ही हो सकता है, दूसरेमें नहीं, ऐसे विचित्र विचार भी प्रचलित हैं, जो वैमनस्य और विद्वेषके मूल बन रहे हैं, परंतु फिर भी क्या यह नामरूप और क्रियाओंकी कल्पना व्यर्थ है? अभिज्ञोंका तो कहना है कि प्राणी जबतक सत्त्व, रजस्, तमस् आदि गुणों और विविध नामरूप एवं कर्मोंमें बँधा हुआ है, तबतक उसे गुण एवं नामरूपक्रियाव्यतीत वस्तुका दर्शन और उसकी उपलब्धि असम्भव ही है। नामरूपसे नामरूपातीत तत्त्वकी प्राप्ति वेदान्त तो पग-पगपर यही उपदेश करता है कि मनोवचनातीत, अनिर्देश्य, अव्यवहार्य, प्रपंचातीत, परमतत्त्व ही सब कुछ है, उससे भिन्न कोई भी व्यवहारविषय तथ्य नहीं है, परंतु जो अनेक तापोंसे सन्तप्त एवं अशान्त है, उसे क्या मात्र इन वचनोंसे शान्ति हो सकती है? अतः जैसे रजसे ही दर्पणगत रज दूर किया जाता है, कण्टकसे ही कण्टक निकाला जाता है, किंवा विषसे ही विषका प्रभाव दूर किया जाता है, वैसे ही कर्मसे ही कर्मका निर्हार और नामरूपसे ही नामरूपातीत तत्त्व प्राप्त करनेका प्रयत्न किया जाता है। निर्गुण, निराकार, निष्प्रपंच असंगसे ही सगुण, साकार समस्त प्रपंच व्यक्त हुआ है। इसमें ही आबद्ध जन्तु अपने मूल परमतत्त्वसे बहिर्मुख होकर अनादिकालसे इस दुर्गम भवाटवीमें भटक रहे हैं। कहा जाता है कि मन, बुद्धिके हलचलसे ही परमार्थ परमतत्त्व आवृत हो जाता है। जैसे छायाके पीछे चलनेसे वह पकड़कर स्थिर नहीं की जा सकती, वैसे ही मन-बुद्धिको स्थिर करनेके प्रयत्नसे वे वशमें नहीं किये जा सकते। मनमें निर्विचारता या निर्व्यापारता स्थिर होनेपर ही निर्दृश्य, निर्विकल्प वस्तुका बोध या उपलब्ध होता है। मनके व्यापारसे ही दृश्य या विकल्पकी उपस्थिति होती है। मनके निर्व्यापारता या अमनीभावमें विकल्प प्रतीतिविरुद्ध होनेसे निर्विकल्प वस्तुका अनायास ही स्फुरण होता है', परंतु यह क्या जैसा कहनेमें सुगम है, वैसे ही अनुष्ठानमें भी? क्या महाप्रयास बिना एक क्षणके लिये भी ऐसा सम्भव है कि मन निश्चल रहे और उसमें आवश्यक-अनावश्यक अन्धकार, प्रकाश, आकाश, तृण कोई-न-कोई दृश्य स्फुरित न हो। जब ऐसा सम्भव ही नहीं, तब अनिर्देश्य, अनाम, अरूप, निष्क्रिय वस्तुकी कोरी बातोंसे क्या लाभ? मनकी एकाग्रताके लिये सात्त्विक कर्म और ज्ञानका अवलम्बन अपेक्षित यह कह देना बहुत सरल है कि 'स्वयं विज्ञाता या मन्ताको ही विचार या मनन करने-न करनेमें स्वतन्त्रता है। कर्ता चाहे तो करणोंको व्यापृत करे- न करे, उनसे काम ले अथवा न ले।' परंतु क्या मन मन्ताकी रुचिका अनुवर्तन करता है अथवा मन्ताकी रुचि न होते हुए भी उसको हठात् आकर्षित करता है? इसीलिये विवेकियोंने अध्यारोप और अपवादसे निष्प्रपंचका ही प्रपंचन किया है—'अध्यारो- पापवादाभ्यां निष्प्रपञ्चं प्रपञ्च्यते। शिष्याणां बोधसिद्ध्यर्थं तत्त्वज्ञैः कल्पितः क्रमः॥' जब प्रपंच एवं तदन्तर्गत नामरूपक्रियाओंके आलम्बनद्वारा ही सर्वातीत तत्त्वको प्राप्त करना है,