भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 587

निराकारसे साकार ५७७ व्यावहारिक दृष्टिसे जन्मका भाव रहनेमें भी कोई आपत्ति नहीं हो सकती। इसपर कहा जा सकता है कि दृष्टि-सृष्टिवादकी दृष्टिसे अवतार कथमपि नहीं सिद्ध होता। परंतु यह भी ठीक नहीं है; क्योंकि दृष्टि-सृष्टिवादमें भी आकाशादि प्रपंचका सत्त्व है। कम-से-कम साकार ब्रह्मका उतना अस्तित्व तो मानना ही होगा। सर्वव्यापि विधुरपरिभावित- कामिनीसाक्षात्कारसे कृष्णसाक्षात्कार विलक्षण है। जब विधुरपरिभावित-कामिनीसाक्षात्कारकी अपेक्षा कामिनीका साक्षात्कार विलक्षण है, फिर कृष्ण- साक्षात्कार विलक्षण क्यों नहीं? सारांश यह कि किसी भी दृष्टिसे व्यवहारका उपपादन करना पड़ता है। 'व्याघातावधिराशङ्का' लोकव्याघात ही शंकाकी अवधि है। प्रपंचके स्वरूप निषेध-पक्षमें भी श्रवण, मनन, साक्षात्कार आदि चीजोंका उपपादन करना पड़ता है। फिर जब उन वस्तुओंका उपपादन करना है, तब तो अवतारका उपपादन ठीक ही है। फिर 'दृष्टिसृष्टिवादमें अवतार नहीं बनता' यह कथन ही व्यर्थ है। जब उस पक्षमें आकाशादि प्रपंच ही नहीं बनता, तब अवतार नहीं बनता, यह विशेषोक्ति व्यर्थ है। यदि किसी दृष्टिसे जीव, जगत्, ईश्वर ही न बनता हो तो उस पक्षमें अवतार भी न बने तो कोई दोष नहीं है। विचार तो ईश्वरके अवतारका है, जो ईश्वर ही नहीं सिद्ध करता, वह अवतार क्यों मानेगा? वस्तुतः 'बिभेत्यल्पश्रुताद् वेदो मामयं प्रहरिष्यति' (महाभारत, आदिपर्व १।२६८) 'अल्पश्रुतसे वेद डरता है कि मुझपर यह प्रहार करेगा।' शास्त्रोंके भिन्न-भिन्न वादोंका आचार्य- परम्परासे बिना अध्ययन किये उनका अभिप्राय नहीं लगता। अज्ञ प्राणी शास्त्र-वचनोंसे ही अपना अनर्थ कर बैठता है। कुछ लोग— मायाख्यायाः कामधेनोर्वत्सौ जीवेश्वरावुभौ। यथेच्छं पिबतां द्वैतं तत्त्वं त्वद्वैतमेव हि॥ (पञ्चदशी ६।२३६) —'माया नामकी कामधेनुके जीव, ईश्वर दोनों बछड़े हैं। यथेच्छ द्वैतको ही पीयें, तत्त्व तो अद्वैत ही है।' इन वचनोंको पढ़कर उपासनाकी तिलांजलि दे बैठते हैं। कोई 'जीव-कल्पित ईश्वर है' वाचस्पतिके इस मतको देखकर ईश्वरकी खिल्ली उड़ाने लगते हैं। सीधी बात तो यह है कि कांचन-कामिनी या रोटी- दालको तो सच्चा मानकर प्राणी उनमें आसक्त है, परंतु भगवान्‌के मिथ्यात्वका ही आग्रह उसे कल्याणकारक मालूम पड़ता है। वस्तुतः 'रामायण' के राम, 'भागवत' के कृष्ण, 'विष्णुपुराण' के विष्णु, 'शिव-स्कन्दपुराणादि' के शिव केवल आभास नहीं हैं, अपितु अधिष्ठानभूत ब्रह्म ही इन स्थलोंमें विष्णु आदि नामोंसे कहा गया है। जहाँ मायामें आभास ईश्वर, अविद्यामें चैतन्यका आभास जीव, यह पक्ष माना गया है, उस पक्षमें भी केवल आभास ईश्वर आदि नहीं है, किंतु अधिष्ठानसहित ही आभास ईश्वरादिरूपमें मान्य है। भागवतादिमें अधिष्ठानप्रधान ब्रह्मरूपको ही कृष्ण, राम माना गया है। अतएव 'एकस्त्वमात्मा पुरुषः पुराणः सत्यः स्वयंज्योतिरनन्त आद्यः।' इत्यादि वचनोंसे भगवान्‌को पुराणपुरुषोत्तम, सत्य, स्वयंज्योति कहा गया है। 'रामायण' में रामको मायाका आश्रय और विषय दोनों ही कहा गया है। यही स्थिति 'विष्णुपुराण', 'शिवपुराण' के विष्णु, शिव आदि स्वरूपोंकी है। 'श्रीमद्भागवत' में भगवान्‌के स्वरूपोंको मायातीत, अनन्त सच्चिदानन्दरूप कहा गया है— सत्यज्ञानानन्तानन्दमात्रैकरसमूर्तयः । अस्पृष्टभूरिमाहात्म्या अपि ह्युपनिषददृशाम्॥ (श्रीमद्भा० १०।१३।५४) श्रीशंकराचार्य भी कहते हैं कि जिसने ब्रह्माको अद्भुत, अनन्त ब्रह्माण्ड दिखलाया और वत्सोंसहित गोपोंको अनेक विष्णुरूपमें दिखलाया, शम्भुने जिनके चरणावनेजनको अपने सिरपर रखा, वह कृष्ण मूर्तित्रयातीत कोई अविकृत चिदानन्दघन ही है— ब्रह्माण्डानि बहूनि पङ्कजभवान् प्रत्यण्डमत्यद्भुतान् गोपान् वत्सयुतानदर्शयदजं विष्णूनशेषांश्च यः।