भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 57

निरवयव और अनन्त है, दृश्यके साथ सिवाय आध्यात्मिक सम्बन्धके और संयोग, समवाय आदि सम्बन्ध नहीं हो सकता, अतः यदि सर्वज्ञ होनेकी वांछा है तो सर्वावभासक सर्वाधिष्ठान विशुद्ध अखण्ड बोध होनेकी क्या वांछा है? यह अखण्ड बोध ही सच्चिदानन्द भगवान्‌का चिद्रूप है। जैसे पूर्वोक्त अखण्ड अनन्त स्वप्रकाश सत्ता या अस्तित्व ही अपना तथा सबका निजी रूप है, वैसे ही यह अबाध्य अखण्ड बोध भी सबका अन्तरात्मा है। आनन्दकी अभिलाषा इसी तरह आस्तिक-नास्तिक ही नहीं, किंतु पशु-कीटपर्यन्त भी आनन्दके लिये व्यग्र हैं, प्राणिमात्रके देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, अहंकार आदिकी जितनी चेष्टाएँ एवं हलचलें हैं, वे सभी आनन्दके लिये हैं। बिना किसी प्रयोजनके किसीकी भी प्रवृत्ति नहीं होती, किं बहुना उन्मत्त भी, चाहे भ्रान्ति या अज्ञानसे ही सही, आनन्दके लिये ही समस्त चेष्टाएँ करता है, समस्त वस्तुओंमें संदिहान एवं भ्रान्त होता हुआ भी प्राणी, जिसके लिये नाना चेष्टाएँ करता है, उसके विषयमें उसे संदेह या भ्रम अथवा अज्ञान हो, यह कैसे कहा जा सकता है। इस तरह जिसके लिये समस्त चेष्टाएँ हो रही हैं, वह आनन्द अत्यन्त प्रसिद्ध है। संसारभरकी समस्त वस्तुओंमें प्रेम जिसके लिये हो और जो स्वयं निरतिशय एवं निरुपाधिक प्रेमका आस्पद हो, अर्थात् जो अन्यके लिये प्रिय न हो, वही आनन्द होता है। देखते ही हैं कि समस्त आनन्दके साधनोंमें प्रेम अस्थिर होता है। स्त्री-पुत्रादिमें प्रेम तभीतक है, जबतक वे अनुकूल हैं, प्रतिकूल होते ही वे द्वेष्य हो जाते हैं, परंतु सुख और आनन्द सदा ही प्रिय रहता है। कभी किसीको भी आनन्दसे द्वेष हो, यह नहीं कहा जा सकता। इस तरह नास्तिकसे-भी-नास्तिक, आनन्दको चाहता है, उसकी प्राप्तिके लिये प्रयत्नशील होता है और उसके लिये लालायित होता है, परंतु उसमें पहचाननेकी ही कमी है; क्योंकि जिस आनन्द और सुखके लिये नास्तिक व्यग्र है, उसे पहचानता नहीं। वह तो सुख-साधन, स्त्री-पुत्रादि, शब्द-स्पर्श आदि सम्भोगमें ही सुखकी भ्रान्तिसे फँसकर उसमें ही सन्तुष्ट हो जाता है। विवेचन करनेसे विदित हो जाता है कि जिनमें कभी प्रेम, कभी द्वेष होता है, वह सुख नहीं है, सदा ही जिसमें निरतिशय एवं निरुपाधिक प्रेम होता है, वही सुख है। जागतिक सम्भोग- साधन-पदार्थ ऐसे हैं नहीं, अतः वे सुखरूप नहीं हैं, किंतु अभिलषित पदार्थकी प्राप्तिमें तृष्णा-प्रशमनके अनन्तर, जिस शान्त अन्तर्मुख मनपर सुखका आभास पड़ता है, उस आभास या प्रतिबिम्बका निदान या बिम्बभूत जो शुद्ध अन्तरात्मा है, वही आनन्द है; क्योंकि जो लक्षण आनन्दका है वही अन्तरात्माका है। जैसे सब कुछ आनन्दके लिये प्रिय है, आनन्द और किसीके लिये प्रिय नहीं होता, ठीक ऐसे ही समस्त वस्तु आत्माके लिये प्रिय होती है, आत्मा किसी दूसरेके लिये प्रिय नहीं होता; अतः अन्तरात्मा ही आनन्द है और निरतिशय निरुपाधि परप्रेमका आस्पद है, उसीका आभास अन्तर्मुख अन्तःकरणपर पड़नेसे अहं सुखी इत्यादि व्यवहार होता है। यही सुख किंवा अन्तरात्मा है। इसीके लिये समस्त कार्य- करण-संघातकी प्रवृत्ति होती है, यही सुख-दुःख- मोहात्मक संघातसे विलक्षण, सुख-दुःख-मोहातीत, असंहत, असंग, अद्वितीय तत्त्व ही—सच्चिदानन्दका आनन्दरूप है एवं प्राणीमात्र स्वतन्त्रता (बन्धनसे छूटना) चाहता है। एक चींटीको भी पकड़नेपर वह व्याकुलताके साथ हाथ-पैर चलाती है, शुक-सारिका आदि विहंगम सुवर्णके भी पिंजरमें रहकर सुन्दर मधुर भक्ष्य-पेयको नहीं पसन्द करते, किंतु बन्धनमुक्त होकर स्वतन्त्रतासे वनमें खट्टे फलको भी खाकर जीवन बिताना अच्छा समझते हैं, इस तरह प्राणीमात्र बन्धनसे छूटने तथा स्वतन्त्रताके लिये लालायित हैं। ऐसी स्थितिमें कौन नास्तिक बन्धनमुक्ति और स्वतन्त्रता न चाहेगा, परंतु स्वतन्त्रताका वास्तविक रूप विवेचन करनेसे स्पष्ट होगा कि यह भी