भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४८ भक्तिसुधा भगवान्का ही स्वरूप है; क्योंकि बिना असंग सच्चिदानन्द भगवान्को प्राप्त किये, बन्धनमुक्ति स्वतन्त्रताकी कल्पना अत्यन्त ही निरालम्बन है। जबतक स्थूल, सूक्ष्म तथा कारणदेहका सम्बन्ध विद्यमान है, तबतक स्वतन्त्रता कैसी ? भले ही कोई माता, पिता, गुरुजनों तथा वेद-शास्त्रकी आज्ञाओंको न माने और उनसे अपनेको स्वतन्त्र मान ले, परंतु जन्म, जरा, व्याधि, दरिद्रता, विपत्ति, मृत्यु आदिके परतन्त्र तो प्राणिमात्रको होना ही पड़ता है; क्योंकि जबतक कुछ स्वतन्त्रताको त्यागकर शास्त्रों एवं गुरुजनोंके परतन्त्र होकर कर्म, उपासना तथा ज्ञानद्वारा, मल-विक्षेप-आवरणको शरीरत्रय बन्धन किंवा जीव भावसे मुक्त होकर, निजी निर्विकार स्वरूपको न प्राप्त कर लें, तबतक पूर्ण स्वातन्त्र्य मिल सकता नहीं। विवेचनसे स्पष्ट होता है कि सर्वोपाधिविनिर्मुक्त असंग-अनन्त-स्वप्रकाश-प्रत्यगभिन्न सच्चिदानन्द भगवान्का ही स्वरूप है। ऐसे ही प्राणीमात्रको यह भी रुचि होती है कि सब कुछ हमारे अधीन हो और मैं स्वाधीन रहूँ, यहाँतक कि माता, पिता, गुरुजनोंके प्रति भी यही रुचि होती है कि ये सब हमारी प्रार्थना मान लिया करें और सब तरहसे मेरे अनुकूल रहें। यही स्थिति देवताओंके प्रति भी होती है। यह सभी भाव जीव भावके रहते नहीं हो सकते, समस्त कल्पित पदार्थ कल्पनाके अधिष्ठानभूत भगवान्के ही परतन्त्र हो सकते हैं, इस तरह परमार्थतः पूर्ण अस्तित्व, पूर्ण बोध, पूर्ण आनन्द, पूर्ण स्वातन्त्र्य एवं पूर्ण नियामकत्व भगवान्में ही होता है। जब आस्तिक- नास्तिक, सभी पूर्ण स्वातन्त्र्य, पूर्ण नियामकत्व, पूर्ण बोध, पूर्णानन्द, पूर्ण अबाध्यतया सत्ताके लिये व्यग्र तथा इनकी प्राप्तिके लिये जी-जानसे प्रयत्न करते हैं, तब कौन कह सकता है कि अज्ञानी किंवा नास्तिक जिसकी प्राप्तिके लिये व्यग्र हैं, वह तत्त्व भक्तों और ज्ञानियोंके ध्येय-ज्ञेय परमाराध्य परब्रह्म भगवान् नहीं हैं, क्योंकि प्राणीमात्र किंवा तत्त्वमात्रके अन्तरात्मा भगवान् ही हैं, फिर उनसे विमुख होकर निःसत्त्व, निःस्फूर्ति कौन होना चाहेगा? इसी आशयसे श्रीवाल्मीकिकी उक्ति है कि ‘लोके नहि स विद्येत यो न राममनुव्रतः' लोकमें ऐसा कोई हुआ नहीं, जो रामका अनुगामी न हो। निजी सर्वस्वके बिना किसीको भी कैसी विश्रान्ति ? अतएव तरंगकी जैसे समुद्रानुगामिता है, ठीक वैसे ही प्राणीमात्रकी भगवदनुगामिता है, भेद यही है कि ज्ञानी अपने प्रियतमको जानकर प्रेम करता है, दूसरे उसीके लिये व्यग्र होते हुए भी उसे जानते नहीं। भागवतके द्वितीय स्कन्धमें भी विराट् आदि भगवान्के स्थूलरूपके ध्यानके अनन्तर, अनन्तकोटि ब्रह्माण्डनायक प्रभुकी मधुर मंगलमयी मूर्तिका ध्यान बतलाया गया है। ध्यानसे चित्तकी पूर्ण एकाग्रता होनेपर भगवान्के अनन्त अखण्ड स्वप्रकाश बोधस्वरूपका साक्षात्कार कहा गया है। उक्त स्वरूपमें दृढ़ निष्ठाके लिये भगवान्के मधुरस्वरूपके श्रीचरणोंका पुनः ध्यान और अनुरागसहित परिरम्भण कहा गया है—‘हृदोपगुह्यार्हपदं पदे पदे॥' (श्रीमद्भा० २।२।१८) भगवान्के अचिन्त्य अनन्त मधुर मंगलमय स्वरूपमें प्रेम और भजन सर्व साधन तथा सर्व फलस्वरूप है। अतएव इसमें साधकों तथा सिद्धों दोनोंकी ही प्रवृत्ति होती है। साधन सिद्धि राम पग नेहू। मोहि लखि परत भरत मत एहू ॥ (रा०च०मा० २।२८९।८) भक्तियोगके विधानके लिये भगवान्का अवतरण प्रभुके श्रीचरणारविन्द सौगन्ध्यामृत सिन्धुके एक बिन्दुके भी समास्वादन करनेसे सनकादिक शुकादिक- जैसे ब्रह्मनिष्ठ महामुनीन्द्र भी मुग्ध हो जाते हैं। तस्यारविन्दनयनस्य पदारविन्द- किञ्जल्कमिश्रतुलसीमकरन्दवायुः । अन्तर्गतः स्वविवरेण चकार तेषां सङ्क्षोभमक्षरजुषामपि चित्ततन्वोः ॥ (श्रीमद्भा० ३।१५।४३) अतएव श्रीजनकजी-जैसे विदेह तत्त्वनिष्ठोंकी