भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

पृष्ठ 59, कुल 778 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 59

'साक्षान्मन्मथमन्मथः' ४९ यह अनुभूतियाँ हैं— इन्हहि बिलोकत अति अनुरागा। बरबस ब्रह्मसुखहि मन त्यागा॥ सहज बिरागरूप मनु मोरा। थकित होत जिमि चंद चकोरा॥ (रा०च०मा० १।२१६।५, ३) ठीक ही है, तभी तो यह कहा जाता है कि अमलात्मा परमहंस महामुनीन्द्रोंको ही भक्तियोग विधान करनेके लिये अदृश्य, अग्राह्य, अचिन्त्य, अव्यपदेश्य भगवान् अद्भुत-सौन्दर्यमाधुर्यसुधाजलनिधि दिव्यमूर्ति धारण करते हैं, अन्यथा छोटे कार्योंके लिये प्रभुका अवतार ऐसा ही अनुचित होगा, जैसे मशक-निवारणार्थ भुशुण्डीका प्रयोग (मच्छर हटानेके लिये तोप चलाना) अनुचित होता है, परंतु समस्त नामरूपक्रियात्मकप्रपंचसे व्यावृतमनस्क अमलात्मा परमहंसोंको भजनानन्द प्रदान करनेके लिये प्रभुका दिव्य स्वरूप धारण परमावश्यक है। अद्वैत ब्रह्मनिष्ठ परमहंसोंको भक्तियोग प्रदानकर उन्हें श्रीपरमहंस बनाना, यही प्रभुके प्राकट्यका मुख्य प्रयोजन है। जैसे मिश्रित क्षीर-नीरका हंस विवेचन करता है, वैसे सांख्य सिद्धान्तके अनुसार प्रकृति प्राकृत प्रपंचसे पृथक्, असंग अनन्त चेतन तत्त्वका विवेचन कर लेनेवाले हंस कहे जा सकते हैं, परंतु वेदान्त सिद्धान्तके अनुसार तो दृक्-दृश्य, आत्मा- अनात्मा, परात्पर पूर्णतम सर्वभासक भगवान् और प्रकृति प्राकृत प्रपंचका ऐसा सम्बन्ध है, जैसे दिव्य मणिमाला और उसमें कल्पित सर्पका, अर्थात् सत्य एवं अनृतका जैसे आध्यासिक सम्बन्ध है, वैसे ही दृश्य प्रकृति और उसके भासक एवं अधिष्ठानभूत भगवान्‌का आध्यासात्मिक सम्बन्ध है। अतः सत्यानृतके विवेचनसे जैसे सत्य ही अवशिष्ट रहता है, अनृतका सर्वथा अभाव हो जाता है, इसी तरह दृक्-दृश्यका भी विवेचन करनेपर अनृत स्वरूप दृश्य प्रकृतिका अभाव हो जाता है, केवल सर्वदृक् भगवान् ही अवशेष रहते हैं। ऐसे वेदान्तसिद्धान्तानुसार सत्यानृतरूप क्षीर- नीरका विवेचन है, नीर-स्थानीय दृश्यको मिटाकर परमसत्य भगवान्‌में ही स्थित होनेवाले परमहंस कहे जा सकते हैं, परंतु 'नैष्कर्म्यमप्यच्युतभाववर्जितं न शोभते ज्ञानमलं निरञ्जनम्।' (श्रीमद्भा० १।५।१२) 'सोह न राम पेम बिनु ग्यानू।' (रा०च०मा० २।२७७।५) इत्यादि अभियुक्तोक्तियोंके अनुसार विदित होता है कि बिना भगवान्‌के मधुर मंगलमय स्वरूपमें पूर्णानुराग हुए उनका ज्ञान भी सुशोभित नहीं होता। अतः भक्तियोगसे ज्ञानको सुशोभित करके परमहंसोंको श्रीपरमहंस बना देना, बस यही मुख्य प्रयोजन प्रभुके मधुर मंगलमय स्वरूप धारण करनेका है; क्योंकि भजनीयके बिना भक्तियोग बन ही नहीं सकता। भगवत्तत्त्वसे भिन्न प्रपंच जिनकी दृष्टिमें है ही नहीं, उनका भजनीय सिवा भगवान्‌के और क्या हो सकता है ? रहा भगवान्‌का अचिन्त्य अनन्त अव्यपदेश्य निराकार स्वरूप, सो उस स्वरूपमें तो वे परिनिष्ठित ही हैं, महावाक्यजन्य परब्रह्माकारवृत्तिके साथ ब्रह्मका सम्बन्ध जानकर मन-बुद्धि एवं सर्वेन्द्रियाँ तथा रोम-रोम भी प्रभुके साथ सम्बन्धके लिये लालायित हैं। इन्द्रियाँ स्वयम्भूसे पराङ्मुख रची जाकर अपनी हिंसा किया जाना इसीलिये समझती हैं कि उन्हें उनके प्रियतमसे बहिर्मुख कर दिया गया है—'पराञ्चि खानि व्यतृणत्स्वयम्भूः।' महर्षि आदिकवि भी यही कहते हैं कि जिसने स्नेहभरी दृष्टिसे श्रीरामचन्द्रको नहीं देखा और श्रीरामचन्द्रने अनुकम्पाभरी दृष्टिसे जिसे नहीं देखा, वह सर्वलोकमें निन्दित है और उसकी स्वात्मा भी उसकी विगर्हणा करती है—'यश्च रामं न पश्येत्तु रामो यं नाभिपश्यति। निन्दितः सर्वलोकेषु स्वात्माऽप्येनं विगर्हति॥' जैसे कमलनयन पुरुषके वे अतिशोभन नयन व्यर्थ हैं, यदि कभी उनके रूपदर्शनमें उनका उपयोग न हुआ, वैसे ही ज्ञानीके भी प्रारब्धभोगपर्यन्त अनिवार्य रूपसे रहनेवाले देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, अहंकार आदि व्यर्थ और नीरस ही रहे, यदि उन सबका सदुपयोग प्रभुके सौन्दर्य, माधुर्य, सौरस्यामृत आदिके समास्वादनमें न हुआ। इसीलिये श्रीव्रजांगनाओंने भी कहा है कि नेत्रवानोंके नेत्रादि करणग्रामोंकी