भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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सार्थकता और इनका चरमफल यही है कि श्रीव्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्णचन्द्रके अनुरागभरे कटाक्ष- पातसे युक्त, वेणुचुम्बित अमृतमय मुखचन्द्रके सौन्दर्य- माधुर्यामृतका निर्निमेषनयनोंसे पान किया जाय और घ्राणसे सौगन्ध्यामृतका, त्वक्से सुस्पर्शामृतका आस्वादन किया जाय, अन्यथा इन करणग्रामोंका होना बिलकुल व्यर्थ ही है। 'अक्षण्वतां फलमिदं न परं विदामः।' इस प्रकार अन्तरात्मा, अन्तःकरण, प्राण, इन्द्रिय, देह तथा रोम-रोमको अपने दिव्य रससे सरस और मंगलमय बनानेके लिये भगवान्‌का प्रादुर्भाव है। यद्यपि सर्वोपाधिविनिर्मुक्त ब्रह्म निरतिशय परप्रेमास्पद और परमानन्दरूप है, उससे अधिक प्रेमास्पदता और परमानन्दरूपताकी कल्पना कहीं नहीं हो सकती तथापि जबतक प्रारब्धका अवशेष है, तबतक ज्ञानीको भी अन्तःकरणरूप उपाधिपर ही ब्रह्मका दर्शन होता है। अन्तःकरणसे ब्रह्मदर्शन वैसा ही समझना चाहिये, जैसे नेत्रसे सूर्यदर्शन, परंतु जैसे दूरवीक्षण यन्त्रकी सहायतासे नेत्रद्वारा सूर्यका अतिदिव्य एवं स्पष्ट रूप दिखायी देता है, वैसे ही दिव्य लीलाशक्तिसे परम मनोहर सगुणरूपमें, प्रकट तत्त्वमें, अन्तःकरणसे और विलक्षण चमत्कार अनुभूत होता है, परंतु प्रारब्धक्षय हो जानेपर, सर्वोपाधियोंके मिटनेपर, साक्षात् सूर्यरूप हो जानेपर, जो सूर्यका रूप आत्मरूप उपलब्ध होता है, वह तो सर्वथा ही अनुपमेय है। जैसे श्रीवृषभानुनन्दिनी दर्पणमें अपने मुखचन्द्रकी मधुरिमाका अनुभव करती हैं, अस्वच्छ दर्पण आदिकी अपेक्षा स्वच्छ आदर्शपर, किंवा श्रीकृष्णके वक्षस्थलपर, उन्हें अपने मुखचन्द्रकी मधुरिमा अधिक भासित होती है, परंतु उनके मुखचन्द्रका जो मुख्य माधुर्य है, वह तो उनके अन्तरात्माभूत प्रियतम श्रीकृष्णको ही विदित हो सकता है, किंचित् भी व्यवधान होनेपर रसास्वादमें कमी ही रहती है। अतएव भावुकोंका कहना है कि यदि मधुर रूपमें ही चक्षु हो, तब ही रूपमाधुर्यका और यदि पुष्पमें ही घ्राण हो, तब ठीक गन्ध माधुर्यका अनुभव हो सकता है। यद्यपि वस्तु वही है तथापि अचिन्त्य दिव्यलीलाशक्तिके अद्भुत प्रभावसे ज्ञानियोंका भी मन प्रभुके इस मधुर स्वरूपमें बलात् आकर्षित हो जाता है। जैसे फल, वृक्ष, अंकुर, बीज यद्यपि भूमिके ही स्वरूपविशेष हैं तथापि फलमें भूमि, बीज, अंकुर, वृक्ष इन सभीकी अपेक्षा विलक्षण सौन्दर्य-माधुर्य-सौगन्ध्य- सौरस्य होता है एवं गुलाबके बीज या नालमें जैसे शाखा, उपशाखा, कण्टक, पत्र आदिके उत्पादन करनेकी शक्ति है, वैसे ही पुष्पके उत्पादन करनेकी शक्ति है, परंतु जैसे कण्टकादि-उत्पादिनी शक्तिकी अपेक्षा सौन्दर्य-माधुर्य-सौगन्ध्य-सम्पन्न पुष्प-उत्पादन करनेकी शक्ति विलक्षण होती है, उसी तरह भगवान्‌की महाशक्तिमें जैसे प्रपंचोत्पादिनी शक्ति है, वैसे ही उससे परम विलक्षण परात्पर पूर्णतम भगवान्‌की स्वरूपभूता, मधुर मनोहर मंगलमयी मूर्तिके प्रादुर्भाव करनेवाली शक्ति भी है। उसी अचिन्त्य दिव्य लीलाशक्तिके योगसे निराकार भगवान् उसी तरह साकार होते हैं, जैसे शैत्यके योगसे निर्मल जल बर्फरूप अथवा संघर्षविशेषसे अव्यक्त अग्नि या विद्युत् दाहक और प्रकाशरूपमें व्यक्त होता है। निराकार ब्रह्मकी अपेक्षा भी भगवान्‌की मधुर मूर्तिमें वैसे ही चमत्कार भासित होता है, जैसे इक्षु (ईख)-दण्ड और चन्दन वृक्ष ही मधुर और सुगन्धित होते हैं, यदि कदाचित् इक्षुमें सुमधुर फल और चन्दन वृक्षमें अति सुन्दर और सुगन्धित पुष्प प्रकट हो, तब उनकी मधुरता और उनके सौगन्ध्यकी जितनी बड़ाई की जाय, उतनी ही कम है। इसी तरह अनन्त ब्रह्माण्डान्तर्गत आनन्दबिन्दु उद्गमस्थान, अचिन्त्य, अनन्त, परमानन्द घन ब्रह्म ही अद्भुत रसमय है, फिर उसके फलरूप मधुर मंगल स्वरूपमें कितना चमत्कार हो सकता है, यह सहृदय ही जान सकते हैं। इक्षुरससार शर्करा सिता आदिका सार जैसे कन्द होता है, वैसे ही औपनिषद् परब्रह्म रससार भगवान्‌का मधुर मनोहर सगुण स्वरूप है। तभी किसीने श्रीकृष्णको देखकर कल्पना की