भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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'साक्षान्मन्मथमन्मथः' ५१ थी कि क्या यह श्रीव्रजांगनाओंका प्रेमरससारसमूह है अथवा सात्वतवृन्दका मूर्तिमान् सौभाग्य है, किंवा श्रुतियोंका गुप्तवित्त ब्रह्म ही श्यामल महोमयी मूर्तिको धारण करके प्रकट हुआ है— पुञ्जीभूतं प्रेम गोपाङ्गनानां मूर्तीभूतं भागधेयं यदूनाम्। एकीभूतं गुप्तवित्तं श्रुतीनां श्यामीभूतं ब्रह्म मे सन्निधत्ताम्॥ इस तरह— शृणु सखि कौतुकमेकं नन्दनिकेताङ्गणे मया दृष्टम्। गोधूलिधूसरिताङ्गो नृत्यति वेदान्तसिद्धान्तः॥ परममिममुपदेशमाद्रियध्वं निगमवनेषु नितान्तखेदखिन्नाः। विचिनुत भवनेषु बल्लवीना- मुपनिषदर्थमुलूखले निबद्धम्॥ कुछ महानुभाव निगमाटवीके ब्रह्मतत्त्वान्वेषकोंके परिश्रमपर दयार्द्र होकर, उनके अन्वेष्टव्य ब्रह्मको श्रीयशोदाके उलूखलमें बँधा बतला रहे हैं तो कुछ श्रीमन्नन्दरायके प्रांगणमें धूलि-धूसरित वेदान्तसिद्धान्तके नृत्यका कौतुक बता रहे हैं, परमकौतुकी प्रभुमें यह कौतुक ही तो है। इतनेपर भी लोगोंके प्रश्न होते हैं कि निराकार भगवान् साकार कैसे हो सकता है? परंतु इस ओर उनका ध्यान नहीं जाता कि जब कौतुकी कृपालुकी लीलासे निराकार जीव साकार होता है (क्योंकि सर्व मतसे जीव निराकार तथा निरवयव है) और स्पर्शविहीन आकाश, स्पर्शयुक्त वायुके रूपमें अवतीर्ण होता है तथा रूपरहित वायु रूपवान् तेजके रूपमें और रसगन्धविहीन तेज और जलका क्रमेण रसयुक्त जल और गन्धवती पृथिवी रूपमें प्रादुर्भाव होना सम्भव है, तब क्या वह निराकार होकर भी साकाररूपमें नहीं प्रकट हो सकते? ज्ञानीके निर्वृत्तिक मनपर अविषयरूपसे प्रकट वही वेदान्तवेद्य सच्चिदानन्दघन भगवान् अनन्तकोटि- कन्दर्पके दर्पको दूर करनेवाले, दिव्य सौन्दर्य-माधुर्य सुधा-जलनिधि, मधुरातिमधुर स्वरूपसे प्रकट होकर अपने स्नेहद्वारा भावुकके द्रवीभूत अन्तःकरणको अपने रंगमें रँग देते हैं। ठीक सौन्दर्यका आस्वादन हो सकता है, यह बात तो ठीक नहीं घटती है कि परमानन्दसारसर्वस्व श्रीकृष्ण ही अपनी मधुरिमा (माधुर्याधिष्ठात्री श्रीवृषभानुनन्दिनी)-का अनुभव करते हैं। ऐसे ही काल्पनिक भेदसे ज्ञानी अपने स्वरूपभूत भगवान्‌के मधुररूपका अनुभव करते हैं। भावुकके द्रुत चित्तपर निखिलरसामृतमूर्ति भगवान्‌का प्राकट्य ही भक्ति पदका अर्थ होता है। आशय यह है कि अन्तःकरण लाक्षाके समान कठिन द्रव्य है, परंतु तापक अग्निके साथ सम्बन्ध होनेसे जैसे लाक्षा पिघलती है, वैसे ही स्नेह-रागादि तापक भावोंके साथ सम्बन्ध होनेसे अन्तःकरण भी पिघलता है। यही कारण है कि रागास्पद कामिनी तथा द्वेषास्पद सर्पादि पदार्थोंको ग्रहण करता हुआ चित्त पिघलकर अपनेमें उन पदार्थोंके स्वरूपोंको अंकित कर लेता है, इसीके लिये उनका विस्मरण न होकर पुनः-पुनः स्मरण होता है। उपेक्ष्य तृण आदिकी स्मृति इसलिये कम होती है कि उनमें राग, द्वेष या भय आदि नहीं हुए, अतः चित्तकी द्रुति वहाँ नहीं हुई। भावुकोंका कहना है कि लाक्षा जबतक पिघली नहीं होती है, तबतक उसमें कोई रंग व्यापक और स्थिर नहीं होता। अतः तापक अग्निके सम्बन्धसे लाक्षा इतनी पिघलायी जाय कि सौ परतके तंजेबमें छाननेलायक हो जाय, तब गंगाजलके समान निर्मल और द्रुत उस लाक्षामें जो रंग छोड़ा जायगा, वह लाक्षाके अणु-अणुमें सर्वांगमें व्यापक तथा स्थिर हो सकेगा। फिर तो यदि लाक्षा चाहे कि मैं अपनेसे रंगको पृथक् कर दूँ, या रंग ही चाहे कि मैं पृथक् हो जाऊँ तो भी दोनों ही पृथक् होनेमें असमर्थ हैं। ठीक इसी तरह भगवद्विषयक राग आदि गंगाजलके समान निर्मल और द्रवीभूत चित्तमें परमानन्दघन भगवान्‌का प्राकट्य होनेपर पिघली हुई लाक्षामें रंगकी तरह सर्वांशमें व्यापक तथा स्थिररूपसे भगवान्‌की