भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 62, कुल 778 में से
संदर्भ में पढ़ें५२ भक्तिसुधा स्थिति होती है। भावनाके प्रभावसे इसका अपरिच्छिन्न अनन्त आन्तर विस्तार अन्तःकरणप्राण तथा रोम- रोममें फैल जाता है, तब तो आन्तररूपसे तथा बाह्यरूपसे सर्वथा ही भगवान्का अनुभव होने लगता है। अपने प्रियतम भगवान्के स्वरूपमें होनेवाले तीव्रराग और उनके विरह-व्यथामय तीव्र तापसे, भावुकके गुणरूप सर्वकोशोंका भस्मीभाव हो जाने और भावनामय भगवत्सम्मिलन सौख्यरससे मन, प्राण, इन्द्रिय, देह तथा रोम-रोमके आप्यायन होनेपर, बाह्य-आभ्यन्तर सर्व रूपसे भगवत्तत्त्वका अवगाहन होता है। इस तरह अनिमित्ता भागवती भक्ति गुणमय कोशोंको जला देती है, तभी निरुपाधिक एवं निरावरण होकर भावुक अपने भगवान्से मिल सकता है, भगवद्-विरहव्यथा तापमयी भक्तिसे जिसके अन्नमयादि पंचकोशोंके त्रिविध तनु नहीं तप्त हुए, वे परम तत्त्वामृतके समास्वादनके अधिकारी नहीं हो सकते। यही ‘अतप्ततनूर्न तदामोऽश्नुते दिवं’ इस श्रुतिका आशय है। ‘तपसा कृच्छ्रादिना भगवद्विरह- जन्यतीव्रतापेन भक्तिपरिणामभूतेन ज्ञानाग्निना वा न तप्ता तनूर्यस्य स दिवमपरमात्मतत्त्वामृतं नाश्नुते।’ कृच्छ्रादि तपसे तथा भगवद्विरहजन्य तीव्र तापसे और भक्तिके परिणामभूत ज्ञानाग्निसे जिसके स्थूल-सूक्ष्म-कारण-ये तीनों तनु नहीं सन्तप्त हुए, वे परमतत्त्वका आस्वादन कैसे कर सकते हैं? इसलिये अनिमित्ता भागवती भक्तिको सिद्धिसे भी श्रेष्ठ कहा जाता है, जैसे भोजनको जठराग्नि पचा डालती है, वैसे ही अनिमित्ता भक्ति पंचकोशोंको जीर्ण कर देती है। अनिमित्ता भागवती भक्तिः सिद्धेर्गरीयसी। जरयत्याशु या कोशं निर्गीणमनलो यथा॥ भक्तिका ज्ञानरूपमें परिणमन भक्ति ही ज्ञानरूपमें परिणत होकर मूलाविद्याका भी विध्वंस करती है। भट्टोजिदीक्षित ‘क्लृपि सम्पद्यमाने च’ इस वार्तिकके उदाहरणरूपमें कहते हैं— ‘भक्तिर्ज्ञानाय कल्पते, ज्ञानाकारेण परिणमते।’ श्रीमद्भागवतके माहात्म्यमें ज्ञान-वैराग्य श्रीभक्तिके ही पुत्र हैं, माता योग्य पुत्रकी उत्पत्तिसे ही सौभाग्यवती समझी जाती है और पुत्र माताकी भक्तिसे ही सौभाग्यवान् होता है, अतः जहाँ ज्ञान भक्तिका फल है, वहाँ भक्ति ज्ञान तथा ज्ञानियोंकी भी परम पूज्या एवं भजनीय देवता है। ज्ञान, भगवत्प्राप्ति, मुक्ति आदि यद्यपि भक्तिके फल हैं तथापि फलकी अपेक्षा साधनमें ही अधिक प्रीति युक्त होती है। यह देखते ही हैं कि यद्यपि धनका फलभोग धर्म और मोक्ष ही है तथापि लोभी धनके संग्रह और रक्षाके सामने भोग, धर्म, मोक्ष सभी पुरुषार्थोंकी तिलांजलि दे देते हैं; क्योंकि उनकी यही दृढ़ धारणा है कि यदि साधन रहेगा, तब स्पष्ट ही सब साध्य सहजमें ही सिद्ध हो सकेंगे। द्रवीभूत लाक्षामें एक हुए रंगकी तरह भक्तके प्रेमार्द्र हृदयमें एक हुए भगवान् यदि चाहें तो भी पृथक् नहीं हो सकते। विसृजति हृदयं न यस्य साक्षा- द्धरिरवशाभिहितोऽप्यघौघनाशः । प्रणयरशनया धृताङ्घ्रिपद्मः स भवति भागवतप्रधान उक्तः॥ (श्रीमद्भा० ११।२।५५) बरबस भी जिसके मंगलमय नामसे बड़ी-से- बड़ी पापराशि नष्ट हो जाती है, ऐसे परमस्वतन्त्र सर्व- शक्तिसम्पन्न भगवान् जिसके अन्तःकरणमें स्नेहार्द्रता- रूप प्रणयपाशमें बँधकर निकल न सकें, वही प्रधान भागवत होते हैं। तभी तो किसी प्रेमीने रागसे पिघले हुए अपने अन्तःकरणमें उसी द्रवावस्थारूप प्रणयपाशसे प्रभुको बाँधकर उनकी सर्वज्ञता, सर्वशक्तिमत्ता, महाशक्तिको भी कुण्ठित करके निःशंक होकर कहा है, अच्छा यदि आप मेरे हृदयसे निकल सकें तो मैं आपके पौरुषको देखूँगा— हस्तमुत्क्षिप्य यातोऽसि बलात्कृष्ण किमद्भुतम्। हृदयाद्यदि निर्यासि पौरुषं गणयामि ते॥ ऐसे ही अगर भक्त भगवान्को अपने हृदयसे