भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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निर्बलका बल ६४९ नहीं। भगवान्‌के तोषका हेतु उच्चकुलमें जन्म, सौभाग्य, मनोहर वाक्, दिव्य बुद्धि, सुन्दर आकृति आदि नहीं; क्योंकि इन सब गुणोंसे रहित भी बन्दरोंको भगवान्‌ने अपना सखा बनाया— न जन्म नूनं महतो न सौभगं न वाङ् न बुद्धिर्नाकृतिस्तोषहेतुः। तैैर्यद्विसृष्टानपि नो वनौकस- श्चकार सख्ये बत लक्ष्मणाग्रजः॥ (श्रीमद्भा० ५।१९।७) श्रीहनुमान्‌जी कहते हैं कि जब सर्वगुणविहीन बन्दर—जिसके नामसे रोटी मिलनेमें भी बाधा उपस्थित हो सकती है—उस सर्वविधहीनको भी सजल नयन होकर गुणग्राम सुननेसे प्रभुने अपना लिया, तब फिर औरोंकी तो बात ही क्या है? कहहु कवन मैं परम कुलीना। कपि चंचल सबहीं बिधि हीना॥ प्रात लेइ जो नाम हमारा। तेहि दिन ताहि न मिलै अहारा॥ अस मैं अधम सखा सुनु मोहू पर रघुबीर। कीन्ही कृपा सुमिरि गुन भरे बिलोचन नीर॥ (रा०च०मा० ५।७।७-८, ५।७) जो ऐसे प्रभुको समझ-बूझकर भी भूल जायें, फिर वे क्यों न दुःखी हों— जानतहूँ अस स्वामि बिसारी। फिरहिं ते काहे न होहिं दुखारी॥ (रा०च०मा० ५।८।१) जो प्राणी मनुष्य-शरीर पाकर भी भगवत्कृपा- सम्प्रदानपूर्वक भगवत्प्राप्तिके लिये भगवदाश्रयण नहीं करते, वे मायामय प्रलोभनोंमें फँसकर बार-बार बन्दरोंके समान बन्धनको प्राप्त होते हैं— प्राप्ता नृजातिं त्विह ये च जन्तवो ज्ञानक्रियाद्रव्यकलापसम्भृताम् । न वै यतेरन्नपुनर्भवाय ते भूयो वनौका इव यान्ति बन्धनम् ॥ (श्रीमद्भा० ५।१९।२५) निर्बलका बल भगवान्‌का गुणगान भवरोगका सर्वश्रेष्ठ महौषध है हर एक श्रेणीके प्राणीको श्रीभगवान्‌का स्मरण एवं आराधन हर समय करना आवश्यक है। यही कारण है कि भगवान्‌के मंगलमय परमपवित्र चरित्रादिके श्रवण-मननके अधिकारी ज्ञानी-अज्ञानी, सिद्ध-साधक सभी हैं और सभीको उनके अनुरूप फल भी मिलता है। फिर वे उसे चाहें अथवा न चाहें। यद्यपि जो महापुरुष स्ववर्णाश्रम-धर्मानुसार भगवान्‌की आराधनाद्वारा निर्मलान्तःकरण होकर वेदान्तोंके श्रवण-मनन- निदिध्यासन एवं तत्त्वसाक्षात्कारसे कृतार्थ हो चुके हैं, उन्हें किसीकी भी अपेक्षा नहीं होती, न उन्हें कुछ करनेसे प्रयोजन है, न उनका किसीसे कुछ अर्थ ही है, बल्कि यदि उन्हें कुछ कर्तव्यबुद्धि हो तो उनकी तत्त्वज्ञतामें भी संदेह किया जाता है— ज्ञानामृतेन तृप्तस्य कृतकृत्यस्य योगिनः। नैवास्ति किञ्चित्कर्तव्यमस्ति चेन्न स तत्त्ववित्॥ तथापि भगवान्‌के भजनमें उनकी स्वाभाविकी प्रवृत्ति होती है। अतएव भगवान्‌के आर्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी, ज्ञानी—इन चार भक्तोंमें ज्ञानीको सर्वश्रेष्ठ भक्त कहा है—'तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्ति- र्विशिष्यते।' (गीता ७।१७) अमलात्मा परमहंस महामुनीन्द्रगण निर्ग्रन्थ होकर भी भगवान्‌में निष्काम भक्ति करते हैं; क्योंकि भगवान्‌में कोई अद्भुत आत्मारामचित्ताकर्षक लोकोत्तर गुण ही हैं— आत्मारामाश्च मुनयो निर्ग्रन्था अप्युरुक्रमे। कुर्वन्त्यहैतुकीं भक्तिमित्थम्भूतगुणो हरिः॥ (श्रीमद्भा० १।७।१०) जीवनमुक्त महामुनि जेऊ। हरि गुन सुनहिं निरंतर तेऊ॥ आसा बसन ब्यसन यह तिन्हहीं। रघुपति चरित होइ तहँ सुनहीं॥ (रा०च०मा० ७।५३।२; ७।३२।६) इतना ही नहीं, विशेषतः ऐसे ही तृणारहित महामुनीन्द्र ही भगवान्‌के गुणगानके अधिकारी माने गये हैं; क्योंकि जिसका मन निरन्तर भगवत्स्वरूपा-