भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६५० भक्तिसुधा मृतसास्वादनमें लगा रहता है, वही उस रसका वितरण कर सकता है। जिस समय राजर्षि परीक्षित्ने ब्रह्माके वत्सहरण-सम्बन्धमें कुछ पूछा, उस समय ब्रह्मर्षि शुकदेवका मन प्रश्नद्वारा हृदयमें अभिव्यक्त भगवान्के स्वरूप-गुण-लीलारसमें लीन हो गया। फिर बड़ी कठिनाईसे जब घण्टा-शंख-निनाद आदिसे वे सावधान किये गये, तब कथा चली— इत्थं स्म पृष्टः स तु बादरायणि- स्तत्स्मारितानन्तहृताखिलेन्द्रियः । कृच्छ्रात् पुनर्लब्धबहिर्दृशिः शनैः प्रत्याह तं भागवतोत्तमोत्तम ॥ (श्रीमद्भा० १०।१२।४४) वस्तुतः जैसे पात्रमें भरपूर भरा हुआ रस वायुके आघात या उफानसे बहिर्भूत होता है, वैसे ही भावुकके हृदयमें अनुभूयमान भगवदीय रस प्रेमोद्रेकसे उद्गीर्ण होकर कथासुधारूपमें व्यक्त होता है। अतः वे ही चरित्र-वर्णनके मुख्य अधिकारी होते हैं— निवृत्ततर्षैरुपगीयमानाद् भवौषधाच्छ्रोत्रमनोऽभिरामात् । क उत्तमश्लोकगुणानुवादात् पुमान् विरज्येत विना पशुघ्नात् ॥ (श्रीमद्भा० १०।१।४) अर्थात् भगवान्का गुणानुवाद तृष्णाविरहित योगीन्द्रोंद्वारा गाया जाता है और वह भवरोगका सर्वश्रेष्ठ महौषध है। साथ ही श्रोत्र और मनको आनन्द देनेवाला है अर्थात् विमुक्त, मुमुक्षु और विषयी सभी भगवच्चरित्रसेवनके अधिकारी होते हैं— सुनहिं बिमुक्त बिरत अरु बिषई। लहहिं भगति गति संपति नई। (रा०च०मा० ७।१५।५) अर्थात् भगवान्का चरित्र सुननेसे विमुक्तको भक्ति, मुमुक्षुको गति और विषयीको सम्पत्ति मिलती है। इसके साथ-ही-साथ श्रवण-सुख मिलता है और मनको प्रसन्नता भी मिलती है— बिषइन्ह कहँ पुनि हरि गुन ग्रामा। श्रवन सुखद अरु मन अभिरामा॥ (रा०च०मा० ७।५३।४) निरन्तर भगवत्स्मरण सभीके लिये परम श्रेयस्कर है पूर्णपरमात्मरति ब्रह्मनिष्ठका भगवद्भजन स्वाभाविक कर्म हो जाता है—‘अद्वेष्टृत्वादिवत्तेषां स्वभावो भजनं हरेः।’ अमानित्व, अदम्भित्व आदि गुणगण जैसे स्वभावसे ही ज्ञानीमें होते हैं, वैसे ही भगवद्भजन, भगवत्परायणता भी ज्ञानीमें स्वाभाविक होती है। इसके सिवा भगवत्कृपासे ही प्रत्यक्चैतन्याभिन्न परमात्मतत्त्वमें स्थिति होती है, अतः कृतघ्नता- निवृत्यर्थ भी ज्ञानी भगवान्को भजता है। सभी वेदान्ताचार्योंने कहा है— यावज्जीवं त्रयो वन्द्या वेदान्तो गुरुरीश्वरः । आदौ विद्याप्रसिद्ध्यर्थं कृतघ्नत्वापनुत्तये ॥ अर्थात् ज्ञानीको यावज्जीवन वेदान्त, गुरु और ईश्वरकी वन्दना करते रहना चाहिये। प्रथम ब्रह्मविद्या- प्राप्तिके लिये इन सबका वन्दन होता है, पश्चात् कृतघ्नता दूर करनेके लिये। विवेकियोंने ज्ञानीके लिये अभेदभावसे ब्रह्मात्मनिष्ठा या भेदभावसे भगवद्भक्तिको समान ही कहा है। जैसे प्रेयसी प्रेमोद्रेकमें प्रियतमके वक्षःस्थलपर विहरण करे अथवा सावधानीसे पादयुग्मकी परिचर्या करे, दोनों एकही-से हैं तथापि जैसे चित्त मिल जानेपर भी चतुर नायिका अपने प्रियतमको घूँघट-पटकी ओटसे ही देखती है, वैसे ही भेदभावके मिट जानेपर भी ज्ञानी भेदभावसे भगवान्को भजते हैं। पारमार्थिक तत्त्व जानकर, व्यावहारिक द्वैतको लेकर भगवान्की भक्ति मुक्तिसे भी अत्यन्त श्रेष्ठ है और भक्त्यर्थभावित द्वैत अद्वैतसे भी श्रेष्ठ होता है। यह स्थिति लोकसंग्रहनिरपेक्ष पूर्णपरमात्मनिष्ठ विज्ञानीकी है। परंतु लोकसंग्रही ज्ञानीको तो लौकिक, वैदिक, धार्मिक, नैतिक अनेक प्रकारके कर्म करने पड़ते हैं और उनमें अनेक प्रकारकी विषम परिस्थितियोंका भी अनुभव करना पड़ता है। अनेक प्रकारके तापोंका भी योग उपस्थित होता है, अतः उन लोकसंग्रहियोंको यह परम आवश्यक होता है कि वे