भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 661, कुल 778 में से
संदर्भ में पढ़ें[Page-header: निर्बलका बल ६५१]
विनश्वर विषम प्रपंचके भीतर सम अविनश्वर परमात्मतत्त्वका स्मरण रखें। लोककल्याणार्थ या आत्मकल्याणार्थ कार्यक्षेत्रमें अवतीर्ण होनेपर सहस्रों दोषोंके संचारकी सम्भावना होती है, इसलिये उन सबसे बचकर अव्याहत स्वरूपनिष्ठा बनाये रखनेके लिये निरन्तर श्रीभगवान्की स्मृति परमावश्यक है। तीसरे हैं मुमुक्षु लोग, ये दो श्रेणीके हैं, एक तो मोक्षकी आकांक्षासे श्रीहरिके चरणपंकजमें समर्पण- बुद्धिसे स्वधर्मानुष्ठान करनेवाले एवं दूसरे शुद्धान्तःकरण हो जानेपर तीव्र विविदिषासे श्रवण, मनन, निदिध्यासन करनेवाले। इन दोनों ही श्रेणीके पुरुषोंको निरन्तर भगवत्स्मृति परमावश्यक है। नैष्कर्म्य-तत्त्वज्ञान भी बिना श्रीहरि-प्रेमके शोभित नहीं होता, फिर कर्म चाहे निष्काम ही क्यों न हो, भगवच्चरणपंकजमें बिना समर्पण किये वह शोभित नहीं होता— 'नैष्कर्म्यमप्यच्युतभाववर्जितं न शोभते ज्ञानमलं निरञ्जनम्।' (श्रीमद्भा० १२।१२।५२) 'सोह न राम पेम बिनु ग्यानू। करनधार बिनु जिमि जलजानू॥' (रा०च०मा० २।२७७।५) 'सो सुखु करमु धरमु जरि जाऊ। जहाँ न राम पद पंकज भाऊ॥' (रा०च०मा० २।२९१।१) जो कर्म भगवत्समर्पणके लिये अनुष्ठित होंगे, उन कर्मोंकी शुद्धिपर ध्यान रहेगा, बुद्धिमान् भगवान्को अशुद्ध कर्मोंका समर्पण नहीं करेंगे। अतः यदि 'यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्। यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम्॥' (गीता ९।२७), 'कायेन वाचा मनसेन्द्रियैर्वा' (श्रीमद्भा० ११।२।३६) इत्यादि भगवान् और भगवदीयोंके कथनानुसार सभी कर्मोंको भगवान्में समर्पण करनेका नियम बनाया जायगा तो लौकिक-वैदिक सभी कर्मोंमें शुद्धि रहेगी और हर एक कर्मको करते समय भगवान्का स्मरण रखनेसे अन्तरात्माको त्रितापसे तप्त न होना पड़ेगा। भगवद्भक्ति, भगवत्स्मृतिकी महिमासे शीघ्र ही भगवान्का साक्षात्कार भी हो सकेगा— 'भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः।' (गीता १८।५५) भगवत्प्रेमसे निर्मल एवं एकाग्र मनपर सहजमें ही परमात्मस्वरूपकी अभिव्यक्ति हो जाती है। प्रापंचिक व्यवहारमें आध्यात्मिक, आधिदैविक, आधिभौतिक अनेक तापोंसे तप्त होना पड़ता है। परंतु जिनके हृदयमें भगवान्की पदनखमणिचन्द्रिकाकी आभा रहती है, उन्हें वे ताप उसी तरह नहीं तपा सकते, जैसे शारदी चान्द्रमसी ज्योत्स्नाके विकसित होनेपर सूर्य- ताप नहीं तपा सकता। जैसे साँपके विषसे परिश्रान्त होकर नकुल विश्रान्तिके लिये अरण्यमें जाकर विषघ्नी दिव्य महौषधियोंका सेवन करता है, वैसे ही संसार- विषसे व्याकुल होनेपर संसारियोंको भी सत्संगमें जाकर भगवत्स्मृतिका सेवन करना चाहिये। कहा जाता है कि भगवान्का स्मरण-भजन और लौकिक कर्म दोनों साथ कैसे बन सकते हैं? परंतु भगवान् तो और कार्योंकी कौन कहे, सबसे विषम कर्म जो युद्ध है, उसको करते हुए भी भगवत्स्मृतिको आवश्यक बतलाते हैं। कृषि, व्यापार आदि सभी कर्मोंसे युद्ध कठिन है, उसमें अस्त्र-शस्त्रकी वर्षा होती है, उससे हर समय अपने मर्मोंको बचाना, परच्छिद्रान्वेषण करना, अस्त्र-शस्त्र चलाना, शस्त्र-अस्त्रोंके लगनेपर व्यथाओंको भी सहन करना पड़ता है। परंतु भगवान्के मतसे उस समय भी परमात्मस्मरण रखना परमावश्यक है— 'तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।' (गीता ८।७) चौथी कोटिके वे पुरुष हैं जो निष्काम नहीं हैं, किंतु आर्त और अर्थार्थी होकर आर्ति-निवृत्ति एवं अर्थप्राप्तिके लिये विविध प्रकारके लौकिक कर्मोंमें प्रयत्नशील होते हैं। उन्हें भी अपने प्रयत्नोंकी सफलताके लिये भगवान्का स्मरण-भजन करते रहना चाहिये, केवल अपने साधन-बलके गर्वमें भगवान्को नहीं भूलना चाहिये। अतएव यद्यपि अर्जुन बुद्धिबल, बाहुबल, सैनिकबल, धनबल आदिमें सम्पन्न थे तो भी उन्हें भगवत्स्मरणकी आवश्यकता बतलायी गयी है। वस्तुतः जितना भी साम्राज्य, स्वाराज्य,