भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 662

६५२ भक्तिसुधा वैराग्य, शौर्य, वीर्य, ऐश्वर्य, अभ्युदय है, वह सभी धर्म और ईश्वराराधनका ही फल है। दरिद्रता, परतन्त्रता, आधि, व्याधि, शोक, सन्ताप आदि अनर्थ धर्मकी उपेक्षा और ईश्वरविमुख होनेका फल है। महा-महा शूरवीर एवं ऐश्वर्यवानोंके चरित्रोंपर ध्यान देनेसे विदित होगा कि उन्होंने धर्म और ईश्वरके सेवनसे उच्चतम स्थिति प्राप्त की है। अतएव सुख एवं तत्साधनोंकी न्यूनाधिकतासे उसके हेतुभूत पुण्यकी न्यूनाधिकताकी कल्पना होती है, दुःख और दुःखसाधनोंके तारतम्यसे उसके हेतु पापके तारतम्यकी कल्पना होती है। इस जन्ममें भी धर्म और भगवान्‌का आश्रयण करके जो अभीष्ट फलसिद्धिके लिये प्रयत्नशील होते हैं, उन्हें बड़ी सुगमतासे सफलता मिलती है— ‘मामाश्रित्य यतन्ति ये।’ (गीता ७। २९) पाँचवीं कोटिके वे पुरुष हैं, जो आर्त एवं अर्थार्थी तो हैं, परंतु आर्ति-निवृत्ति एवं अर्थप्राप्तिके लिये उनके पास कोई साधन नहीं है, उनके लिये भी एक भगवान्‌का ही सहारा रह जाता है—‘निरबलके बल राम।’, ‘हारेको हरिनाम॥’ जब सर्वसाधनसम्पन्नोंको भी साधनबलका दर्प छोड़कर श्रीभगवान्‌का सहारा लेना पड़ता है, तब साधनहीन किसकी शरण जायें ? निर्बल, निराश्रय पुरुष किसी आश्रयका अन्वेषण करता ही है, गिरते हुए पुरुषके हाथ-पैर स्वभावसे ही किसी आश्रयको पकड़नेके लिये प्रवृत्त होते हैं। बालक विपन्न एवं उपद्रुत होकर माता-पिता एवं बन्धुकी ओर दौड़ता है, प्रजा राजाकी ओर दौड़ती है, निर्बल बलवान्‌की ओर दौड़ता है। परंतु जहाँ इन किन्हींका वश या सहारा नहीं है, वहाँ सिवा पूर्णतम पुरुषोत्तम भगवान् सर्वान्तरात्माके और किसका सहारा हो सकता है ? वस्तुतः परमज्ञानी, भगवत्परायण और इस साधनशून्य अर्थार्थी या आर्तकी स्थिति समान ही है, उसके भी सब कुछ भगवान् ही हैं और इसके भी सब कुछ भगवान् ही हैं। निरालम्ब, निःसाधन आर्त एवं अर्थार्थी बड़े प्रेम और विश्वाससे भगवान्‌को पुकारता है और भगवान् उसकी जल्दी ही सुनते भी हैं। प्रतिज्ञा भी उनकी यह है, एक बार भी जो प्रपन्न होता है, उसे मैं अभय देता हूँ— सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते। अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद् व्रतं मम॥ (वाल्मीकीय० ६।१८।३३) हतभाग्य प्राणीको भगवान्‌के इस व्रतपर विश्वास नहीं होता, किंतु साधारण राजाओं और उनकी झूठी प्रतिज्ञाओंपर विश्वास होता है। आर्तकी आर्ति मिटाकर भगवान् उसे परम अभय देते हैं, कृतार्थ कर देते हैं। अर्थार्थीको भी अर्थप्रदानके बाद निष्काम, जिज्ञासु एवं ज्ञानी बनाकर तार देते हैं। विभीषण पहले अवश्य अर्थार्थी था। परंतु अन्तमें तो पूर्ण परमार्थी हो गया। भगवान्‌का दर्शन करके उसने कहा था— उर कछु प्रथम बासना रही। प्रभु पद प्रीति सरित सो बही॥ अब कृपाल निज भगति पावनी। देहु सदा सिव मन भावनी॥ (रा०च०मा० ५।४९।६-७) परंतु इन सब परिस्थितियोंसे भिन्न एक और भी छठी परिस्थिति उस प्राणीकी है, जो कृतकृत्य भी नहीं, निष्काम और विरक्त भी नहीं, आर्त- अर्थार्थी होकर भी निराश्रय एवं साधनविहीन है और साथ ही भगवान्‌पर जिसे विश्वास भी नहीं है। परंतु यदि उसकी आन्तर भावना ऐसी हो कि भगवान्‌में हमारा विश्वास उत्पन्न हो और हम अपनी परिस्थितियोंको समझकर भगवान्‌को पुकारें कि ‘हे नाथ! आप ही ऐसी कृपा करो, जिससे हम आपपर विश्वासकर आपको पुकारें और आपको न भूलें और मैं ब्रह्म (भगवान्)-का निराकरण (उपेक्षण) न करूँ।’—‘माहं ब्रह्म निराकुर्याम्।’ वस्तुतः भगवान्‌की कृपासे ही प्राणी विश्वासपूर्वक भगवान्‌की शरण जाता है। श्रीअक्रूरजीने कहा है— ‘हे नाथ! आज मैं आपके श्रीचरणोंके शरण आया हूँ, यह भी आपकी कृपाका ही फल है। जब प्राणियोंकी सांसारिक विपत्तियाँ मिटनेको होती हैं, तभी सदुपासनासे आपके श्रीचरणोंमें उनकी प्रीति होती है’—