भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 663

सोऽहं तवाङ्घ्र्युपगतोऽस्म्यसतां दुरापं तच्चाप्यहं भवदनुग्रह ईश मन्ये। पुंसो भवेद् यर्हि संसरणापवर्ग- स्त्वय्यब्जनाभ सदुपासनया मतिः स्यात्॥ (श्रीमद्भा० १०।४०।२८) सचमुच आज भारतकी यही अन्तिम दशा है। न वह कृतकृत्य है, न निष्काम एवं विरक्त। वह आर्त एवं अर्थार्थी होकर भी आश्रय एवं साधनविहीन है। बुद्धिबल, बाहुबल, सैन्यबलसे रहित निःसहाय है। हिन्दू-मुसलमानके अतिरिक्त शैव-वैष्णव एवं वैष्णव- वैष्णव ही परस्पर कटकर मर सकते हैं। यदि कथंचित् धरना आदि अशास्त्रीय मार्गसे कुछ मिल भी जाय तो वह उसकी रक्षा भी नहीं कर सकता। इतनेपर भी उसमें धर्म और भगवान्‌से विश्वास उठ चला है— ग्रह गृहीत पुनि बात बस तेहि पुनि बीछी मार। तेहि पिआइअ बारुनी कहहु काह उपचार॥ (रा०च०मा० २।१८०) जहाँ अर्जुन ऐसे साधनसम्पन्न योद्धाके लिये भी ‘सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर’ (गीता ८।७)-का आदेश था, वहाँ सर्वसाधनशून्य दशामें भी भगवान्‌का स्मरण नहीं होता, इससे अधिक इसकी शोचनीय दशा और क्या हो सकती है ? अस्तु, इसके हितैषियों और इसको चाहिये कि वह भगवान्‌को पुकारे और प्रार्थना करे कि ‘हे नाथ! हम सबको आपमें विश्वास और भक्ति दो, जिससे कि हम आपको पुकारें। हम सबको धर्मग्लानि—अधर्माभ्युत्थान मिटाकर परमकल्याण— मूलभूत धर्ममें प्रीति दो, जिससे सब तरहके अनर्थ मिटकर भारत फिर अभ्युदय एवं निःश्रेयसका भागी हो।’

करुणालहरी

प्रेमी भक्तका भगवान्‌के प्रति मधुर उपालम्भ पण्डितराज श्रीजगन्नाथजीकी ‘गंगालहरी’ का नाम भला कौन नहीं जानता? उन्हींकी एक अत्यन्त अद्भुत सरस कृति ‘करुणालहरी’ है। उसीमेंसे कुछ सदुक्तियाँ यहाँ निदर्शित की जा रही हैं। एक पद्यमें वे कहते हैं—भगवन्! मैं तो नरकोंकी तरह-तरहकी यातनाओंसे परिचित हूँ, मेरी लज्जा भी विदा हो चुकी है, फिर दूसरोंके द्वारोंपर भटकनेसे मेरा क्या बिगड़ेगा? परंतु नाथ! जरा आपको सूक्ष्म दृष्टिसे विचारना चाहिये, जनता आपको क्या कहेगी?— नितरां नरकेऽपि सीदतः किमु हीनं गलितत्रपस्य मे। भगवन् कुरु सूक्ष्ममीक्षणं परतस्त्वां जनता किमालपेत्॥ नाथ! यद्यपि नरकोंमें अपने कर्मोंके ही परिणामस्वरूप मुझे बड़ी-बड़ी यातनाएँ भोगनी पड़ती हैं, फिर भी यह बड़ी असह्य बात है कि देखनेवाले मुझे अनाथ कहते हैं। नाथ! भवजालबन्धनमें तो नृग, गजेन्द्र आदि मेरे साथ ही बँधे थे। मेरी उपेक्षा करके उन्हें मुक्त करते हुए क्या आपके मनको करुणा नहीं द्रवित करती ? प्रभो! आप बिना उपाधि (कारण) ही प्राणियोंकी विपत्तियोंको दूर करते हैं, यह जानकर ही मैंने पुण्यपुंजोंकी उपेक्षा की है। आपको पतित-पावन सुनकर ही मैंने अहर्निश पाप किया। फिर अब आप उपेक्षा करते हैं? प्रभो! मैंने पुण्य कभी नहीं किया, सब कुछ पाप ही किया है, फिर मैं अब आपसे कैसे क्या कहूँ? नाथ! आपके सामने ही मुझे मद, काम, मोह आदि अपनी-अपनी ओर खींचते हैं। आपको क्या लज्जा नहीं लगती? गढ़ेमें गिरते हुए शिशुको पथिक भी शीघ्रताके साथ बचा लेता है। नाथ! आप तो जनक ही हैं, फिर भवार्णवमें डूबते हुएको क्यों नहीं बचाते?— अयि गर्तमुखे गतः शिशुः पथिकेनापि निवार्यते जवात्। जनकेन पतन्भवार्णवे न निवार्यो भवता कथं विभो॥ हे सुकृतप्रिय! यदि आप सुकृतियोंको ही सुखद होकर मुझ पातकीको धारण नहीं करोगे तो आपका विश्वम्भर नाम भी दुर्लभ हो जायगा। प्रभो! यदि आप मेरे परुष (कठोर) वाक्योंसे रुष्ट हो गये हों तो मुझ मुखर और अपराधीको अपने संसारसे निकाल दो। प्रभो! पतित, दुर्गत एवं अकृतज्ञ कैसा भी क्यों न हो,