भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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६५४ भक्तिसुधा 'मैं आपका हूँ' ऐसा कहनेमात्रसे आपको लज्जासे ही उसपर दया करनी चाहिये। किसी पुण्यप्रकृतिपर कृपा करनेसे कोई विशेष महत्त्व नहीं है। कृपानिधे ! यदि मुझ-सरीखे पापियोंपर कृपा की जाय तो आप ही सोचिये, कितनी कीर्ति होगी ? जो बालक शैशवावस्थामें लालित किया गया है, बड़ा होनेपर उसीकी ताड़ना उचित है। परंतु आपने तो मेरा कभी भी लालन नहीं किया। फिर मेरी ताड़ना क्यों ? अथवा भगवन् ! मेरा ही दोष है, मैं ही दूषित हूँ, व्यर्थ ही आपको उपालम्भ देता हूँ। जैसे रमणीके विरहज्वरसे ज्वलित कुमति प्राणी अमृतांशुकी निन्दा करता है, वैसे ही मैं अपने ही दोषसे आपको उपालम्भ देता हूँ। प्रभो ! मैं अत्यन्त नम्रतासे पूछता हूँ, जरा अच्छी तरह विचारकर इसका उत्तर मुझे दें। मैं क्या गजेन्द्र और गोवर्धनपर्वतसे भी अधिकतर गुरु (भारी) हूँ, जो आप शीघ्रतासे मेरा उद्धरण नहीं करते ?— [