भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 665, कुल 778 में से
संदर्भ में पढ़ेंगजेन्द्र-मुक्ति ६५५ गजेन्द्र-मुक्ति आर्तभक्तकी प्रार्थना क्षीरसागरसे आवृत एक त्रिकूट पर्वत था। उसके चाँदी, लोहे और सोनेके शृंगोंकी दिव्य दीप्तिसे क्षीरसागर और सारी दिशाएँ प्रदीप्त हो रही थीं। नाना प्रकारके रत्नों, मणियों, वृक्षों, लताओं तथा पक्षियों, सिद्ध, चारण, यक्ष, गन्धर्व, अप्सराओंसे उस पर्वतकी शोभा निरन्तर बढ़ रही थी। उसी पर्वतकी द्रोणीमें ही एक बड़ा विशाल सरोवर था, जिसमें बहुत-से कंचन वर्णके पंकज शोभायमान थे। कुमुद-कमल आदिकी श्रीसे समवेत, षट्पदोंके घोष और पक्षियोंके कलनादसे उसकी शोभा बड़ी अद्भुत हो रही थी। उसी पहाड़ और जंगलोंमें एक गजेन्द्र रहता था। वह अपनी हथिनियों और यूथोंके साथ सकण्टक वेणु और वेत्रोंके वनोंको तोड़ता-फोड़ता, बड़ी-बड़ी वनस्पतियोंको भी गिराता हुआ सरोवरमें स्नान करनेके लिये चला। उसकी गन्धमात्रसे दूसरे हाथी, सिंह, व्याघ्र, व्याल आदि भयभीत होकर भागने लगे। उसके अनुग्रहसे हरिण, शश आदि क्षुद्र जन्तु निर्भय होकर विचरण करते थे। घामसे तप्त होकर मतवाले हाथियों और हथिनियोंके साथ अपनी गुरुतासे उस पर्वतको प्रकम्पित करता हुआ, मद पीनेवाले भ्रमरोंकी मालाओंसे निषेवित वह गजेन्द्र पंकजरेणुरूपित वायुको सूंघता हुआ सरोवरके पास जा पहुँचा। तृषार्दित अपने यूथके साथ उस सरोवरमें प्रविष्ट होकर उसने खूब जल पीया और अपनी शुण्डसे जल डाल-डालकर अपनेको नहलाने लगा। शुण्डोद्भूत जलकणोंसे अपनी हथिनियों और बच्चोंको पिलाने और नहलानेमें दूसरे गृहस्थोंके समान ही वह दयालु गजेन्द्र संलग्न हो गया। ईश्वरकी मायासे मोहित होनेके कारण उसे विपत्ति दृष्टिगोचर नहीं हुई। इतनेमें ही किसी दैवप्रेरित बलवान् ग्राहने आकर क्रोधसे उसका पाँव पकड़ लिया। महाबलवान् गजेन्द्रने अपनेको छुड़ानेके लिये बड़ा प्रयत्न किया। उसे आतुर देखकर हथिनियों और हाथियोंने भी छुड़ानेका प्रयत्न किया, परंतु ग्राहसे आकृष्ट गजेन्द्रको बचानेमें असमर्थ होकर वे दीन- बुद्धिसे चिल्लाने लगे। गजेन्द्र कभी ग्राहको बाहरकी तरफ ले जाता था और कभी ग्राह गजेन्द्रको भीतरकी तरफ ले जाता था। इस तरह परस्पर एक-दूसरेको खींचते और लड़ते हुए हजार वर्ष बीत गये, फिर भी दोनों जीते रहे। देवता भी आश्चर्य मान रहे थे। पानीमें दिन-रात आकृष्ट होनेके कारण गजेन्द्रके मन, बल और ओजका बहुत व्यय हो गया, अतः शिथिलता आ गयी। इसके विपरीत ग्राहकी शक्ति बढ़ गयी; क्योंकि ग्राहका तो जलमें घर ही था, उसकी स्थिति अनुकूल थी। जब गजेन्द्र प्राणके संकटमें पड़ गया और विवश हो गया, अपनेको छुड़ानेमें असमर्थ हो गया, तब चिरकालतक ध्यान करके उसने निश्चय किया कि यह मेरे जातीय हाथी मुझ आतुरको बचा नहीं सकते तो फिर मेरी हथिनियाँ मुझे बचा ही कैसे सकती हैं? यह ग्राह नहीं, विधाताका पाश है, उसमें मैं ग्रस्त हो रहा हूँ, उसी परमेश्वरकी शरण जाऊँ, जो ब्रह्मादि सभी प्राणियोंके एकमात्र आश्रय हैं। जो भगवान् प्रचण्ड वेगवाले बलवान् कालसर्पसे भयभीत प्राणीकी रक्षा करते हैं, मौत भी जिनसे डरकर भागती फिरती है, उसी भगवान्की मैं शरण जाता हूँ। श्रीशुकभगवान्ने राजा परीक्षित्से कहा कि ऐसा निश्चयकर और मनको समाहित करके वह गजेन्द्र पिछले जन्मके शिक्षित परम जाप्यका जप करने लगा। गजेन्द्रने कहा— 'मैं उन भगवान्का मनन कर रहा हूँ अर्थात् ध्यानमात्रसे उन्हें नमस्कार कर रहा हूँ। ग्राहसे गृहीत होनेके कारण शरीरसे प्रणाम करना भी मेरे लिये अशक्य है, जिन भगवान्के कारण देहादि जड़ प्रपंच भी चेतन हो रहे हैं। जो पुरुष हैं अर्थात् जिनसे