भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसम्पूर्ण विश्व पूर्ण हो रहा है। विश्वके कारण होनेसे घटमें मृत्तिकाके समान विश्वमें भगवान् पूर्ण हैं; अतः उन्हींसे सम्पूर्ण विश्व प्रकाशित हो रहा है। कहा जाता है कि जगत्के कारण प्रकृति और पुरुष हैं, अतः कहा कि वह आदिबीजस्वरूप हैं। आदिप्रकृति, बीज-पुरुष अर्थात् जो प्रकृतिपुरुष-स्वरूप हैं, फिर भी वह जीवके समान पराधीन नहीं हैं, किंतु सर्वोत्कृष्ट परमेश्वर हैं, उन भगवान्का मैं अभिध्यान करता हूँ। जिस अधिष्ठानसे सम्पूर्ण विश्व है, जिस उपादानसे विश्व उत्पन्न होता है, जिस कर्तासे जो पद अपने-आप बन जाता है और जो इस कार्य और कारणसे पर है, उस स्वयम्भू स्वतःसिद्ध परमात्माकी मैं शरण हूँ।' 'जो स्वात्मामें ही अपनी मायासे अर्पित, प्रकाशित और कभी तिरोहित विश्वका साक्षीरूपसे प्रकाशन करते हैं और साथ ही अविलुप्तदृक् हैं और जो आत्ममूल अर्थात् स्वप्रकाश हैं, परप्रकाशकचक्षु आदिसे भी पर हैं अर्थात् चक्षु आदिके भी प्रकाशक हैं— चक्षुषश्चक्षुः, ('ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्त- मसः परमुच्यते।') (गीता १३।१७) इत्यादि वचनोंसे स्पष्ट है कि भगवान् ही विभिन्न प्रकाशक ज्योतियोंके भी प्रकाशक ज्योति हैं। कालके प्रभावसे सम्पूर्ण लोक और लोकपाल जब पंचतत्त्वको प्राप्त हो जाते हैं, तब दुरवग्राह्य, गम्भीर अनन्तपार तम ही रह जाता है, उस तमके पार विराजमान विभु हैं, मैं उन्हींको नमन करता हूँ।' ('आदित्यवर्णस्तमसः परस्तात्')' श्रुति कहती है कि वे भगवान् आदित्यवत् सर्वभासक एवं स्वतःप्रकाश हैं और तमसे परे हैं। देवता और ऋषि भी उनके पदको नहीं जानते, फिर दूसरे साधारण कौन जन्तु उन्हें जान सकते हैं? उनका जानना और कहना किसीके लिये भी सम्भव नहीं है। जैसे विभिन्न आकृतियोंद्वारा विचेष्टा करते हुए नटके आक्रमणोंका परिज्ञान दुष्कर है, वैसे ही भगवान्के विभिन्न चरित्रों और अनुक्रमणोंका भी जानना और कहना बहुत दुष्कर है। दुर्गम चरित्रवाले वे भगवान् श्रीहरि मेरी रक्षा करें। जिनके समंगल पदारविन्दके दर्शनकी इच्छासे विमुक्तसंग सुसाधु मुनि सम्पूर्ण भूतोंमें असक्त दृष्टि रखते हुए अव्रण—छिद्रवर्जित और अवलोकव्रत— आश्चर्यव्रतका आचरण करते हैं, वे ही भगवान् मेरी गति हैं। उन भगवान्का जन्म, कर्म, नाम, रूप, गुण, दोष कुछ नहीं होता तथापि लोककी उत्पत्ति, लय एवं पालनके लिये अपनी मायासे वे जन्म, कर्म आदिको स्वीकार करते हैं। अनन्तशक्ति, परेश, परब्रह्म भगवान्को नमस्कार है। जो अरूप हैं, साथ ही बहुस्वरूप हैं, उन आश्चर्यकर्मवाले भगवान्को प्रणाम है। जो प्रकाशान्तरकी अपेक्षा न करके प्रकाशमान हैं, जो सर्वप्रकाशक साक्षी तथा जीवके भी नियन्ता हैं, चित्तवृत्ति एवं वाणीसे भी जो अप्राप्य हैं, जो निपुण पुरुष शुद्ध अन्तःकरणसे संन्यासके द्वारा प्रत्येक स्वरूपसे प्राप्त होनेवाले हैं, जो कैवल्यके दाता हैं, निर्वाणसुख-संवित्स्वरूप हैं, उन प्रभुके लिये प्रणाम है।' 'जो सत्त्वादि गुणधर्मोंका अनुसरण करके शान्त, घोर एवं मूढ़ प्रतीत होते हैं, साम्य, निर्विशेष और ज्ञानघन हैं, जो क्षेत्रज्ञ एवं सर्वाध्यक्ष हैं, साक्षी हैं, आत्मा अर्थात् क्षेत्रज्ञोंके भी मूल हैं तथा मूल अर्थात् प्रकृतिके भी प्रकृति अर्थात् मूल हैं; क्योंकि स्वतः पूर्वसिद्ध पुरुष हैं, उन प्रभुको प्रणाम है। जो सर्वेन्द्रियोंके, शब्दादि विषयोंके द्रष्टा हैं और सर्वेन्द्रियवृत्तिरूप प्रत्ययोंके हेतु हैं अथवा चित्प्रतिबिम्बित वृत्तियोंके द्वारा बिम्बस्वरूपसे जो परिलक्षित होते हैं, छायामय असत्स्वरूप अहंकारादि प्रपंचोंसे बोधित किये जाते हैं, जो तद्रूपसे विषयोंमें भासमान होते हैं, उन भगवान्को प्रणाम है। सबके कारणरूप अतएव स्वयं निष्कारण तथा मृदादि विकारविलक्षण अद्भुत