भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 667

गजेन्द्र-मुक्ति ६५७ कारण हैं, उन भगवान्‌को मैं प्रणाम करता हूँ। जो पंचरात्र आदि समस्त आगम (शास्त्र) और समस्त वेद आदिके समुद्रस्थानीय हैं तथा जो मोक्षरूप एवं सत्पुरुषोंके आश्रय हैं, ज्ञानाग्निरूप, गुणविस्फूर्जक, विधि-निषेधविवर्जित और स्वयंप्रकाश हैं, उन भगवान्‌को मेरा प्रणाम है।' 'जो अज्ञानपाशका छेदन करनेवाले, सकरुण, निरालस, अन्तर्यामिरूपसे सब जीवोंके मनमें प्रतीत होनेवाले, सबका नियमन करनेमें समर्थ और अपरिच्छिन्न हैं, उन भगवान्‌को मैं प्रणाम करता हूँ। गृह-कुटुम्ब- चिन्तामें आसक्त जनोंके लिये दुष्प्राप्य, गुणोंके संगसे रहित, मुक्तात्माजनोंसे परिभाषित, ज्ञातात्मा, ईश्वर हैं; उन भगवान्‌को मेरा प्रणाम है।' 'जिनकी आराधना करनेवाले अभीष्ट वस्तुओंको प्राप्त करते हैं तथा न चाही गयी भी आशिषोंको प्राप्त करते हैं, जो अव्यय (नित्य) शरीर भी देते हैं, वे परम कृपालु मेरा विमोक्षणकर आनन्दमें मग्न होकर अति अद्भुत परममंगल उनके चरितको ही गाते हैं, उन अक्षर ब्रह्म, आध्यात्मिक योगगम्य, अतीन्द्रिय, सूक्ष्म, अनन्त और परिपूर्ण भगवान्‌की मैं स्तुति करता हूँ।' 'ब्रह्मादि देवता, वेद, चराचर लोक नाम-रूपके विभेदसे जिनके कलामात्रसे बनते हैं, जैसे अग्निकी अर्चि और सूर्यकी किरणें उनसे उठती तथा उन्हींमें लीन हो जाती हैं, वैसे ही जिनसे तथा जिनमें यह गुणोंका प्रवाह, बुद्धि, मन, इन्द्रिय आदि उद्भूत, तिरोभूत होते हैं तथा जो न देव हैं, न असुर; न मर्त्य हैं, न पक्षी,; न स्त्री हैं, न पुरुष, न नपुंसक; न गुण हैं, न कर्म और न सत् हैं, न असत् तथा जो अशेषात्मक हैं, उनकी जय हो।' 'मुझे ग्राहसे शरीर छुड़ाकर जीनेकी इच्छा नहीं है; क्योंकि बाहर-भीतर अविवेकसे व्याप्त इस गजत्वसे मेरा कोई प्रयोजन नहीं है। मैं तो यह चाहता हूँ कि मेरे आत्मप्रकाशका आवरण—अज्ञान मिट जाय, मैं इसीका मोक्ष चाहता हूँ। मैं ऐसा मोक्ष चाहता हूँ, जिसका फिर किसी भी कालमें नाश न हो। मुमुक्षु मैं विश्वरूप, विश्वव्यतिरिक्त, विश्वके स्रष्टा, विश्वके आत्माको केवल प्रणाम करता हूँ। भगवद्धर्मानुष्ठानसे कर्मोंको दग्ध कर देनेवाले योगी जिनको अपने हृदयमें भावित करते हैं, उन योगेश्वरको मैं प्रणाम करता हूँ। जिनका वेग असह्य है, जिनकी शक्तियाँ असह्य हैं, जो शब्दादिरूपसे प्रतीयमान हैं, प्रपन्नजनोंके पालक हैं, जिनकी शक्ति अनन्त है, कुत्सित इन्द्रियोंवाले दुराचारी जिनके मार्गको नहीं प्राप्त कर सकते, उनको बार-बार मेरा प्रणाम है। जिनकी मायासे उत्पन्न हुए अहंकारसे आवृत हुआ यह जन कुछ भी नहीं जानता, 'उन सदा जाग्रत् माहात्म्यवाले भगवान्‌की शरणमें मैं प्राप्त हूँ।'- नमो नमस्तुभ्यमसहायवेग- शक्तित्रयायाखिलधीगुणाय । प्रपन्नपालाय दुरन्तशक्तये कदिन्द्रियाणामनवाप्यवर्त्मने ॥ (श्रीमद्भा० ८।३।२८) इस प्रकार गजेन्द्रद्वारा निर्विशेष तत्त्वका उपवर्णन किये जानेपर अपनेमें मूर्तिभेदका अभिमान रखनेवाले देवता जब नहीं आये, तब सर्वात्मा, निखिल देवतामय श्रीहरि आविर्भूत हुए। गजेन्द्रको उस प्रकार पीड़ित देखकर और उसके स्तोत्रको सुनकर वेदमय अपने स्वच्छन्द शीघ्रगामी गरुड़पर विराजमान होकर देवताओंसे स्तुत होते हुए चक्रको धारण किये भगवान् वहाँ शीघ्र पधारे, जहाँ वह गजेन्द्र था। उस समय गजेन्द्र सरोवरमें डूब रहा था, बड़े बली ग्राहने उसे जोरसे पकड़ रखा था, वह बड़ा ही पीड़ित था। चक्रधारी श्रीहरिको आकाशमें गरुड़पर देखकर कमलसहित कर (सूँड़) उछालकर प्रेमपारवश्यसे, बड़ी कठिनाईसे वह बोला- 'नारायणाखिलगुरो भगवन् नमस्ते॥' (श्रीमद्भा० ८।३।३२) हे अखिलगुरो! भगवान् नारायण! आपको