भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 668

४५८ भक्तिसुधा प्रणाम है। उसे दुःखी देखकर श्रीहरि सहसा गरुड़से उतर पड़े और कृपापूर्वक शीघ्रतासे ग्राहसहित गजेन्द्रको सरोवरसे बाहर निकालकर देवताओंके देखते-ही- देखते चक्रसे नक्रका मुख विदारित करके भगवान्‌ने गजेन्द्रको मुक्त कर दिया- तं वीक्ष्य पीडितमजः सहसावतीर्य सग्राहमाशु सरसः कृपयोज्जहार। ग्राहाद् विपाटितमुखादरिणा गजेन्द्रं सम्पश्यतां हरिरमूमुचदुस्त्रियाणाम् ॥ (श्रीमद्भा० ८।३।३३) यह कथा व्यापक रूपसे अध्यात्मभावमें देखी जाती है। कारण (अव्यक्त) चैतन्य क्षीरसमुद्र है, त्रिगुणात्मिका माया त्रिकूटाचल है। तदाश्रित संसारारण्यमें भटकनेवाला जीवात्मा ही गजेन्द्र है। आध्यात्मिक, आधिदैविक, आधिभौतिक अनुगुण वृत्तियाँ तथा विविध सम्बन्धी ही उसके साथी हाथी और हथिनी हैं, महामोहरूप ग्राहसे ग्रस्त जीवात्माको कोई भी सम्बन्धी बचानेमें समर्थ नहीं होते। जब जीवात्माकी अपनी शक्ति बेकार हो जाती है, वह निराधार, निराश्रय होकर डूबनेको होता है, तब उसे प्राकृत सुकृत कर्मोंके सद्विपाकसे भगवान्‌का स्मरण होता है, सर्वसाधनविहीन विपन्न प्राणीके मानस प्रणाममात्रसे प्रभु सन्तुष्ट हो जाते हैं, अपना सब कुछ भूलकर दौड़ पड़ते हैं। भावुकोंका कहना है कि गजेन्द्र 'हरि'-इन दो अक्षरोंका नाम भी उच्चारण नहीं करने पाया था कि भगवान् आ गये। सुनते हैं कि सत्यभामाने प्रभुसे पूछा कि कहाँ जानेकी जल्दी है, तब भगवान् ने 'हाथी' कहा। परंतु 'हा' सत्यभामाके पास और 'थी' वहाँ ग्राहके मुखमें गजेन्द्रको उबारकर। ऐसे अशरणशरण, अकारणकरुण, करुणावरुणालय भगवान् आर्तत्राण- परायण हैं। वृन्दावनके श्रीगोविन्ददेवजी महाराजके उपासक एक मेरे स्नेहीने कहा था कि श्रीगोविन्दजी महाराजका संकेत है कि इस समयके धार्मिक संकट और विविध अशान्तिमय उपद्रवोंको दूर करनेके लिये गजेन्द्रस्तुतिका पाठ घर-घरमें होना परमावश्यक है और भी वृद्धोंसे सुना जाता है कि इसका आश्रय लेनेसे लोग बड़ी- बड़ी विपत्तियोंसे छुटकारा पा जाते हैं। संकल्प-बल संकल्प, विचार या भावनाका महत्त्व संसारके सभी विद्वानोंको मान्य है। संसारके सभी बलोंसे संकल्पका बल श्रेष्ठ है। वेदादि शास्त्रोंका तो कहना है कि परमात्माके संकल्पसे ही अनन्तकोटिब्रह्माण्ड बनकर तैयार हो जाता है। वैसे तो किसी भी कार्यके मूलमें संकल्प होना आवश्यक है। स्थूल, सूक्ष्म किसी प्रकारके संकल्प, विचार हुए बिना कोई भी कार्य नहीं हो सकता। देह, इन्द्रिय आदि किसीकी भी हलचलमें मनकी हलचल आवश्यक है। अतएव यह भी कहा जा सकता है कि संसारकी सभी गति अथवा उन्नतिका मूल संकल्प ही है, परंतु साधारण स्थानोंमें संकल्पके पश्चात् अन्यान्य सामग्रियों और प्रयत्नोंकी भी अपेक्षा हुआ करती है। जैसे कुलाल (कुम्भकार) घटनिर्माणका विचार करता है। तत्पश्चात् मृत्तिका, दण्ड, चक्र, चीवरादि सामग्रियोंका संचय करता है, फिर हस्त आदि व्यापारसे घटको बनाता है। परंतु परमात्मा किसी भी सामग्रीकी अपेक्षा न करके ही अपने संकल्पमात्रसे विश्वका उत्पादन, पालन और संहार करता है।