भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसंकल्प-बल ६५९ परमात्मा ही जगत्के उपादान और निमित्त कारण वेदान्तके सिद्धान्तानुसार यह जगत् जड़ परमाणुओंके एकत्रित हो जानेमात्रसे नहीं बना, साथ ही विद्युत्कणों या प्रकृतिकी हलचलसे भी नहीं बना, अपितु अनिर्वचनीय, मायाशक्तिविशिष्ट वस्तुतः सजातीय, विजातीय, स्वगतभेदशून्य परमात्मासे ही यह संसार बना है, वे ही इसके उपादान हैं, वे ही निमित्त भी हैं। नैयायिक, वैशेषिक, योगी आदिकोंके मतानुसार भी विश्वप्रपंच जड़का कार्य नहीं हो सकता। इसका निर्माता कोई सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् चेतन ही हो सकता है। जब संसारके कोई भी प्राचीन विलक्षण कार्य एवं आधुनिक रेल, तार, मोटर, वायुयानादि विविध कल- पुर्जे बिना किसी बुद्धिमान् चेतनके अपने-आप नहीं बन जाते; परमाणुओं, विद्युत्कणों या प्रकृतिसे इनका निर्माण बतलानेवाला अश्रद्धेय समझा जाता है, तब विलक्षण संसार और तदन्तर्गत विभिन्न यन्त्रोंके आविष्कारक वैज्ञानिकोंके मन, बुद्धि (मस्तिष्क, दिमाग) आदिकोंके बनानेवालेको जड़ कैसे कहा जाय ? जब साधारण-से चित्र (ड्राइंग) भी परमाणुओंके एकत्रित हो जानेमात्रसे नहीं बनते तो विश्व कैसे बन सकता है ? भेद यही है कि इन मतोंमें परमाणु, प्रकृति आदिका नियामक परमेश्वर माना जाता है; परमाणु, प्रकृति समवायिकारण या उपादान माने जाते हैं, परमात्मा निमित्तकारण माना जाता है, परंतु वेदान्त- सिद्धान्तमें परमात्मा ही उपादान और निमित्त दोनों ही तरहका कारण है। वह अपने संकल्पसे अपने- आपको ही प्रपंचरूपमें प्रकट करता है। योगी आदि भी परमात्माके संकल्पसे सृष्टि मानते हैं, परंतु वहाँ उपादान विद्यमान है, परमेश्वरके संकल्पसे ही वे-वे उपादान उन-उन कार्योंके रूपमें परिणत होते हैं। कुम्भकारके समान परमेश्वरको हस्तादि व्यापारकी अपेक्षा नहीं होती है। विशिष्टशक्तिसम्पन्न योगियोंके भी संकल्पमात्रसे प्रकृति और प्राकृतप्रपंचमें उथल-पुथल मच जाती है। किसी वस्तुका प्रकृतिमें विलयन और किसीको प्रकृतिसे साहाय्य (आपूर) प्राप्त होता है। वाचस्पतिमिश्रने कहा है कि— निश्श्वसितमस्य वेदा वीक्षितमेतस्य पञ्चभूतानि। स्मितमेतस्य चराचरमस्य च सुप्तं महाप्रलयः ॥ ( भामती १।२) ‘भगवान्के स्वाभाविक सहज निःश्वाससे अनन्त विद्याओंके उद्गम-स्थान वेदोंका प्रादुर्भाव होता है, उनके अवलोकन (निहारने)-से ही ब्रह्माण्डोंके उपादानभूत पंचमहाभूत—आकाश, वायु, तेज आदिकी उत्पत्ति होती है और भगवान्के मन्द हास (मुसकराहट)- से ही अनन्तकोटिब्रह्माण्ड बनकर तैयार हो जाता है। उनके सोनेसे—आँख मीच लेनेसे ही विश्वका प्रलय हो जाता है।' यहाँ भी रूपकके द्वारा परमात्माके संकल्पसे ही साक्षात् एवं परम्परासे विश्वकी उत्पत्त्यादिका वर्णन किया गया है। यहाँ पूर्व-पूर्व कार्योंमें बुद्धि एवं प्रयत्नकी निरपेक्षता उत्तरोत्तर कार्योंमें कुछ सापेक्षता कही गयी है। संकल्पका प्राधान्य सारांश यह है कि भगवान् अपने संकल्पसे ही सब संसारको बनाते हैं। भगवान्का ही अंश जीवात्मा है और भगवान्की मायाका ही अंश जीवका मन है। अतः भगवान् और मायाकी शक्ति उसी तरह जीवात्मा और मनमें रहती है, जैसे महाकाशकी अवकाश- प्रदत्वशक्ति घटाकाशमें रहती है। जलकी शीतलता, मधुरता उसके अंश तरंगमें हुआ करती है; अग्निका दहन-प्रकाशन-सामर्थ्य उसके अंश स्फुलिंग (चिनगारी)-में रहा करता है। इस दृष्टिसे भगवान्की सभी शक्तियाँ जीवात्मामें होती हैं। मायाकी शक्तियाँ मनमें रहती हैं। इसीलिये शास्त्रोंने कहा है कि जीवात्मा अपने संकल्पों—विचारोंसे बहुत कुछ कार्य कर सकता है। हाँ, अत्याचार, अनाचार, पापाचार,