भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 670

व्यभिचार आदिकोंसे संकल्पकी शक्ति कमजोर हो जाती है। सदाचार, सद्विचार, सद्धर्म, तपस्या आदिसे संकल्पकी शक्तियाँ दृढ़ (जोरदार) हो जाती हैं। परमेश्वरकी आराधनासे जीवात्मामें स्वाभाविक परमात्मसम्बन्धी ऐश्वर्य प्रकट होते हैं, अन्यथा छिपे रहते हैं। सिद्ध, योगीन्द्र-मुनीन्द्र अपने संकल्पसे ही घटको पट और पटको घट बना सकते हैं। लौकिक महर्षियोंका वचन अर्थानुसारी हुआ करता है, अर्थात् जैसा अर्थ होता है, उनका वैसा ही वचन होता है, परंतु सिद्ध प्राचीन महर्षियोंके वचनोंका अनुसरण तो अर्थको ही करना पड़ता है, अर्थात् वे अर्थको जैसा कहते हैं, अर्थको वैसा ही बनना पड़ता है। इसीलिये विश्वामित्रके संकल्पसे मेनका अप्सराको संकल्पानुसार बनना पड़ा, अगस्त्यके वचनसे नहुषको अजगर बनना पड़ा था। संकल्पसे ही विश्वामित्रने बहुत-से नक्षत्रों और वस्तुओंको बनाया था। वचनके साथ भी संकल्प रहता है। अतएव वचनके प्रभावके साथ संकल्पका प्रभाव रहता है। सुना जाता है, अमेरिका आदिमें बहुत-से मनोविज्ञानके अभ्यासी संकल्प या विचारसे ही गुलाबके फूलोंको घटाने या बढ़ानेमें सफल हो जाते हैं। एलोपैथिक, होमियोपैथिक आदि चिकित्साओंसे निराश रोगियोंको मनोविज्ञानकी महिमासे लाभान्वित करते हैं। एक मनोविज्ञानके पण्डितने जीवनसे निराश किसी लड़कीको कई दिवसतक बर्फके भीतर रखकर मनोविज्ञानके बलसे आराम पहुँचाया था। इसी तरह मनोविज्ञानद्वारा ही बहुत-से रोगोंमें आराम हो रहा है। वैसे प्रत्येकके मनमें भी संकल्पकी प्रधानता रहती है। कारण, सभी काम पहले मन या बुद्धिके साहाय्यकी अपेक्षा रखते हैं, पश्चात् किसी अन्यकी सफलतामें बुद्धि या सूझका बड़ा हाथ रहता है। अच्छी सूझसे ही व्यापारमें लाभ होता है। संग्राम जीतनेमें भी मन्त्रियों, सेनापतियोंकी उत्तम सूझ ही लाभदायक होती है। कितने स्थलोंमें नीतिनिर्धारणकी ही बुद्धिमानी या गलतीसे व्यक्ति या समाज ही नहीं, अपितु राष्ट्र-का-राष्ट्र उन्नत या अवनत हो सकता है। विचारकी गलतीसे ही कहीं-कहीं बड़े-बड़े विजयी लोग एकदम पतनके गर्तमें चले जाते हैं। विचारकी ही अच्छाईसे कितने पथभ्रष्ट व्यक्तियोंका अतर्कित कायापलट देखा जाता है। इसीलिये मानना पड़ता है कि स्थूल जगत् किसी सूक्ष्म जगत्के ही नियन्त्रणमें रहता है। ऊपरसे देखनेमें स्थूल जगत् ही सब कुछ है, परंतु जब देखते हैं कि चींटी, चिड़िया, ऊँट, हाथी आदिकोंके छोटे-बड़े शरीर सूक्ष्म विचारपर ही उठते, चलते, फिरते, बैठते हैं; तब यह कहनेमें कोई भी संकोच नहीं रह जाता कि ब्रह्मादि-स्तम्बपर्यन्त सभी प्राणियोंकी जो भी हलचलें हैं और उन हलचलोंसे जो भी कार्य सम्पन्न होते हैं, सब सूक्ष्म विचार, मन या बुद्धिके ही कार्य हैं। सूर्य, चन्द्र, नक्षत्र, वायु आदिकोंकी भी हलचलका कारण सूक्ष्म विचार ही हो सकता है। वह विचार अपनेसे भी सूक्ष्म चेतनाभास या अखण्ड बोधकी अपेक्षा रखता है। इसीलिये कहा जाता है कि अचेतनकी प्रवृत्ति तभी होती है, जब वह चेतनसे अधिष्ठित होता है। जैसे अश्व, सारथी आदिसे अधिष्ठित होनेपर ही रथ चलता है अन्यथा नहीं, वैसे ही विचार या चेतनासे अधिष्ठित होनेपर ही सम्पूर्ण जड़ जगत् चल होता है। इसी न्यायसे यह कहा जाता है कि दृश्य जगत्का नियन्त्रण अदृश्य जगत्से होता है। इसी तरह आधिदैविक जगत्से आधिभौतिक जगत्का नियन्त्रण समझना चाहिये। विशेषकर जीवोंका उत्थान-पतन बहुत कुछ विचारोंपर ही अवलम्बित है। शास्त्र कहते हैं कि पुरुष क्रतुमय है। अतएव— 'यत्क्रतुर्भवति तत् कर्म कुरुते यत् कर्म कुरुते तदभिसम्पद्यते॥' (बृहदारण्यकोपनिषद् ४।४।५)