भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसंकल्प-बल ६६१ संकल्पके अनुसार ही क्रियाकी निष्पत्ति पुरुष जैसा संकल्प करने लगता है, वैसा ही कर्म करता है, जैसा कर्म करता है, वैसा ही बन जाता है। जिन बातोंका प्राणी बार-बार विचार करता है, धीरे- धीरे वैसी ही इच्छा हो जाती है, इच्छानुसारी कर्म और कर्मानुसारिणी गति होती है। अतः स्पष्ट है कि अच्छे कर्म करनेके लिये अच्छे विचारोंको लाना चाहिये। बुरे कर्मोंको त्यागनेके पहले बुरे विचारोंको त्यागना चाहिये। जो बुरे विचारोंका त्याग नहीं करता, वह कोटि-कोटि प्रयत्नोंसे भी बुरे कर्मोंसे छुटकारा नहीं पा सकता। कितने प्राणी दुराचार, दुर्विचारजन्य दुर्व्यसन आदिको छोड़ना चाहते हैं। मद्यपायी, वेश्यागामी व्यसनके कारण दुःखी होता है, व्यसनको छोड़ना चाहता है, उपाय भी ढूँढ़ता है, महात्माओंके पास रोता भी है, छोड़नेकी प्रतिज्ञा भी कर लेता है, परंतु जो सावधानीसे मद्यपान, वेश्यागमन आदि दुराचारोंका बराबर चिन्तन और मननका परित्याग करता है, उनका स्मरण ही नहीं होने देता है, विचार आते ही उसे विचारान्तरोंसे काट देता है, वह तो छुटकारा पा जाता है; परंतु जो बुरे विचारोंको न छोड़कर उनका रस लेता रहता है, वह कभी बुरे कर्मोंसे छुटकारा नहीं पा सकता, वह बार-बार भग्नप्रतिज्ञ होकर रोता है, विचारोंके समय असावधान रहता है। विचारसे क्या होता है? बुरा कर्म न करूँगा, उसीके त्यागकी मैंने प्रतिज्ञा की है—इस तरह अपनेको धोखा देकर विचारके रसका अनुभव करता है। वह कभी भी व्यसनसे आत्मत्राण नहीं कर सकता है। इसीलिये बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि वह किसी तरह बुरे विचारोंको हटाये। असत्संकल्पोंको त्यागनेकी रीति जिस समय बुरे विचार आने लगें, उस समय अन्यमनस्क होनेका प्रयत्न करे। भगवद्ध्यानसे, मन्त्रजपसे, श्रवणसे, सत्संगसे बुरे विचारोंकी धाराको तोड़ देना चाहिये। भले ही उपन्यास, नाटकों, समाचार-पत्रोंको पढ़ना पड़े, परंतु बुरे विचारोंकी धारा अवश्य तोड़नी चाहिये। इसी तरह अच्छे कर्मोंके लिये पहले अच्छे विचारोंको लाना चाहिये। इसीलिये अच्छे शास्त्रोंका अभ्यास, अच्छे पुरुषोंका संग करने और पवित्र वातावरणमें रहनेसे अच्छे विचार बनते हैं, बुरे विचार और बुरे कर्म छूट जाते हैं। एकाएक मनका संकल्प-विकल्पसे रहित होना असम्भव है, अतः तदर्थ प्रयत्न व्यर्थ है। जैसे भाद्रपदमें सिन्धु, शतद्रु, गंगा आदि नदियोंका वेग रोककर उनके उद्गम-स्थानमें लौटाकर उन्हें सुखा देना असम्भव है, परंतु उनकी धाराओंका मुँह फेरकर उन्हें छिन्न-भिन्नकर सुखाना सम्भव है। इसी तरह मनके संकल्पोंको एकदम रोक देना असम्भव है, परंतु बुरे विचारोंको रोककर, सात्त्विक विचारोंकी धाराओंको चलाकर, सात्त्विक वृत्तियोंसे तामस वृत्तियोंको काटकर, शनैः-शनैः अन्तरंग सूक्ष्म सात्त्विक वृत्तियोंसे स्थूल बहिरंग सात्त्विक वृत्तियोंको भी काटकर निर्वृत्तिकता सम्पादन की जा सकती है। वैदिक शास्त्रोंमें बालकोंके विचारोंको सँभालनेका बड़ा ध्यान रखा गया है। स्त्रियों और बालकोंके निर्मल-कोमल पवित्र अन्तःकरणोंमें पहलेसे ही जो बातें अंकित हो जाती हैं, वे ही सदा काम आती हैं। चित्त या अन्तःकरण यदि अद्रुत लाक्षा (लाख)-के समान कठोर होता है तो उसमें किसी भी आचरण या उपदेशका प्रभाव नहीं पड़ता और जब वह द्रुत लाक्षाके समान कोमल रहता है तो लाक्षापर मुहरके अक्षरोंके समान निर्मल-कोमल पवित्र अन्तःकरणपर उत्तम आचरणों और उपदेशोंसे प्रभावित होता है। पहलेसे ही बुरे संगों और ग्रन्थोंसे बालकोंके हृदयमें कूड़ा-करकटका भरा जाना अत्यन्त हानिकारक है। इसीलिये अच्छे पुरुषोंका संग तथा सच्छास्त्रोंके अभ्यासमें ही उन्हें लगाना अच्छा है। यादृशैः सन्निविशते यादृशांश्चैव सेवते। यादृगिच्छेच्च भवितुं तादृग्भवति पूरुषः॥ 'जैसे लोगोंका साथ होता है और जैसे लोगोंका