भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
संकल्प-बल ६६१ संकल्पके अनुसार ही क्रियाकी निष्पत्ति पुरुष जैसा संकल्प करने लगता है, वैसा ही कर्म करता है, जैसा कर्म करता है, वैसा ही बन जाता है। जिन बातोंका प्राणी बार-बार विचार करता है, धीरे- धीरे वैसी ही इच्छा हो जाती है, इच्छानुसारी कर्म और कर्मानुसारिणी गति होती है। अतः स्पष्ट है कि अच्छे कर्म करनेके लिये अच्छे विचारोंको लाना चाहिये। बुरे कर्मोंको त्यागनेके पहले बुरे विचारोंको त्यागना चाहिये। जो बुरे विचारोंका त्याग नहीं करता, वह कोटि-कोटि प्रयत्नोंसे भी बुरे कर्मोंसे छुटकारा नहीं पा सकता। कितने प्राणी दुराचार, दुर्विचारजन्य दुर्व्यसन आदिको छोड़ना चाहते हैं। मद्यपायी, वेश्यागामी व्यसनके कारण दुःखी होता है, व्यसनको छोड़ना चाहता है, उपाय भी ढूँढ़ता है, महात्माओंके पास रोता भी है, छोड़नेकी प्रतिज्ञा भी कर लेता है, परंतु जो सावधानीसे मद्यपान, वेश्यागमन आदि दुराचारोंका बराबर चिन्तन और मननका परित्याग करता है, उनका स्मरण ही नहीं होने देता है, विचार आते ही उसे विचारान्तरोंसे काट देता है, वह तो छुटकारा पा जाता है; परंतु जो बुरे विचारोंको न छोड़कर उनका रस लेता रहता है, वह कभी बुरे कर्मोंसे छुटकारा नहीं पा सकता, वह बार-बार भग्नप्रतिज्ञ होकर रोता है, विचारोंके समय असावधान रहता है। विचारसे क्या होता है? बुरा कर्म न करूँगा, उसीके त्यागकी मैंने प्रतिज्ञा की है—इस तरह अपनेको धोखा देकर विचारके रसका अनुभव करता है। वह कभी भी व्यसनसे आत्मत्राण नहीं कर सकता है। इसीलिये बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि वह किसी तरह बुरे विचारोंको हटाये। असत्संकल्पोंको त्यागनेकी रीति जिस समय बुरे विचार आने लगें, उस समय अन्यमनस्क होनेका प्रयत्न करे। भगवद्ध्यानसे, मन्त्रजपसे, श्रवणसे, सत्संगसे बुरे विचारोंकी धाराको तोड़ देना चाहिये। भले ही उपन्यास, नाटकों, समाचार-पत्रोंको पढ़ना पड़े, परंतु बुरे विचारोंकी धारा अवश्य तोड़नी चाहिये। इसी तरह अच्छे कर्मोंके लिये पहले अच्छे विचारोंको लाना चाहिये। इसीलिये अच्छे शास्त्रोंका अभ्यास, अच्छे पुरुषोंका संग करने और पवित्र वातावरणमें रहनेसे अच्छे विचार बनते हैं, बुरे विचार और बुरे कर्म छूट जाते हैं। एकाएक मनका संकल्प-विकल्पसे रहित होना असम्भव है, अतः तदर्थ प्रयत्न व्यर्थ है। जैसे भाद्रपदमें सिन्धु, शतद्रु, गंगा आदि नदियोंका वेग रोककर उनके उद्गम-स्थानमें लौटाकर उन्हें सुखा देना असम्भव है, परंतु उनकी धाराओंका मुँह फेरकर उन्हें छिन्न-भिन्नकर सुखाना सम्भव है। इसी तरह मनके संकल्पोंको एकदम रोक देना असम्भव है, परंतु बुरे विचारोंको रोककर, सात्त्विक विचारोंकी धाराओंको चलाकर, सात्त्विक वृत्तियोंसे तामस वृत्तियोंको काटकर, शनैः-शनैः अन्तरंग सूक्ष्म सात्त्विक वृत्तियोंसे स्थूल बहिरंग सात्त्विक वृत्तियोंको भी काटकर निर्वृत्तिकता सम्पादन की जा सकती है। वैदिक शास्त्रोंमें बालकोंके विचारोंको सँभालनेका बड़ा ध्यान रखा गया है। स्त्रियों और बालकोंके निर्मल-कोमल पवित्र अन्तःकरणोंमें पहलेसे ही जो बातें अंकित हो जाती हैं, वे ही सदा काम आती हैं। चित्त या अन्तःकरण यदि अद्रुत लाक्षा (लाख)-के समान कठोर होता है तो उसमें किसी भी आचरण या उपदेशका प्रभाव नहीं पड़ता और जब वह द्रुत लाक्षाके समान कोमल रहता है तो लाक्षापर मुहरके अक्षरोंके समान निर्मल-कोमल पवित्र अन्तःकरणपर उत्तम आचरणों और उपदेशोंसे प्रभावित होता है। पहलेसे ही बुरे संगों और ग्रन्थोंसे बालकोंके हृदयमें कूड़ा-करकटका भरा जाना अत्यन्त हानिकारक है। इसीलिये अच्छे पुरुषोंका संग तथा सच्छास्त्रोंके अभ्यासमें ही उन्हें लगाना अच्छा है। यादृशैः सन्निविशते यादृशांश्चैव सेवते। यादृगिच्छेच्च भवितुं तादृग्भवति पूरुषः॥ 'जैसे लोगोंका साथ होता है और जैसे लोगोंका
६६२ भक्तिसुधा सेवन होता है, जैसा होनेकी उत्कट वांछा होती है, प्राणी वैसा ही हो जाता है।' सत्-तत्त्वका प्रभाव श्रद्धेय प्राणीके प्रति श्रद्धालुका अन्तःकरण, प्राण, देह आदि झुक जाते हैं, अतएव श्रद्धेयके उपदेशों और आचरणोंका प्रभाव श्रद्धालुओके अन्तःकरणमें पड़ता है। यद्यपि सात्त्विकी श्रद्धा उत्तम व्यक्तियोंमें ही हुआ करती है तथापि तामसी, राजसी श्रद्धा कहीं भी उत्पन्न हो सकती है। बुरे लोगोंके साथसे बुरी इच्छा, बुरे कर्म बन पड़ते हैं, जिनसे प्राणीका पतन हो जाता है, परंतु अच्छे संगों, अच्छी इच्छाओं, अच्छे कर्मोंसे प्राणी सम्राट्, स्वराट्, विराट्, अनन्त, धन-धान्य-सम्पन्न इन्द्र, महेन्द्र, ब्रह्मा आदितक बन सकता है। अच्छे संग, अच्छी इच्छा और शास्त्रोक्त उत्तम साधनोंका सहारा लेकर प्राणी मनचाही वस्तुको प्राप्त कर सकता है। एक जन्म या अनेक जन्मोंमें प्राणी अवश्य ही अपने अभीष्टको प्राप्त कर सकता है, अगर बीचसे ही लौट न पड़े। अन्यान्य वस्तुओंके समान ही विचारोंका भी आदान-प्रदान किया जा सकता है। प्राणी यदि अच्छे विचारोंका आदान चाहे तो अच्छे शास्त्रों, अच्छे वातावरण और बड़े-बड़े अच्छे ऋषि, महर्षि, अवतारोंका स्मरण रखे; उनके विचारों, व्यवहारोंको याद रखे; इससे उनके अच्छे विचारोंका आदान होता रहेगा। इन्हीं उत्तम विचारोंके आनेके लिये द्वारको अनावृत करना है। बुरे ग्रन्थों, वातावरणों और बुरे पुरुषोंको भूलकर भी कभी स्मरण न होने देना, यदि बुरे विचारोंके आनेका दरवाजा बन्द करना है। बुरे विचारोंसे घृणा करने और उनके नाशकी भावना करनेसे वे नष्ट भी हो जाते हैं। अच्छे विचारोंका आदर और उनके उपबृंहणकी भावनासे वे बढ़ भी जाते हैं। दूसरोंके शुभानुसन्धानसे विचारोंमें बल आता है। दूसरोंके अनिष्ट चिन्तनसे विचार निर्वीर्य भी हो जाते हैं। विचारतत्त्वज्ञोंका तो कहना है कि कोई भी प्राणी एकाग्रतासे संकल्प या विचारद्वारा ही, बाहरी प्रयत्नोंके बिना ही मनचाही वस्तु बना सकता है। संकल्पसिद्धिका बाधक—अविश्वास संकल्पकी पहली कोटि अर्थात् आरम्भ भूल जाते ही विचारित संकल्पित पदार्थ प्रत्यक्ष हो जाता है अर्थात् लगातार बिना विच्छेद हुए निरन्तर संकल्प ही संकल्पित पदार्थका रूप धारण करके प्रकट हो जाता है। प्राणी बार-बार संकल्पित पदार्थके प्रति अविश्वास करता रहता है, समझता रहता है कि यह तो संकल्पमात्र है, मनोराज्यमात्र है, संकल्पित पदार्थ है। बस, यही अविश्वास संकल्पसिद्धिमें बाधक होता है। भावना या उपासनामें भी यह अविश्वास ही प्रतिबन्धक है। विश्वासपूर्वक संकल्पित इष्टदेवकी मूर्ति उसके भूषणालंकार, भोग-रागादि कुछ दिनोंमें प्रत्यक्ष प्रकट हो जाते हैं। त्रिपुरसुन्दरीरहस्य और योगवासिष्ठमें कुछ आख्यान ऐसे आते हैं, जिनमें कहा गया है कि किन्हीं सिद्धोंने संकल्पसे ही तीन हाथकी शिलाके भीतर ब्रह्माण्डकी रचना कर डाली थी। जब दूसरे व्यक्तियोंको शिलाके भीतर ले जाया गया, तब उन्हें अतल, वितल, सुतल, तलातल, रसातल, महातल, पाताल और भूर्भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः, सत्य आदि चौदह भुवन— सूर्य, चन्द्र, नक्षत्र, भूधर, सागर, गगन आदि सभी प्रपंच दिखायी दिये। आश्चर्य होता है कि ठोस शिलाके भीतर कोई व्यक्ति कैसे प्रविष्ट हो सकता है! जिस ठोस शिलाके भीतर सूची, त्र्यणु आदिकोंको भी प्रवेशका अवकाश नहीं, उसके भीतर कोई व्यक्ति कैसे प्रविष्ट हो सकता है और कैसे उसमें ब्रह्माण्ड रह सकता है? परंतु विचार करनेसे मालूम पड़ता है कि सभी देश-काल आदि मनकी ही कल्पना है। जैसे स्वप्नमें सूक्ष्म नाड़ियोंके बीचमें ही महादेश और हस्ती, पर्वतादि बड़ी-बड़ी चीजें नजर आती हैं, वैसे ही स्वल्पदेश—
तीन हाथकी शिलामें ब्रह्माण्डका होना सम्भव है। जैसे जाग्रत्के दस-पाँच क्षणमें ही वर्ष, दस वर्षका स्वप्न अनुभूत होता है, वैसे ही स्वप्नकालमें महाकालका भी अनुभव होता है। राजा लवणको एक क्षणके नेत्रनिमीलन (झपकी)-में सौ वर्षका स्वप्न हुआ। अरण्यमें क्षुधा-पिपासासे व्याकुल होकर किरातिनीके साथ रोटीके लिये विवाह किया और उसके संग रहकर पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र आदिकोंको देखा। आँख खुलते ही पूछा तो वसिष्ठने उन सब घटनाओंको सच्चा बतलाया। उसने स्वयं भी जाकर सभी बातोंका प्रत्यक्ष अनुभव किया। सुखमें वर्ष क्षणभर लगते हैं, दुःखमें क्षण भी वर्ष-से लगते हैं। गोपांगनाओंको गोविन्द- दर्शनमें युग भी क्षणसे प्रतीत होते थे, गोविन्दके विप्रयोग (वियोग)-में क्षण भी सहस्रों युग-सा प्रतीत होता था— गोपीनां परमानन्द आसीद् गोविन्ददर्शने। क्षणं युगशतमिव यासां येन विनाभवत्॥ (श्रीमद्भा० १०।१९।१६) सारांश यह है कि मन ही संसार है। अतः जैसे वटबीजके भीतर अंकुरनाल, स्कन्ध, शाखा, उपशाखा, पत्र-पल्लव, फलात्मक सम्पूर्ण वृक्ष रहता है और उसमें अपरिगणित फल होते हैं, इसी तरह एक वटबीजके भीतर अनन्त वटवृक्ष रहते हैं, यह कहना भी अत्युक्ति नहीं है। अपितु— 'नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः।' (गीता २।१६) इस उक्तिके अनुसार ठीक ही है। इसी तरह मनके भीतर संसार है। गृहछिद्रसे आनेवाली सूर्यकिरणोंमें दिखायी देनेवाले सूक्ष्मरजोंका आठवाँ या छठा हिस्सा परमाणु है, उसका पाँचवाँ हिस्सा स्पर्शतन्मात्रा, उसके स्वल्पांशमें प्राण और प्राणके सहारे रहनेवाले मनमें ब्रह्माण्ड रहता है। ब्रह्माण्डमें अनन्त मन रहते हैं, उनमें भी ब्रह्माण्ड रहता है। इस तरह एक परमाणुके भीतर भी अनन्त ब्रह्माण्डका होना सम्भव है। इस दृष्टिसे देखें तो भगवान् श्रीकृष्णके संकल्पसे परिमित वृन्दावन-धाममें अनन्तकोटि ब्रजांगनाओंका विहारस्थान होना और एक प्रहर चतुष्टयवती रात्रिमें अनन्तकोटि ब्राह्मी रात्रियोंका प्रवेश करके विहार करना आदि सब सम्भव ही प्रतीत होता है। संकल्पके बलसे स्वल्प देशमें महादेश, स्वल्प कालमें महाकालका प्रवेश सम्भव है। किंचित् विचार करें तो मालूम होगा कि सूक्ष्मसंकल्प या विचारसे ही स्थूलजगत् बन जाता है अर्थात् मनोमय जगत् ही स्थूल प्रपंच होकर भासित होने लगता है। जैसे सूर्यकी किरणोंमें रहनेवाला अति सूक्ष्म जल ही कठोर बर्फ बन जाता है, वैसे अति सूक्ष्म संकल्प ही कठोर जगत् बन जाता है। सूर्यकिरणोंमें जल रहता है, परंतु वह अति सूक्ष्म होता है, अतएव वह दर्शन, गमन आदिमें बाधक नहीं होता। किरणोंको पार करनेमें नेत्रों या अन्यान्य अंगोंको कुछ भी कठिनाई नहीं मालूम पड़ती, परंतु आतपकी तेजीसे जब उन्हीं किरणोंका सूक्ष्म जल बादल बन जाता है, तब वही दर्शनमें प्रतिबन्धक हो जाता है। नेत्रके बीचमें बादल होनेसे सूर्य, चन्द्र, नक्षत्र, पर्वत आदि कोई चीज नहीं दिखायी देती, वही जल किरणोंमें रहकर नेत्रशक्तिका प्रतिबन्धक नहीं होता। बादलरूपमें व्यक्त होनेपर नेत्रशक्तिकी रुकावट हो जाती है, परंतु चलने-फिरनेमें उससे कुछ भी बाधा नहीं पड़ती। बादलमें कोई भी खूब चल-फिर, दौड़ सकता है। जब वही चीज जल बन जाती है, तब चलने-फिरनेमें भी कुछ-कुछ रुकावट पड़ने लगती है, परंतु जब वही बर्फ बन जाती है, तब तो उसमें कठोरता इतनी आ जाती है कि बर्फके भीतर फँसा हुआ प्राणी टस-से-मस भी नहीं हो सकता। वही बर्फ बहुत पुरानी होकर जब किसी रत्नके रूपमें परिणत हो जाती है, तब तो उसका टूटना ही बड़ा कठिन हो जाता है। इस तरह जैसे सूक्ष्म चीज ही
६६४ भक्तिसुधा क्रमेण स्थूल और कठोर हो जाती है, उसी तरह सूक्ष्म मनोमय जगत् ही अभिनिवेशके कारण स्थूल हो जाता है अर्थात् भावना ही अभिनिवेशकी अधिकतासे गाढ़ होते-होते स्थूल प्रपंच बन जाती है। उसके स्थूल या सूक्ष्म बनानेकी पद्धतियाँ जिन्हें मालूम हैं, वे लोग सहजमें ही स्थूलको सूक्ष्म और सूक्ष्मको स्थूल बना लेते हैं। जैसे आतप या अग्निसे बर्फ जलभाप आदि बनकर फिर सूक्ष्म हो जाती है, वैसे ही संकल्पकी ही महिमासे स्थूल जगत् सूक्ष्म और सूक्ष्म जगत् स्थूल बन जाता है। तात्पर्य यह है कि प्राणीके पास संकल्प नामकी एक ऐसी चीज है कि उसे कामधेनु, चिन्तामणि या कल्पतरु कुछ भी कह सकते हैं। बुरे कर्मोंको छोड़कर अच्छे कर्मों, आराधनाओं, तपस्याओंमें लगे रहनेपर संकल्प या विचारकी शक्ति मजबूत हो जाती है। पौर्वापर्यानुसन्धानशून्य दृढ़ संकल्पसे प्राणी सब कुछ प्राप्त कर सकता है। जैसे वायुके योगसे जल ही तरंग बन जाता है, उसी तरह मननी शक्तिके योगसे अखण्डबोधस्वरूप परमात्मा ही विचार या संकल्प बन जाता है। स आत्मा सर्वगो राम नित्योदितवपुर्महान्। स मनाङ्मननीं शक्तिं धत्ते तन्मन उच्यते॥ संकल्पका स्वरूप निर्विकल्प बोध ही जब सविकल्प हो जाता है, तब वही संकल्प या विचार कहलाने लगता है। विचारमेंसे विकल्पके निकलते ही वह निर्विकल्प बोधरूप परमात्मा ही बन जाता है। इस तरह सविकल्प बोध विचार या संकल्पके भीतर सम्पूर्ण विश्व रहता है और वह विचार अखण्ड बोधसे कवलित रहता है। जैसे दर्पणके भीतर प्रतिबिम्ब दर्पणसे भिन्न नहीं होता है, वैसे ही संकल्प और संकल्पित जगत् अखण्ड बोधरूप दर्पणके भीतर ही रहता है, उससे भिन्न होकर वह कभी भी नहीं रहता। समस्त प्रपंचको संकल्पमें लीन करने और संकल्पको अखण्ड बोधमें लीन कर लेनेपर शुद्धतत्त्वका साक्षात्कार अपने-आप हो जाता है। महावाक्यसे अनिर्वचनीय मायामात्रके हटानेकी आवश्यकता रहती है। शुद्ध संकल्पसे दुर्लभ-से-दुर्लभ चीज मिल सकती है। बुरे संकल्पोंसे उनकी शक्ति घटती है, अच्छे संकल्पोंसे उनकी महिमा बढ़ती है। शुभसंकल्पकी ही भावना करें किसीका अनिष्ट चिन्तन करनेसे इतनी उसकी हानि नहीं होती, जितनी चिन्तन करनेवालेकी हानि होती है। किसी भी कर्ममें अगर समष्टिहितकी भावना रहती है तो वह महत्त्वका हो जाता है। समष्टि- अहितकी भावनासे बड़ा-से-बड़ा यज्ञ, तप, दान आदि भी निर्वीर्य हो जाता है। इसीलिये समष्टिहितकी दृष्टिसे शुभ संकल्पमें प्रवृत्त हो जाना चाहिये। 'धर्मकी जय हो, अधर्मका नाश हो, प्राणियोंमें सद्भावना हो, विश्वका कल्याण हो'—इन संकल्पोंका विस्तार होना चाहिये। विशिष्टशक्तिसम्पन्न महात्मा या ऋषि-महर्षि तो अकेले ही अपने दृढ़ संकल्पसे विश्वका कल्याण कर सकता है, दुनियाकी भावनामें परिवर्तन कर सकता है, परंतु आज वैसे लोगोंकी संख्या कम उपलब्ध होती है। अतः सामूहिक संकल्प काम देगा, यदि चालीस-पचास लाख भी आस्तिक धर्मके जयकी भावना करें तो वैसा होनेमें विलम्ब नहीं हो सकता। युद्धकालमें मित्रराष्ट्र भी रोमन लिपिके 'वी' (V) अक्षरको अपने सभी स्थानोंमें लिखवाते थे। सभी कर्मचारी अपने मकानों, मोटरोंपर 'वी' लिख रहे थे, इसका मतलब यही कि यदि अधिक लोग हमारी विजय (विक्ट्री)-की भावना करेंगे तो हमारी विजय होगी। आधुनिकोंने भी भावनाकी महिमाको मान लिया है। हमारे सनातन वैदिक धर्ममें तो संकल्पकी इतनी महिमा है कि उसके बिना कोई कर्म ही नहीं होता। हर एक कर्ममें, फिर चाहे वह सकाम हो या निष्काम, संकल्प परमावश्यक है। विष्णुस्मरण, देश-काल-
संकल्प-बल ६६५ नाम-गोत्रकीर्तन करके संकल्प किया जाता है। वही पाठ-जप आदि जिस संकल्पसे किया जाता है, वैसा उसका फल होता है। भले ही रामायण, सप्तशती आदिमें कुछ भी वर्णन हो; परंतु जिस संकल्पसे उनका पाठ, जप, सम्पुट आदि होगा, वही उनका फल होगा। इसलिये एक संकल्पसे ही अधिक अनुष्ठान होना आवश्यक है। जहाँतक हो संकल्पके शब्द भी एकहीसे हों और वे संस्कृतके हों, प्रभावशाली हों। धर्मरक्षा एवं विश्वकल्याणके निमित्त जहाँतक हो, सभी विश्वकल्याणकारियोंको ऐसे शुभ-संकल्पसे अनुष्ठानादि करना चाहिये। यद्यपि संकल्प मानस है तथापि शब्दके साथ उसका घनिष्ठ सम्बन्ध है। पवित्र शब्दों—आर्ष शब्दोंसे संकल्पकी शक्ति बढ़ जाती है। योगियोंका संकल्प-बल ईश्वर और योगीका संकल्प विचित्र सामर्थ्यसम्पन्न होता है। विभिन्न योगियोंने अपने संकल्पसे विश्वका निर्माण कर लिया है। परमेश्वरका ज्ञान या संकल्प ही उनका (परमेश्वरका) तप समझा जाता है। उनके ज्ञानरूप तपस्यासे ही विश्व बन जाता है। उसी तरह वसिष्ठ आदि महर्षियोंने भी संकल्पस्वरूप तपस्यासे विश्वनिर्माणका अनुभव किया था। एक बार वसिष्ठजी निर्जीव आकाशमें मनोमय कुटीरका निर्माणकर निर्विकल्प समाधिमें स्थित हुए। बहुत कालके अनन्तर जब उनका समाधिसे उत्थान हुआ, तब उन्होंने एक युवतीका वीणानिनादसमन्वित मधुर गीत सुना। उन्हें आश्चर्य हुआ कि अत्यन्त निर्जीव प्रदेशमें हम समाधिस्थ हुए, यहाँ युवतीका गीत कैसे सुनायी दे रहा है! जब उन्होंने उधर दृष्टि डाली तो कुछ भी दिखायी न दिया। जब उन्होंने अन्तर्मुख होकर सूक्ष्मदृष्टिसे देखा तो मालूम हुआ कि वह किसी दूसरे ब्रह्माण्डके आवरणमें स्थित होकर गायन कर रही है। जब वसिष्ठजीने उससे वार्तालाप करना चाहा, तब उसने बड़े ही मधुर शब्दोंमें अपनी वेदना सुनायी। वह एक ब्रह्माण्डके विधाता ब्रह्माकी तरुणी वासना थी। ब्रह्मा तो वृद्ध हो गये, परंतु वह वासना तरुणी हो रही थी। ब्रह्मा विरक्त होकर ब्रह्माण्डका उपसंहार करके ब्रह्मलीन होना चाहते थे। उस वासनाकी ओर उपेक्षा- दृष्टिसे देखते थे। यह उसे अच्छा नहीं लगता था। वह चाहती थी कि वसिष्ठजी चलकर ब्रह्माको समझाकर उन्हें उसके अनुकूल कर दें। कुतूहलवशात् वसिष्ठने उसके साथ जाना पसन्द किया और योगबलसे एक शिलाके भीतर स्थित ब्रह्माण्डमें दोनोंने ही प्रवेश किया। वह वासना सब लोकोंका लंघन करती-करती ब्रह्माके पास पहुँची और ब्रह्माजीको समाधिसे उठाया। ब्रह्माने वसिष्ठको देखकर उनका आतिथ्य किया। पुनश्च वसिष्ठके पूछनेपर उन्होंने सम्पूर्ण वृत्तान्त बताया और कहा कि यह मेरी ब्रह्मा बननेकी वासना थी, मेरी विरक्ति इसे असह्य है, परंतु अब मैंने तत्त्वदृष्टिसे इसे और उसके परिणाम जगत्को जान लिया है, अतः इस निस्सार संसारका उपसंहार करना चाहता हूँ। उस समय वसिष्ठने सम्पूर्ण उपसंहारकी लीला देखी। यद्यपि कल्पना और उसके उपसंहारमें कुछ क्रम और कार्यकारणभाव प्रतीत होता है, परंतु वस्तुतः केवल दृढ़ अभिनिवेशपूर्ण वासनासे अतिरिक्त और कहीं भी कुछ भी नहीं। मनसे पापकर्मोंका परित्यग और अच्छे कर्मोंका अनुष्ठान करना चाहिये संकल्पकी विचित्रतासे ही जगत्की विचित्रता होती है। संकल्प ही बाह्य प्रपंचके रूपमें प्रकट होता है। जैसे काष्ठके भीतर विविध पुत्रिका विद्यमान रहती हैं, वही कारक व्यापारसे प्रकट होती है, वैसे ही मनके संकल्पमें ही लीन सम्पूर्ण विश्व उचित कारणकलापोंसे प्रकट हो जाता है। जैसे मिट्टी या सुवर्णके होनेपर ही घट-शरावादि और कटक- मुकुटकुण्डलादि हो सकते हैं, अन्यथा नहीं; उसी तरह संकल्पके रहनेपर ही विश्वकी उपलब्धि होती है, अन्यथा नहीं। जब मनकी हलचल है, तभी द्वैत है। मनकी हलचल न होनेपर विश्वका पता ही नहीं
६६६ भक्तिसुधा लगता। संकल्पकी अनेकरसतासे ही विश्वकी अनेकरसता भी अनुभूत होती है। इसीलिये यद्यपि कहीं विश्वको अव्यय और सनातन भी कहा गया है। 'एषोऽश्वत्थः सनातनः।' (कठोपनिषद् २।३।१) 'अश्वत्थं प्राहुरव्ययम्।' (गीता १५।१) तथापि विश्वकी क्षणभंगुरता अबाधित ही रहती है। कूटस्थ नित्य केवल एक आत्मा ही है। परिणामी पदार्थ प्रवाहरूपसे ही नित्य है। पूर्वरूपपरित्यागपूर्वक रूपान्तरापत्ति ही परिणाम है। अतः परिणामी पदार्थ कूटस्थरूपसे नित्य कदापि नहीं हो सकते। स्थूल जगत् कभी-कभी हिमालयके स्थानमें समुद्र, समुद्रके स्थानमें हिमालय हो जाता है। मरुस्थानमें गंगा और गंगाके स्थानमें मारवाड़ दीखने लगता है। संकल्प या भावनाकी शुद्धतासे ही प्राणियोंकी शुद्धि और भावनाकी ही अपवित्रतासे अपवित्रता होती है। अतः विवेकियोंने मनःकृत कर्मको ही कृत माना है— मनसा कृतमित्येव कृतमाहुर्मनीषिणः। तेनैवालिङ्ग्यते कान्ता तेनैव दुहितापि च॥ मनसे किये हुए कर्मको मनीषी लोग कृत समझते हैं। उसी अंगसे कान्ताका आलिंगन किया जाता है, उसीसे दुहिताका भी आलिंगन किया जाता है। भेद है तो केवल भावनाका ही भेद है। यद्यपि कहा जाता है कि मानससे ही कुशल कर्मोंकी सफलता होती है, अकुशल निषिद्ध कर्मोंके मानस- अनुष्ठान अकिंचित्कर रहते हैं। कलि कर एक पुनीत प्रतापा। मानस पुन्य होहिं नहिं पापा॥ (रा०च०मा० ७।१०३।८) कलियुगका यह पुनीत प्रताप है कि इसमें मानस पुण्यकर्मोंका फल होता है, पापकर्मोंका नहीं। परंतु इन वचनोंका आशय और है—यदि मनसे पापकर्म होते रहेंगे अर्थात् मानसकर्मका अभ्यास हो जायगा, तब देहेन्द्रियादिसे भी पापकर्म अवश्य ही हो जायँगे। अतः मनसे सर्वदा पापकर्मोंका परित्याग और अच्छे कर्मोंका अनुष्ठान करना चाहिये, इससे बुरे कर्म होनेका अवकाश न रहेगा। शुद्ध कर्म ही शरीरसे भी होने लगेगा। मानस पुण्य होता है, यह कहनेका प्रयोजन यही है कि प्राणीके मनसे पुण्यकर्म किया जाय, जिससे देहेन्द्रियादिसे भी पुण्यकर्म होने लग जायँ। मानस-पाप नहीं होता—यह कहनेका भी यह प्रयोजन है, अगर असावधानीसे कुछ मानस पाप हो जायँ तो भी देहेन्द्रियादिसे उन कर्मोंको न होने दे। ऐसा न समझ ले कि मनसे कर्म होनेपर पाप हो ही गया, फिर अब शरीरसे भी क्यों न कर लिया जाय। किंतु यह समझना उचित है कि पुण्य मानस भी होता है। अतः उसका संकल्प चलाये और पाप मानस कर्मसे नहीं होता, अतः यदि कथंचित् असावधानीसे मनद्वारा बुरा कर्म हो गया तो भी देहादिसे बुरे कर्म न होने देकर बड़ी सावधानीसे मनद्वारा भी बुरे कर्मोंको न होने दे। यदि मानस कर्म करता रहेगा तो अभ्यास बढ़ जानेपर न चाहते हुए भी बुरे कर्मोंको करना ही पड़ेगा। जैसे गमनजन्य वेगके बढ़ जानेपर गमन क्रियामें स्वतन्त्र गन्ताकी भी स्वतन्त्रता तिरोहित हो जाती है, उसी तरह मननजन्य वेगके बढ़ जानेपर मनन क्रियामें स्वतन्त्र मन्ताकी भी मननमें स्वाधीनता छिप जाती है। बुरे कर्मोंके संकल्पोंको रोकना परमावश्यक इतना ही नहीं, किंतु पराधीनताका भी स्पष्ट अनुभव होने लगता है। इसी तरह बुरे कर्मोंके संकल्पोंको धाराबद्ध हो जानेपर उनका रोकना अपने वशमें नहीं रहता। इसलिये अच्छे कर्मोंके संकल्पोंको चलाना और बुरे कर्मोंके संकल्पोंको रोकना परमावश्यक है। सारांश यह है कि संकल्प ही विश्वका मूल है। उसीपर उन्नति, अवनति दोनों निर्भर हैं। इसीलिये शास्त्रोंने बार-बार उत्तम विचार, दृढ़ संकल्पकी महत्ता गायी है। बन्ध-मोक्षमें भी भावनाकी ही प्रधानता दी गयी है। अपनेको कर्ता, भोक्ता, सुखी- दुःखी, बद्ध माननेवाला प्राणी बद्ध रहता है। अपनेको
नित्य शुद्ध, बुद्ध, मुक्त माननेवाला प्राणी मुक्त हो जाता है। मैं कुछ भी नहीं कर सकता, अत्यन्त दीन- हीन प्राणी सर्वदा पुरुषार्थलाभ नहीं कर सकता। भगवदाश्रित होकर भगवद्दत्त साधनोंका आलम्बन करके सब कुछ कर सकता हूँ—ऐसा निश्चयवान् प्राणी पुरुषार्थलाभ कर सकता है। इसीलिये श्रुति प्रोत्साहन देती है— उत्थातव्यं जागृतव्यं योक्तव्यं भूतिकर्मसु। भविष्यतीत्येव मनः कृत्वा निश्चयमात्मनः॥ अगर अनुष्ठान न भी हो सके, तब भी तत्संकल्प परम लाभदायक होते हैं, अतः 'धर्मकी जय हो, अधर्मका नाश हो, प्राणियोंमें सद्भावना हो, विश्वका कल्याण हो,' ऐसे संकल्पोंका प्रवाह चलाना देश, समाज, विश्व एवं अपने लौकिक, पारलौकिक सर्वप्रकारके कल्याणका परम कारण है। सिद्ध पुरुषोंका एक ही संकल्प पर्याप्त होता है, परंतु सर्वसाधारणोंके अकेले संकल्पमें ऐसा सामर्थ्य नहीं होता। अतः सामूहिक संकल्प आवश्यक है। एककी शक्ति अकिंचित्कर होनेसे ही, कलिमें संघशक्तिका महत्त्व वर्णित है। 'संघे शक्तिः कलौ युगे' विश्व-कल्याण और धर्मकी जयके लिये अधिक संख्यामें द्रव्यदान करनेसे भी संकल्प बनना बड़ी चीज है। तीन सौ साठ दिन— एक-एक मिनट भी धर्मजयका संकल्प बहुत लाभदायक हो सकता है। द्रव्यदान कोई कर सकता है, परंतु संकल्प सभी चला सकते हैं। किसी विषयमें कायिक- वाचिक—किसी भी प्रयत्नके करनेपर उस विषयमें प्रेम हो जाता है। उसकी सुरक्षामें प्रसन्नता, बिगड़नेमें दुःख होता है। विशेषतः मानस परिश्रम कर लेनेपर तो उसमें और अधिक अनुराग हो जाता है। किसी कार्यमें अनुराग हो जाना ही सबसे बड़ा कार्य है। धर्मके प्रति ममता होती है। फिर यह भी ध्यान आता है कि जब हम धर्मकी उन्नति चाहते हैं, तब उसका अनुष्ठान भी करना चाहिये। अधर्मकी निवृत्ति चाहते हैं, तब उससे बचना भी चाहिये। विचारके उपरान्त वह स्वयं और अपने इष्ट मित्रोंको अधर्मसे निवृत्त करके धर्ममें प्रवृत्त करेगा। बस, ऐसी ही अधिक लोगोंकी प्रवृत्ति हो जानेसे धर्मकी रक्षा होती है। सत्कर्म और उत्तम मन्त्रोंके जपसे संकल्पका बल दुगुना हो जाता है संकल्पके साथ-साथ यदि मन्त्रका भी बल होता है तो सुवर्णमें सुगन्ध हो जाती है। संकल्प बुरे कर्मोंसे कमजोर हो जाता है। अच्छे कर्मोंसे भावना या संकल्प मजबूत होते हैं। तपस्या, सत्कर्म और उत्तम मन्त्रोंके जपसे जुड़कर संकल्पका बल दुगुना हो जाता है। मनु लिखते हैं—ब्राह्मण केवल जपसे ही सिद्ध हो सकता है। और कुछ करे या न करे। जप्येनैव तु संसिद्ध्येद् ब्राह्मणो नात्र संशयः। कुर्यादन्यन्न वा कुर्यान्मैत्रो ब्राह्मण उच्यते॥ (मनुस्मृति २।८७) भगवान् भी गीतामें जपयज्ञको सब यज्ञोंमें श्रेष्ठ बतलाते हैं— 'यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि।' (गीता १०।२५) मन्त्रोंकी महिमा सभी शास्त्रोंने गायी है, अन्यान्य सम्प्रदायके लोग भी मन्त्रकी महिमा मानते हैं। ईसाई, पारसी, मुसलमान, यहूदी, चीनी, जापानी, बौद्ध, जैन आदि भी मन्त्रोंकी महिमा और उनके जपसे शान्ति, चमत्कार, पारलौकिक लाभ मानते हैं। महात्मा तुलसीदासजी लिखते हैं— मंत्र परम लघु जासु बस बिधि हरि हर सुर सर्ब। महामत्त गजराज कहुँ बस कर अंकुस खर्ब॥ (रा०च०मा० १।२५६) छोटा-सा भी अंकुश महामत्त गजराजको वशमें रखता है। परम लघु मन्त्र विधि-हरि-हरको वश कर लेता है। जैसे संसारके विविध तृणोंमें विचित्र शक्तियाँ होती हैं, कोई तृण किसी रोगको दूर कर सकता है, कोई किसी रोगको। एक-एक तृणोंमें कैसी-कैसी शक्तियाँ हैं, इसका पता लगाना सिवा योगियोंके औरोंको कठिन है। पुनश्च किन-किन तृणोंके मिलनेसे कितनी और किन- किन शक्तियोंका विकास होगा, किन-किन तृणोंके
६६८ भक्तिसुधा मिलनेसे किनका विघटन होगा, यह जानना भी कठिन ही नहीं, अर्वाग्दर्शी लोगोंके लिये यह असम्भव ही है। ऐसे स्थलोंमें सर्वज्ञ वैदिक ऋषियोंके ग्रन्थोंसे ही उन- उन मूलों, औषधोंका गुण, महत्त्व आदि जाना जा सकता है। उसी तरह वर्णों (अक्षरों)-की भी बात है। वर्णोंसे मेल-जोलके भेदमें अर्थोंमें भेद होता है। किन्हीं वर्णोंके संश्लेष-विश्लेषसे किन्हीं शक्तियोंका ह्रास और किन्हींका विकास होता है। पचास वर्णोंके ही संश्लेष-विश्लेषसे दुनियाकी अपरिगणित ग्रन्थराशि तैयार हुई है। वर्ण वही हों, परंतु उनके संश्लेषवैचित्र्यसे अर्थमें भेद हो जाता है। राजा—जारा, नदी—दीन इत्यादि स्थलोंमें वर्णोंमें भेद न रहनेपर भी संश्लेषमें भेद होनेसे अर्थमें भेद हो जाता है। संश्लेष-विश्लेषके कारण ही उन्हीं वर्णोंसे भिन्न-भिन्न भाषाएँ बनीं। वर्णोंके जोड़-मेलके वैलक्षण्यसे ही भाषण और ग्रन्थोंमें वैलक्षण्य होता है। एक छोटी-सी पुस्तक बड़े मूल्यमें मिलती है, कोई बड़ी-सी पुस्तक भी साधारण मूल्यमें प्राप्त होती है। किसी भाषणका साधारण ही मूल्य होता है, किसी शास्त्ररहस्यज्ञ विद्वान् या वकील—बैरिस्टरके भाषणका मूल्य चमत्कारमूलक ही है। शब्दोंका प्रभाव स्पष्ट ही है। किन्हीं वाग्विन्यासोंसे मित्र भी शत्रु बन जाते हैं, किन्हींसे शत्रु भी मित्र बन जाते हैं। तात्पर्य यह कि वर्णोंके संश्लेष-विश्लेषकी विचित्रतासे शब्दोंमें विचित्रता और उनसे प्रभावोंमें भी वैलक्षण्य हुआ करता है। उनमें भी कुछ शब्द तो अर्थबोध कराकर उसके द्वारा विचित्र प्रभाव पैदा करते हैं, परंतु कोई अर्थबोधके बिना ही श्रवणमात्रसे आनन्दित करते हैं, उसी अर्थको एक शुष्क व्यक्ति 'शुष्को वृक्षस्तिष्ठत्यग्रे' कहकर बोलता है, उसीको एक सरस व्यक्ति 'नीरसरुहिरह विलसति पुरतः' कहकर बोलता है। स्वरविशेष आदिकी महिमासे भी शब्दों और भावोंमें रोचकता आ जाती है। उसके द्वारा प्रभाव भी अद्भुत पड़ता है। विराम (टोन या तर्ज, मुखाकृति, मुद्रादि)-के भेदसे भी अर्थके भाव- प्रभावमें भेद पड़ा करता है, परंतु कोई-कोई शब्द अर्थबोध बिना, स्वरसम्पत्ति आदि बिना, रोचकता बिना अपना प्रभाव जापक या श्रावकपर पैदा करते हैं। इसी कोटिमें मन्त्र आदि आते हैं। कितने शाबरी मन्त्र विभिन्न प्राकृत भाषाओंमें हैं कि उनका अर्थ आदि कुछ भी नहीं प्रतीत होता, परंतु उनके प्रयोगका फल विलक्षण होता है। गुग्गा गुग्गा तेरी थाली। जा बैठी पिप्पलकी डाली॥ —इत्यादि सर्पके मन्त्र हैं। उनके अर्थोंका पता नहीं लगता। फिर भी फल होता ही है। गोस्वामी तुलसीदासजी लिखते हैं— कलि बिलोकि जग हित हर गिरिजा। साबर मंत्र जाल जिन्ह सिरिजा॥ अनमिल आखर अरथ न जापू। प्रगट प्रभाउ महेस प्रतापू॥ (रा०च०मा० १।१५।५-६) शाबरी मन्त्रोंके अक्षर अनमिल, उनके अर्थ और पुरश्चरणका सम्बन्ध नहीं, फिर भी फल होता ही है। यही क्यों, गायत्री मन्त्रका हिन्दी, उर्दू, इंगलिश आदि भाषाओंमें अनुवाद करके जप किया जाय तो वह चमत्कार नहीं होता, परंतु यदि अर्थ न जानकर भी पवित्र होकर, पवित्र स्थानमें नियमपूर्वक जप किया जाय तो शान्ति आदि फलोपलब्धि प्रत्यक्ष होती है। मन्त्रजपके अधिकारी-अनधिकारी कोई मन्त्र तो देश, काल, आचार, विचार, व्यक्तिविशेष आदिकी अपेक्षा नहीं रखते हैं। जैसे भगवान्के श्रीराम, श्रीकृष्ण, श्रीदुर्गा, श्रीशिव आदि नाम। इनमें किसी भी विशिष्ट नियमोंकी अपेक्षा नहीं होती। भाव-कुभाव, अनख-आलस जिस किसी तरह भी जप करनेसे लाभ होता है। इन्हींके लिये कहा जाता है कि भगवान्के भजन या दुष्ट भावसे भी नामोच्चारणसे पाप क्षय होता है, जैसे अनिच्छासे भी संस्पृष्ट होनेसे अग्नि जलाती ही है— हरिर्हरति पापानि दुष्टचित्तैरपि स्मृतः। अनिच्छयाऽपि संस्पृष्टो दहत्येव हि पावकः॥ × × ×
संकल्प-बल ६६९ तुलसी अपने राम को रीझ भजै की खीझ। वपे बीज दुहुँ जमि हैं उलटे पड़े कि सीध॥ परंतु वैदिक मन्त्रोंमें, प्रणवमें, गायत्रीमें देश, काल, जाति, नियम आदि भी अपेक्षित होते हैं। जैसे विभिन्न तृणों-वीरुधोंके विशिष्ट संश्लेष-विश्लेषणोंसे विभिन्न शक्तिसम्पन्न औषधियाँ तैयार होती हैं। उनमें भी किस यन्त्रमें किस तरहकी औषधियाँ बन सकती हैं, किस यन्त्रमें किस तरहकी, इस विषयके विशिष्ट नियम हैं। सब यन्त्रोंमें सब औषधियाँ नहीं बन सकतीं। न सब पात्रोंमें रखी ही जा सकती हैं। जैसे भिन्न-भिन्न यन्त्रोंसे भिन्न-भिन्न कार्य सम्पन्न हो सकते हैं, वैसे ही भिन्न-भिन्न कर्म और भिन्न-भिन्न मन्त्रोंके भिन्न-भिन्न अधिकारी हैं। अतएव जिन प्राणियों- मनुष्योंका मन्त्रोंद्वारा निषेकादिश्मशानान्त संस्कार कहा गया है, वे ही शास्त्रोंके पठनके अधिकारी हैं। निषेकादिश्मशानान्तो मन्त्रैर्यस्योदितो विधिः। तस्य शास्त्रेऽधिकारोऽस्मिञ्ज्ञेयो नान्यस्य कस्यचित्॥ (मनुस्मृति २।१६) उपनयनादि संस्कारसम्पन्न प्राणी ही श्रुति, स्मृति आदिके अध्ययनका अधिकारी होता है। एवं द्विजातिमापन्नो विमुक्तो वान्यदोषतः। श्रुतिस्मृतिपुराणानां भवेदध्ययनक्षमः॥ नृसिंहतापनीयोपनिषदादि ग्रन्थोंमें यह भी स्पष्ट है कि स्त्री और शूद्र सावित्री, प्रणव, यजुः आदिका उच्चारण न करें। उनको उपदेश करनेवाला और वे-दोनों ही ऐसा करनेसे अधोगतिको प्राप्त होते हैं। पूर्वमीमांसा और उत्तरमीमांसा दोनोंमें ही इसपर विचार किया गया है कि शूद्र आदिकोंको उपनयन- संस्कारका विधान नहीं है, अतः वे वेदाध्ययनादिके अधिकारी नहीं हैं। इन बातोंसे कुछ लोग जातिद्वेषकी कल्पना करते हैं, परंतु वस्तुस्थितिकी दृष्टिसे ही शास्त्रोंने ऐसा नियम बनाया है। माँ बच्चेके हाथसे इक्षुदण्ड छीन लेती है, परंतु शर्करासिता बड़े प्रेमसे बच्चेको प्रदान करती है। इस विषयमें द्वेषकी कल्पना व्यर्थ है, माँ केवल हितबुद्धिसे ही ऐसा करती है। इसी तरह शास्त्रोंने शूद्रोंको वेदादि शास्त्रोंका सार इतिहास-पुराणादि श्रवणद्वारा ज्ञात कराकर वेदादिके अध्ययनका निषेध किया है। जैसे हर एक यन्त्रसे हर एक चीज नहीं बनती, वैसे ही हर एक शरीरसे हर एक मन्त्रका उच्चारण ठीक नहीं। शास्त्रोंके द्वारा ही इसका निर्णय होता है। ब्राह्मणका मदिरा-बिन्दुपान और शूद्रका वेदाक्षर- विचार उन दोनोंके लिये हानिकारक होता है। त्रैवर्णिकोंके लिये प्रणवयुक्त मन्त्र और शूद्र, स्त्रियोंके लिये प्रणवरहित मन्त्रका ही जपविधान है। द्वादशाक्षर मन्त्रके विषयमें कहा गया है कि यह मन्त्र सर्वसिद्धि- प्रदायक है। स्त्री-शूद्रोंके लिये वितार अर्थात् प्रणवरहित और द्विजातियोंके लिये सतार मन्त्रका जप ठीक है— द्वादशार्णो महामन्त्रो भुक्तिमुक्तिप्रदायकः। स्त्रीशूद्राणां वितारोऽयं सतारस्तु द्विजन्मनाम्॥ (बृहन्नारदीयपु०, पृ० ७०।७३) अभिप्राय यह है कि ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’— द्वादशाक्षर मन्त्र विधिवत् यज्ञोपवीत- सम्पन्न व्यक्तियोंके लिये है, अन्योंके लिये ‘ॐ’ के स्थानपर तान्त्रिक प्रणव ‘ह्रीं’ या ‘ऐं’ आदिके सहित जपका विधान है। ब्राह्मण अध्ययन-अध्यापन दोनोंका अधिकारी है। क्षत्रिय-वैश्य वेदादि शास्त्रोंके अध्ययनके अधिकारी हैं, अध्यापनके नहीं। शूद्र, स्त्री आदि इतिहास- पुराणादिका श्रवण करके उपासना, ज्ञान और अपने अधिकारानुसार कर्मोंका ज्ञान प्राप्त करके प्रवृत्त हों तो उसीसे कल्याण होगा। इस तरह वेदादि शास्त्रों, प्रणवादि मन्त्रोंमें जातिविशेषकी अपेक्षा होती है, संस्कारोंकी अपेक्षा होती है, श्मशानादि एवं अन्यान्य अपवित्र स्थानों, सूतक-पातकादिवालोंको बचाकर पवित्र देश-कालमें संस्कारसम्पन्न होकर गायत्री आदि मन्त्रोंका जप कल्याणकारक होता है।
६७० भक्तिसुधा ज्ञान और भक्ति ज्ञान बड़ा या भक्ति बड़ी बड़े कुतूहलके साथ लोगोंका प्रश्न होता है कि ज्ञान बड़ा कि भक्ति बड़ी ? कुछ लोग ज्ञानकी महिमा दिखलाते हुए भक्तिका अपकर्ष दिखलाते हैं तो कुछ लोग भक्तिकी महिमाके सामने ज्ञानको निकृष्ट ठहराते हैं। कोई भक्तिको ज्ञानका साधन कहते हैं। गोस्वामी तुलसीदासजीका कहना है कि ज्ञानसे विश्वास और विश्वाससे प्रीति होती है और प्रीतिसे ही भक्तिमें दृढ़ता आती है— जानें बिनु न होइ परतीती। बिनु परतीति होइ नहिं प्रीती ॥ प्रीति बिना नहिं भगति दृढ़ाई। जिमि खगपति जल कै चिकनाई ॥ (रा०च०मा० ७।८९।७-८) भक्तिमणि प्राप्त करनेके लिये भी ज्ञान-वैराग्यको साधन ही माना गया है— पावन पर्बत बेद पुराना। राम कथा रुचिराकर नाना ॥ मर्मी सज्जन सुमति कुदारी। ग्यान बिराग नयन उरगारी ॥ भाव सहित खोजइ जो प्रानी। पाव भगति मनि सब सुख खानी ॥ (रा०च०मा० ७।१२०।१३-१५) भक्तिके बिना जो ज्ञानको ढूंढ़ते हैं, वे मन्दभाग्य हैं। वे मानो कामधेनुको छोड़कर दूधके लिये आक ढूंढ़ते हैं— जे असि भगति जानि परिहरहीं। केवल ग्यान हेतु श्रम करहीं ॥ ते जड़ कामधेनु गृहँ त्यागी। खोजत आकु फिरहिं पय लागी ॥ (रा०च०मा० ७।११५।१-२) श्रीमद्भागवतमें भी कहा है— येऽन्येऽरविन्दाक्ष विमुक्तमानिन- स्त्वय्यस्तभावादविशुद्धबुद्धयः । आरुह्य कृच्छ्रेण परं पदं ततः पतन्त्यधोऽनादृतयुष्मदङ्घ्रयः ॥ (१०।२।३२) अर्थात् हे कमलनयन! जो ज्ञानके प्रभावसे अपनेको निर्मुक्त जाननेवाले हैं या ज्ञानी मानते हैं, परंतु आपके श्रीचरणारविन्दप्रेमद्वारा जिनकी बुद्धि शुद्ध नहीं है, वे बड़ी कठिनाईसे उच्चतम पदपर आरूढ़ होकर भी पुनः पतित हो जाते हैं; क्योंकि उन्होंने आपके श्रीचरण-कमलका आदर नहीं किया। जे ग्यान मान बिमत्त तव भव हरनि भक्ति न आदरी। ते पाइ सुर दुर्लभ पदादपि परत हम देखत हरी ॥ (रा०च०मा० ७।१३।छन्द ३) नानुव्रजति यो मोहाद् व्रजन्तं हरिमीश्वरम्। ज्ञानाग्निदग्धकर्माऽपि स भवेद् राक्षसाधमः ॥ अर्थात् श्रीहरिकी रथयात्रामें जो मोहवश उनका अनुगमन नहीं करता, वह ज्ञानाग्निदग्धकर्मा होकर भी राक्षसाधम हो जाता है। जो ज्ञानप्रयासको छोड़कर सन्तोंको भी मुखरित करनेवाली श्रवणरन्ध्रमें प्राप्त भगवान्की वार्ताको शरीर, वाक् तथा मनसे प्रणाम करता हुआ जीवन व्यतीत करता है, वह त्रिलोकीमें अजितभगवान्को भी जीत लेता है अर्थात् मनोवचनातीत भगवान्को अपने तनु तथा मनके वशमें कर लेता है— ज्ञाने प्रयासमुदपास्य नमन्त एव जीवन्ति सन्मुखरितां भवदीयवार्ताम्। स्थाने स्थिताः श्रुतिगतां तनुवाङ्मनोभि- र्ये प्रायशोऽजित जितोऽप्यसि तैस्त्रिलोक्याम् ॥ (श्रीमद्भा० १०।१४।३) तथा न ते माधव तावकाः क्वचिद् भ्रश्यन्ति मार्गात्त्वयि बद्धसौहृदाः। त्वयाभिगुप्ता विचरन्ति निर्भया विनायकानीकपमूर्धसु प्रभो॥ (श्रीमद्भा० १०।२।३३) भगवान्के साथ जिनका सौहार्द सुदृढ़ है, ऐसे भगवान्के भक्त कभी भी मार्गसे नहीं गिरते, अपितु वे भगवान्द्वारा सुरक्षित हो विघ्नसेनानियोंके सिरपर पादविन्यास करते हुए निर्भय विचरते हैं। या निर्वृतिस्तनुभृतां तव पादपद्म- ध्यानाद्भवज्जनकथाश्रवणेन वा स्यात्।
ज्ञान और भक्ति ६७१ सा ब्रह्मणि स्वमहिमन्यपि नाथ मा भूत् किं त्वन्तकासिलुलितात्पततां विमानात्॥ (श्रीमद्भा० ४।९।१०) भक्तोंको भगवान्के श्रीचरणारविन्दके ध्यानमें रस मिलता है, किंवा भगवद्भक्तोंके चरित्र-श्रवणसे जो रस व्यक्त होता है, वह स्वप्रकाश, स्वमहिमास्थित भगवान्में भी नहीं व्यक्त होता। फिर अन्तककी तलवारसे विलुलित विमानोंसे गिरनेवाले लोगोंके सुखोंकी तो चर्चा ही क्या है? इसके सिवाय यह भी है कि ज्ञान हो जानेपर भी भक्तिके बिना उसकी शोभा नहीं होती। नैष्कर्म्यमप्यच्युतभाववर्जितं न शोभते ज्ञानमलं निरञ्जनम्। कुतः पुनः शश्वदभद्रमीश्वरे न चार्पितं कर्म यदप्यकारणम्॥ (श्रीमद्भा० १।५।१२) सोह न राम पेम बिनु ग्यानू। करनधार बिनु जिमि जलजानू॥ (रा०च०मा० २।२७७।५) ज्ञान, वैराग्य, धर्म और कर्म यह सभी प्रेम- लक्षणा भक्तिसे ही सुशोभित होते हैं। उसके बिना सब निरर्थक हो जाते हैं— सो सुखु करमु धरमु जरि जाऊ। जहँ न राम पद पंकज भाऊ॥ जोगु कुजोगु ग्यानु अग्यानू। जहँ नहिं राम पेम परधानू॥ (रा०च०मा० २।२९१।१-२) साथ ही ज्ञानके उत्कर्षका भी पक्ष प्रसिद्ध ही है। 'न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते' (गीता ४।३८) अर्थात् ज्ञानके समान कोई भी पवित्र नहीं है। 'वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः' (गीता ७।१९) सब कुछ वासुदेव ही हैं, ऐसा ज्ञानवान् महात्मा अत्यन्त दुर्लभ है। ज्ञानको छोड़कर दूसरा कल्याणका मार्ग ही नहीं है। बिना ज्ञानके मुक्ति होती ही नहीं—'तमेव विदित्वाति मृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय॥' (श्वेताश्वतर० ६।१५) 'ऋते ज्ञानान्न मुक्तिः।' 'नैनमविदितो देवो भुनक्ति।' अर्थात् यह देव बिना ज्ञानके प्राणीका अन्तर्रात्मा होकर भी पालन नहीं करता अर्थात् सर्वानर्थसे विनिर्मुक्त नहीं करता। भगवान् ज्ञानीको प्रत्यक्ष अपना आत्मा ही बतलाते हैं—'ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्।' (गीता ७।१८) समस्त भक्तोंकी अपेक्षा ज्ञानी भक्तकी विशेषता स्वयं श्रीभगवान् स्वीकार करते हैं—'तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते।' (गीता ७।१७) तुलसीदासजी भी ज्ञानको ही साक्षात् मोक्षप्रद बतलाते हैं— धर्म तें बिरति जोग तें ग्याना। ग्यान मोच्छप्रद बेद बखाना॥ (रा०च०मा० ३।१६।१) भेद गये बिनु रघुपति अति न हरहिं जग-जाल॥ (विनय-पत्रिका २०३।१५) 'सकल दृश्य निज उदर मेलि, सोवै निद्रा तजि जोगी। सोइ हरिपद अनुभवै परम सुख, अतिसय द्वैत-बियोगी॥ (विनय-पत्रिका १६७।४) साथ ही जब द्वैत अज्ञानका कार्य है, तब उसकी निवृत्तिके लिये ज्ञानकी अपेक्षा है ही—'क्रोध कि द्वैतबुद्धि बिनु द्वैत कि बिनु अग्यान' (रा०च०मा० ७।१११ (ख)) साथ ही भक्तिका ज्ञान साधनोंमें वर्णन स्पष्ट है— 'मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी।' (गीता १३।१०) मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते। स गुणान्समतीत्यैतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते॥ (गीता १४।२६) यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ। तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः। (श्वेताश्वतर० ६।२३) श्रद्धाभक्तिध्यानयोगादवेहि॥ इत्यादि श्रुतियोंके द्वारा यह सिद्ध होता है कि भक्तिसे ही ब्रह्मात्मतत्त्वका साक्षात्कार होता है। भक्ति और ज्ञानका स्वरूप इन दोनों पक्षोंपर विचार करनेके पहले यह समझ लेना चाहिये कि भक्तिपदका प्रयोग कहाँ होता
६७२ भक्तिसुधा है। वैदिकोंकी दृष्टिमें कर्म, उपासना और ज्ञान—ये तीन साधन प्राणियोंके कल्याणके मूल हैं। कर्मसे मलकी निवृत्ति, उपासनासे विक्षेपकी निवृत्ति और ज्ञानसे आवरणकी निवृत्ति होती है। मल, विक्षेप, आवरण—इन तीनों उपद्रवोंसे उपद्रुत होकर अन्तरात्मा अनन्त अनर्थोंका भागी होता है। इन तीनों साधनोंसे तीनों उपद्रवोंके निवृत्त हो जानेपर अन्तरात्माकी शुद्धप्रत्यक्चैतन्याभिन्न परब्रह्मस्वरूपसे अवस्थिति होती है। इस पक्षसे वेदशास्त्रानुसार देहेन्द्रिय, मन, बुद्धि, चित्त और अहंकारकी, सन्ध्या, तर्पण, वैश्वदेव, अग्निहोत्र, दर्शपूर्णमास, चातुर्मास्यादि श्रौत-स्मार्त कर्मलक्षण चेष्टाएं ही कर्म हैं। सगुण, साकार सच्चिदानन्दघन परब्रह्माकाराकारित स्निग्ध अन्तःकरणकी वृत्ति- परम्परा ही उपासना या भक्ति है। साथ ही सगुण, निराकार परब्रह्माकाराकारित अन्तःकरणवृत्ति- परम्परा एवं निर्गुण, निराकार ब्रह्माकारवृत्तिको भी उपासना या भक्ति कहा जाता है। कुछ लोग कहते हैं कि निर्गुण, निराकार ब्रह्माकारवृत्तिको ज्ञान कहते हैं और सगुण, साकार ब्रह्माकारस्नेहात्मिकावृत्तिको भक्ति कहते हैं। वस्तुतः ब्रह्माकारवृत्तिपरम्पराको कर्म और ज्ञान दोनों ही कहा जा सकता है, परंतु सारांश यही है कि प्रमाण एवं वस्तुसे परतन्त्र-वृत्ति ज्ञान है और पुरुषतन्त्रमानसी-वृत्ति कर्म है। वही श्रद्धा-स्नेह सहकृता उपासना या भक्ति है। ज्ञानमें प्राणी परतन्त्र होता है, घ्राणसे गन्धका सन्निकर्ष होनेपर इच्छा न होते हुए भी गन्धज्ञान होता है। अतः ज्ञानमें पुरुषकी स्वतन्त्रता नहीं है, परंतु ध्यान या उपासनामें प्राणी स्वतन्त्र होता है। शास्त्रानुसार भगवान्की मूर्तिकी कल्पना करके प्राणी ध्यान कर सकता है। इस दृष्टिसे श्रद्धा- स्नेहसहित उपास्य ब्रह्मस्वरूपाकारवृत्तिप्रवाह उपासना है। वह उपास्यस्वरूप निर्गुण-निराकार, सगुण- निराकार और सगुण-साकार तीनों ही तरहका होता है। वस्तु एवं प्रमाणके अधीन उपास्याकारवृत्ति ज्ञान कहलाती है, जो कि उपासनाकी महिमासे ही हो सकता है, फिर भी वेदान्तियोंकी दृष्टिमें अनाद्य निर्वचनीय मूलाज्ञानका निवर्तक निर्गुण निराकारका ही ज्ञान होता है। अतः वही ज्ञान पदसे अधिक व्यपदिष्ट होता है। वह शान्त शुद्ध मनः सहकृत महावाक्यसे ही या महावाक्याभ्यासजन्यसंस्कारप्रचयसहकृत शान्त मनसे होता है। तदितर ज्ञान या साक्षात्कार उपासना मनसे होती है। परोक्ष ज्ञान वेदादि शास्त्रोंसे भी हो जाता है। इस सिद्धान्तके अनुसार शास्त्रानुसार किसी उपास्यस्वरूपका श्रद्धा-स्नेहसहित ध्यान उपासना है; वही भक्ति है। इस तरह सगुण भगवान्के समान ही निर्गुण ब्रह्मकी भी भक्ति होती है। इस भक्तिसे विक्षेपनिवृत्ति, चित्तकी एकाग्रता और भगवत्प्रसन्नता प्राप्त होती है। फिर निर्विघ्न रूपसे ही वेदान्त- श्रवणादिद्वारा निर्गुण निराकार निर्विकार ब्रह्मका साक्षात्कार होता है। अतएव शास्त्रोंमें वेदान्त- श्रवणादिद्वारा भगवत्साक्षात्कारमें भगवद्भक्ति या प्रपत्तिको मुख्य साधन बतलाया है—'तं ह देवमात्मबुद्धिप्रकाशं मुमुक्षुर्वै शरणमहं प्रपद्ये'॥ (श्वेताश्वतरो० ६।१८) अर्थात् आत्मबुद्धि प्रकाशित करनेवाले देवके मैं शरणागत हूँ। 'तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये' (गीता १५।४) उस आद्यपुरुषकी मैं शरण हूँ। 'यमेवैष वृणुते तेन लभ्यः' (कठोपनिषद् १।२।२३) स्मरण, भजन, भक्ति और प्रार्थनासे भी भगवान्की प्राप्ति अर्थात् बोध होता है। ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते ॥ × × × नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता ॥ (गीता १०।१०-११) भक्तिसे ज्ञानकी प्राप्ति भगवान्का भी कहना है कि श्रद्धासे भजनेवाले भक्तोंको मैं बुद्धियोग (ज्ञान) देता हूँ, जिससे वे मुझे प्राप्त कर लेते हैं। मैं स्वयं ही ज्ञान-दीपसे उनके अज्ञानको नष्ट कर देता हूँ। 'भक्त्या मामभिजानाति'
ज्ञान और भक्ति [पृ. ६७३]
(गीता १८।५५) भक्त भक्तिके द्वारा मुझे सम्यक् रूपसे जान लेता है। 'क्लृपि सम्पद्यमाने च' इस वार्तिकके उदाहरण- रूपसे भट्टोजिदीक्षितने कहा है कि 'भक्तिर्ज्ञानाय कल्पते, सम्पद्यत इत्यर्थः' अर्थात् भक्ति ही ज्ञानाकारसे परिणत होती है। सारांश यह है कि जैसे मृत्पिण्ड ही घटाकारमें परिणत होता है, वैसे ही भक्ति ही ज्ञान शुद्धसच्चिदानन्दघन ब्रह्मसाक्षात्काररूपसे परिणत होती है। सगुण साकार परब्रह्ममें आसक्त चित्त जब प्रेमोद्रेकसे निर्विचेष्ट हो जाता है, तब किसी भी प्रमेयकी प्रतीति नहीं होती। प्रमेय-प्रतीति मिटनेपर प्रमाण और प्रमाणाश्रय प्रमाताकी अप्रतीति स्वाभाविकी है। उस स्थितिमें वेदान्तद्वारा प्रमाता, प्रमाण, प्रमेय तीनोंके अवभासकरूपसे शुद्ध परब्रह्मका साक्षात्कार होता है। चित्तकी निर्विचेष्टताके बिना प्रमाता और प्रमाणकी प्रतीति कथमपि नहीं मिट सकती। बिना उसके मिटे सर्वोपद्रवविनिर्मुक्त निर्विकल्प चिदानन्द ब्रह्मका साक्षात्कार नहीं हो सकता। अष्टांगयोगका भी उपयोग इसी भगवदुपासनाद्वारा चित्तकी निर्विचेष्टतामें है। कपिल और देवहूतिके संवादमें इसीलिये सगुण-साकार ध्यानकी अत्यन्त प्रशंसा की गयी है। भगवान्के श्रीचरणारविन्द- मकरन्द-रसास्वादनमें विभोर मन सहजहीमें शान्त हो जाता है तथा उनके नख-मणि-चन्द्रिकासे धौतप्राय मन भगवान्के अमृतमय मुखचन्द्रके सौन्दर्य-माधुर्य- सुधा-समास्वादन करते-करते निर्विचेष्ट हो जाता है, बस, फिर उस प्रेमोन्मादमें विलीन मनको विचलित न करके—'तच्च त्यक्त्वा मदारोहो न किञ्चिदपि चिन्तयेत्॥' (श्रीमद्भागवत ११।१४।४४) उस समय 'एकमेकतराभावे यदा नोपलभामहे। त्रितयं तत्र यो वेद स आत्मा स्वाश्रयाश्रयः॥' (श्रीमद्भागवत २।१०।९)-के अनुसार प्रमाता, प्रमाण, प्रमेय और उनके अभावोंका भासक शुद्ध परब्रह्म स्वतः प्रकाशमान होता है, फिर वहाँ केवल महावाक्यकी अचिन्त्य शक्तिसे अनाद्यावरण सदाके लिये मिट जाता है। इस तरह द्रवीभूत स्निग्ध चित्तकी भगवदा- काराकारित वृत्तिरूप भक्ति ही निर्गुण निराकार निर्विकार परब्रह्मरूपसे व्यक्त होती है। फिर उससे शुद्ध ब्रह्मात्मनावस्थानरूप मोक्ष अपने-आप ही सिद्ध हो जाता है। इसलिये कुछ महानुभावोंने भक्तिसे ही मोक्ष माना है। ऐसी स्थितिमें भी 'तमेव विदित्वाति मृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यते।' (श्वेताश्वतर० ६।१५) इत्यादि श्रुतियोंका विरोध नहीं होता; क्योंकि ज्ञान द्वार-कोटिमें यहाँ भी मान्य ही है। जैसे पिण्ड- कपालादिद्वारा ही मृत्तिका घटका कारण बनती है, वैसे ही ज्ञानद्वारा ही भक्ति मोक्षका कारण बनती है। भक्तिका अर्थ ज्ञान है इसके अतिरिक्त आचार्योंने कहीं-कहीं भक्ति शब्दका ज्ञान ही अर्थ किया है। यद्यपि ऐसा अर्थ आपाततः पक्षपातपूर्ण-सा प्रतीत होता है, परंतु विचार करनेपर अनुचित प्रतीत नहीं होता। तथा च 'भजनं भक्तिः' इस व्युत्पत्तिके अनुसार भजन या सेवनको ही भक्ति कहा जाता है। वह सेवन केवल कायिक व्यापार ही नहीं, किंतु शरीर, इन्द्रिय, मन तीनोंहीसे सेव्यकी सेवा की जाती है। इतना ही क्यों, महानुभावोंने मानसी सेवाको ही परा या मुख्या सेवा माना है— 'कृष्णसेवा सदा कार्या मानसी सा परा मता।' (श्रीवल्लभाचार्य) श्रीकृष्णकी सेवा सदा करनी चाहिये, वह सेवा भी मानसी ही मुख्या है। अब प्रश्न होता है कि हस्त-पादादिसे तो सेवा-परिचर्या बन सकती है, परंतु मानसी सेवा कैसे हो? इसपर महानुभावोंने कहा है—'चेतस्तत्प्रवणं सेवा' अर्थात् चित्तकी श्रीकृष्णोन्मुखता ही सेवा है अर्थात् भगवान्की ओर भगवत्स्वरूपाकाराकारित मनोवृत्तिप्रवाह ही भगवान्की मानसी सेवा है। बस, उसीकी सिद्धिके लिये तनुजा, वित्तजा—उभय प्रकारकी सेवा अपेक्षित होती है। 'तत्सिद्धयै तनुवित्तजा'। इस तरह
६७४ भक्तिसुधा
मनोवृत्ति-प्रवाह भी सेवा ही है। सारांश यह हुआ कि सेव्याकार-मानसी-वृत्ति ही सेव्यकी सेवा है। यहाँपर भी कुछ महानुभाव आनुकूल्येन कृष्णाकारवृत्ति (कृष्णानुस्मरण)-को भक्ति कहते हैं। कुछ कृष्णाकारावृत्ति मात्रको भक्ति या सेवा मानते हैं। वह आनुकूल्येन किंवा प्रातिकूल्येन चाहे जैसी ही हो। जब सेव्याकार वृत्ति भक्ति है और सेव्य निर्गुण, निराकार, निर्विकार है तो निर्गुण, निराकार, निर्विकार ब्रह्माकाराकारित वृत्ति ही भक्ति हुई। फिर वह चाहे वस्तु और प्रमाणपरतन्त्र ज्ञानरूपा हो, चाहे पुरुषतन्त्र उपासनारूपा हो। निर्गुण, निराकार, निर्विकार परब्रह्माकाराकारित वृत्ति अवश्य ही भक्ति पदसे कही जा सकती है। अतएव—'भजति विषयाकारतां प्राप्नोति—इति भक्तिर्ज्ञानम्।' इस व्युत्पत्तिके अनुसार भी विषयाकारताको भजनेवाला ज्ञान भक्ति पदका अर्थ होता है। इस पक्षमें 'भक्त्या मामभिजानाति' (गीता १८।५५) इस स्थलमें भक्ति पदसे ज्ञानलक्षणा चतुर्थी भक्ति ही विवक्षित है। आर्त, अर्थार्थी, जिज्ञासु और ज्ञानी— चार प्रकारके भक्त होते हैं और उनकी भक्ति चार ही तरहकी होती है। ज्ञानीकी भक्ति ज्ञानरूपा ही है, ज्ञानीकी दृष्टिमें प्रत्यक्चैतन्याभिन्न भगवान्से भिन्न दूसरी वस्तु न हुई, न है और न होगी। अतः उसकी एकमात्र प्रीति भगवान्में ही है। इस तरह वह इतरोंसे विशिष्ट है। भगवान् उसे अपना आत्मा ही मानते हैं— 'ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्।' (गीता ७।१८) प्रकाश्यको प्रकाशन करता हुआ प्रकाश, प्रकाश्याकार होकर प्रकाश्याकारताको भजता है। इस दृष्टिसे ज्ञेयाकारताको प्राप्त ज्ञान भक्ति पदसे कहा गया है। इसी दृष्टिसे आचार्योंका कहना है कि— मोक्षकारणसामग्र्यां भक्तिरेव गरीयसी। स्वस्वरूपानुसन्धानं भक्तिरित्यभिधीयते ॥ स्वात्मतत्त्वानुसन्धानं भक्तिरित्यपरे जगुः। (विवेकचूडामणि ३२-३३) मोक्षकारण-सामग्रीमें भक्ति ही श्रेष्ठ है और स्वरूपानुसन्धान ही भक्ति है। यहाँ इस शंकाका कोई मूल्य नहीं रहता कि जब सेव्याकाराकारित वृत्तिको भक्ति कहा जाता है, तब तो एक सेवकको अवशेष रहना चाहिये। परंतु ऐसी स्थितिमें तो अद्वैतवाद ही असिद्ध रहेगा, क्योंकि व्यावहारिक सत्तावाला साधक ही पारमार्थिक विशुद्ध चिदानन्दात्मतत्त्वको अपना सेव्य बनायेगा, उस सेव्यसे भिन्न सभी व्यावहारिक ही हैं, पारमार्थिक तो एक अव्यवहार्य परमात्मतत्त्व ही रहता है— अक्षमा भवतः केयं साधकत्वप्रकल्पने। किं न पश्यति संसारं तत्रैवाज्ञानकल्पितम् ॥ (पञ्चदशी, वार्तिक) ज्ञान नामकी स्वतन्त्र वस्तु नहीं है इतनेपर भी इस सिद्धान्तमें उपासनारूप भक्ति ज्ञानसे पृथक् मान्य और आदरणीय होती ही है। उसकी कृपासे ही यह भक्ति भी प्राप्त होती है। साथ ही ठीक इसके विपरीत, अन्यान्य साम्प्रदायिक ब्रह्मसूत्र- भाष्यकारोंका कहना है कि उपासना ही भक्ति है और उससे भिन्न होकर ज्ञान नामकी स्वतन्त्र वस्तु नहीं है। 'अथातो ब्रह्मजिज्ञासा' यहाँपर भी इस मतमें वस्तुप्रमाणतन्त्र तत्त्वज्ञानमात्र नहीं विवक्षित है; क्योंकि उसका कुछ भी उपयोग नहीं है। 'राजा है' इस ज्ञान-मात्रसे कुछ नहीं सिद्ध होता, किंतु राजाका स्वसम्बन्धित्वेन ज्ञान ही उपकारक हो सकता है। ठीक इसी तरह वेदान्तवेद्य ब्रह्मका केवल ज्ञान निरर्थक है, किंतु 'गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत्।' इत्यादिके अनुसार स्वसम्बन्धित्वेन ज्ञानपूर्वक उपासनारूप विशिष्ट ज्ञान ही 'अथातो ब्रह्मजिज्ञासा' (ब्रह्मसूत्र १।१।१), 'ब्रह्मविदाप्नोति परम्।' (तैत्तिरीयोपनिषद् २।१) इत्यादि श्रुति- सूत्रोंमें विवक्षित है। अतएव 'य एवं वेद' इत्यादि स्थलोंमें वेदसे उपासना ही सर्वमान्य है, इसलिये
ज्ञान और भक्ति ६७५ ज्ञानकाण्डकी पृथक् कल्पना ही व्यर्थ है। वेदोंके दो काण्ड—कर्मकाण्ड और उपासनाकाण्ड कर्मकाण्ड और उपासनाकाण्ड दो ही काण्ड वेदोंमें हैं। चाहे पृथक् ज्ञानकाण्ड माना भी जाय तो भी वह कर्म और उपासना दोनोंका साधन है। कर्मके ज्ञानसे ही अनुष्ठान होगा, उपास्यज्ञानसे ही उसकी उपासना होती है। इस पक्षमें निर्गुण निराकार ब्रह्म सर्वथा अमान्य ही है और उस पक्षमें संसार या बन्ध सत्य ही है। अतः ज्ञानसे उसका मिटना असम्भव है। इसलिये भक्ति, प्रार्थना आदिसे ही बन्धनका छूटना और विशिष्ट आनन्दका लाभ सम्भव है। इस पक्षमें ज्ञानसे भक्तिका अत्यन्त उत्कर्ष स्पष्ट ही है, परंतु जो कर्मफल होनेसे मुक्तिकी अनित्यतासे भयभीत होते हैं और समझते हैं कि यदि बन्ध और संसार सत्य है तो उसकी आत्यन्तिक निवृत्ति असम्भव है, वे भगवान्को सगुण-साकारकी तरह निर्गुण-निराकार भी मानते हैं और कर्म, उपासनाके समान ही ज्ञानकाण्डका भी महत्त्व मानते हैं, उनके मतमें सुतरां उपर्युक्त मत अमान्य है। भक्तिका उत्कर्ष फिर भी कुछ महानुभाव कर्मकाण्ड, उपासनाकाण्ड और ज्ञानकाण्ड तीनोंको पृथक् मानते हुए भी भक्तिको ज्ञानसे उत्कृष्ट कहते हैं, तब भी उनका ज्ञानप्राप्त ब्रह्म, सगुण साकार परब्रह्मसे निम्न कोटिका है। ज्ञानप्रधान सच्चिदानन्द ब्रह्म ज्ञानप्राप्य है, आनन्दप्रधान ब्रह्म भक्तिप्राप्य है। वेदान्तवेद्य ब्रह्म आतपके समान है, भक्तिप्राप्य भगवान् सूर्यके समान है। सुतरां इस मतमें भी ज्ञानसे भक्तिका उत्कर्ष है। इन मतोंमें भी भक्तिका 'सा परानुरक्तिरीश्वरे' ईश्वरमें परमानुराग ही भक्ति है इत्यादि लक्षण मान्य हैं। वह भक्ति 'मर्यादा' और 'पुष्टि' किंवा 'वैधी' और 'रागानुरागा' भेदसे दो प्रकार की है। स्वतः अप्राप्त विधिगम्य भगवत्सेवन मर्यादा या वैधी है, भगवत्कृपाप्राप्त कामिन्यादिप्रीतिवत् रागवशात् भगवत्सेवन पुष्टि या रागानुरागा है। यह भक्ति परप्रेमरूपा है, स्वतःसिद्धा है, यह भगवान्की परमान्तरंगा शक्तिरूपा है। यह हेतुफलभावरहित है। स वै पुंसां परो धर्मो यतो भक्तिरधोक्षजे। अहैतुक्यप्रतिहता ययात्मा सम्प्रसीदति॥ (श्रीमद्भा० १।२।६) पुरुषोंकी भगवन्नामसंकीर्तनादि लक्षणा भक्ति ही परमोत्कृष्ट धर्म है, जिससे अधोक्षज भगवान्में अहैतुकी अप्रतिहता भक्ति होती है, जिससे कि अन्तरात्माका संप्रसाद होता है, यहाँ यह सिद्ध होता है कि जब 'यतः' इस पंचम्यन्तसे भक्तिका कार्यकारणभाव निर्धारित है, तब उसे अहैतुकी कैसे कहा जा सकता है? इसपर समाधान यह है कि वास्तवमें भक्तिका कारण बनता नहीं, यदि भगवत्कृपाको कारण कहें तो सम भगवान्में विषम कृपा कैसे सम्भव है? यदि कृपा भी सम हो, तब तो सभीको भक्ति-प्राप्ति होनी चाहिये। यदि भक्तकृपासे कहें तो वह भी ठीक नहीं; क्योंकि वह भी सम ही है। सर्वभूतेषु यः पश्येद् भगवद्भावमात्मनः। भूतानि भगवत्यात्मन्येष भागवतोत्तमः॥ (श्रीमद्भा० ११।२।४५) यदि— ईश्वरे तदधीनेषु बालिशेषु द्विषत्सु च। प्रेममैत्रीकृपोपेक्षा यः करोति स मध्यमः॥ (श्रीमद्भा० ११।२।४६) इस लक्षणके अनुसार मध्यम-भक्तकी कृपासे भक्तिका होना मानें सो भी ठीक नहीं, क्योंकि श्रद्धा- पुरस्सर मध्यम-भक्तके सेवनसे ही मध्यम-भक्तकी कृपा प्राप्त हो सकती है, परंतु श्रद्धा भी तो भक्ति ही है, वह पहले कैसे मिले? साधन और साध्यरूपसे भक्ति ही दो प्रकारकी है, उसमें भी अवस्था- भेदमात्रसे साध्य-साधनभाव बनते हैं। जैसे अपक्व आम्र, पक्व आम्रका हेतु होता है, वैसे ही साधनरूपा भक्तिका साध्यरूपा भक्तिके साथ साध्य-साधन-भाव होता है।
६७६ भक्तिसुधा अन्याभिलाषिताशून्यं ज्ञानकर्माद्यनावृतम्। आनुकूल्येन कृष्णानुशीलनं भक्तिरुत्तमा ॥ अर्थात् सर्वाभिलाषवर्जित ज्ञान और कर्मोंसे अनावृत अनुकूलतया श्रीकृष्णका अनुस्मरण ही भक्ति है। इन सिद्धान्तोंमें भक्ति ही सब कुछ है, उसके लिये ही समस्त साधन हैं, ज्ञान और मोक्ष आदि उसमें विघ्न हैं। भक्तजन भुक्ति, मुक्ति, विरक्ति सबको तिलांजलि देकर इस भक्तिको ही चाहते हैं। इसीलिये बड़े-बड़े अमलात्मा परमहंस महामुनीन्द्रगण भी अद्वैत, अनन्त, अखण्ड ब्रह्मसे मन हटाकर सगुण साकार भगवान्में मन लगाते हैं। तस्यारविन्दनयनस्य पदारविन्द- किञ्जल्कमिश्रतुलसीमकरन्दवायुः। अन्तर्गतः स्वविवरेण चकार तेषां सङ्क्षोभमक्षरजुषामपि चित्ततन्वोः ॥ (श्रीमद्भा० ३।१५।४३) अरविन्दनयन भगवान्के श्रीचरणारविन्दमकरन्द- मिश्रित तुलसिकाके मकरन्दररेणु जिस समय घ्राणरूप स्वविवरद्वारा सनकादिकोंके हृदयान्तर्गत हुए, बस उसी समय उन अक्षर ब्रह्मनिष्ठ सनकादिकोंके भी शरीर और मनमें क्षोभ हो गया। अर्थात् शरीरमें पुलकावली, नयनोंमें अश्रु और मनमें द्रवता उत्पन्न हो उठी। स्वसुखनिभृतचेतास्तद्व्युदस्तान्यभावोऽ- प्यजितरुचिरलीलाकृष्टसारस्तदीयम्। व्यतनुत कृपया यस्तत्त्वदीपं पुराणं तमखिलवृजिनघ्नं व्याससूनुं नतोऽस्मि ॥ (श्रीमद्भा० १२।१२।६८) 'स्वसुखेनैव निभृतं परिपूर्णं चेतो यस्य स तथोक्तः, तेनैव निरस्तः अन्यस्मिन् पदार्थे भावो भावना अस्तित्वबुद्धिर्यस्य स तथोक्तः।' श्रीशुकाचार्य, जिनका चित्त स्वस्वरूपभूत परमानन्द सुधासिन्धुसे ही परिपूर्ण हो गया था, तद्व्युदस्तान्यभाव अर्थात् स्वसुख-निभृतचेता होनेसे ही अन्यपदार्थविषयक अस्तित्व-बुद्धि जिनकी मिट गयी थी, जो केवल सर्वत्र एक परम तत्त्वका ही दर्शन करते थे, भगवान्की रुचिर लीलासे उनका भी धैर्य च्युत हो गया। उन्होंने स्वयं कहा है— परिनिष्ठितोऽपि नैर्गुण्य उत्तमश्लोकलीलया। गृहीतचेता राजर्षे आख्यानं यदधीतवान् ॥ (श्रीमद्भा० २।१।९) अर्थात् मेरा मन निर्गुण परब्रह्ममें परिनिष्ठित था, फिर भी उत्तमश्लोक भगवान्की लीलाने मेरे चित्तको खींच लिया। श्रीहरिके गुणोंसे आक्षिप्त-मति होकर भगवान् बादरायणिने श्रीमद्भागवतरूप महाख्यानका अध्ययन किया है— हरेर्गुणाक्षिप्तमतिर्भगवान् बादरायणिः। अध्यगान्महदाख्यानं नित्यं विष्णुजनप्रियः ॥ (श्रीमद्भा० १।७।११) लखी जिन लालकी मुसकान। तिनहिं बिसरी बेद बिधि सब योग संयम ज्ञान ॥ × × × आत्मारामारच मुनयो निर्ग्रन्था अप्युरुक्रमे। कुर्वन्त्यहैतुकीं भक्तिमित्थम्भूतगुणो हरिः ॥ (श्रीमद्भा० १।७।१०) भक्ति और वेदान्त फिर भी वेदान्तीगण इनके कुछ अंशोंमें विमति रखते ही हैं, उनकी दृष्टिमें जो निरतिशय परमानन्दरसात्मक वस्तु है, वही तो ब्रह्म है और उससे बढ़कर किसी फलकी कल्पना भी असम्भव है। अनन्तपदसमभिव्याहृत ब्रह्म पदका अर्थ ही निरतिशय बृहत् है। सर्वविधपरिच्छेद-शून्य ही निरतिशय बृहत् होता है। ऐसा होनेपर भी यदि सोपप्लव एवं अस्वप्रकाश हो तो वह निरतिशय बृहत्स्वरूप ब्रह्म पदार्थ होने योग्य नहीं है। अतः स्वप्रकाश परमानन्द रसात्मक ही उसे होना चाहिये। इस तरह अनन्त स्वप्रकाश परमानन्द ही ब्रह्म है। आतपकी अपेक्षा सूर्यमें जो अतिशयता है, वैसी अनन्त अतिशयताकी कल्पना करते-करते वाचस्पतिकी भी मति जहाँ परिश्रान्त हो जाय, वही वेदान्तियोंका ब्रह्म है। उसमें ही समस्त विश्व कल्पित है, उसीसे
ज्ञान और भक्ति ६७७ जीवादि विविध प्रकारका संसार उपस्थित होता है। उसके साक्षात्कारात्मक ज्ञानसे ही समस्त अनर्थोंकी निवृत्ति होती है। कर्मोपासनादि किसीसे भी उत्पन्न होनेवाला मोक्ष द्वैतात्म होनेसे एक संसार ही है। साथ ही उत्पाद्य, प्राप्य, संस्कार्य और विकार्य सभी कर्मफल जैसे अनित्य हैं, वैसे ही कर्मोपासनादि प्राप्य मोक्ष भी अनित्य ही होगा। निष्प्रपंच अद्वैत-सुखके लिये ही समस्त विश्वकी निद्रा या सुषुप्तिमें प्रवृत्ति होती है। जैसे निम्बके कीटको निम्बमें ही मिठास लगती है, उसे मिश्रीके मीठेपनपर हँसी आ सकती है, वैसे ही वादित्र, नृत्य, गीतादि द्वैतसुखमें रस लेनेवाले संसारियोंको अद्वैतसुखमें रस नहीं आता। फिर भी वह ऐसी वस्तु है कि चाहे उससे कोई अनभिज्ञतावश द्वेष ही करे, परंतु वह अपने स्वभावानुसार सबके प्रेमका आस्पद सबमें व्यक्त ही रहता है। आत्माके ज्ञान और उसकी महिमासे भले ही किसीको चिढ़ हो, परंतु आत्माका उत्कर्ष और बड़ाई सभी चाहते हैं। प्रेम भी उसमें सभीको करना पड़ता है। जब अपने सिद्धान्तमें, अपने हठमें, अपने देश, ग्राम, कुल, कुटुम्ब, क्षेत्र, वित्त, राज्यमें प्रेम होता है, तब क्या अपनेमें नहीं होगा? जब परमात्माकी ही मूर्तियोंमें-से अपनी इष्ट मूर्तिमें ही प्रेम होता है, अपने इष्टसे भिन्न परमात्माकी मूर्तिमें प्रेमाभाव ही नहीं, किंतु द्वेष होता है, तब क्या आत्मामें किसीको प्रेम नहीं होगा? शैव विष्णुमूर्तिसे द्वेष तथा वैष्णव शिव- मूर्तिसे द्वेष आत्मसम्बन्धाभावसे ही तो करते हैं। अपने इष्टमें तो सबको प्रेम होता ही है। साथ ही असहिष्णु भी अपनी बड़ाई—आत्ममहिमाको चाहता है, अपने सिद्धान्तकी बड़ाई चाहता है, इतना ही क्यों, 'अहं ब्रह्मास्मि' के सिद्धान्तका खण्डन करनेवाले ही अन्तमें स्वयं भगवान् बनने और रासलीला करनेका साहस करते हैं। उनके भक्त उन्हें प्रत्यक्ष अवतारी कहते हैं और वे सुन-सुनकर प्रसन्न होते हैं। कोई श्रीवृषभानु- नन्दिनीका अवतार तो कोई प्रिया-प्रियतम दोनोंका ही अवतार मानते और मनवाते हैं। यह सब स्वाभाविक आत्मप्रेमका ही विकृत रूप है। तभी तो भगवती श्रुतिने साफ कहा है कि सब कुछ आत्माके ही प्रेमका शेष है। देवतामें भी प्रेम आत्मार्थ ही होता है, आत्मकल्याणकारक आत्महितैषी देवतामें प्रेम और विपरीतमें द्वेष होता है। इसी तरह निम्न-से-निम्न कोटिके जीव और उच्च-से- उच्च कोटिके जीव सुषुप्तिमें अद्वैत निष्प्रपंच सुखका रस लेना चाहते हैं। किं बहुना उच्च-से-उच्च कोटिके ईश्वर भी योगनिद्रामें उसी निष्प्रपंच अद्वैत- सुखके अनुभवमें लवलीन होते हैं। दिव्यातिदिव्य वैषयिक सुख सामग्रियोंके उपस्थित रहनेपर भी योगनिद्राद्वारा निष्प्रपंच अद्वैत-सुखमें ही अधिकाधिक प्रवृत्ति होती है। प्राणी दिव्य कान्तादि स्पर्श-सुखसे विरत होकर सौषुप्त सुख चाहते हैं, फिर जब सावरण सौषुप्त अद्वैत सुखमें प्राणियोंकी ऐसी प्रीति होती है तो फिर निष्प्रपंच निरावरण अद्वैत ब्राह्म सुखकी महिमा कौन-कैसे कहे? अतएव अपरिच्छिन्न सुख वही है, जहाँ द्रष्टा, दर्शन, दृश्यकी समाप्ति है। वही भूमा सुख है। 'यत्र नान्यत्पश्यति नान्यच्छृणोति स भूमा, यो वै भूमा तत्सुखं, नाल्पे सुखमस्ति ।।' अर्थात् जहाँ अन्य अन्यको देखता-सुनता है, वहाँ अल्प ही सुख है। इस दृष्टिसे अनन्त, अखण्ड भूमा ब्रह्म ही परम सुख है, उससे अधिक सुखकी कल्पना सर्वथा अशास्त्रीय है। यह अनन्त अखण्ड भूमा ब्रह्म ही सगुण, साकार, सच्चिदानन्द ब्रह्म भी है। यही अपनी अचिन्त्य दिव्यलीलाशक्तिसे शिव, विष्णु, उमा, गणपति, भास्कररूपसे भी उपास्य होता है। जैसे विष्णुकी ही राम, कृष्ण, नृसिंह आदि रूपसे उपासना होती है, वैसे ही एक ही परमतत्त्वकी शिव, विष्णु आदि रूपसे उपासना होती है। 'व्यापक ब्रह्म निरंजन निर्गुन बिगत बिनोद।' (रा०च०मा० १।१९८)
६७८ भक्तिसुधा भक्ति और ज्ञानके उत्कर्ष तथा अपकर्षका चिन्तन व्यर्थ है परमतत्त्व ही अपनी अचिन्त्य दिव्य लीलाशक्तिसे सगुण, साकार, सच्चिदानन्दघनरूपमें व्यक्त होते हैं, उनके किसी रूपमें उत्कट उत्कण्ठा, प्रीति ही भक्ति है। भक्ति और ज्ञानके उत्कर्ष-अपकर्षका चिन्तन व्यर्थ है। भक्ति महारानीके ही शुभाशीर्वादसे विवेकरूपी नृपसे उपनिषदमें प्रबोध चन्द्रका उदय होता है। विवेकका मोहके साथ अनादि कालसे युद्ध चला आ रहा है। मोहके पक्षमें काम, क्रोध, अहंकार, लोभ, दम्भप्रभृति आदि अनेक भट हैं। विवेकके पक्षमें वैराग्य, विचार, शम, दम, क्षमा, दया, श्रद्धा, निवृत्ति आदि अनेक भट हैं। दलबल-सहित मोहपर विजय प्राप्त करके प्रबोधसहित परम पुरुष भगवान्का अंशभूत जीवात्मा कृतकृत्य होकर श्रीभक्तिमाताके चरणोंमें जाकर प्रणाम करता है। श्रीभक्ति भगवती उसे आशीर्वाद देती हैं और कहती हैं—'वत्स! मैं तो चिरकालसे इसी चिन्तामें थी कि किस तरह प्रबोधचन्द्रसहित विवेक विजयी होकर स्वभावतः शुद्ध-बुद्ध-मुक्त-स्वभाव परम पुरुषको स्व-स्वरूपस्थ करें। वह आज मेरा मनोरथ पूरा हुआ। वत्स! मैं आशीर्वाद देती हूँ।' जीवात्मा कृतकृत्य होकर कहता है—'अम्ब! आपके ही शुभानुसन्धानसे मैं कृतकृत्य हुआ हूँ। अब मैं यही चाहता हूँ कि आपके श्रीचरणोंमें मेरी सदा अटल श्रद्धा बनी रहे।' इस तरह प्रबुद्ध होकर भी जीवात्मा भक्तिदेवीका प्रेमी है, फिर भक्तिका उत्कर्ष जितना ही कहा जाय उतना ही कम है। श्रीमद्भागवतके माहात्म्यमें ज्ञान, वैराग्यको भक्ति महारानीका पुत्र कहा गया है और यह दिखाया गया है कि ये तीनों ही कलिके पाखण्डसे जर्जर एवं जीर्ण-शीर्ण हो गये थे। श्रीमद्वृन्दारण्यधामके संसर्गसे श्रीभक्तिदेवी तो नवीनस्वरूपा तरुणी हो गयीं, परंतु वहाँ ज्ञान, वैराग्यका कोई ग्राहक न था, अतः वे दोनों ज्यों-के- त्यों जीर्ण-शीर्ण क्षुत्क्षाम-शुष्क-कण्ठ होकर मूर्च्छितावस्थामें ही पड़े रहे। श्रीभक्तिदेवी स्वयं नवीना, सुरूपिणी तरुणी होकर भी अपने पुत्रोंकी दुर्दशा देखकर खिन्न होकर सोच रही थीं। उसका भाव यह था कि माताका जरठ होना उचित है, पुत्रका जरठत्व वार्धक्य अवश्य ही चिन्ताजनक है। कभी एक वृद्धा वैश्यानी स्त्री एक महात्मासे वरदान माँगने लगी—'महाराज! मैं तो यही माँगती हूँ कि मेरे बेटे, पोते मुझे कन्धेपर रखकर जला आयें।' महात्माने कहा कि 'जीते ही या मरनेपर?' सारांश यह कि कल्याणमयी, करुणामयी, पुत्रवत्सला अम्बा यही चाहती है कि 'मेरे सामने मेरे बेटे-पोते बने रहें, मरें नहीं, किंतु मैं ही उनके सामने मर जाऊँ।' बेटे-पोतेकी बीमारीको माँ अपने ऊपर बुलाती है। ठीक इसी तरह भक्ति माताको भी अपने पुत्र ज्ञान, वैराग्यकी वृद्धिमें ही शान्ति-संतोष होता है। वह उनका अनिष्ट नहीं देख सकती, उनके सामने अपना निधन चाहती है। माता पहले तो पुत्र बिना अपनेको वन्ध्या समझती है, अपना जीवन व्यर्थ समझती है, पुत्र-जन्मके लिये तरह-तरहके देवी- देवताओंको मनाती है। पुत्रके गर्भमें आते ही हर्षके मारे फूली नहीं समाती, गर्भस्थ बालकके हस्त, पादादि उत्क्षेपणसे कष्ट होनेपर भी उसे अपराध नहीं मानती, अब पुत्र बड़ा हो गया यह समझकर प्रसन्न होती है। पुत्रकी उत्पत्तिमें प्राणान्त कष्ट सहनकर भी आनन्दमें विभोर रहती है। स्वयं गीलेमें रहकर बालकको सूखेमें रखती है। मल, मूत्रादि अपने ऊपर लेती है। माँका हृदय कितना उदार होता है, वह पुत्रके लिये क्या-क्या नहीं करती है? ठीक इसी तरह ज्ञान-वैराग्यरूप पुत्रोत्पत्तिके बिना भक्ति अपनेको वन्ध्या मानती है और उसकी उत्पत्तिके लिये लालायित रहकर देवी-देवता मनाती है। फिर लालन-पालनकर बड़ा करती है, उनकी जीर्णता-शीर्णतामें वह फिर चिन्तित और खिन्न होती है। उनकी मूर्च्छा और जीर्णता-शीर्णता मिटानेके लिये फिर महात्माओंकी शरण जाकर उपाय चाहती है।
ज्ञान और भक्ति ६७९ श्रीभक्तिदेवीके इतने प्रिय पुत्र ज्ञान, वैराग्यके अपकर्षकी चिन्ता ही क्यों, जब श्रीभक्ति उनके बिना अपनेको वन्ध्या और उनके जन्म, समृद्धि, उन्नतिमें ही अपनेको सौभाग्यवती मानती है। माता बिना पुत्रके नहीं सोहती, पुत्र माताके अमरपुर पधारनेपर भी रह सकता है। तत्त्वज्ञान, वैराग्यसे भक्तको घृणा होना और उनका अपकर्ष सिद्ध करनेका प्रयत्न करना कहाँतक संगत है? साथ ही पुत्रका माताके प्रति क्या कर्तव्य है, यह भी सोचनेकी बात है। शास्त्रोंने पुत्रके लिये माता- पिताहीको परम दैवत कहा है। साक्षात् उमा- महेश्वररूपसे माता-पिताकी आराधना करनी चाहिये— 'मातृदेवो भव, पितृदेवो भव।' पिताकी अपेक्षा भी माताकी महिमा दशगुना अधिक है— 'पितुर्दशगुणा माता गौरवेणातिरिच्यते।' ऐसी स्थितिमें पुत्र कितनी भी उन्नतिको क्यों न प्राप्त कर ले, कितना अधिक पूज्य क्यों न हो तथापि उसमें मातृभक्तिका सदा ही रहना अनिवार्य होगा। ऐसा न होनेपर वह कृतघ्न समझा जाता है और उसका उद्धार होना असम्भव हो जाता है। अतः ज्ञान-वैराग्य उच्चतम होकर तथा परम पूज्यतम होकर भी अपनी अम्बा श्रीभक्ति महारानीके चरणोंमें अवश्य ही पूर्ण श्रद्धा-भक्ति रखेंगे। ऐसी स्थितिमें यदि कोई भी ज्ञानी या वैराग्यवान् श्रीभक्तिको नगण्य या निकृष्ट समझकर अनादर करे तो वह ज्ञानी नहीं, ठीक अज्ञानी और कृतघ्न ही है। इसीलिये वेदान्ताचार्यप्रवर भगवान् शंकरने कहा है— 'यावज्जीवं त्रयो वन्द्या वेदान्तो गुरूरीश्वरः। आदौ विद्याप्रसिद्ध्यर्थं कृतघ्नत्वापनुत्तये॥' वेदान्त, गुरु और श्रीहरि—इनका यावज्जीवन सदा ही वन्दन करना चाहिये, पहले विद्याप्राप्तिके लिये, पश्चात् कृतज्ञता प्रकटकर कृतघ्नता दूर करनेके लिये। इसीलिये शास्त्रोंमें कहीं भी भक्ति या ज्ञान किसीकी निन्दा नहीं है। भक्ति बिना ज्ञानकी उत्पत्ति ही असम्भव है, इसीलिये 'भक्त्या मामभिजानाति' इत्यादि उक्तियाँ हैं। भक्तिके बिना अन्तरात्माकी शुद्धि नहीं होती, दृढ़ ज्ञानका आविर्भाव नहीं होता, अतः भक्ति बिना ही जो विमुक्त-मानी हैं, वे ज्ञानी ही नहीं हैं। वे ही परिश्रमोंसे सत्कुलजन्म, विद्या, त्याग आदि उच्च पदपर आरूढ़ होकर भी कामादि दोषोंसे भ्रष्ट हो जाते हैं। उन्हींके लिये—'येऽन्येऽरविन्दाक्ष विमुक्तमानिनः' (श्रीमद्भा० १०।२।३२) इत्यादि उक्तियाँ हैं। यहाँ 'पर' पदका अर्थ ब्रह्मपदकी प्राप्ति, उसका अपरोक्ष एवं साक्षात्कार नहीं कहा गया है, क्योंकि ब्रह्मपद पानेके बाद पुनः पतन नहीं होता— 'न स पुनरावर्तते, न स पुनरावर्तते'। निराकार निर्विकार ब्रह्मका अपरोक्ष साक्षात्कार होनेपर पुनः कर्मोंका प्ररोहण भी अत्यन्त श्रुति-विरुद्ध है। अतः वह भी अमान्य ही है। 'ज्ञानाग्निदग्धकर्माणम्' इत्यादि वचनोंका तात्पर्य भगवान्के अनुगमनकी प्रशंसामें ही है। 'अपि' शब्दसे भी यही भाव निकलता है। भगवान्को रथयात्रा करते देखकर उनका अनुगमन न करना महा अपराध है। अतः अवश्य ही अनुगमन करना चाहिये। औरकी तो कथा ही क्या, ज्ञानाग्नि- दग्धकर्माको भी उसका दण्ड मिलता है। 'न हि निन्दा निन्द्यं निन्दितुं प्रवर्तते अपितु विधेयं स्तोतुमिति न्यायात्' निन्दाका तात्पर्य निन्द्यकी निन्दामें नहीं, अपितु किसी विधेयकी स्तुतिमें ही है। ऐसे ही 'ज्ञाने प्रयासमुदपास्य' (श्रीमद्भा० १०।१४।३) इत्यादि श्लोकसे ज्ञानप्रयास-त्यागका भी तात्पर्य यही है कि भगवच्चरित्र-श्रवणादि-लक्षण भगवद्भक्तिसहित ही ज्ञानप्रयास सफल होता है। विशेषतः वहाँ ज्ञानसे शास्त्रीय परोक्ष ज्ञान ही विवक्षित है, अर्थात् प्राणीको केवल शास्त्रीय परोक्ष ज्ञानमें इतना प्रयास न करना चाहिये कि जिससे श्रुतिगता भगवदीयवार्ताका आदर छूट जाय। कारण भगवद्भक्ति बिना भ्रमनिवर्तक ब्रह्मापरोक्षसाक्षात्कार नहीं हो सकेगा। श्रेयःस्रुतिं भक्तिमुदस्य ते विभो क्लिश्यन्ति ये केवलबोधलब्धये।
६८० भक्तिसुधा
तेषामसौ क्लेशल एव शिष्यते नान्यद् यथा स्थूलतुषावघातिनाम्॥ सर्वविध कल्याणोंका प्रसव करनेवाली किंवा सर्व प्रकारके श्रेयोंकी निर्झरिणी श्रीभक्ति महारानीको छोड़कर जो केवल शास्त्रीय बोध प्राप्त करनेके लिये क्लेश उठाते हैं, उनको सिवा क्लेशके और कुछ नहीं बचता। जैसे स्थूल धानकी भूसीका अवहनन (कुट्टन) करनेवालेको सिवा परिश्रमके और कुछ भी हाथ नहीं लगता। अतः भक्तिसहित ही ज्ञानप्रयास आदिकी सफलता हो सकती है। इसी तरहके और भी बहुत-से वचन मिलते हैं। भक्तिके बिना यज्ञ, वेद, तप आदिको निष्फल बताया गया है— नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया। शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा॥ (गीता ११।५३) मैं वेद, तप, यज्ञ, दान तथा इज्यासे इस तरह नहीं देखा जा सकता हूँ, अर्जुन! जैसा तुमने मुझे देखा। भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन। ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप॥ (गीता ११।५४) हाँ, अनन्यभक्तिसे तो प्राणी मेरे इस प्रकारके स्वरूपको जान तथा देख सकता है, देखकर मुझमें प्रविष्ट भी हो सकता है। यहाँ सर्वत्र ही यही अर्थ करना उचित है कि भक्तिके बिना केवल वेद, यज्ञ, दानादिसे भगवान्की प्राप्ति नहीं हो सकती। अन्यथा वेद, यज्ञ, दानादिका भगवत्प्राप्तिमें उपयोग ही नहीं सिद्ध होगा, परंतु 'वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यः', (गीता १५।१५) 'यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्॥' (गीता १८।५) इत्यादि वचनोंसे यह स्पष्ट सिद्ध है कि भगवान्की प्राप्तिमें वेद, यज्ञ, तप, दानादि सबका पूर्ण उपयोग है। यही स्थिति 'नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन।' (कण्ठ० १।२।२३) इत्यादि श्रुतियोंकी भी है। कारण—'श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासि- तव्यः।' (बृहदा० २।४।५) 'ऋतं च स्वाध्याय- प्रवचने च।' (तैत्तिरीय० १।९) 'स्वाध्यायप्रवचना- भ्यां न प्रमदितव्यम्।' (तैत्तिरीय० १।११) इत्यादि स्थलोंमें श्रवणादिको ब्रह्मसाक्षात्कारका साधन कहा गया है, अतः भगवद्भक्ति या वरण बिना केवल श्रवणादिसे ब्रह्मका अपरोक्ष साक्षात्कार नहीं होता। इस सम्बन्धमें एक दोहेकी संगति बड़ी सुन्दर बैठती है—'रामनाम इक अंक है सब साधन हैं सून। अंक बिना कछु हाथ नहिं अंक रहे दश गून।' अर्थात् भगवान्का नाम तो एक आदि अंकके समान है और समस्त साधन शून्यके समान हैं। अंकके बिना शून्योंका कुछ भी मूल्य नहीं, परंतु अंक रहनेपर तो शून्योंका दसगुना मूल्य बढ़ जाता है। यहाँ ध्यान देनेकी बात है कि शून्य भी व्यर्थ और अनादरणीय नहीं है। किसी दस्तावेजमें एक अंकके अनन्तर दस शून्य हों और दसों शून्योंको मिटाकर केवल एक अंक ही रख लिया जाय तब कितना भेद होता है? इसी तरह भगवन्नामके बिना साधन शून्यके समान निःसार हैं, परंतु उसके रहनेपर तो उन शून्यात्मक साधनोंका बहुत मूल्य बढ़ जाता है। यही गति— नहिं कलि करम न भगति बिबेकू। राम नाम अवलंबन एकू॥ (रा०च०मा० १।२७।७) हरेर्नामैव नामैव नामैव मम जीवनम्। कलौ नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव गतिरन्यथा॥ —इत्यादि वचनोंकी है। भगवन्नाम और भक्ति बिना कोई भी साधन फलवान् नहीं होते। बिना माताके यदि पुत्रका होना असम्भव है तो बिना भक्तिके ज्ञानका होना कैसे सम्भव है? अतः भक्ति छोड़कर ज्ञानका प्रयास वैसे ही व्यर्थ है, जैसे कामधेनु छोड़कर दूधके लिये आकको ढूँढ़ना। यदि सच्चे दूधकी अपेक्षा है तो कामधेनुका सेवन ही युक्त है। इसी तरह यदि सच्चे ज्ञानकी अपेक्षा है तो भक्ति महारानीका सेवन युक्त ही है। यही 'ते जड़ कामधेनु गृहँ त्यागी। खोजत आकु फिरहिं पय लागी॥' (रा०च०मा० ७।११५।२) इत्यादि वाक्योंका भावार्थ है।