भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंज्ञान और भक्ति ६७९ श्रीभक्तिदेवीके इतने प्रिय पुत्र ज्ञान, वैराग्यके अपकर्षकी चिन्ता ही क्यों, जब श्रीभक्ति उनके बिना अपनेको वन्ध्या और उनके जन्म, समृद्धि, उन्नतिमें ही अपनेको सौभाग्यवती मानती है। माता बिना पुत्रके नहीं सोहती, पुत्र माताके अमरपुर पधारनेपर भी रह सकता है। तत्त्वज्ञान, वैराग्यसे भक्तको घृणा होना और उनका अपकर्ष सिद्ध करनेका प्रयत्न करना कहाँतक संगत है? साथ ही पुत्रका माताके प्रति क्या कर्तव्य है, यह भी सोचनेकी बात है। शास्त्रोंने पुत्रके लिये माता- पिताहीको परम दैवत कहा है। साक्षात् उमा- महेश्वररूपसे माता-पिताकी आराधना करनी चाहिये— 'मातृदेवो भव, पितृदेवो भव।' पिताकी अपेक्षा भी माताकी महिमा दशगुना अधिक है— 'पितुर्दशगुणा माता गौरवेणातिरिच्यते।' ऐसी स्थितिमें पुत्र कितनी भी उन्नतिको क्यों न प्राप्त कर ले, कितना अधिक पूज्य क्यों न हो तथापि उसमें मातृभक्तिका सदा ही रहना अनिवार्य होगा। ऐसा न होनेपर वह कृतघ्न समझा जाता है और उसका उद्धार होना असम्भव हो जाता है। अतः ज्ञान-वैराग्य उच्चतम होकर तथा परम पूज्यतम होकर भी अपनी अम्बा श्रीभक्ति महारानीके चरणोंमें अवश्य ही पूर्ण श्रद्धा-भक्ति रखेंगे। ऐसी स्थितिमें यदि कोई भी ज्ञानी या वैराग्यवान् श्रीभक्तिको नगण्य या निकृष्ट समझकर अनादर करे तो वह ज्ञानी नहीं, ठीक अज्ञानी और कृतघ्न ही है। इसीलिये वेदान्ताचार्यप्रवर भगवान् शंकरने कहा है— 'यावज्जीवं त्रयो वन्द्या वेदान्तो गुरूरीश्वरः। आदौ विद्याप्रसिद्ध्यर्थं कृतघ्नत्वापनुत्तये॥' वेदान्त, गुरु और श्रीहरि—इनका यावज्जीवन सदा ही वन्दन करना चाहिये, पहले विद्याप्राप्तिके लिये, पश्चात् कृतज्ञता प्रकटकर कृतघ्नता दूर करनेके लिये। इसीलिये शास्त्रोंमें कहीं भी भक्ति या ज्ञान किसीकी निन्दा नहीं है। भक्ति बिना ज्ञानकी उत्पत्ति ही असम्भव है, इसीलिये 'भक्त्या मामभिजानाति' इत्यादि उक्तियाँ हैं। भक्तिके बिना अन्तरात्माकी शुद्धि नहीं होती, दृढ़ ज्ञानका आविर्भाव नहीं होता, अतः भक्ति बिना ही जो विमुक्त-मानी हैं, वे ज्ञानी ही नहीं हैं। वे ही परिश्रमोंसे सत्कुलजन्म, विद्या, त्याग आदि उच्च पदपर आरूढ़ होकर भी कामादि दोषोंसे भ्रष्ट हो जाते हैं। उन्हींके लिये—'येऽन्येऽरविन्दाक्ष विमुक्तमानिनः' (श्रीमद्भा० १०।२।३२) इत्यादि उक्तियाँ हैं। यहाँ 'पर' पदका अर्थ ब्रह्मपदकी प्राप्ति, उसका अपरोक्ष एवं साक्षात्कार नहीं कहा गया है, क्योंकि ब्रह्मपद पानेके बाद पुनः पतन नहीं होता— 'न स पुनरावर्तते, न स पुनरावर्तते'। निराकार निर्विकार ब्रह्मका अपरोक्ष साक्षात्कार होनेपर पुनः कर्मोंका प्ररोहण भी अत्यन्त श्रुति-विरुद्ध है। अतः वह भी अमान्य ही है। 'ज्ञानाग्निदग्धकर्माणम्' इत्यादि वचनोंका तात्पर्य भगवान्के अनुगमनकी प्रशंसामें ही है। 'अपि' शब्दसे भी यही भाव निकलता है। भगवान्को रथयात्रा करते देखकर उनका अनुगमन न करना महा अपराध है। अतः अवश्य ही अनुगमन करना चाहिये। औरकी तो कथा ही क्या, ज्ञानाग्नि- दग्धकर्माको भी उसका दण्ड मिलता है। 'न हि निन्दा निन्द्यं निन्दितुं प्रवर्तते अपितु विधेयं स्तोतुमिति न्यायात्' निन्दाका तात्पर्य निन्द्यकी निन्दामें नहीं, अपितु किसी विधेयकी स्तुतिमें ही है। ऐसे ही 'ज्ञाने प्रयासमुदपास्य' (श्रीमद्भा० १०।१४।३) इत्यादि श्लोकसे ज्ञानप्रयास-त्यागका भी तात्पर्य यही है कि भगवच्चरित्र-श्रवणादि-लक्षण भगवद्भक्तिसहित ही ज्ञानप्रयास सफल होता है। विशेषतः वहाँ ज्ञानसे शास्त्रीय परोक्ष ज्ञान ही विवक्षित है, अर्थात् प्राणीको केवल शास्त्रीय परोक्ष ज्ञानमें इतना प्रयास न करना चाहिये कि जिससे श्रुतिगता भगवदीयवार्ताका आदर छूट जाय। कारण भगवद्भक्ति बिना भ्रमनिवर्तक ब्रह्मापरोक्षसाक्षात्कार नहीं हो सकेगा। श्रेयःस्रुतिं भक्तिमुदस्य ते विभो क्लिश्यन्ति ये केवलबोधलब्धये।