भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६८० भक्तिसुधा
तेषामसौ क्लेशल एव शिष्यते नान्यद् यथा स्थूलतुषावघातिनाम्॥ सर्वविध कल्याणोंका प्रसव करनेवाली किंवा सर्व प्रकारके श्रेयोंकी निर्झरिणी श्रीभक्ति महारानीको छोड़कर जो केवल शास्त्रीय बोध प्राप्त करनेके लिये क्लेश उठाते हैं, उनको सिवा क्लेशके और कुछ नहीं बचता। जैसे स्थूल धानकी भूसीका अवहनन (कुट्टन) करनेवालेको सिवा परिश्रमके और कुछ भी हाथ नहीं लगता। अतः भक्तिसहित ही ज्ञानप्रयास आदिकी सफलता हो सकती है। इसी तरहके और भी बहुत-से वचन मिलते हैं। भक्तिके बिना यज्ञ, वेद, तप आदिको निष्फल बताया गया है— नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया। शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा॥ (गीता ११।५३) मैं वेद, तप, यज्ञ, दान तथा इज्यासे इस तरह नहीं देखा जा सकता हूँ, अर्जुन! जैसा तुमने मुझे देखा। भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन। ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप॥ (गीता ११।५४) हाँ, अनन्यभक्तिसे तो प्राणी मेरे इस प्रकारके स्वरूपको जान तथा देख सकता है, देखकर मुझमें प्रविष्ट भी हो सकता है। यहाँ सर्वत्र ही यही अर्थ करना उचित है कि भक्तिके बिना केवल वेद, यज्ञ, दानादिसे भगवान्की प्राप्ति नहीं हो सकती। अन्यथा वेद, यज्ञ, दानादिका भगवत्प्राप्तिमें उपयोग ही नहीं सिद्ध होगा, परंतु 'वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यः', (गीता १५।१५) 'यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्॥' (गीता १८।५) इत्यादि वचनोंसे यह स्पष्ट सिद्ध है कि भगवान्की प्राप्तिमें वेद, यज्ञ, तप, दानादि सबका पूर्ण उपयोग है। यही स्थिति 'नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन।' (कण्ठ० १।२।२३) इत्यादि श्रुतियोंकी भी है। कारण—'श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासि- तव्यः।' (बृहदा० २।४।५) 'ऋतं च स्वाध्याय- प्रवचने च।' (तैत्तिरीय० १।९) 'स्वाध्यायप्रवचना- भ्यां न प्रमदितव्यम्।' (तैत्तिरीय० १।११) इत्यादि स्थलोंमें श्रवणादिको ब्रह्मसाक्षात्कारका साधन कहा गया है, अतः भगवद्भक्ति या वरण बिना केवल श्रवणादिसे ब्रह्मका अपरोक्ष साक्षात्कार नहीं होता। इस सम्बन्धमें एक दोहेकी संगति बड़ी सुन्दर बैठती है—'रामनाम इक अंक है सब साधन हैं सून। अंक बिना कछु हाथ नहिं अंक रहे दश गून।' अर्थात् भगवान्का नाम तो एक आदि अंकके समान है और समस्त साधन शून्यके समान हैं। अंकके बिना शून्योंका कुछ भी मूल्य नहीं, परंतु अंक रहनेपर तो शून्योंका दसगुना मूल्य बढ़ जाता है। यहाँ ध्यान देनेकी बात है कि शून्य भी व्यर्थ और अनादरणीय नहीं है। किसी दस्तावेजमें एक अंकके अनन्तर दस शून्य हों और दसों शून्योंको मिटाकर केवल एक अंक ही रख लिया जाय तब कितना भेद होता है? इसी तरह भगवन्नामके बिना साधन शून्यके समान निःसार हैं, परंतु उसके रहनेपर तो उन शून्यात्मक साधनोंका बहुत मूल्य बढ़ जाता है। यही गति— नहिं कलि करम न भगति बिबेकू। राम नाम अवलंबन एकू॥ (रा०च०मा० १।२७।७) हरेर्नामैव नामैव नामैव मम जीवनम्। कलौ नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव गतिरन्यथा॥ —इत्यादि वचनोंकी है। भगवन्नाम और भक्ति बिना कोई भी साधन फलवान् नहीं होते। बिना माताके यदि पुत्रका होना असम्भव है तो बिना भक्तिके ज्ञानका होना कैसे सम्भव है? अतः भक्ति छोड़कर ज्ञानका प्रयास वैसे ही व्यर्थ है, जैसे कामधेनु छोड़कर दूधके लिये आकको ढूँढ़ना। यदि सच्चे दूधकी अपेक्षा है तो कामधेनुका सेवन ही युक्त है। इसी तरह यदि सच्चे ज्ञानकी अपेक्षा है तो भक्ति महारानीका सेवन युक्त ही है। यही 'ते जड़ कामधेनु गृहँ त्यागी। खोजत आकु फिरहिं पय लागी॥' (रा०च०मा० ७।११५।२) इत्यादि वाक्योंका भावार्थ है।