भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंज्ञान और भक्ति
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इन वचनोंमें अन्य साधनोंका या ज्ञानका अनादर कथमपि नहीं किया गया है। अन्यथा शास्त्रोक्त विधि-निषेधोंका उल्लंघन करनेसे नामापराध दोष अनिवार्य हो जायगा। इसीलिये गोस्वामीजीने भी 'चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती' (रा०च०मा० ७।२१।२) और 'बरनाश्रम निज निज धरम निरत बेद पथ लोग ॥' इत्यादि वचनोंसे वेद और वेदोक्त कर्मोंका खूब सम्मान किया है। कल्प कल्प भरि एक एक नरका। परहिं जे दूषहिं श्रुति करि तरका॥ (रा०च०मा० ७।१००।४)
भक्तिसे ज्ञानद्वारा परम तत्त्वकी प्राप्ति
श्रीमद्भागवतादि सद्ग्रन्थोंमें भक्तिसे ज्ञानद्वारा ही परमतत्त्वकी प्राप्ति कही गयी है— एवं विशुद्धमनसो भगवद्भक्तियोगतः। भगवत्तत्त्वविज्ञानं मुक्तसङ्गस्य जायते॥ भगवद्भक्तियोगसे विशुद्धमनस्क निःसंग प्राणीको भगवत्तत्त्वका ज्ञान होता है। पुरेह भूमन् बहवोऽपि योगिन- स्त्वदर्पितेहा निजकर्मलब्धया। विबुध्य भक्त्यैव कथोपनीतया प्रपेदिरेऽञ्जोऽच्युत ते गतिं पराम् ॥ (श्रीमद्भा० १०।१४।५) अर्थात् हे भूमन् ! बहुत-से योगी आपके चरणोंमें निज कर्मोंको समर्पित करके विशुद्धान्तःकरण तथा विरक्त होकर आपकी कथा-श्रवणद्वारा प्राप्त भक्तिसे आपको जानकर प्राप्त कर लेते हैं। भगवत्कथा- श्रवणादि भागवतधर्मोंका सेवन करते-करते भक्ति, विरति, भगवत्प्रबोध प्राप्त करके आपको पा लेते हैं। 'भक्त्या मामभिजानाति' (गीता १८।५५) स्पष्ट ही है। भगवत्प्रेमसे ही भगवत्कृपा प्राप्त होती है और उनकी कृपासे ही प्राणी उन्हें जान सकता है। 'यमेवैष वृणुते तेन लभ्यः।' (मुण्डक० ३।२।३) सोइ जानइ जेहि देहु जनाई। जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई॥ तुम्हरिहि कृपाँ तुम्हहि रघुनंदन। जानहिं भगत भगत उर चंदन॥ (रा०च०मा० २।१२७।३-४)
इस तरह भगवद्भक्तिसे भगवत्कृपा और भगवान्का ज्ञान होता है। ज्ञानसे फिर भगवान्के सहजसिद्ध परमप्रेमका प्रकट होना स्वाभाविक ही है। भक्तिको कौन कहे, भगवान्के साक्षात्कारमें ही संसारबन्ध मिट जाता है। इस तरहसे भक्तिपक्षसे भी ज्ञानपक्षमें भगवान्की महिमा अधिक समझमें आती है। सोइ जानइ जेहि देहु जनाई। जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई॥ तुम्हरिहि कृपाँ तुम्हहिं रघुनंदन। जानहिं भगत भगत उर चंदन॥ हाँ, यह बात दूसरी है कि कोई भगवत्तत्त्वके ज्ञानकी भावनासे भगवान्की भक्ति करता है, कोई प्रेमसे ही भगवान्की भक्ति करता है। परंतु भगवत्तत्त्व ज्ञानरूप फल दोनोंको ही उसी तरह प्राप्त होता है, जैसे कोई पुण्यप्राप्त्यर्थ गंगा-स्नान करता है, उसे पुण्य तो प्राप्त होता ही है, परंतु तापादि-निवृत्ति भी आनुषंगिकी हो जाती है। कोई तापनिवृत्तिके लिये गंगा-स्नान करता है, पुण्यप्राप्ति उसे भी आनुषंगिकरूपसे होती है। इसी तरह कोई ज्ञानप्राप्तिद्वारा पाप-ताप मिटानेके लिये भक्तिगंगामें स्नान करता है, उसे भी भगवत्प्रेमानन्दका लोकोत्तर सुख मिलता है और जो भगवत्प्रेमानन्दके लिये ही भक्ति करते हैं, उन्हें भी ज्ञानप्राप्ति और पाप-ताप निवृत्ति एवं तन्मूलभूत ज्ञान प्राप्त होता है। इस तरह भक्तको ज्ञानप्राप्ति और मोक्ष अवश्य होता है। परंतु बिना ज्ञानके यदि किसी भी साधनसे मोक्ष मान लिया जाय तो बन्धकी सत्यता और मोक्षकी कृत्रिमता तथा अनित्यता अपरिहार्य हो जायगी, इसीलिये कर्मयोग या भक्तियोगसे ज्ञानप्राप्तिके बिना मोक्षका होना अत्यन्त अशास्त्रीय है। हाँ, जो मोक्ष चाहते ही नहीं, केवल प्रेम चाहते हैं, उनकी स्थिति दूसरी है। ताते उमा मोच्छ नहिं पायो। दसरथ भेद भगति मन लायो॥ सगुनोपासक मोच्छ न लेहीं। तिन्ह कहुँ राम भगति निज देहीं॥ (रा०च०मा० ६।११२।६-७) निर्गुण, निराकार, निर्विकार परब्रह्मकी उपासनामें बड़ी कठिनाई है, परंतु भगवान्का भक्त तो भगवान्के दिव्य चरणकमलका अवलम्बन करके अनायास ही