भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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भवसागरको तर जाता है। इतना ही क्यों, फिर तो उसे भवसागर और उसका पार समान ही हो जाता है। भगवान्‌के श्रीचरण और उनकी मंगलमयी शक्तिकी महिमासे स्वर्ग, अपवर्ग, दिशाएँ-विदिशाएँ सब मंगलमय हो जाती हैं। उसकी छोड़ने और ग्रहण करनेकी भावना ही मिट जाती है। किसीकी क्षीरसागरको पार करनेकी रुचि होती है। यदि उसे तैरकर पार करना हो, तब फिर कठिनाईका ठिकाना ही क्या ? परंतु यदि उसे पार करनेके लिये दिव्य उपभोग-सामग्रीसम्पन्न सर्वांगसुन्दर नाव प्राप्त हो जाय और उसके संचालक अपने प्रियतम प्राणधन भगवान् हों, तब समुद्र पार करनेमें क्या कठिनाई है? आनन्दसे सर्वसुखका सम्भोग करते हुए और दिव्य शब्द, दिव्य स्पर्श, दिव्य गन्ध, दिव्य रसका आस्वादन करते हुए अर्थात् अपने प्रियतमके श्रीअंगके सौगन्ध-सुस्पर्शका अनुभव करते हुए प्रियतमके अमृतमय मुखचन्द्रका सौन्दर्य-माधुर्य सौरस्य सुधाका आस्वादन करते हुए प्रेमी विभोर हो जाता है। उसे भवसागर और उसके पारमें कुछ भी विशेषता नहीं रह जाती। भवसागरके पार जाकर भगवान्‌के जिन दिव्य माधुर्यादिकोंका अनुभव करता है, उनका अनुभव भवसागरमें ही होने लगता है। भवसागरके पाप-तापोंका उसे स्पर्शतक नहीं होता है। इसीलिये कहा जाता है कि भगवन्नामसे भवसागर सूख जाता है। इसीलिये भक्त वैकुण्ठ, कैलासादि पद पाकर भी लोक-कल्याणार्थ पुनः लौट आते हैं और जीवोंको उसी भक्तिरूपी दिव्य नावपर बिठाकर पार उतारते हैं। सगुणोपासना और निर्गुणोपासनाका तारतम्य यह कथन बहुत अंशोंमें ठीक है, परंतु यहाँ भी सगुणोपासना और निर्गुणोपासनाका ही तारतम्य कहा जा सकता है, ज्ञान और सगुणोपासनाका नहीं। गीताके बारहवें अध्यायमें अर्जुनने प्रश्न किया है कि 'जो आपके विश्वरूप या किसी भी सगुण साकार सच्चिदानन्दस्वरूपमें मन लगाकर आपकी उपासना करते हैं और जो अक्षर अव्यक्त स्वरूपकी उपासना करते हैं, उनमें कौन अतिशयेन योगवित् अर्थात् ब्रह्म- प्राप्तिके उपायज्ञ हैं'—'एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते। ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योग- वित्तमाः ॥' (गीता १२।१) श्रीभगवान्‌ने कहा कि 'जो मुझ सगुण साकार सच्चिदानन्दस्वरूपमें मनको सम्यक् आविष्ट करके नित्ययुक्त हो, परमश्रद्धासे मेरी उपासना करते हैं, वे मेरी दृष्टिमें अतिशयेन युक्त हैं। जो इन्द्रियग्रामका संयम करके अनिर्देश्य अक्षर, अव्यक्त-सर्वव्यापी-अचिन्त्य-कूटस्थ-अचल ब्रह्म- स्वरूपकी उपासना करते हैं, वे—'सर्वभूतहिते रताः' (गीता ५।२५; १२।४) महानुभाव मुझे ही प्राप्त होते हैं। फिर भी उनके (निर्गुणोपासकोंके) लिये क्लेश (कठिनाई) अधिकतर है; क्योंकि देहवानों (देहाभिमानियों)-के लिये अव्यक्तगति दुःखसे प्राप्त होती है।' यहाँ यह समझ लेना चाहिये कि देहवान्‌का अर्थ देहाभिमानी ही है, अन्यथा देहवान् पदका प्रयोग ही व्यर्थ होगा; क्योंकि जितनी भी उपासनाएँ हैं, वे सभी देहवान्‌के लिये होती हैं। जो अदेह है, उसके लिये तो उपासनाकी अपेक्षा और सम्भावना ही नहीं है। यह भी नहीं कहा जा सकता कि निर्गुणोपासना किसीके लिये सम्भव नहीं, क्योंकि ऐसी स्थितिमें उसका विधान ही व्यर्थ हो जाता है। अशक्यका उपदेश करनेवाले शास्त्रोंका शास्त्रत्व भी सन्देहमें पड़ जाता है। अतः यही अर्थ उचित है कि 'देहोऽस्त्यत्वेनास्येति देहवान्' अर्थात् देहात्माभिमानी ही देहवान् यह विवक्षित है। सर्वथापि यहाँ निर्गुणोपासना और सगुणोपासनाके उत्कर्षापकर्षका प्रश्न है और यहाँ सगुणोपासनाका उत्कर्ष है यही उत्तर है। यहाँ तत्त्वज्ञोंका कहना है कि अर्जुनके प्रश्नका उत्तर विकल्पपुरस्सर किया गया है। अर्थात् सरलताके अभिप्रायसे उत्कर्षापकर्षका प्रश्न है कि फलोत्कर्षके अभिप्रायसे उत्कर्षापकर्षका प्रश्न है ? पहले पक्षके अनुसार यह उत्तर है कि सगुणोपासना सरल होनेसे