भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

पृष्ठ 688, कुल 778 में से

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पृष्ठ 688

६७८ भक्तिसुधा भक्ति और ज्ञानके उत्कर्ष तथा अपकर्षका चिन्तन व्यर्थ है परमतत्त्व ही अपनी अचिन्त्य दिव्य लीलाशक्तिसे सगुण, साकार, सच्चिदानन्दघनरूपमें व्यक्त होते हैं, उनके किसी रूपमें उत्कट उत्कण्ठा, प्रीति ही भक्ति है। भक्ति और ज्ञानके उत्कर्ष-अपकर्षका चिन्तन व्यर्थ है। भक्ति महारानीके ही शुभाशीर्वादसे विवेकरूपी नृपसे उपनिषदमें प्रबोध चन्द्रका उदय होता है। विवेकका मोहके साथ अनादि कालसे युद्ध चला आ रहा है। मोहके पक्षमें काम, क्रोध, अहंकार, लोभ, दम्भप्रभृति आदि अनेक भट हैं। विवेकके पक्षमें वैराग्य, विचार, शम, दम, क्षमा, दया, श्रद्धा, निवृत्ति आदि अनेक भट हैं। दलबल-सहित मोहपर विजय प्राप्त करके प्रबोधसहित परम पुरुष भगवान्‌का अंशभूत जीवात्मा कृतकृत्य होकर श्रीभक्तिमाताके चरणोंमें जाकर प्रणाम करता है। श्रीभक्ति भगवती उसे आशीर्वाद देती हैं और कहती हैं—'वत्स! मैं तो चिरकालसे इसी चिन्तामें थी कि किस तरह प्रबोधचन्द्रसहित विवेक विजयी होकर स्वभावतः शुद्ध-बुद्ध-मुक्त-स्वभाव परम पुरुषको स्व-स्वरूपस्थ करें। वह आज मेरा मनोरथ पूरा हुआ। वत्स! मैं आशीर्वाद देती हूँ।' जीवात्मा कृतकृत्य होकर कहता है—'अम्ब! आपके ही शुभानुसन्धानसे मैं कृतकृत्य हुआ हूँ। अब मैं यही चाहता हूँ कि आपके श्रीचरणोंमें मेरी सदा अटल श्रद्धा बनी रहे।' इस तरह प्रबुद्ध होकर भी जीवात्मा भक्तिदेवीका प्रेमी है, फिर भक्तिका उत्कर्ष जितना ही कहा जाय उतना ही कम है। श्रीमद्भागवतके माहात्म्यमें ज्ञान, वैराग्यको भक्ति महारानीका पुत्र कहा गया है और यह दिखाया गया है कि ये तीनों ही कलिके पाखण्डसे जर्जर एवं जीर्ण-शीर्ण हो गये थे। श्रीमद्वृन्दारण्यधामके संसर्गसे श्रीभक्तिदेवी तो नवीनस्वरूपा तरुणी हो गयीं, परंतु वहाँ ज्ञान, वैराग्यका कोई ग्राहक न था, अतः वे दोनों ज्यों-के- त्यों जीर्ण-शीर्ण क्षुत्क्षाम-शुष्क-कण्ठ होकर मूर्च्छितावस्थामें ही पड़े रहे। श्रीभक्तिदेवी स्वयं नवीना, सुरूपिणी तरुणी होकर भी अपने पुत्रोंकी दुर्दशा देखकर खिन्न होकर सोच रही थीं। उसका भाव यह था कि माताका जरठ होना उचित है, पुत्रका जरठत्व वार्धक्य अवश्य ही चिन्ताजनक है। कभी एक वृद्धा वैश्यानी स्त्री एक महात्मासे वरदान माँगने लगी—'महाराज! मैं तो यही माँगती हूँ कि मेरे बेटे, पोते मुझे कन्धेपर रखकर जला आयें।' महात्माने कहा कि 'जीते ही या मरनेपर?' सारांश यह कि कल्याणमयी, करुणामयी, पुत्रवत्सला अम्बा यही चाहती है कि 'मेरे सामने मेरे बेटे-पोते बने रहें, मरें नहीं, किंतु मैं ही उनके सामने मर जाऊँ।' बेटे-पोतेकी बीमारीको माँ अपने ऊपर बुलाती है। ठीक इसी तरह भक्ति माताको भी अपने पुत्र ज्ञान, वैराग्यकी वृद्धिमें ही शान्ति-संतोष होता है। वह उनका अनिष्ट नहीं देख सकती, उनके सामने अपना निधन चाहती है। माता पहले तो पुत्र बिना अपनेको वन्ध्या समझती है, अपना जीवन व्यर्थ समझती है, पुत्र-जन्मके लिये तरह-तरहके देवी- देवताओंको मनाती है। पुत्रके गर्भमें आते ही हर्षके मारे फूली नहीं समाती, गर्भस्थ बालकके हस्त, पादादि उत्क्षेपणसे कष्ट होनेपर भी उसे अपराध नहीं मानती, अब पुत्र बड़ा हो गया यह समझकर प्रसन्न होती है। पुत्रकी उत्पत्तिमें प्राणान्त कष्ट सहनकर भी आनन्दमें विभोर रहती है। स्वयं गीलेमें रहकर बालकको सूखेमें रखती है। मल, मूत्रादि अपने ऊपर लेती है। माँका हृदय कितना उदार होता है, वह पुत्रके लिये क्या-क्या नहीं करती है? ठीक इसी तरह ज्ञान-वैराग्यरूप पुत्रोत्पत्तिके बिना भक्ति अपनेको वन्ध्या मानती है और उसकी उत्पत्तिके लिये लालायित रहकर देवी-देवता मनाती है। फिर लालन-पालनकर बड़ा करती है, उनकी जीर्णता-शीर्णतामें वह फिर चिन्तित और खिन्न होती है। उनकी मूर्च्छा और जीर्णता-शीर्णता मिटानेके लिये फिर महात्माओंकी शरण जाकर उपाय चाहती है।

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