भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंज्ञान और भक्ति ६७७ जीवादि विविध प्रकारका संसार उपस्थित होता है। उसके साक्षात्कारात्मक ज्ञानसे ही समस्त अनर्थोंकी निवृत्ति होती है। कर्मोपासनादि किसीसे भी उत्पन्न होनेवाला मोक्ष द्वैतात्म होनेसे एक संसार ही है। साथ ही उत्पाद्य, प्राप्य, संस्कार्य और विकार्य सभी कर्मफल जैसे अनित्य हैं, वैसे ही कर्मोपासनादि प्राप्य मोक्ष भी अनित्य ही होगा। निष्प्रपंच अद्वैत-सुखके लिये ही समस्त विश्वकी निद्रा या सुषुप्तिमें प्रवृत्ति होती है। जैसे निम्बके कीटको निम्बमें ही मिठास लगती है, उसे मिश्रीके मीठेपनपर हँसी आ सकती है, वैसे ही वादित्र, नृत्य, गीतादि द्वैतसुखमें रस लेनेवाले संसारियोंको अद्वैतसुखमें रस नहीं आता। फिर भी वह ऐसी वस्तु है कि चाहे उससे कोई अनभिज्ञतावश द्वेष ही करे, परंतु वह अपने स्वभावानुसार सबके प्रेमका आस्पद सबमें व्यक्त ही रहता है। आत्माके ज्ञान और उसकी महिमासे भले ही किसीको चिढ़ हो, परंतु आत्माका उत्कर्ष और बड़ाई सभी चाहते हैं। प्रेम भी उसमें सभीको करना पड़ता है। जब अपने सिद्धान्तमें, अपने हठमें, अपने देश, ग्राम, कुल, कुटुम्ब, क्षेत्र, वित्त, राज्यमें प्रेम होता है, तब क्या अपनेमें नहीं होगा? जब परमात्माकी ही मूर्तियोंमें-से अपनी इष्ट मूर्तिमें ही प्रेम होता है, अपने इष्टसे भिन्न परमात्माकी मूर्तिमें प्रेमाभाव ही नहीं, किंतु द्वेष होता है, तब क्या आत्मामें किसीको प्रेम नहीं होगा? शैव विष्णुमूर्तिसे द्वेष तथा वैष्णव शिव- मूर्तिसे द्वेष आत्मसम्बन्धाभावसे ही तो करते हैं। अपने इष्टमें तो सबको प्रेम होता ही है। साथ ही असहिष्णु भी अपनी बड़ाई—आत्ममहिमाको चाहता है, अपने सिद्धान्तकी बड़ाई चाहता है, इतना ही क्यों, 'अहं ब्रह्मास्मि' के सिद्धान्तका खण्डन करनेवाले ही अन्तमें स्वयं भगवान् बनने और रासलीला करनेका साहस करते हैं। उनके भक्त उन्हें प्रत्यक्ष अवतारी कहते हैं और वे सुन-सुनकर प्रसन्न होते हैं। कोई श्रीवृषभानु- नन्दिनीका अवतार तो कोई प्रिया-प्रियतम दोनोंका ही अवतार मानते और मनवाते हैं। यह सब स्वाभाविक आत्मप्रेमका ही विकृत रूप है। तभी तो भगवती श्रुतिने साफ कहा है कि सब कुछ आत्माके ही प्रेमका शेष है। देवतामें भी प्रेम आत्मार्थ ही होता है, आत्मकल्याणकारक आत्महितैषी देवतामें प्रेम और विपरीतमें द्वेष होता है। इसी तरह निम्न-से-निम्न कोटिके जीव और उच्च-से- उच्च कोटिके जीव सुषुप्तिमें अद्वैत निष्प्रपंच सुखका रस लेना चाहते हैं। किं बहुना उच्च-से-उच्च कोटिके ईश्वर भी योगनिद्रामें उसी निष्प्रपंच अद्वैत- सुखके अनुभवमें लवलीन होते हैं। दिव्यातिदिव्य वैषयिक सुख सामग्रियोंके उपस्थित रहनेपर भी योगनिद्राद्वारा निष्प्रपंच अद्वैत-सुखमें ही अधिकाधिक प्रवृत्ति होती है। प्राणी दिव्य कान्तादि स्पर्श-सुखसे विरत होकर सौषुप्त सुख चाहते हैं, फिर जब सावरण सौषुप्त अद्वैत सुखमें प्राणियोंकी ऐसी प्रीति होती है तो फिर निष्प्रपंच निरावरण अद्वैत ब्राह्म सुखकी महिमा कौन-कैसे कहे? अतएव अपरिच्छिन्न सुख वही है, जहाँ द्रष्टा, दर्शन, दृश्यकी समाप्ति है। वही भूमा सुख है। 'यत्र नान्यत्पश्यति नान्यच्छृणोति स भूमा, यो वै भूमा तत्सुखं, नाल्पे सुखमस्ति ।।' अर्थात् जहाँ अन्य अन्यको देखता-सुनता है, वहाँ अल्प ही सुख है। इस दृष्टिसे अनन्त, अखण्ड भूमा ब्रह्म ही परम सुख है, उससे अधिक सुखकी कल्पना सर्वथा अशास्त्रीय है। यह अनन्त अखण्ड भूमा ब्रह्म ही सगुण, साकार, सच्चिदानन्द ब्रह्म भी है। यही अपनी अचिन्त्य दिव्यलीलाशक्तिसे शिव, विष्णु, उमा, गणपति, भास्कररूपसे भी उपास्य होता है। जैसे विष्णुकी ही राम, कृष्ण, नृसिंह आदि रूपसे उपासना होती है, वैसे ही एक ही परमतत्त्वकी शिव, विष्णु आदि रूपसे उपासना होती है। 'व्यापक ब्रह्म निरंजन निर्गुन बिगत बिनोद।' (रा०च०मा० १।१९८)