भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६७६ भक्तिसुधा अन्याभिलाषिताशून्यं ज्ञानकर्माद्यनावृतम्। आनुकूल्येन कृष्णानुशीलनं भक्तिरुत्तमा ॥ अर्थात् सर्वाभिलाषवर्जित ज्ञान और कर्मोंसे अनावृत अनुकूलतया श्रीकृष्णका अनुस्मरण ही भक्ति है। इन सिद्धान्तोंमें भक्ति ही सब कुछ है, उसके लिये ही समस्त साधन हैं, ज्ञान और मोक्ष आदि उसमें विघ्न हैं। भक्तजन भुक्ति, मुक्ति, विरक्ति सबको तिलांजलि देकर इस भक्तिको ही चाहते हैं। इसीलिये बड़े-बड़े अमलात्मा परमहंस महामुनीन्द्रगण भी अद्वैत, अनन्त, अखण्ड ब्रह्मसे मन हटाकर सगुण साकार भगवान्में मन लगाते हैं। तस्यारविन्दनयनस्य पदारविन्द- किञ्जल्कमिश्रतुलसीमकरन्दवायुः। अन्तर्गतः स्वविवरेण चकार तेषां सङ्क्षोभमक्षरजुषामपि चित्ततन्वोः ॥ (श्रीमद्भा० ३।१५।४३) अरविन्दनयन भगवान्के श्रीचरणारविन्दमकरन्द- मिश्रित तुलसिकाके मकरन्दररेणु जिस समय घ्राणरूप स्वविवरद्वारा सनकादिकोंके हृदयान्तर्गत हुए, बस उसी समय उन अक्षर ब्रह्मनिष्ठ सनकादिकोंके भी शरीर और मनमें क्षोभ हो गया। अर्थात् शरीरमें पुलकावली, नयनोंमें अश्रु और मनमें द्रवता उत्पन्न हो उठी। स्वसुखनिभृतचेतास्तद्व्युदस्तान्यभावोऽ- प्यजितरुचिरलीलाकृष्टसारस्तदीयम्। व्यतनुत कृपया यस्तत्त्वदीपं पुराणं तमखिलवृजिनघ्नं व्याससूनुं नतोऽस्मि ॥ (श्रीमद्भा० १२।१२।६८) 'स्वसुखेनैव निभृतं परिपूर्णं चेतो यस्य स तथोक्तः, तेनैव निरस्तः अन्यस्मिन् पदार्थे भावो भावना अस्तित्वबुद्धिर्यस्य स तथोक्तः।' श्रीशुकाचार्य, जिनका चित्त स्वस्वरूपभूत परमानन्द सुधासिन्धुसे ही परिपूर्ण हो गया था, तद्व्युदस्तान्यभाव अर्थात् स्वसुख-निभृतचेता होनेसे ही अन्यपदार्थविषयक अस्तित्व-बुद्धि जिनकी मिट गयी थी, जो केवल सर्वत्र एक परम तत्त्वका ही दर्शन करते थे, भगवान्की रुचिर लीलासे उनका भी धैर्य च्युत हो गया। उन्होंने स्वयं कहा है— परिनिष्ठितोऽपि नैर्गुण्य उत्तमश्लोकलीलया। गृहीतचेता राजर्षे आख्यानं यदधीतवान् ॥ (श्रीमद्भा० २।१।९) अर्थात् मेरा मन निर्गुण परब्रह्ममें परिनिष्ठित था, फिर भी उत्तमश्लोक भगवान्की लीलाने मेरे चित्तको खींच लिया। श्रीहरिके गुणोंसे आक्षिप्त-मति होकर भगवान् बादरायणिने श्रीमद्भागवतरूप महाख्यानका अध्ययन किया है— हरेर्गुणाक्षिप्तमतिर्भगवान् बादरायणिः। अध्यगान्महदाख्यानं नित्यं विष्णुजनप्रियः ॥ (श्रीमद्भा० १।७।११) लखी जिन लालकी मुसकान। तिनहिं बिसरी बेद बिधि सब योग संयम ज्ञान ॥ × × × आत्मारामारच मुनयो निर्ग्रन्था अप्युरुक्रमे। कुर्वन्त्यहैतुकीं भक्तिमित्थम्भूतगुणो हरिः ॥ (श्रीमद्भा० १।७।१०) भक्ति और वेदान्त फिर भी वेदान्तीगण इनके कुछ अंशोंमें विमति रखते ही हैं, उनकी दृष्टिमें जो निरतिशय परमानन्दरसात्मक वस्तु है, वही तो ब्रह्म है और उससे बढ़कर किसी फलकी कल्पना भी असम्भव है। अनन्तपदसमभिव्याहृत ब्रह्म पदका अर्थ ही निरतिशय बृहत् है। सर्वविधपरिच्छेद-शून्य ही निरतिशय बृहत् होता है। ऐसा होनेपर भी यदि सोपप्लव एवं अस्वप्रकाश हो तो वह निरतिशय बृहत्स्वरूप ब्रह्म पदार्थ होने योग्य नहीं है। अतः स्वप्रकाश परमानन्द रसात्मक ही उसे होना चाहिये। इस तरह अनन्त स्वप्रकाश परमानन्द ही ब्रह्म है। आतपकी अपेक्षा सूर्यमें जो अतिशयता है, वैसी अनन्त अतिशयताकी कल्पना करते-करते वाचस्पतिकी भी मति जहाँ परिश्रान्त हो जाय, वही वेदान्तियोंका ब्रह्म है। उसमें ही समस्त विश्व कल्पित है, उसीसे