भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 685

ज्ञान और भक्ति ६७५ ज्ञानकाण्डकी पृथक् कल्पना ही व्यर्थ है। वेदोंके दो काण्ड—कर्मकाण्ड और उपासनाकाण्ड कर्मकाण्ड और उपासनाकाण्ड दो ही काण्ड वेदोंमें हैं। चाहे पृथक् ज्ञानकाण्ड माना भी जाय तो भी वह कर्म और उपासना दोनोंका साधन है। कर्मके ज्ञानसे ही अनुष्ठान होगा, उपास्यज्ञानसे ही उसकी उपासना होती है। इस पक्षमें निर्गुण निराकार ब्रह्म सर्वथा अमान्य ही है और उस पक्षमें संसार या बन्ध सत्य ही है। अतः ज्ञानसे उसका मिटना असम्भव है। इसलिये भक्ति, प्रार्थना आदिसे ही बन्धनका छूटना और विशिष्ट आनन्दका लाभ सम्भव है। इस पक्षमें ज्ञानसे भक्तिका अत्यन्त उत्कर्ष स्पष्ट ही है, परंतु जो कर्मफल होनेसे मुक्तिकी अनित्यतासे भयभीत होते हैं और समझते हैं कि यदि बन्ध और संसार सत्य है तो उसकी आत्यन्तिक निवृत्ति असम्भव है, वे भगवान्‌को सगुण-साकारकी तरह निर्गुण-निराकार भी मानते हैं और कर्म, उपासनाके समान ही ज्ञानकाण्डका भी महत्त्व मानते हैं, उनके मतमें सुतरां उपर्युक्त मत अमान्य है। भक्तिका उत्कर्ष फिर भी कुछ महानुभाव कर्मकाण्ड, उपासनाकाण्ड और ज्ञानकाण्ड तीनोंको पृथक् मानते हुए भी भक्तिको ज्ञानसे उत्कृष्ट कहते हैं, तब भी उनका ज्ञानप्राप्त ब्रह्म, सगुण साकार परब्रह्मसे निम्न कोटिका है। ज्ञानप्रधान सच्चिदानन्द ब्रह्म ज्ञानप्राप्य है, आनन्दप्रधान ब्रह्म भक्तिप्राप्य है। वेदान्तवेद्य ब्रह्म आतपके समान है, भक्तिप्राप्य भगवान् सूर्यके समान है। सुतरां इस मतमें भी ज्ञानसे भक्तिका उत्कर्ष है। इन मतोंमें भी भक्तिका 'सा परानुरक्तिरीश्वरे' ईश्वरमें परमानुराग ही भक्ति है इत्यादि लक्षण मान्य हैं। वह भक्ति 'मर्यादा' और 'पुष्टि' किंवा 'वैधी' और 'रागानुरागा' भेदसे दो प्रकार की है। स्वतः अप्राप्त विधिगम्य भगवत्सेवन मर्यादा या वैधी है, भगवत्कृपाप्राप्त कामिन्यादिप्रीतिवत् रागवशात् भगवत्सेवन पुष्टि या रागानुरागा है। यह भक्ति परप्रेमरूपा है, स्वतःसिद्धा है, यह भगवान्‌की परमान्तरंगा शक्तिरूपा है। यह हेतुफलभावरहित है। स वै पुंसां परो धर्मो यतो भक्तिरधोक्षजे। अहैतुक्यप्रतिहता ययात्मा सम्प्रसीदति॥ (श्रीमद्भा० १।२।६) पुरुषोंकी भगवन्नामसंकीर्तनादि लक्षणा भक्ति ही परमोत्कृष्ट धर्म है, जिससे अधोक्षज भगवान्‌में अहैतुकी अप्रतिहता भक्ति होती है, जिससे कि अन्तरात्माका संप्रसाद होता है, यहाँ यह सिद्ध होता है कि जब 'यतः' इस पंचम्यन्तसे भक्तिका कार्यकारणभाव निर्धारित है, तब उसे अहैतुकी कैसे कहा जा सकता है? इसपर समाधान यह है कि वास्तवमें भक्तिका कारण बनता नहीं, यदि भगवत्कृपाको कारण कहें तो सम भगवान्‌में विषम कृपा कैसे सम्भव है? यदि कृपा भी सम हो, तब तो सभीको भक्ति-प्राप्ति होनी चाहिये। यदि भक्तकृपासे कहें तो वह भी ठीक नहीं; क्योंकि वह भी सम ही है। सर्वभूतेषु यः पश्येद् भगवद्भावमात्मनः। भूतानि भगवत्यात्मन्येष भागवतोत्तमः॥ (श्रीमद्भा० ११।२।४५) यदि— ईश्वरे तदधीनेषु बालिशेषु द्विषत्सु च। प्रेममैत्रीकृपोपेक्षा यः करोति स मध्यमः॥ (श्रीमद्भा० ११।२।४६) इस लक्षणके अनुसार मध्यम-भक्तकी कृपासे भक्तिका होना मानें सो भी ठीक नहीं, क्योंकि श्रद्धा- पुरस्सर मध्यम-भक्तके सेवनसे ही मध्यम-भक्तकी कृपा प्राप्त हो सकती है, परंतु श्रद्धा भी तो भक्ति ही है, वह पहले कैसे मिले? साधन और साध्यरूपसे भक्ति ही दो प्रकारकी है, उसमें भी अवस्था- भेदमात्रसे साध्य-साधनभाव बनते हैं। जैसे अपक्व आम्र, पक्व आम्रका हेतु होता है, वैसे ही साधनरूपा भक्तिका साध्यरूपा भक्तिके साथ साध्य-साधन-भाव होता है।