भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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मनोवृत्ति-प्रवाह भी सेवा ही है। सारांश यह हुआ कि सेव्याकार-मानसी-वृत्ति ही सेव्यकी सेवा है। यहाँपर भी कुछ महानुभाव आनुकूल्येन कृष्णाकारवृत्ति (कृष्णानुस्मरण)-को भक्ति कहते हैं। कुछ कृष्णाकारावृत्ति मात्रको भक्ति या सेवा मानते हैं। वह आनुकूल्येन किंवा प्रातिकूल्येन चाहे जैसी ही हो। जब सेव्याकार वृत्ति भक्ति है और सेव्य निर्गुण, निराकार, निर्विकार है तो निर्गुण, निराकार, निर्विकार ब्रह्माकाराकारित वृत्ति ही भक्ति हुई। फिर वह चाहे वस्तु और प्रमाणपरतन्त्र ज्ञानरूपा हो, चाहे पुरुषतन्त्र उपासनारूपा हो। निर्गुण, निराकार, निर्विकार परब्रह्माकाराकारित वृत्ति अवश्य ही भक्ति पदसे कही जा सकती है। अतएव—'भजति विषयाकारतां प्राप्नोति—इति भक्तिर्ज्ञानम्।' इस व्युत्पत्तिके अनुसार भी विषयाकारताको भजनेवाला ज्ञान भक्ति पदका अर्थ होता है। इस पक्षमें 'भक्त्या मामभिजानाति' (गीता १८।५५) इस स्थलमें भक्ति पदसे ज्ञानलक्षणा चतुर्थी भक्ति ही विवक्षित है। आर्त, अर्थार्थी, जिज्ञासु और ज्ञानी— चार प्रकारके भक्त होते हैं और उनकी भक्ति चार ही तरहकी होती है। ज्ञानीकी भक्ति ज्ञानरूपा ही है, ज्ञानीकी दृष्टिमें प्रत्यक्चैतन्याभिन्न भगवान्से भिन्न दूसरी वस्तु न हुई, न है और न होगी। अतः उसकी एकमात्र प्रीति भगवान्में ही है। इस तरह वह इतरोंसे विशिष्ट है। भगवान् उसे अपना आत्मा ही मानते हैं— 'ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्।' (गीता ७।१८) प्रकाश्यको प्रकाशन करता हुआ प्रकाश, प्रकाश्याकार होकर प्रकाश्याकारताको भजता है। इस दृष्टिसे ज्ञेयाकारताको प्राप्त ज्ञान भक्ति पदसे कहा गया है। इसी दृष्टिसे आचार्योंका कहना है कि— मोक्षकारणसामग्र्यां भक्तिरेव गरीयसी। स्वस्वरूपानुसन्धानं भक्तिरित्यभिधीयते ॥ स्वात्मतत्त्वानुसन्धानं भक्तिरित्यपरे जगुः। (विवेकचूडामणि ३२-३३) मोक्षकारण-सामग्रीमें भक्ति ही श्रेष्ठ है और स्वरूपानुसन्धान ही भक्ति है। यहाँ इस शंकाका कोई मूल्य नहीं रहता कि जब सेव्याकाराकारित वृत्तिको भक्ति कहा जाता है, तब तो एक सेवकको अवशेष रहना चाहिये। परंतु ऐसी स्थितिमें तो अद्वैतवाद ही असिद्ध रहेगा, क्योंकि व्यावहारिक सत्तावाला साधक ही पारमार्थिक विशुद्ध चिदानन्दात्मतत्त्वको अपना सेव्य बनायेगा, उस सेव्यसे भिन्न सभी व्यावहारिक ही हैं, पारमार्थिक तो एक अव्यवहार्य परमात्मतत्त्व ही रहता है— अक्षमा भवतः केयं साधकत्वप्रकल्पने। किं न पश्यति संसारं तत्रैवाज्ञानकल्पितम् ॥ (पञ्चदशी, वार्तिक) ज्ञान नामकी स्वतन्त्र वस्तु नहीं है इतनेपर भी इस सिद्धान्तमें उपासनारूप भक्ति ज्ञानसे पृथक् मान्य और आदरणीय होती ही है। उसकी कृपासे ही यह भक्ति भी प्राप्त होती है। साथ ही ठीक इसके विपरीत, अन्यान्य साम्प्रदायिक ब्रह्मसूत्र- भाष्यकारोंका कहना है कि उपासना ही भक्ति है और उससे भिन्न होकर ज्ञान नामकी स्वतन्त्र वस्तु नहीं है। 'अथातो ब्रह्मजिज्ञासा' यहाँपर भी इस मतमें वस्तुप्रमाणतन्त्र तत्त्वज्ञानमात्र नहीं विवक्षित है; क्योंकि उसका कुछ भी उपयोग नहीं है। 'राजा है' इस ज्ञान-मात्रसे कुछ नहीं सिद्ध होता, किंतु राजाका स्वसम्बन्धित्वेन ज्ञान ही उपकारक हो सकता है। ठीक इसी तरह वेदान्तवेद्य ब्रह्मका केवल ज्ञान निरर्थक है, किंतु 'गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत्।' इत्यादिके अनुसार स्वसम्बन्धित्वेन ज्ञानपूर्वक उपासनारूप विशिष्ट ज्ञान ही 'अथातो ब्रह्मजिज्ञासा' (ब्रह्मसूत्र १।१।१), 'ब्रह्मविदाप्नोति परम्।' (तैत्तिरीयोपनिषद् २।१) इत्यादि श्रुति- सूत्रोंमें विवक्षित है। अतएव 'य एवं वेद' इत्यादि स्थलोंमें वेदसे उपासना ही सर्वमान्य है, इसलिये