भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

पृष्ठ 683, कुल 778 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 683

ज्ञान और भक्ति [पृ. ६७३]

(गीता १८।५५) भक्त भक्तिके द्वारा मुझे सम्यक् रूपसे जान लेता है। 'क्लृपि सम्पद्यमाने च' इस वार्तिकके उदाहरण- रूपसे भट्टोजिदीक्षितने कहा है कि 'भक्तिर्ज्ञानाय कल्पते, सम्पद्यत इत्यर्थः' अर्थात् भक्ति ही ज्ञानाकारसे परिणत होती है। सारांश यह है कि जैसे मृत्पिण्ड ही घटाकारमें परिणत होता है, वैसे ही भक्ति ही ज्ञान शुद्धसच्चिदानन्दघन ब्रह्मसाक्षात्काररूपसे परिणत होती है। सगुण साकार परब्रह्ममें आसक्त चित्त जब प्रेमोद्रेकसे निर्विचेष्ट हो जाता है, तब किसी भी प्रमेयकी प्रतीति नहीं होती। प्रमेय-प्रतीति मिटनेपर प्रमाण और प्रमाणाश्रय प्रमाताकी अप्रतीति स्वाभाविकी है। उस स्थितिमें वेदान्तद्वारा प्रमाता, प्रमाण, प्रमेय तीनोंके अवभासकरूपसे शुद्ध परब्रह्मका साक्षात्कार होता है। चित्तकी निर्विचेष्टताके बिना प्रमाता और प्रमाणकी प्रतीति कथमपि नहीं मिट सकती। बिना उसके मिटे सर्वोपद्रवविनिर्मुक्त निर्विकल्प चिदानन्द ब्रह्मका साक्षात्कार नहीं हो सकता। अष्टांगयोगका भी उपयोग इसी भगवदुपासनाद्वारा चित्तकी निर्विचेष्टतामें है। कपिल और देवहूतिके संवादमें इसीलिये सगुण-साकार ध्यानकी अत्यन्त प्रशंसा की गयी है। भगवान्‌के श्रीचरणारविन्द- मकरन्द-रसास्वादनमें विभोर मन सहजहीमें शान्त हो जाता है तथा उनके नख-मणि-चन्द्रिकासे धौतप्राय मन भगवान्‌के अमृतमय मुखचन्द्रके सौन्दर्य-माधुर्य- सुधा-समास्वादन करते-करते निर्विचेष्ट हो जाता है, बस, फिर उस प्रेमोन्मादमें विलीन मनको विचलित न करके—'तच्च त्यक्त्वा मदारोहो न किञ्चिदपि चिन्तयेत्॥' (श्रीमद्भागवत ११।१४।४४) उस समय 'एकमेकतराभावे यदा नोपलभामहे। त्रितयं तत्र यो वेद स आत्मा स्वाश्रयाश्रयः॥' (श्रीमद्भागवत २।१०।९)-के अनुसार प्रमाता, प्रमाण, प्रमेय और उनके अभावोंका भासक शुद्ध परब्रह्म स्वतः प्रकाशमान होता है, फिर वहाँ केवल महावाक्यकी अचिन्त्य शक्तिसे अनाद्यावरण सदाके लिये मिट जाता है। इस तरह द्रवीभूत स्निग्ध चित्तकी भगवदा- काराकारित वृत्तिरूप भक्ति ही निर्गुण निराकार निर्विकार परब्रह्मरूपसे व्यक्त होती है। फिर उससे शुद्ध ब्रह्मात्मनावस्थानरूप मोक्ष अपने-आप ही सिद्ध हो जाता है। इसलिये कुछ महानुभावोंने भक्तिसे ही मोक्ष माना है। ऐसी स्थितिमें भी 'तमेव विदित्वाति मृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यते।' (श्वेताश्वतर० ६।१५) इत्यादि श्रुतियोंका विरोध नहीं होता; क्योंकि ज्ञान द्वार-कोटिमें यहाँ भी मान्य ही है। जैसे पिण्ड- कपालादिद्वारा ही मृत्तिका घटका कारण बनती है, वैसे ही ज्ञानद्वारा ही भक्ति मोक्षका कारण बनती है। भक्तिका अर्थ ज्ञान है इसके अतिरिक्त आचार्योंने कहीं-कहीं भक्ति शब्दका ज्ञान ही अर्थ किया है। यद्यपि ऐसा अर्थ आपाततः पक्षपातपूर्ण-सा प्रतीत होता है, परंतु विचार करनेपर अनुचित प्रतीत नहीं होता। तथा च 'भजनं भक्तिः' इस व्युत्पत्तिके अनुसार भजन या सेवनको ही भक्ति कहा जाता है। वह सेवन केवल कायिक व्यापार ही नहीं, किंतु शरीर, इन्द्रिय, मन तीनोंहीसे सेव्यकी सेवा की जाती है। इतना ही क्यों, महानुभावोंने मानसी सेवाको ही परा या मुख्या सेवा माना है— 'कृष्णसेवा सदा कार्या मानसी सा परा मता।' (श्रीवल्लभाचार्य) श्रीकृष्णकी सेवा सदा करनी चाहिये, वह सेवा भी मानसी ही मुख्या है। अब प्रश्न होता है कि हस्त-पादादिसे तो सेवा-परिचर्या बन सकती है, परंतु मानसी सेवा कैसे हो? इसपर महानुभावोंने कहा है—'चेतस्तत्प्रवणं सेवा' अर्थात् चित्तकी श्रीकृष्णोन्मुखता ही सेवा है अर्थात् भगवान्‌की ओर भगवत्स्वरूपाकाराकारित मनोवृत्तिप्रवाह ही भगवान्‌की मानसी सेवा है। बस, उसीकी सिद्धिके लिये तनुजा, वित्तजा—उभय प्रकारकी सेवा अपेक्षित होती है। 'तत्सिद्धयै तनुवित्तजा'। इस तरह

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ) · पृष्ठ 683, कुल 778 में से · BharatKosha