भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 682

६७२ भक्तिसुधा है। वैदिकोंकी दृष्टिमें कर्म, उपासना और ज्ञान—ये तीन साधन प्राणियोंके कल्याणके मूल हैं। कर्मसे मलकी निवृत्ति, उपासनासे विक्षेपकी निवृत्ति और ज्ञानसे आवरणकी निवृत्ति होती है। मल, विक्षेप, आवरण—इन तीनों उपद्रवोंसे उपद्रुत होकर अन्तरात्मा अनन्त अनर्थोंका भागी होता है। इन तीनों साधनोंसे तीनों उपद्रवोंके निवृत्त हो जानेपर अन्तरात्माकी शुद्धप्रत्यक्चैतन्याभिन्न परब्रह्मस्वरूपसे अवस्थिति होती है। इस पक्षसे वेदशास्त्रानुसार देहेन्द्रिय, मन, बुद्धि, चित्त और अहंकारकी, सन्ध्या, तर्पण, वैश्वदेव, अग्निहोत्र, दर्शपूर्णमास, चातुर्मास्यादि श्रौत-स्मार्त कर्मलक्षण चेष्टाएं ही कर्म हैं। सगुण, साकार सच्चिदानन्दघन परब्रह्माकाराकारित स्निग्ध अन्तःकरणकी वृत्ति- परम्परा ही उपासना या भक्ति है। साथ ही सगुण, निराकार परब्रह्माकाराकारित अन्तःकरणवृत्ति- परम्परा एवं निर्गुण, निराकार ब्रह्माकारवृत्तिको भी उपासना या भक्ति कहा जाता है। कुछ लोग कहते हैं कि निर्गुण, निराकार ब्रह्माकारवृत्तिको ज्ञान कहते हैं और सगुण, साकार ब्रह्माकारस्नेहात्मिकावृत्तिको भक्ति कहते हैं। वस्तुतः ब्रह्माकारवृत्तिपरम्पराको कर्म और ज्ञान दोनों ही कहा जा सकता है, परंतु सारांश यही है कि प्रमाण एवं वस्तुसे परतन्त्र-वृत्ति ज्ञान है और पुरुषतन्त्रमानसी-वृत्ति कर्म है। वही श्रद्धा-स्नेह सहकृता उपासना या भक्ति है। ज्ञानमें प्राणी परतन्त्र होता है, घ्राणसे गन्धका सन्निकर्ष होनेपर इच्छा न होते हुए भी गन्धज्ञान होता है। अतः ज्ञानमें पुरुषकी स्वतन्त्रता नहीं है, परंतु ध्यान या उपासनामें प्राणी स्वतन्त्र होता है। शास्त्रानुसार भगवान्‌की मूर्तिकी कल्पना करके प्राणी ध्यान कर सकता है। इस दृष्टिसे श्रद्धा- स्नेहसहित उपास्य ब्रह्मस्वरूपाकारवृत्तिप्रवाह उपासना है। वह उपास्यस्वरूप निर्गुण-निराकार, सगुण- निराकार और सगुण-साकार तीनों ही तरहका होता है। वस्तु एवं प्रमाणके अधीन उपास्याकारवृत्ति ज्ञान कहलाती है, जो कि उपासनाकी महिमासे ही हो सकता है, फिर भी वेदान्तियोंकी दृष्टिमें अनाद्य निर्वचनीय मूलाज्ञानका निवर्तक निर्गुण निराकारका ही ज्ञान होता है। अतः वही ज्ञान पदसे अधिक व्यपदिष्ट होता है। वह शान्त शुद्ध मनः सहकृत महावाक्यसे ही या महावाक्याभ्यासजन्यसंस्कारप्रचयसहकृत शान्त मनसे होता है। तदितर ज्ञान या साक्षात्कार उपासना मनसे होती है। परोक्ष ज्ञान वेदादि शास्त्रोंसे भी हो जाता है। इस सिद्धान्तके अनुसार शास्त्रानुसार किसी उपास्यस्वरूपका श्रद्धा-स्नेहसहित ध्यान उपासना है; वही भक्ति है। इस तरह सगुण भगवान्‌के समान ही निर्गुण ब्रह्मकी भी भक्ति होती है। इस भक्तिसे विक्षेपनिवृत्ति, चित्तकी एकाग्रता और भगवत्प्रसन्नता प्राप्त होती है। फिर निर्विघ्न रूपसे ही वेदान्त- श्रवणादिद्वारा निर्गुण निराकार निर्विकार ब्रह्मका साक्षात्कार होता है। अतएव शास्त्रोंमें वेदान्त- श्रवणादिद्वारा भगवत्साक्षात्कारमें भगवद्भक्ति या प्रपत्तिको मुख्य साधन बतलाया है—'तं ह देवमात्मबुद्धिप्रकाशं मुमुक्षुर्वै शरणमहं प्रपद्ये'॥ (श्वेताश्वतरो० ६।१८) अर्थात् आत्मबुद्धि प्रकाशित करनेवाले देवके मैं शरणागत हूँ। 'तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये' (गीता १५।४) उस आद्यपुरुषकी मैं शरण हूँ। 'यमेवैष वृणुते तेन लभ्यः' (कठोपनिषद् १।२।२३) स्मरण, भजन, भक्ति और प्रार्थनासे भी भगवान्‌की प्राप्ति अर्थात् बोध होता है। ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते ॥ × × × नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता ॥ (गीता १०।१०-११) भक्तिसे ज्ञानकी प्राप्ति भगवान्‌का भी कहना है कि श्रद्धासे भजनेवाले भक्तोंको मैं बुद्धियोग (ज्ञान) देता हूँ, जिससे वे मुझे प्राप्त कर लेते हैं। मैं स्वयं ही ज्ञान-दीपसे उनके अज्ञानको नष्ट कर देता हूँ। 'भक्त्या मामभिजानाति'