भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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ज्ञान और भक्ति ६७१ सा ब्रह्मणि स्वमहिमन्यपि नाथ मा भूत् किं त्वन्तकासिलुलितात्पततां विमानात्॥ (श्रीमद्भा० ४।९।१०) भक्तोंको भगवान्‌के श्रीचरणारविन्दके ध्यानमें रस मिलता है, किंवा भगवद्भक्तोंके चरित्र-श्रवणसे जो रस व्यक्त होता है, वह स्वप्रकाश, स्वमहिमास्थित भगवान्‌में भी नहीं व्यक्त होता। फिर अन्तककी तलवारसे विलुलित विमानोंसे गिरनेवाले लोगोंके सुखोंकी तो चर्चा ही क्या है? इसके सिवाय यह भी है कि ज्ञान हो जानेपर भी भक्तिके बिना उसकी शोभा नहीं होती। नैष्कर्म्यमप्यच्युतभाववर्जितं न शोभते ज्ञानमलं निरञ्जनम्। कुतः पुनः शश्वदभद्रमीश्वरे न चार्पितं कर्म यदप्यकारणम्॥ (श्रीमद्भा० १।५।१२) सोह न राम पेम बिनु ग्यानू। करनधार बिनु जिमि जलजानू॥ (रा०च०मा० २।२७७।५) ज्ञान, वैराग्य, धर्म और कर्म यह सभी प्रेम- लक्षणा भक्तिसे ही सुशोभित होते हैं। उसके बिना सब निरर्थक हो जाते हैं— सो सुखु करमु धरमु जरि जाऊ। जहँ न राम पद पंकज भाऊ॥ जोगु कुजोगु ग्यानु अग्यानू। जहँ नहिं राम पेम परधानू॥ (रा०च०मा० २।२९१।१-२) साथ ही ज्ञानके उत्कर्षका भी पक्ष प्रसिद्ध ही है। 'न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते' (गीता ४।३८) अर्थात् ज्ञानके समान कोई भी पवित्र नहीं है। 'वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः' (गीता ७।१९) सब कुछ वासुदेव ही हैं, ऐसा ज्ञानवान् महात्मा अत्यन्त दुर्लभ है। ज्ञानको छोड़कर दूसरा कल्याणका मार्ग ही नहीं है। बिना ज्ञानके मुक्ति होती ही नहीं—'तमेव विदित्वाति मृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय॥' (श्वेताश्वतर० ६।१५) 'ऋते ज्ञानान्न मुक्तिः।' 'नैनमविदितो देवो भुनक्ति।' अर्थात् यह देव बिना ज्ञानके प्राणीका अन्तर्रात्मा होकर भी पालन नहीं करता अर्थात् सर्वानर्थसे विनिर्मुक्त नहीं करता। भगवान् ज्ञानीको प्रत्यक्ष अपना आत्मा ही बतलाते हैं—'ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्।' (गीता ७।१८) समस्त भक्तोंकी अपेक्षा ज्ञानी भक्तकी विशेषता स्वयं श्रीभगवान् स्वीकार करते हैं—'तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते।' (गीता ७।१७) तुलसीदासजी भी ज्ञानको ही साक्षात् मोक्षप्रद बतलाते हैं— धर्म तें बिरति जोग तें ग्याना। ग्यान मोच्छप्रद बेद बखाना॥ (रा०च०मा० ३।१६।१) भेद गये बिनु रघुपति अति न हरहिं जग-जाल॥ (विनय-पत्रिका २०३।१५) 'सकल दृश्य निज उदर मेलि, सोवै निद्रा तजि जोगी। सोइ हरिपद अनुभवै परम सुख, अतिसय द्वैत-बियोगी॥ (विनय-पत्रिका १६७।४) साथ ही जब द्वैत अज्ञानका कार्य है, तब उसकी निवृत्तिके लिये ज्ञानकी अपेक्षा है ही—'क्रोध कि द्वैतबुद्धि बिनु द्वैत कि बिनु अग्यान' (रा०च०मा० ७।१११ (ख)) साथ ही भक्तिका ज्ञान साधनोंमें वर्णन स्पष्ट है— 'मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी।' (गीता १३।१०) मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते। स गुणान्समतीत्यैतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते॥ (गीता १४।२६) यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ। तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः। (श्वेताश्वतर० ६।२३) श्रद्धाभक्तिध्यानयोगादवेहि॥ इत्यादि श्रुतियोंके द्वारा यह सिद्ध होता है कि भक्तिसे ही ब्रह्मात्मतत्त्वका साक्षात्कार होता है। भक्ति और ज्ञानका स्वरूप इन दोनों पक्षोंपर विचार करनेके पहले यह समझ लेना चाहिये कि भक्तिपदका प्रयोग कहाँ होता