भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६७० भक्तिसुधा ज्ञान और भक्ति ज्ञान बड़ा या भक्ति बड़ी बड़े कुतूहलके साथ लोगोंका प्रश्न होता है कि ज्ञान बड़ा कि भक्ति बड़ी ? कुछ लोग ज्ञानकी महिमा दिखलाते हुए भक्तिका अपकर्ष दिखलाते हैं तो कुछ लोग भक्तिकी महिमाके सामने ज्ञानको निकृष्ट ठहराते हैं। कोई भक्तिको ज्ञानका साधन कहते हैं। गोस्वामी तुलसीदासजीका कहना है कि ज्ञानसे विश्वास और विश्वाससे प्रीति होती है और प्रीतिसे ही भक्तिमें दृढ़ता आती है— जानें बिनु न होइ परतीती। बिनु परतीति होइ नहिं प्रीती ॥ प्रीति बिना नहिं भगति दृढ़ाई। जिमि खगपति जल कै चिकनाई ॥ (रा०च०मा० ७।८९।७-८) भक्तिमणि प्राप्त करनेके लिये भी ज्ञान-वैराग्यको साधन ही माना गया है— पावन पर्बत बेद पुराना। राम कथा रुचिराकर नाना ॥ मर्मी सज्जन सुमति कुदारी। ग्यान बिराग नयन उरगारी ॥ भाव सहित खोजइ जो प्रानी। पाव भगति मनि सब सुख खानी ॥ (रा०च०मा० ७।१२०।१३-१५) भक्तिके बिना जो ज्ञानको ढूंढ़ते हैं, वे मन्दभाग्य हैं। वे मानो कामधेनुको छोड़कर दूधके लिये आक ढूंढ़ते हैं— जे असि भगति जानि परिहरहीं। केवल ग्यान हेतु श्रम करहीं ॥ ते जड़ कामधेनु गृहँ त्यागी। खोजत आकु फिरहिं पय लागी ॥ (रा०च०मा० ७।११५।१-२) श्रीमद्भागवतमें भी कहा है— येऽन्येऽरविन्दाक्ष विमुक्तमानिन- स्त्वय्यस्तभावादविशुद्धबुद्धयः । आरुह्य कृच्छ्रेण परं पदं ततः पतन्त्यधोऽनादृतयुष्मदङ्घ्रयः ॥ (१०।२।३२) अर्थात् हे कमलनयन! जो ज्ञानके प्रभावसे अपनेको निर्मुक्त जाननेवाले हैं या ज्ञानी मानते हैं, परंतु आपके श्रीचरणारविन्दप्रेमद्वारा जिनकी बुद्धि शुद्ध नहीं है, वे बड़ी कठिनाईसे उच्चतम पदपर आरूढ़ होकर भी पुनः पतित हो जाते हैं; क्योंकि उन्होंने आपके श्रीचरण-कमलका आदर नहीं किया। जे ग्यान मान बिमत्त तव भव हरनि भक्ति न आदरी। ते पाइ सुर दुर्लभ पदादपि परत हम देखत हरी ॥ (रा०च०मा० ७।१३।छन्द ३) नानुव्रजति यो मोहाद् व्रजन्तं हरिमीश्वरम्। ज्ञानाग्निदग्धकर्माऽपि स भवेद् राक्षसाधमः ॥ अर्थात् श्रीहरिकी रथयात्रामें जो मोहवश उनका अनुगमन नहीं करता, वह ज्ञानाग्निदग्धकर्मा होकर भी राक्षसाधम हो जाता है। जो ज्ञानप्रयासको छोड़कर सन्तोंको भी मुखरित करनेवाली श्रवणरन्ध्रमें प्राप्त भगवान्की वार्ताको शरीर, वाक् तथा मनसे प्रणाम करता हुआ जीवन व्यतीत करता है, वह त्रिलोकीमें अजितभगवान्को भी जीत लेता है अर्थात् मनोवचनातीत भगवान्को अपने तनु तथा मनके वशमें कर लेता है— ज्ञाने प्रयासमुदपास्य नमन्त एव जीवन्ति सन्मुखरितां भवदीयवार्ताम्। स्थाने स्थिताः श्रुतिगतां तनुवाङ्मनोभि- र्ये प्रायशोऽजित जितोऽप्यसि तैस्त्रिलोक्याम् ॥ (श्रीमद्भा० १०।१४।३) तथा न ते माधव तावकाः क्वचिद् भ्रश्यन्ति मार्गात्त्वयि बद्धसौहृदाः। त्वयाभिगुप्ता विचरन्ति निर्भया विनायकानीकपमूर्धसु प्रभो॥ (श्रीमद्भा० १०।२।३३) भगवान्के साथ जिनका सौहार्द सुदृढ़ है, ऐसे भगवान्के भक्त कभी भी मार्गसे नहीं गिरते, अपितु वे भगवान्द्वारा सुरक्षित हो विघ्नसेनानियोंके सिरपर पादविन्यास करते हुए निर्भय विचरते हैं। या निर्वृतिस्तनुभृतां तव पादपद्म- ध्यानाद्भवज्जनकथाश्रवणेन वा स्यात्।