भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 679

संकल्प-बल ६६९ तुलसी अपने राम को रीझ भजै की खीझ। वपे बीज दुहुँ जमि हैं उलटे पड़े कि सीध॥ परंतु वैदिक मन्त्रोंमें, प्रणवमें, गायत्रीमें देश, काल, जाति, नियम आदि भी अपेक्षित होते हैं। जैसे विभिन्न तृणों-वीरुधोंके विशिष्ट संश्लेष-विश्लेषणोंसे विभिन्न शक्तिसम्पन्न औषधियाँ तैयार होती हैं। उनमें भी किस यन्त्रमें किस तरहकी औषधियाँ बन सकती हैं, किस यन्त्रमें किस तरहकी, इस विषयके विशिष्ट नियम हैं। सब यन्त्रोंमें सब औषधियाँ नहीं बन सकतीं। न सब पात्रोंमें रखी ही जा सकती हैं। जैसे भिन्न-भिन्न यन्त्रोंसे भिन्न-भिन्न कार्य सम्पन्न हो सकते हैं, वैसे ही भिन्न-भिन्न कर्म और भिन्न-भिन्न मन्त्रोंके भिन्न-भिन्न अधिकारी हैं। अतएव जिन प्राणियों- मनुष्योंका मन्त्रोंद्वारा निषेकादिश्मशानान्त संस्कार कहा गया है, वे ही शास्त्रोंके पठनके अधिकारी हैं। निषेकादिश्मशानान्तो मन्त्रैर्यस्योदितो विधिः। तस्य शास्त्रेऽधिकारोऽस्मिञ्ज्ञेयो नान्यस्य कस्यचित्॥ (मनुस्मृति २।१६) उपनयनादि संस्कारसम्पन्न प्राणी ही श्रुति, स्मृति आदिके अध्ययनका अधिकारी होता है। एवं द्विजातिमापन्नो विमुक्तो वान्यदोषतः। श्रुतिस्मृतिपुराणानां भवेदध्ययनक्षमः॥ नृसिंहतापनीयोपनिषदादि ग्रन्थोंमें यह भी स्पष्ट है कि स्त्री और शूद्र सावित्री, प्रणव, यजुः आदिका उच्चारण न करें। उनको उपदेश करनेवाला और वे-दोनों ही ऐसा करनेसे अधोगतिको प्राप्त होते हैं। पूर्वमीमांसा और उत्तरमीमांसा दोनोंमें ही इसपर विचार किया गया है कि शूद्र आदिकोंको उपनयन- संस्कारका विधान नहीं है, अतः वे वेदाध्ययनादिके अधिकारी नहीं हैं। इन बातोंसे कुछ लोग जातिद्वेषकी कल्पना करते हैं, परंतु वस्तुस्थितिकी दृष्टिसे ही शास्त्रोंने ऐसा नियम बनाया है। माँ बच्चेके हाथसे इक्षुदण्ड छीन लेती है, परंतु शर्करासिता बड़े प्रेमसे बच्चेको प्रदान करती है। इस विषयमें द्वेषकी कल्पना व्यर्थ है, माँ केवल हितबुद्धिसे ही ऐसा करती है। इसी तरह शास्त्रोंने शूद्रोंको वेदादि शास्त्रोंका सार इतिहास-पुराणादि श्रवणद्वारा ज्ञात कराकर वेदादिके अध्ययनका निषेध किया है। जैसे हर एक यन्त्रसे हर एक चीज नहीं बनती, वैसे ही हर एक शरीरसे हर एक मन्त्रका उच्चारण ठीक नहीं। शास्त्रोंके द्वारा ही इसका निर्णय होता है। ब्राह्मणका मदिरा-बिन्दुपान और शूद्रका वेदाक्षर- विचार उन दोनोंके लिये हानिकारक होता है। त्रैवर्णिकोंके लिये प्रणवयुक्त मन्त्र और शूद्र, स्त्रियोंके लिये प्रणवरहित मन्त्रका ही जपविधान है। द्वादशाक्षर मन्त्रके विषयमें कहा गया है कि यह मन्त्र सर्वसिद्धि- प्रदायक है। स्त्री-शूद्रोंके लिये वितार अर्थात् प्रणवरहित और द्विजातियोंके लिये सतार मन्त्रका जप ठीक है— द्वादशार्णो महामन्त्रो भुक्तिमुक्तिप्रदायकः। स्त्रीशूद्राणां वितारोऽयं सतारस्तु द्विजन्मनाम्॥ (बृहन्नारदीयपु०, पृ० ७०।७३) अभिप्राय यह है कि ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’— द्वादशाक्षर मन्त्र विधिवत् यज्ञोपवीत- सम्पन्न व्यक्तियोंके लिये है, अन्योंके लिये ‘ॐ’ के स्थानपर तान्त्रिक प्रणव ‘ह्रीं’ या ‘ऐं’ आदिके सहित जपका विधान है। ब्राह्मण अध्ययन-अध्यापन दोनोंका अधिकारी है। क्षत्रिय-वैश्य वेदादि शास्त्रोंके अध्ययनके अधिकारी हैं, अध्यापनके नहीं। शूद्र, स्त्री आदि इतिहास- पुराणादिका श्रवण करके उपासना, ज्ञान और अपने अधिकारानुसार कर्मोंका ज्ञान प्राप्त करके प्रवृत्त हों तो उसीसे कल्याण होगा। इस तरह वेदादि शास्त्रों, प्रणवादि मन्त्रोंमें जातिविशेषकी अपेक्षा होती है, संस्कारोंकी अपेक्षा होती है, श्मशानादि एवं अन्यान्य अपवित्र स्थानों, सूतक-पातकादिवालोंको बचाकर पवित्र देश-कालमें संस्कारसम्पन्न होकर गायत्री आदि मन्त्रोंका जप कल्याणकारक होता है।