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भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

संकल्प-बल ६६९ तुलसी अपने राम को रीझ भजै की खीझ। वपे बीज दुहुँ जमि हैं उलटे पड़े कि सीध॥ परंतु वैदिक मन्त्रोंमें, प्रणवमें, गायत्रीमें देश, काल, जाति, नियम आदि भी अपेक्षित होते हैं। जैसे विभिन्न तृणों-वीरुधोंके विशिष्ट संश्लेष-विश्लेषणोंसे विभिन्न शक्तिसम्पन्न औषधियाँ तैयार होती हैं। उनमें भी किस यन्त्रमें किस तरहकी औषधियाँ बन सकती हैं, किस यन्त्रमें किस तरहकी, इस विषयके विशिष्ट नियम हैं। सब यन्त्रोंमें सब औषधियाँ नहीं बन सकतीं। न सब पात्रोंमें रखी ही जा सकती हैं। जैसे भिन्न-भिन्न यन्त्रोंसे भिन्न-भिन्न कार्य सम्पन्न हो सकते हैं, वैसे ही भिन्न-भिन्न कर्म और भिन्न-भिन्न मन्त्रोंके भिन्न-भिन्न अधिकारी हैं। अतएव जिन प्राणियों- मनुष्योंका मन्त्रोंद्वारा निषेकादिश्मशानान्त संस्कार कहा गया है, वे ही शास्त्रोंके पठनके अधिकारी हैं। निषेकादिश्मशानान्तो मन्त्रैर्यस्योदितो विधिः। तस्य शास्त्रेऽधिकारोऽस्मिञ्ज्ञेयो नान्यस्य कस्यचित्॥ (मनुस्मृति २।१६) उपनयनादि संस्कारसम्पन्न प्राणी ही श्रुति, स्मृति आदिके अध्ययनका अधिकारी होता है। एवं द्विजातिमापन्नो विमुक्तो वान्यदोषतः। श्रुतिस्मृतिपुराणानां भवेदध्ययनक्षमः॥ नृसिंहतापनीयोपनिषदादि ग्रन्थोंमें यह भी स्पष्ट है कि स्त्री और शूद्र सावित्री, प्रणव, यजुः आदिका उच्चारण न करें। उनको उपदेश करनेवाला और वे-दोनों ही ऐसा करनेसे अधोगतिको प्राप्त होते हैं। पूर्वमीमांसा और उत्तरमीमांसा दोनोंमें ही इसपर विचार किया गया है कि शूद्र आदिकोंको उपनयन- संस्कारका विधान नहीं है, अतः वे वेदाध्ययनादिके अधिकारी नहीं हैं। इन बातोंसे कुछ लोग जातिद्वेषकी कल्पना करते हैं, परंतु वस्तुस्थितिकी दृष्टिसे ही शास्त्रोंने ऐसा नियम बनाया है। माँ बच्चेके हाथसे इक्षुदण्ड छीन लेती है, परंतु शर्करासिता बड़े प्रेमसे बच्चेको प्रदान करती है। इस विषयमें द्वेषकी कल्पना व्यर्थ है, माँ केवल हितबुद्धिसे ही ऐसा करती है। इसी तरह शास्त्रोंने शूद्रोंको वेदादि शास्त्रोंका सार इतिहास-पुराणादि श्रवणद्वारा ज्ञात कराकर वेदादिके अध्ययनका निषेध किया है। जैसे हर एक यन्त्रसे हर एक चीज नहीं बनती, वैसे ही हर एक शरीरसे हर एक मन्त्रका उच्चारण ठीक नहीं। शास्त्रोंके द्वारा ही इसका निर्णय होता है। ब्राह्मणका मदिरा-बिन्दुपान और शूद्रका वेदाक्षर- विचार उन दोनोंके लिये हानिकारक होता है। त्रैवर्णिकोंके लिये प्रणवयुक्त मन्त्र और शूद्र, स्त्रियोंके लिये प्रणवरहित मन्त्रका ही जपविधान है। द्वादशाक्षर मन्त्रके विषयमें कहा गया है कि यह मन्त्र सर्वसिद्धि- प्रदायक है। स्त्री-शूद्रोंके लिये वितार अर्थात् प्रणवरहित और द्विजातियोंके लिये सतार मन्त्रका जप ठीक है— द्वादशार्णो महामन्त्रो भुक्तिमुक्तिप्रदायकः। स्त्रीशूद्राणां वितारोऽयं सतारस्तु द्विजन्मनाम्॥ (बृहन्नारदीयपु०, पृ० ७०।७३) अभिप्राय यह है कि ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’— द्वादशाक्षर मन्त्र विधिवत् यज्ञोपवीत- सम्पन्न व्यक्तियोंके लिये है, अन्योंके लिये ‘ॐ’ के स्थानपर तान्त्रिक प्रणव ‘ह्रीं’ या ‘ऐं’ आदिके सहित जपका विधान है। ब्राह्मण अध्ययन-अध्यापन दोनोंका अधिकारी है। क्षत्रिय-वैश्य वेदादि शास्त्रोंके अध्ययनके अधिकारी हैं, अध्यापनके नहीं। शूद्र, स्त्री आदि इतिहास- पुराणादिका श्रवण करके उपासना, ज्ञान और अपने अधिकारानुसार कर्मोंका ज्ञान प्राप्त करके प्रवृत्त हों तो उसीसे कल्याण होगा। इस तरह वेदादि शास्त्रों, प्रणवादि मन्त्रोंमें जातिविशेषकी अपेक्षा होती है, संस्कारोंकी अपेक्षा होती है, श्मशानादि एवं अन्यान्य अपवित्र स्थानों, सूतक-पातकादिवालोंको बचाकर पवित्र देश-कालमें संस्कारसम्पन्न होकर गायत्री आदि मन्त्रोंका जप कल्याणकारक होता है।

६७० भक्तिसुधा ज्ञान और भक्ति ज्ञान बड़ा या भक्ति बड़ी बड़े कुतूहलके साथ लोगोंका प्रश्न होता है कि ज्ञान बड़ा कि भक्ति बड़ी ? कुछ लोग ज्ञानकी महिमा दिखलाते हुए भक्तिका अपकर्ष दिखलाते हैं तो कुछ लोग भक्तिकी महिमाके सामने ज्ञानको निकृष्ट ठहराते हैं। कोई भक्तिको ज्ञानका साधन कहते हैं। गोस्वामी तुलसीदासजीका कहना है कि ज्ञानसे विश्वास और विश्वाससे प्रीति होती है और प्रीतिसे ही भक्तिमें दृढ़ता आती है— जानें बिनु न होइ परतीती। बिनु परतीति होइ नहिं प्रीती ॥ प्रीति बिना नहिं भगति दृढ़ाई। जिमि खगपति जल कै चिकनाई ॥ (रा०च०मा० ७।८९।७-८) भक्तिमणि प्राप्त करनेके लिये भी ज्ञान-वैराग्यको साधन ही माना गया है— पावन पर्बत बेद पुराना। राम कथा रुचिराकर नाना ॥ मर्मी सज्जन सुमति कुदारी। ग्यान बिराग नयन उरगारी ॥ भाव सहित खोजइ जो प्रानी। पाव भगति मनि सब सुख खानी ॥ (रा०च०मा० ७।१२०।१३-१५) भक्तिके बिना जो ज्ञानको ढूंढ़ते हैं, वे मन्दभाग्य हैं। वे मानो कामधेनुको छोड़कर दूधके लिये आक ढूंढ़ते हैं— जे असि भगति जानि परिहरहीं। केवल ग्यान हेतु श्रम करहीं ॥ ते जड़ कामधेनु गृहँ त्यागी। खोजत आकु फिरहिं पय लागी ॥ (रा०च०मा० ७।११५।१-२) श्रीमद्भागवतमें भी कहा है— येऽन्येऽरविन्दाक्ष विमुक्तमानिन- स्त्वय्यस्तभावादविशुद्धबुद्धयः । आरुह्य कृच्छ्रेण परं पदं ततः पतन्त्यधोऽनादृतयुष्मदङ्घ्रयः ॥ (१०।२।३२) अर्थात् हे कमलनयन! जो ज्ञानके प्रभावसे अपनेको निर्मुक्त जाननेवाले हैं या ज्ञानी मानते हैं, परंतु आपके श्रीचरणारविन्दप्रेमद्वारा जिनकी बुद्धि शुद्ध नहीं है, वे बड़ी कठिनाईसे उच्चतम पदपर आरूढ़ होकर भी पुनः पतित हो जाते हैं; क्योंकि उन्होंने आपके श्रीचरण-कमलका आदर नहीं किया। जे ग्यान मान बिमत्त तव भव हरनि भक्ति न आदरी। ते पाइ सुर दुर्लभ पदादपि परत हम देखत हरी ॥ (रा०च०मा० ७।१३।छन्द ३) नानुव्रजति यो मोहाद् व्रजन्तं हरिमीश्वरम्। ज्ञानाग्निदग्धकर्माऽपि स भवेद् राक्षसाधमः ॥ अर्थात् श्रीहरिकी रथयात्रामें जो मोहवश उनका अनुगमन नहीं करता, वह ज्ञानाग्निदग्धकर्मा होकर भी राक्षसाधम हो जाता है। जो ज्ञानप्रयासको छोड़कर सन्तोंको भी मुखरित करनेवाली श्रवणरन्ध्रमें प्राप्त भगवान्‌की वार्ताको शरीर, वाक् तथा मनसे प्रणाम करता हुआ जीवन व्यतीत करता है, वह त्रिलोकीमें अजितभगवान्‌को भी जीत लेता है अर्थात् मनोवचनातीत भगवान्‌को अपने तनु तथा मनके वशमें कर लेता है— ज्ञाने प्रयासमुदपास्य नमन्त एव जीवन्ति सन्मुखरितां भवदीयवार्ताम्। स्थाने स्थिताः श्रुतिगतां तनुवाङ्मनोभि- र्ये प्रायशोऽजित जितोऽप्यसि तैस्त्रिलोक्याम् ॥ (श्रीमद्भा० १०।१४।३) तथा न ते माधव तावकाः क्वचिद् भ्रश्यन्ति मार्गात्त्वयि बद्धसौहृदाः। त्वयाभिगुप्ता विचरन्ति निर्भया विनायकानीकपमूर्धसु प्रभो॥ (श्रीमद्भा० १०।२।३३) भगवान्‌के साथ जिनका सौहार्द सुदृढ़ है, ऐसे भगवान्‌के भक्त कभी भी मार्गसे नहीं गिरते, अपितु वे भगवान्‌द्वारा सुरक्षित हो विघ्नसेनानियोंके सिरपर पादविन्यास करते हुए निर्भय विचरते हैं। या निर्वृतिस्तनुभृतां तव पादपद्म- ध्यानाद्भवज्जनकथाश्रवणेन वा स्यात्।

ज्ञान और भक्ति ६७१ सा ब्रह्मणि स्वमहिमन्यपि नाथ मा भूत् किं त्वन्तकासिलुलितात्पततां विमानात्॥ (श्रीमद्भा० ४।९।१०) भक्तोंको भगवान्‌के श्रीचरणारविन्दके ध्यानमें रस मिलता है, किंवा भगवद्भक्तोंके चरित्र-श्रवणसे जो रस व्यक्त होता है, वह स्वप्रकाश, स्वमहिमास्थित भगवान्‌में भी नहीं व्यक्त होता। फिर अन्तककी तलवारसे विलुलित विमानोंसे गिरनेवाले लोगोंके सुखोंकी तो चर्चा ही क्या है? इसके सिवाय यह भी है कि ज्ञान हो जानेपर भी भक्तिके बिना उसकी शोभा नहीं होती। नैष्कर्म्यमप्यच्युतभाववर्जितं न शोभते ज्ञानमलं निरञ्जनम्। कुतः पुनः शश्वदभद्रमीश्वरे न चार्पितं कर्म यदप्यकारणम्॥ (श्रीमद्भा० १।५।१२) सोह न राम पेम बिनु ग्यानू। करनधार बिनु जिमि जलजानू॥ (रा०च०मा० २।२७७।५) ज्ञान, वैराग्य, धर्म और कर्म यह सभी प्रेम- लक्षणा भक्तिसे ही सुशोभित होते हैं। उसके बिना सब निरर्थक हो जाते हैं— सो सुखु करमु धरमु जरि जाऊ। जहँ न राम पद पंकज भाऊ॥ जोगु कुजोगु ग्यानु अग्यानू। जहँ नहिं राम पेम परधानू॥ (रा०च०मा० २।२९१।१-२) साथ ही ज्ञानके उत्कर्षका भी पक्ष प्रसिद्ध ही है। 'न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते' (गीता ४।३८) अर्थात् ज्ञानके समान कोई भी पवित्र नहीं है। 'वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः' (गीता ७।१९) सब कुछ वासुदेव ही हैं, ऐसा ज्ञानवान् महात्मा अत्यन्त दुर्लभ है। ज्ञानको छोड़कर दूसरा कल्याणका मार्ग ही नहीं है। बिना ज्ञानके मुक्ति होती ही नहीं—'तमेव विदित्वाति मृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय॥' (श्वेताश्वतर० ६।१५) 'ऋते ज्ञानान्न मुक्तिः।' 'नैनमविदितो देवो भुनक्ति।' अर्थात् यह देव बिना ज्ञानके प्राणीका अन्तर्रात्मा होकर भी पालन नहीं करता अर्थात् सर्वानर्थसे विनिर्मुक्त नहीं करता। भगवान् ज्ञानीको प्रत्यक्ष अपना आत्मा ही बतलाते हैं—'ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्।' (गीता ७।१८) समस्त भक्तोंकी अपेक्षा ज्ञानी भक्तकी विशेषता स्वयं श्रीभगवान् स्वीकार करते हैं—'तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते।' (गीता ७।१७) तुलसीदासजी भी ज्ञानको ही साक्षात् मोक्षप्रद बतलाते हैं— धर्म तें बिरति जोग तें ग्याना। ग्यान मोच्छप्रद बेद बखाना॥ (रा०च०मा० ३।१६।१) भेद गये बिनु रघुपति अति न हरहिं जग-जाल॥ (विनय-पत्रिका २०३।१५) 'सकल दृश्य निज उदर मेलि, सोवै निद्रा तजि जोगी। सोइ हरिपद अनुभवै परम सुख, अतिसय द्वैत-बियोगी॥ (विनय-पत्रिका १६७।४) साथ ही जब द्वैत अज्ञानका कार्य है, तब उसकी निवृत्तिके लिये ज्ञानकी अपेक्षा है ही—'क्रोध कि द्वैतबुद्धि बिनु द्वैत कि बिनु अग्यान' (रा०च०मा० ७।१११ (ख)) साथ ही भक्तिका ज्ञान साधनोंमें वर्णन स्पष्ट है— 'मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी।' (गीता १३।१०) मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते। स गुणान्समतीत्यैतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते॥ (गीता १४।२६) यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ। तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः। (श्वेताश्वतर० ६।२३) श्रद्धाभक्तिध्यानयोगादवेहि॥ इत्यादि श्रुतियोंके द्वारा यह सिद्ध होता है कि भक्तिसे ही ब्रह्मात्मतत्त्वका साक्षात्कार होता है। भक्ति और ज्ञानका स्वरूप इन दोनों पक्षोंपर विचार करनेके पहले यह समझ लेना चाहिये कि भक्तिपदका प्रयोग कहाँ होता

६७२ भक्तिसुधा है। वैदिकोंकी दृष्टिमें कर्म, उपासना और ज्ञान—ये तीन साधन प्राणियोंके कल्याणके मूल हैं। कर्मसे मलकी निवृत्ति, उपासनासे विक्षेपकी निवृत्ति और ज्ञानसे आवरणकी निवृत्ति होती है। मल, विक्षेप, आवरण—इन तीनों उपद्रवोंसे उपद्रुत होकर अन्तरात्मा अनन्त अनर्थोंका भागी होता है। इन तीनों साधनोंसे तीनों उपद्रवोंके निवृत्त हो जानेपर अन्तरात्माकी शुद्धप्रत्यक्चैतन्याभिन्न परब्रह्मस्वरूपसे अवस्थिति होती है। इस पक्षसे वेदशास्त्रानुसार देहेन्द्रिय, मन, बुद्धि, चित्त और अहंकारकी, सन्ध्या, तर्पण, वैश्वदेव, अग्निहोत्र, दर्शपूर्णमास, चातुर्मास्यादि श्रौत-स्मार्त कर्मलक्षण चेष्टाएं ही कर्म हैं। सगुण, साकार सच्चिदानन्दघन परब्रह्माकाराकारित स्निग्ध अन्तःकरणकी वृत्ति- परम्परा ही उपासना या भक्ति है। साथ ही सगुण, निराकार परब्रह्माकाराकारित अन्तःकरणवृत्ति- परम्परा एवं निर्गुण, निराकार ब्रह्माकारवृत्तिको भी उपासना या भक्ति कहा जाता है। कुछ लोग कहते हैं कि निर्गुण, निराकार ब्रह्माकारवृत्तिको ज्ञान कहते हैं और सगुण, साकार ब्रह्माकारस्नेहात्मिकावृत्तिको भक्ति कहते हैं। वस्तुतः ब्रह्माकारवृत्तिपरम्पराको कर्म और ज्ञान दोनों ही कहा जा सकता है, परंतु सारांश यही है कि प्रमाण एवं वस्तुसे परतन्त्र-वृत्ति ज्ञान है और पुरुषतन्त्रमानसी-वृत्ति कर्म है। वही श्रद्धा-स्नेह सहकृता उपासना या भक्ति है। ज्ञानमें प्राणी परतन्त्र होता है, घ्राणसे गन्धका सन्निकर्ष होनेपर इच्छा न होते हुए भी गन्धज्ञान होता है। अतः ज्ञानमें पुरुषकी स्वतन्त्रता नहीं है, परंतु ध्यान या उपासनामें प्राणी स्वतन्त्र होता है। शास्त्रानुसार भगवान्‌की मूर्तिकी कल्पना करके प्राणी ध्यान कर सकता है। इस दृष्टिसे श्रद्धा- स्नेहसहित उपास्य ब्रह्मस्वरूपाकारवृत्तिप्रवाह उपासना है। वह उपास्यस्वरूप निर्गुण-निराकार, सगुण- निराकार और सगुण-साकार तीनों ही तरहका होता है। वस्तु एवं प्रमाणके अधीन उपास्याकारवृत्ति ज्ञान कहलाती है, जो कि उपासनाकी महिमासे ही हो सकता है, फिर भी वेदान्तियोंकी दृष्टिमें अनाद्य निर्वचनीय मूलाज्ञानका निवर्तक निर्गुण निराकारका ही ज्ञान होता है। अतः वही ज्ञान पदसे अधिक व्यपदिष्ट होता है। वह शान्त शुद्ध मनः सहकृत महावाक्यसे ही या महावाक्याभ्यासजन्यसंस्कारप्रचयसहकृत शान्त मनसे होता है। तदितर ज्ञान या साक्षात्कार उपासना मनसे होती है। परोक्ष ज्ञान वेदादि शास्त्रोंसे भी हो जाता है। इस सिद्धान्तके अनुसार शास्त्रानुसार किसी उपास्यस्वरूपका श्रद्धा-स्नेहसहित ध्यान उपासना है; वही भक्ति है। इस तरह सगुण भगवान्‌के समान ही निर्गुण ब्रह्मकी भी भक्ति होती है। इस भक्तिसे विक्षेपनिवृत्ति, चित्तकी एकाग्रता और भगवत्प्रसन्नता प्राप्त होती है। फिर निर्विघ्न रूपसे ही वेदान्त- श्रवणादिद्वारा निर्गुण निराकार निर्विकार ब्रह्मका साक्षात्कार होता है। अतएव शास्त्रोंमें वेदान्त- श्रवणादिद्वारा भगवत्साक्षात्कारमें भगवद्भक्ति या प्रपत्तिको मुख्य साधन बतलाया है—'तं ह देवमात्मबुद्धिप्रकाशं मुमुक्षुर्वै शरणमहं प्रपद्ये'॥ (श्वेताश्वतरो० ६।१८) अर्थात् आत्मबुद्धि प्रकाशित करनेवाले देवके मैं शरणागत हूँ। 'तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये' (गीता १५।४) उस आद्यपुरुषकी मैं शरण हूँ। 'यमेवैष वृणुते तेन लभ्यः' (कठोपनिषद् १।२।२३) स्मरण, भजन, भक्ति और प्रार्थनासे भी भगवान्‌की प्राप्ति अर्थात् बोध होता है। ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते ॥ × × × नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता ॥ (गीता १०।१०-११) भक्तिसे ज्ञानकी प्राप्ति भगवान्‌का भी कहना है कि श्रद्धासे भजनेवाले भक्तोंको मैं बुद्धियोग (ज्ञान) देता हूँ, जिससे वे मुझे प्राप्त कर लेते हैं। मैं स्वयं ही ज्ञान-दीपसे उनके अज्ञानको नष्ट कर देता हूँ। 'भक्त्या मामभिजानाति'

ज्ञान और भक्ति [पृ. ६७३]

(गीता १८।५५) भक्त भक्तिके द्वारा मुझे सम्यक् रूपसे जान लेता है। 'क्लृपि सम्पद्यमाने च' इस वार्तिकके उदाहरण- रूपसे भट्टोजिदीक्षितने कहा है कि 'भक्तिर्ज्ञानाय कल्पते, सम्पद्यत इत्यर्थः' अर्थात् भक्ति ही ज्ञानाकारसे परिणत होती है। सारांश यह है कि जैसे मृत्पिण्ड ही घटाकारमें परिणत होता है, वैसे ही भक्ति ही ज्ञान शुद्धसच्चिदानन्दघन ब्रह्मसाक्षात्काररूपसे परिणत होती है। सगुण साकार परब्रह्ममें आसक्त चित्त जब प्रेमोद्रेकसे निर्विचेष्ट हो जाता है, तब किसी भी प्रमेयकी प्रतीति नहीं होती। प्रमेय-प्रतीति मिटनेपर प्रमाण और प्रमाणाश्रय प्रमाताकी अप्रतीति स्वाभाविकी है। उस स्थितिमें वेदान्तद्वारा प्रमाता, प्रमाण, प्रमेय तीनोंके अवभासकरूपसे शुद्ध परब्रह्मका साक्षात्कार होता है। चित्तकी निर्विचेष्टताके बिना प्रमाता और प्रमाणकी प्रतीति कथमपि नहीं मिट सकती। बिना उसके मिटे सर्वोपद्रवविनिर्मुक्त निर्विकल्प चिदानन्द ब्रह्मका साक्षात्कार नहीं हो सकता। अष्टांगयोगका भी उपयोग इसी भगवदुपासनाद्वारा चित्तकी निर्विचेष्टतामें है। कपिल और देवहूतिके संवादमें इसीलिये सगुण-साकार ध्यानकी अत्यन्त प्रशंसा की गयी है। भगवान्‌के श्रीचरणारविन्द- मकरन्द-रसास्वादनमें विभोर मन सहजहीमें शान्त हो जाता है तथा उनके नख-मणि-चन्द्रिकासे धौतप्राय मन भगवान्‌के अमृतमय मुखचन्द्रके सौन्दर्य-माधुर्य- सुधा-समास्वादन करते-करते निर्विचेष्ट हो जाता है, बस, फिर उस प्रेमोन्मादमें विलीन मनको विचलित न करके—'तच्च त्यक्त्वा मदारोहो न किञ्चिदपि चिन्तयेत्॥' (श्रीमद्भागवत ११।१४।४४) उस समय 'एकमेकतराभावे यदा नोपलभामहे। त्रितयं तत्र यो वेद स आत्मा स्वाश्रयाश्रयः॥' (श्रीमद्भागवत २।१०।९)-के अनुसार प्रमाता, प्रमाण, प्रमेय और उनके अभावोंका भासक शुद्ध परब्रह्म स्वतः प्रकाशमान होता है, फिर वहाँ केवल महावाक्यकी अचिन्त्य शक्तिसे अनाद्यावरण सदाके लिये मिट जाता है। इस तरह द्रवीभूत स्निग्ध चित्तकी भगवदा- काराकारित वृत्तिरूप भक्ति ही निर्गुण निराकार निर्विकार परब्रह्मरूपसे व्यक्त होती है। फिर उससे शुद्ध ब्रह्मात्मनावस्थानरूप मोक्ष अपने-आप ही सिद्ध हो जाता है। इसलिये कुछ महानुभावोंने भक्तिसे ही मोक्ष माना है। ऐसी स्थितिमें भी 'तमेव विदित्वाति मृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यते।' (श्वेताश्वतर० ६।१५) इत्यादि श्रुतियोंका विरोध नहीं होता; क्योंकि ज्ञान द्वार-कोटिमें यहाँ भी मान्य ही है। जैसे पिण्ड- कपालादिद्वारा ही मृत्तिका घटका कारण बनती है, वैसे ही ज्ञानद्वारा ही भक्ति मोक्षका कारण बनती है। भक्तिका अर्थ ज्ञान है इसके अतिरिक्त आचार्योंने कहीं-कहीं भक्ति शब्दका ज्ञान ही अर्थ किया है। यद्यपि ऐसा अर्थ आपाततः पक्षपातपूर्ण-सा प्रतीत होता है, परंतु विचार करनेपर अनुचित प्रतीत नहीं होता। तथा च 'भजनं भक्तिः' इस व्युत्पत्तिके अनुसार भजन या सेवनको ही भक्ति कहा जाता है। वह सेवन केवल कायिक व्यापार ही नहीं, किंतु शरीर, इन्द्रिय, मन तीनोंहीसे सेव्यकी सेवा की जाती है। इतना ही क्यों, महानुभावोंने मानसी सेवाको ही परा या मुख्या सेवा माना है— 'कृष्णसेवा सदा कार्या मानसी सा परा मता।' (श्रीवल्लभाचार्य) श्रीकृष्णकी सेवा सदा करनी चाहिये, वह सेवा भी मानसी ही मुख्या है। अब प्रश्न होता है कि हस्त-पादादिसे तो सेवा-परिचर्या बन सकती है, परंतु मानसी सेवा कैसे हो? इसपर महानुभावोंने कहा है—'चेतस्तत्प्रवणं सेवा' अर्थात् चित्तकी श्रीकृष्णोन्मुखता ही सेवा है अर्थात् भगवान्‌की ओर भगवत्स्वरूपाकाराकारित मनोवृत्तिप्रवाह ही भगवान्‌की मानसी सेवा है। बस, उसीकी सिद्धिके लिये तनुजा, वित्तजा—उभय प्रकारकी सेवा अपेक्षित होती है। 'तत्सिद्धयै तनुवित्तजा'। इस तरह

६७४ भक्तिसुधा

मनोवृत्ति-प्रवाह भी सेवा ही है। सारांश यह हुआ कि सेव्याकार-मानसी-वृत्ति ही सेव्यकी सेवा है। यहाँपर भी कुछ महानुभाव आनुकूल्येन कृष्णाकारवृत्ति (कृष्णानुस्मरण)-को भक्ति कहते हैं। कुछ कृष्णाकारावृत्ति मात्रको भक्ति या सेवा मानते हैं। वह आनुकूल्येन किंवा प्रातिकूल्येन चाहे जैसी ही हो। जब सेव्याकार वृत्ति भक्ति है और सेव्य निर्गुण, निराकार, निर्विकार है तो निर्गुण, निराकार, निर्विकार ब्रह्माकाराकारित वृत्ति ही भक्ति हुई। फिर वह चाहे वस्तु और प्रमाणपरतन्त्र ज्ञानरूपा हो, चाहे पुरुषतन्त्र उपासनारूपा हो। निर्गुण, निराकार, निर्विकार परब्रह्माकाराकारित वृत्ति अवश्य ही भक्ति पदसे कही जा सकती है। अतएव—'भजति विषयाकारतां प्राप्नोति—इति भक्तिर्ज्ञानम्।' इस व्युत्पत्तिके अनुसार भी विषयाकारताको भजनेवाला ज्ञान भक्ति पदका अर्थ होता है। इस पक्षमें 'भक्त्या मामभिजानाति' (गीता १८।५५) इस स्थलमें भक्ति पदसे ज्ञानलक्षणा चतुर्थी भक्ति ही विवक्षित है। आर्त, अर्थार्थी, जिज्ञासु और ज्ञानी— चार प्रकारके भक्त होते हैं और उनकी भक्ति चार ही तरहकी होती है। ज्ञानीकी भक्ति ज्ञानरूपा ही है, ज्ञानीकी दृष्टिमें प्रत्यक्चैतन्याभिन्न भगवान्‌से भिन्न दूसरी वस्तु न हुई, न है और न होगी। अतः उसकी एकमात्र प्रीति भगवान्‌में ही है। इस तरह वह इतरोंसे विशिष्ट है। भगवान् उसे अपना आत्मा ही मानते हैं— 'ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्।' (गीता ७।१८) प्रकाश्यको प्रकाशन करता हुआ प्रकाश, प्रकाश्याकार होकर प्रकाश्याकारताको भजता है। इस दृष्टिसे ज्ञेयाकारताको प्राप्त ज्ञान भक्ति पदसे कहा गया है। इसी दृष्टिसे आचार्योंका कहना है कि— मोक्षकारणसामग्र्यां भक्तिरेव गरीयसी। स्वस्वरूपानुसन्धानं भक्तिरित्यभिधीयते ॥ स्वात्मतत्त्वानुसन्धानं भक्तिरित्यपरे जगुः। (विवेकचूडामणि ३२-३३) मोक्षकारण-सामग्रीमें भक्ति ही श्रेष्ठ है और स्वरूपानुसन्धान ही भक्ति है। यहाँ इस शंकाका कोई मूल्य नहीं रहता कि जब सेव्याकाराकारित वृत्तिको भक्ति कहा जाता है, तब तो एक सेवकको अवशेष रहना चाहिये। परंतु ऐसी स्थितिमें तो अद्वैतवाद ही असिद्ध रहेगा, क्योंकि व्यावहारिक सत्तावाला साधक ही पारमार्थिक विशुद्ध चिदानन्दात्मतत्त्वको अपना सेव्य बनायेगा, उस सेव्यसे भिन्न सभी व्यावहारिक ही हैं, पारमार्थिक तो एक अव्यवहार्य परमात्मतत्त्व ही रहता है— अक्षमा भवतः केयं साधकत्वप्रकल्पने। किं न पश्यति संसारं तत्रैवाज्ञानकल्पितम् ॥ (पञ्चदशी, वार्तिक) ज्ञान नामकी स्वतन्त्र वस्तु नहीं है इतनेपर भी इस सिद्धान्तमें उपासनारूप भक्ति ज्ञानसे पृथक् मान्य और आदरणीय होती ही है। उसकी कृपासे ही यह भक्ति भी प्राप्त होती है। साथ ही ठीक इसके विपरीत, अन्यान्य साम्प्रदायिक ब्रह्मसूत्र- भाष्यकारोंका कहना है कि उपासना ही भक्ति है और उससे भिन्न होकर ज्ञान नामकी स्वतन्त्र वस्तु नहीं है। 'अथातो ब्रह्मजिज्ञासा' यहाँपर भी इस मतमें वस्तुप्रमाणतन्त्र तत्त्वज्ञानमात्र नहीं विवक्षित है; क्योंकि उसका कुछ भी उपयोग नहीं है। 'राजा है' इस ज्ञान-मात्रसे कुछ नहीं सिद्ध होता, किंतु राजाका स्वसम्बन्धित्वेन ज्ञान ही उपकारक हो सकता है। ठीक इसी तरह वेदान्तवेद्य ब्रह्मका केवल ज्ञान निरर्थक है, किंतु 'गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत्।' इत्यादिके अनुसार स्वसम्बन्धित्वेन ज्ञानपूर्वक उपासनारूप विशिष्ट ज्ञान ही 'अथातो ब्रह्मजिज्ञासा' (ब्रह्मसूत्र १।१।१), 'ब्रह्मविदाप्नोति परम्।' (तैत्तिरीयोपनिषद् २।१) इत्यादि श्रुति- सूत्रोंमें विवक्षित है। अतएव 'य एवं वेद' इत्यादि स्थलोंमें वेदसे उपासना ही सर्वमान्य है, इसलिये

ज्ञान और भक्ति ६७५ ज्ञानकाण्डकी पृथक् कल्पना ही व्यर्थ है। वेदोंके दो काण्ड—कर्मकाण्ड और उपासनाकाण्ड कर्मकाण्ड और उपासनाकाण्ड दो ही काण्ड वेदोंमें हैं। चाहे पृथक् ज्ञानकाण्ड माना भी जाय तो भी वह कर्म और उपासना दोनोंका साधन है। कर्मके ज्ञानसे ही अनुष्ठान होगा, उपास्यज्ञानसे ही उसकी उपासना होती है। इस पक्षमें निर्गुण निराकार ब्रह्म सर्वथा अमान्य ही है और उस पक्षमें संसार या बन्ध सत्य ही है। अतः ज्ञानसे उसका मिटना असम्भव है। इसलिये भक्ति, प्रार्थना आदिसे ही बन्धनका छूटना और विशिष्ट आनन्दका लाभ सम्भव है। इस पक्षमें ज्ञानसे भक्तिका अत्यन्त उत्कर्ष स्पष्ट ही है, परंतु जो कर्मफल होनेसे मुक्तिकी अनित्यतासे भयभीत होते हैं और समझते हैं कि यदि बन्ध और संसार सत्य है तो उसकी आत्यन्तिक निवृत्ति असम्भव है, वे भगवान्‌को सगुण-साकारकी तरह निर्गुण-निराकार भी मानते हैं और कर्म, उपासनाके समान ही ज्ञानकाण्डका भी महत्त्व मानते हैं, उनके मतमें सुतरां उपर्युक्त मत अमान्य है। भक्तिका उत्कर्ष फिर भी कुछ महानुभाव कर्मकाण्ड, उपासनाकाण्ड और ज्ञानकाण्ड तीनोंको पृथक् मानते हुए भी भक्तिको ज्ञानसे उत्कृष्ट कहते हैं, तब भी उनका ज्ञानप्राप्त ब्रह्म, सगुण साकार परब्रह्मसे निम्न कोटिका है। ज्ञानप्रधान सच्चिदानन्द ब्रह्म ज्ञानप्राप्य है, आनन्दप्रधान ब्रह्म भक्तिप्राप्य है। वेदान्तवेद्य ब्रह्म आतपके समान है, भक्तिप्राप्य भगवान् सूर्यके समान है। सुतरां इस मतमें भी ज्ञानसे भक्तिका उत्कर्ष है। इन मतोंमें भी भक्तिका 'सा परानुरक्तिरीश्वरे' ईश्वरमें परमानुराग ही भक्ति है इत्यादि लक्षण मान्य हैं। वह भक्ति 'मर्यादा' और 'पुष्टि' किंवा 'वैधी' और 'रागानुरागा' भेदसे दो प्रकार की है। स्वतः अप्राप्त विधिगम्य भगवत्सेवन मर्यादा या वैधी है, भगवत्कृपाप्राप्त कामिन्यादिप्रीतिवत् रागवशात् भगवत्सेवन पुष्टि या रागानुरागा है। यह भक्ति परप्रेमरूपा है, स्वतःसिद्धा है, यह भगवान्‌की परमान्तरंगा शक्तिरूपा है। यह हेतुफलभावरहित है। स वै पुंसां परो धर्मो यतो भक्तिरधोक्षजे। अहैतुक्यप्रतिहता ययात्मा सम्प्रसीदति॥ (श्रीमद्भा० १।२।६) पुरुषोंकी भगवन्नामसंकीर्तनादि लक्षणा भक्ति ही परमोत्कृष्ट धर्म है, जिससे अधोक्षज भगवान्‌में अहैतुकी अप्रतिहता भक्ति होती है, जिससे कि अन्तरात्माका संप्रसाद होता है, यहाँ यह सिद्ध होता है कि जब 'यतः' इस पंचम्यन्तसे भक्तिका कार्यकारणभाव निर्धारित है, तब उसे अहैतुकी कैसे कहा जा सकता है? इसपर समाधान यह है कि वास्तवमें भक्तिका कारण बनता नहीं, यदि भगवत्कृपाको कारण कहें तो सम भगवान्‌में विषम कृपा कैसे सम्भव है? यदि कृपा भी सम हो, तब तो सभीको भक्ति-प्राप्ति होनी चाहिये। यदि भक्तकृपासे कहें तो वह भी ठीक नहीं; क्योंकि वह भी सम ही है। सर्वभूतेषु यः पश्येद् भगवद्भावमात्मनः। भूतानि भगवत्यात्मन्येष भागवतोत्तमः॥ (श्रीमद्भा० ११।२।४५) यदि— ईश्वरे तदधीनेषु बालिशेषु द्विषत्सु च। प्रेममैत्रीकृपोपेक्षा यः करोति स मध्यमः॥ (श्रीमद्भा० ११।२।४६) इस लक्षणके अनुसार मध्यम-भक्तकी कृपासे भक्तिका होना मानें सो भी ठीक नहीं, क्योंकि श्रद्धा- पुरस्सर मध्यम-भक्तके सेवनसे ही मध्यम-भक्तकी कृपा प्राप्त हो सकती है, परंतु श्रद्धा भी तो भक्ति ही है, वह पहले कैसे मिले? साधन और साध्यरूपसे भक्ति ही दो प्रकारकी है, उसमें भी अवस्था- भेदमात्रसे साध्य-साधनभाव बनते हैं। जैसे अपक्व आम्र, पक्व आम्रका हेतु होता है, वैसे ही साधनरूपा भक्तिका साध्यरूपा भक्तिके साथ साध्य-साधन-भाव होता है।

६७६ भक्तिसुधा अन्याभिलाषिताशून्यं ज्ञानकर्माद्यनावृतम्। आनुकूल्येन कृष्णानुशीलनं भक्तिरुत्तमा ॥ अर्थात् सर्वाभिलाषवर्जित ज्ञान और कर्मोंसे अनावृत अनुकूलतया श्रीकृष्णका अनुस्मरण ही भक्ति है। इन सिद्धान्तोंमें भक्ति ही सब कुछ है, उसके लिये ही समस्त साधन हैं, ज्ञान और मोक्ष आदि उसमें विघ्न हैं। भक्तजन भुक्ति, मुक्ति, विरक्ति सबको तिलांजलि देकर इस भक्तिको ही चाहते हैं। इसीलिये बड़े-बड़े अमलात्मा परमहंस महामुनीन्द्रगण भी अद्वैत, अनन्त, अखण्ड ब्रह्मसे मन हटाकर सगुण साकार भगवान्‌में मन लगाते हैं। तस्यारविन्दनयनस्य पदारविन्द- किञ्जल्कमिश्रतुलसीमकरन्दवायुः। अन्तर्गतः स्वविवरेण चकार तेषां सङ्क्षोभमक्षरजुषामपि चित्ततन्वोः ॥ (श्रीमद्भा० ३।१५।४३) अरविन्दनयन भगवान्‌के श्रीचरणारविन्दमकरन्द- मिश्रित तुलसिकाके मकरन्दररेणु जिस समय घ्राणरूप स्वविवरद्वारा सनकादिकोंके हृदयान्तर्गत हुए, बस उसी समय उन अक्षर ब्रह्मनिष्ठ सनकादिकोंके भी शरीर और मनमें क्षोभ हो गया। अर्थात् शरीरमें पुलकावली, नयनोंमें अश्रु और मनमें द्रवता उत्पन्न हो उठी। स्वसुखनिभृतचेतास्तद्व्युदस्तान्यभावोऽ- प्यजितरुचिरलीलाकृष्टसारस्तदीयम्। व्यतनुत कृपया यस्तत्त्वदीपं पुराणं तमखिलवृजिनघ्नं व्याससूनुं नतोऽस्मि ॥ (श्रीमद्भा० १२।१२।६८) 'स्वसुखेनैव निभृतं परिपूर्णं चेतो यस्य स तथोक्तः, तेनैव निरस्तः अन्यस्मिन् पदार्थे भावो भावना अस्तित्वबुद्धिर्यस्य स तथोक्तः।' श्रीशुकाचार्य, जिनका चित्त स्वस्वरूपभूत परमानन्द सुधासिन्धुसे ही परिपूर्ण हो गया था, तद्व्युदस्तान्यभाव अर्थात् स्वसुख-निभृतचेता होनेसे ही अन्यपदार्थविषयक अस्तित्व-बुद्धि जिनकी मिट गयी थी, जो केवल सर्वत्र एक परम तत्त्वका ही दर्शन करते थे, भगवान्‌की रुचिर लीलासे उनका भी धैर्य च्युत हो गया। उन्होंने स्वयं कहा है— परिनिष्ठितोऽपि नैर्गुण्य उत्तमश्लोकलीलया। गृहीतचेता राजर्षे आख्यानं यदधीतवान् ॥ (श्रीमद्भा० २।१।९) अर्थात् मेरा मन निर्गुण परब्रह्ममें परिनिष्ठित था, फिर भी उत्तमश्लोक भगवान्‌की लीलाने मेरे चित्तको खींच लिया। श्रीहरिके गुणोंसे आक्षिप्त-मति होकर भगवान् बादरायणिने श्रीमद्भागवतरूप महाख्यानका अध्ययन किया है— हरेर्गुणाक्षिप्तमतिर्भगवान् बादरायणिः। अध्यगान्महदाख्यानं नित्यं विष्णुजनप्रियः ॥ (श्रीमद्भा० १।७।११) लखी जिन लालकी मुसकान। तिनहिं बिसरी बेद बिधि सब योग संयम ज्ञान ॥ × × × आत्मारामारच मुनयो निर्ग्रन्था अप्युरुक्रमे। कुर्वन्त्यहैतुकीं भक्तिमित्थम्भूतगुणो हरिः ॥ (श्रीमद्भा० १।७।१०) भक्ति और वेदान्त फिर भी वेदान्तीगण इनके कुछ अंशोंमें विमति रखते ही हैं, उनकी दृष्टिमें जो निरतिशय परमानन्दरसात्मक वस्तु है, वही तो ब्रह्म है और उससे बढ़कर किसी फलकी कल्पना भी असम्भव है। अनन्तपदसमभिव्याहृत ब्रह्म पदका अर्थ ही निरतिशय बृहत् है। सर्वविधपरिच्छेद-शून्य ही निरतिशय बृहत् होता है। ऐसा होनेपर भी यदि सोपप्लव एवं अस्वप्रकाश हो तो वह निरतिशय बृहत्स्वरूप ब्रह्म पदार्थ होने योग्य नहीं है। अतः स्वप्रकाश परमानन्द रसात्मक ही उसे होना चाहिये। इस तरह अनन्त स्वप्रकाश परमानन्द ही ब्रह्म है। आतपकी अपेक्षा सूर्यमें जो अतिशयता है, वैसी अनन्त अतिशयताकी कल्पना करते-करते वाचस्पतिकी भी मति जहाँ परिश्रान्त हो जाय, वही वेदान्तियोंका ब्रह्म है। उसमें ही समस्त विश्व कल्पित है, उसीसे

ज्ञान और भक्ति ६७७ जीवादि विविध प्रकारका संसार उपस्थित होता है। उसके साक्षात्कारात्मक ज्ञानसे ही समस्त अनर्थोंकी निवृत्ति होती है। कर्मोपासनादि किसीसे भी उत्पन्न होनेवाला मोक्ष द्वैतात्म होनेसे एक संसार ही है। साथ ही उत्पाद्य, प्राप्य, संस्कार्य और विकार्य सभी कर्मफल जैसे अनित्य हैं, वैसे ही कर्मोपासनादि प्राप्य मोक्ष भी अनित्य ही होगा। निष्प्रपंच अद्वैत-सुखके लिये ही समस्त विश्वकी निद्रा या सुषुप्तिमें प्रवृत्ति होती है। जैसे निम्बके कीटको निम्बमें ही मिठास लगती है, उसे मिश्रीके मीठेपनपर हँसी आ सकती है, वैसे ही वादित्र, नृत्य, गीतादि द्वैतसुखमें रस लेनेवाले संसारियोंको अद्वैतसुखमें रस नहीं आता। फिर भी वह ऐसी वस्तु है कि चाहे उससे कोई अनभिज्ञतावश द्वेष ही करे, परंतु वह अपने स्वभावानुसार सबके प्रेमका आस्पद सबमें व्यक्त ही रहता है। आत्माके ज्ञान और उसकी महिमासे भले ही किसीको चिढ़ हो, परंतु आत्माका उत्कर्ष और बड़ाई सभी चाहते हैं। प्रेम भी उसमें सभीको करना पड़ता है। जब अपने सिद्धान्तमें, अपने हठमें, अपने देश, ग्राम, कुल, कुटुम्ब, क्षेत्र, वित्त, राज्यमें प्रेम होता है, तब क्या अपनेमें नहीं होगा? जब परमात्माकी ही मूर्तियोंमें-से अपनी इष्ट मूर्तिमें ही प्रेम होता है, अपने इष्टसे भिन्न परमात्माकी मूर्तिमें प्रेमाभाव ही नहीं, किंतु द्वेष होता है, तब क्या आत्मामें किसीको प्रेम नहीं होगा? शैव विष्णुमूर्तिसे द्वेष तथा वैष्णव शिव- मूर्तिसे द्वेष आत्मसम्बन्धाभावसे ही तो करते हैं। अपने इष्टमें तो सबको प्रेम होता ही है। साथ ही असहिष्णु भी अपनी बड़ाई—आत्ममहिमाको चाहता है, अपने सिद्धान्तकी बड़ाई चाहता है, इतना ही क्यों, 'अहं ब्रह्मास्मि' के सिद्धान्तका खण्डन करनेवाले ही अन्तमें स्वयं भगवान् बनने और रासलीला करनेका साहस करते हैं। उनके भक्त उन्हें प्रत्यक्ष अवतारी कहते हैं और वे सुन-सुनकर प्रसन्न होते हैं। कोई श्रीवृषभानु- नन्दिनीका अवतार तो कोई प्रिया-प्रियतम दोनोंका ही अवतार मानते और मनवाते हैं। यह सब स्वाभाविक आत्मप्रेमका ही विकृत रूप है। तभी तो भगवती श्रुतिने साफ कहा है कि सब कुछ आत्माके ही प्रेमका शेष है। देवतामें भी प्रेम आत्मार्थ ही होता है, आत्मकल्याणकारक आत्महितैषी देवतामें प्रेम और विपरीतमें द्वेष होता है। इसी तरह निम्न-से-निम्न कोटिके जीव और उच्च-से- उच्च कोटिके जीव सुषुप्तिमें अद्वैत निष्प्रपंच सुखका रस लेना चाहते हैं। किं बहुना उच्च-से-उच्च कोटिके ईश्वर भी योगनिद्रामें उसी निष्प्रपंच अद्वैत- सुखके अनुभवमें लवलीन होते हैं। दिव्यातिदिव्य वैषयिक सुख सामग्रियोंके उपस्थित रहनेपर भी योगनिद्राद्वारा निष्प्रपंच अद्वैत-सुखमें ही अधिकाधिक प्रवृत्ति होती है। प्राणी दिव्य कान्तादि स्पर्श-सुखसे विरत होकर सौषुप्त सुख चाहते हैं, फिर जब सावरण सौषुप्त अद्वैत सुखमें प्राणियोंकी ऐसी प्रीति होती है तो फिर निष्प्रपंच निरावरण अद्वैत ब्राह्म सुखकी महिमा कौन-कैसे कहे? अतएव अपरिच्छिन्न सुख वही है, जहाँ द्रष्टा, दर्शन, दृश्यकी समाप्ति है। वही भूमा सुख है। 'यत्र नान्यत्पश्यति नान्यच्छृणोति स भूमा, यो वै भूमा तत्सुखं, नाल्पे सुखमस्ति ।।' अर्थात् जहाँ अन्य अन्यको देखता-सुनता है, वहाँ अल्प ही सुख है। इस दृष्टिसे अनन्त, अखण्ड भूमा ब्रह्म ही परम सुख है, उससे अधिक सुखकी कल्पना सर्वथा अशास्त्रीय है। यह अनन्त अखण्ड भूमा ब्रह्म ही सगुण, साकार, सच्चिदानन्द ब्रह्म भी है। यही अपनी अचिन्त्य दिव्यलीलाशक्तिसे शिव, विष्णु, उमा, गणपति, भास्कररूपसे भी उपास्य होता है। जैसे विष्णुकी ही राम, कृष्ण, नृसिंह आदि रूपसे उपासना होती है, वैसे ही एक ही परमतत्त्वकी शिव, विष्णु आदि रूपसे उपासना होती है। 'व्यापक ब्रह्म निरंजन निर्गुन बिगत बिनोद।' (रा०च०मा० १।१९८)

६७८ भक्तिसुधा भक्ति और ज्ञानके उत्कर्ष तथा अपकर्षका चिन्तन व्यर्थ है परमतत्त्व ही अपनी अचिन्त्य दिव्य लीलाशक्तिसे सगुण, साकार, सच्चिदानन्दघनरूपमें व्यक्त होते हैं, उनके किसी रूपमें उत्कट उत्कण्ठा, प्रीति ही भक्ति है। भक्ति और ज्ञानके उत्कर्ष-अपकर्षका चिन्तन व्यर्थ है। भक्ति महारानीके ही शुभाशीर्वादसे विवेकरूपी नृपसे उपनिषदमें प्रबोध चन्द्रका उदय होता है। विवेकका मोहके साथ अनादि कालसे युद्ध चला आ रहा है। मोहके पक्षमें काम, क्रोध, अहंकार, लोभ, दम्भप्रभृति आदि अनेक भट हैं। विवेकके पक्षमें वैराग्य, विचार, शम, दम, क्षमा, दया, श्रद्धा, निवृत्ति आदि अनेक भट हैं। दलबल-सहित मोहपर विजय प्राप्त करके प्रबोधसहित परम पुरुष भगवान्‌का अंशभूत जीवात्मा कृतकृत्य होकर श्रीभक्तिमाताके चरणोंमें जाकर प्रणाम करता है। श्रीभक्ति भगवती उसे आशीर्वाद देती हैं और कहती हैं—'वत्स! मैं तो चिरकालसे इसी चिन्तामें थी कि किस तरह प्रबोधचन्द्रसहित विवेक विजयी होकर स्वभावतः शुद्ध-बुद्ध-मुक्त-स्वभाव परम पुरुषको स्व-स्वरूपस्थ करें। वह आज मेरा मनोरथ पूरा हुआ। वत्स! मैं आशीर्वाद देती हूँ।' जीवात्मा कृतकृत्य होकर कहता है—'अम्ब! आपके ही शुभानुसन्धानसे मैं कृतकृत्य हुआ हूँ। अब मैं यही चाहता हूँ कि आपके श्रीचरणोंमें मेरी सदा अटल श्रद्धा बनी रहे।' इस तरह प्रबुद्ध होकर भी जीवात्मा भक्तिदेवीका प्रेमी है, फिर भक्तिका उत्कर्ष जितना ही कहा जाय उतना ही कम है। श्रीमद्भागवतके माहात्म्यमें ज्ञान, वैराग्यको भक्ति महारानीका पुत्र कहा गया है और यह दिखाया गया है कि ये तीनों ही कलिके पाखण्डसे जर्जर एवं जीर्ण-शीर्ण हो गये थे। श्रीमद्वृन्दारण्यधामके संसर्गसे श्रीभक्तिदेवी तो नवीनस्वरूपा तरुणी हो गयीं, परंतु वहाँ ज्ञान, वैराग्यका कोई ग्राहक न था, अतः वे दोनों ज्यों-के- त्यों जीर्ण-शीर्ण क्षुत्क्षाम-शुष्क-कण्ठ होकर मूर्च्छितावस्थामें ही पड़े रहे। श्रीभक्तिदेवी स्वयं नवीना, सुरूपिणी तरुणी होकर भी अपने पुत्रोंकी दुर्दशा देखकर खिन्न होकर सोच रही थीं। उसका भाव यह था कि माताका जरठ होना उचित है, पुत्रका जरठत्व वार्धक्य अवश्य ही चिन्ताजनक है। कभी एक वृद्धा वैश्यानी स्त्री एक महात्मासे वरदान माँगने लगी—'महाराज! मैं तो यही माँगती हूँ कि मेरे बेटे, पोते मुझे कन्धेपर रखकर जला आयें।' महात्माने कहा कि 'जीते ही या मरनेपर?' सारांश यह कि कल्याणमयी, करुणामयी, पुत्रवत्सला अम्बा यही चाहती है कि 'मेरे सामने मेरे बेटे-पोते बने रहें, मरें नहीं, किंतु मैं ही उनके सामने मर जाऊँ।' बेटे-पोतेकी बीमारीको माँ अपने ऊपर बुलाती है। ठीक इसी तरह भक्ति माताको भी अपने पुत्र ज्ञान, वैराग्यकी वृद्धिमें ही शान्ति-संतोष होता है। वह उनका अनिष्ट नहीं देख सकती, उनके सामने अपना निधन चाहती है। माता पहले तो पुत्र बिना अपनेको वन्ध्या समझती है, अपना जीवन व्यर्थ समझती है, पुत्र-जन्मके लिये तरह-तरहके देवी- देवताओंको मनाती है। पुत्रके गर्भमें आते ही हर्षके मारे फूली नहीं समाती, गर्भस्थ बालकके हस्त, पादादि उत्क्षेपणसे कष्ट होनेपर भी उसे अपराध नहीं मानती, अब पुत्र बड़ा हो गया यह समझकर प्रसन्न होती है। पुत्रकी उत्पत्तिमें प्राणान्त कष्ट सहनकर भी आनन्दमें विभोर रहती है। स्वयं गीलेमें रहकर बालकको सूखेमें रखती है। मल, मूत्रादि अपने ऊपर लेती है। माँका हृदय कितना उदार होता है, वह पुत्रके लिये क्या-क्या नहीं करती है? ठीक इसी तरह ज्ञान-वैराग्यरूप पुत्रोत्पत्तिके बिना भक्ति अपनेको वन्ध्या मानती है और उसकी उत्पत्तिके लिये लालायित रहकर देवी-देवता मनाती है। फिर लालन-पालनकर बड़ा करती है, उनकी जीर्णता-शीर्णतामें वह फिर चिन्तित और खिन्न होती है। उनकी मूर्च्छा और जीर्णता-शीर्णता मिटानेके लिये फिर महात्माओंकी शरण जाकर उपाय चाहती है।

ज्ञान और भक्ति ६७९ श्रीभक्तिदेवीके इतने प्रिय पुत्र ज्ञान, वैराग्यके अपकर्षकी चिन्ता ही क्यों, जब श्रीभक्ति उनके बिना अपनेको वन्ध्या और उनके जन्म, समृद्धि, उन्नतिमें ही अपनेको सौभाग्यवती मानती है। माता बिना पुत्रके नहीं सोहती, पुत्र माताके अमरपुर पधारनेपर भी रह सकता है। तत्त्वज्ञान, वैराग्यसे भक्तको घृणा होना और उनका अपकर्ष सिद्ध करनेका प्रयत्न करना कहाँतक संगत है? साथ ही पुत्रका माताके प्रति क्या कर्तव्य है, यह भी सोचनेकी बात है। शास्त्रोंने पुत्रके लिये माता- पिताहीको परम दैवत कहा है। साक्षात् उमा- महेश्वररूपसे माता-पिताकी आराधना करनी चाहिये— 'मातृदेवो भव, पितृदेवो भव।' पिताकी अपेक्षा भी माताकी महिमा दशगुना अधिक है— 'पितुर्दशगुणा माता गौरवेणातिरिच्यते।' ऐसी स्थितिमें पुत्र कितनी भी उन्नतिको क्यों न प्राप्त कर ले, कितना अधिक पूज्य क्यों न हो तथापि उसमें मातृभक्तिका सदा ही रहना अनिवार्य होगा। ऐसा न होनेपर वह कृतघ्न समझा जाता है और उसका उद्धार होना असम्भव हो जाता है। अतः ज्ञान-वैराग्य उच्चतम होकर तथा परम पूज्यतम होकर भी अपनी अम्बा श्रीभक्ति महारानीके चरणोंमें अवश्य ही पूर्ण श्रद्धा-भक्ति रखेंगे। ऐसी स्थितिमें यदि कोई भी ज्ञानी या वैराग्यवान् श्रीभक्तिको नगण्य या निकृष्ट समझकर अनादर करे तो वह ज्ञानी नहीं, ठीक अज्ञानी और कृतघ्न ही है। इसीलिये वेदान्ताचार्यप्रवर भगवान् शंकरने कहा है— 'यावज्जीवं त्रयो वन्द्या वेदान्तो गुरूरीश्वरः। आदौ विद्याप्रसिद्ध्यर्थं कृतघ्नत्वापनुत्तये॥' वेदान्त, गुरु और श्रीहरि—इनका यावज्जीवन सदा ही वन्दन करना चाहिये, पहले विद्याप्राप्तिके लिये, पश्चात् कृतज्ञता प्रकटकर कृतघ्नता दूर करनेके लिये। इसीलिये शास्त्रोंमें कहीं भी भक्ति या ज्ञान किसीकी निन्दा नहीं है। भक्ति बिना ज्ञानकी उत्पत्ति ही असम्भव है, इसीलिये 'भक्त्या मामभिजानाति' इत्यादि उक्तियाँ हैं। भक्तिके बिना अन्तरात्माकी शुद्धि नहीं होती, दृढ़ ज्ञानका आविर्भाव नहीं होता, अतः भक्ति बिना ही जो विमुक्त-मानी हैं, वे ज्ञानी ही नहीं हैं। वे ही परिश्रमोंसे सत्कुलजन्म, विद्या, त्याग आदि उच्च पदपर आरूढ़ होकर भी कामादि दोषोंसे भ्रष्ट हो जाते हैं। उन्हींके लिये—'येऽन्येऽरविन्दाक्ष विमुक्तमानिनः' (श्रीमद्भा० १०।२।३२) इत्यादि उक्तियाँ हैं। यहाँ 'पर' पदका अर्थ ब्रह्मपदकी प्राप्ति, उसका अपरोक्ष एवं साक्षात्कार नहीं कहा गया है, क्योंकि ब्रह्मपद पानेके बाद पुनः पतन नहीं होता— 'न स पुनरावर्तते, न स पुनरावर्तते'। निराकार निर्विकार ब्रह्मका अपरोक्ष साक्षात्कार होनेपर पुनः कर्मोंका प्ररोहण भी अत्यन्त श्रुति-विरुद्ध है। अतः वह भी अमान्य ही है। 'ज्ञानाग्निदग्धकर्माणम्' इत्यादि वचनोंका तात्पर्य भगवान्के अनुगमनकी प्रशंसामें ही है। 'अपि' शब्दसे भी यही भाव निकलता है। भगवान्को रथयात्रा करते देखकर उनका अनुगमन न करना महा अपराध है। अतः अवश्य ही अनुगमन करना चाहिये। औरकी तो कथा ही क्या, ज्ञानाग्नि- दग्धकर्माको भी उसका दण्ड मिलता है। 'न हि निन्दा निन्द्यं निन्दितुं प्रवर्तते अपितु विधेयं स्तोतुमिति न्यायात्' निन्दाका तात्पर्य निन्द्यकी निन्दामें नहीं, अपितु किसी विधेयकी स्तुतिमें ही है। ऐसे ही 'ज्ञाने प्रयासमुदपास्य' (श्रीमद्भा० १०।१४।३) इत्यादि श्लोकसे ज्ञानप्रयास-त्यागका भी तात्पर्य यही है कि भगवच्चरित्र-श्रवणादि-लक्षण भगवद्भक्तिसहित ही ज्ञानप्रयास सफल होता है। विशेषतः वहाँ ज्ञानसे शास्त्रीय परोक्ष ज्ञान ही विवक्षित है, अर्थात् प्राणीको केवल शास्त्रीय परोक्ष ज्ञानमें इतना प्रयास न करना चाहिये कि जिससे श्रुतिगता भगवदीयवार्ताका आदर छूट जाय। कारण भगवद्भक्ति बिना भ्रमनिवर्तक ब्रह्मापरोक्षसाक्षात्कार नहीं हो सकेगा। श्रेयःस्रुतिं भक्तिमुदस्य ते विभो क्लिश्यन्ति ये केवलबोधलब्धये।

६८० भक्तिसुधा

तेषामसौ क्लेशल एव शिष्यते नान्यद् यथा स्थूलतुषावघातिनाम्॥ सर्वविध कल्याणोंका प्रसव करनेवाली किंवा सर्व प्रकारके श्रेयोंकी निर्झरिणी श्रीभक्ति महारानीको छोड़कर जो केवल शास्त्रीय बोध प्राप्त करनेके लिये क्लेश उठाते हैं, उनको सिवा क्लेशके और कुछ नहीं बचता। जैसे स्थूल धानकी भूसीका अवहनन (कुट्टन) करनेवालेको सिवा परिश्रमके और कुछ भी हाथ नहीं लगता। अतः भक्तिसहित ही ज्ञानप्रयास आदिकी सफलता हो सकती है। इसी तरहके और भी बहुत-से वचन मिलते हैं। भक्तिके बिना यज्ञ, वेद, तप आदिको निष्फल बताया गया है— नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया। शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा॥ (गीता ११।५३) मैं वेद, तप, यज्ञ, दान तथा इज्यासे इस तरह नहीं देखा जा सकता हूँ, अर्जुन! जैसा तुमने मुझे देखा। भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन। ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप॥ (गीता ११।५४) हाँ, अनन्यभक्तिसे तो प्राणी मेरे इस प्रकारके स्वरूपको जान तथा देख सकता है, देखकर मुझमें प्रविष्ट भी हो सकता है। यहाँ सर्वत्र ही यही अर्थ करना उचित है कि भक्तिके बिना केवल वेद, यज्ञ, दानादिसे भगवान्‌की प्राप्ति नहीं हो सकती। अन्यथा वेद, यज्ञ, दानादिका भगवत्प्राप्तिमें उपयोग ही नहीं सिद्ध होगा, परंतु 'वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यः', (गीता १५।१५) 'यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्॥' (गीता १८।५) इत्यादि वचनोंसे यह स्पष्ट सिद्ध है कि भगवान्‌की प्राप्तिमें वेद, यज्ञ, तप, दानादि सबका पूर्ण उपयोग है। यही स्थिति 'नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन।' (कण्ठ० १।२।२३) इत्यादि श्रुतियोंकी भी है। कारण—'श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासि- तव्यः।' (बृहदा० २।४।५) 'ऋतं च स्वाध्याय- प्रवचने च।' (तैत्तिरीय० १।९) 'स्वाध्यायप्रवचना- भ्यां न प्रमदितव्यम्।' (तैत्तिरीय० १।११) इत्यादि स्थलोंमें श्रवणादिको ब्रह्मसाक्षात्कारका साधन कहा गया है, अतः भगवद्भक्ति या वरण बिना केवल श्रवणादिसे ब्रह्मका अपरोक्ष साक्षात्कार नहीं होता। इस सम्बन्धमें एक दोहेकी संगति बड़ी सुन्दर बैठती है—'रामनाम इक अंक है सब साधन हैं सून। अंक बिना कछु हाथ नहिं अंक रहे दश गून।' अर्थात् भगवान्‌का नाम तो एक आदि अंकके समान है और समस्त साधन शून्यके समान हैं। अंकके बिना शून्योंका कुछ भी मूल्य नहीं, परंतु अंक रहनेपर तो शून्योंका दसगुना मूल्य बढ़ जाता है। यहाँ ध्यान देनेकी बात है कि शून्य भी व्यर्थ और अनादरणीय नहीं है। किसी दस्तावेजमें एक अंकके अनन्तर दस शून्य हों और दसों शून्योंको मिटाकर केवल एक अंक ही रख लिया जाय तब कितना भेद होता है? इसी तरह भगवन्नामके बिना साधन शून्यके समान निःसार हैं, परंतु उसके रहनेपर तो उन शून्यात्मक साधनोंका बहुत मूल्य बढ़ जाता है। यही गति— नहिं कलि करम न भगति बिबेकू। राम नाम अवलंबन एकू॥ (रा०च०मा० १।२७।७) हरेर्नामैव नामैव नामैव मम जीवनम्। कलौ नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव गतिरन्यथा॥ —इत्यादि वचनोंकी है। भगवन्नाम और भक्ति बिना कोई भी साधन फलवान् नहीं होते। बिना माताके यदि पुत्रका होना असम्भव है तो बिना भक्तिके ज्ञानका होना कैसे सम्भव है? अतः भक्ति छोड़कर ज्ञानका प्रयास वैसे ही व्यर्थ है, जैसे कामधेनु छोड़कर दूधके लिये आकको ढूँढ़ना। यदि सच्चे दूधकी अपेक्षा है तो कामधेनुका सेवन ही युक्त है। इसी तरह यदि सच्चे ज्ञानकी अपेक्षा है तो भक्ति महारानीका सेवन युक्त ही है। यही 'ते जड़ कामधेनु गृहँ त्यागी। खोजत आकु फिरहिं पय लागी॥' (रा०च०मा० ७।११५।२) इत्यादि वाक्योंका भावार्थ है।

ज्ञान और भक्ति

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इन वचनोंमें अन्य साधनोंका या ज्ञानका अनादर कथमपि नहीं किया गया है। अन्यथा शास्त्रोक्त विधि-निषेधोंका उल्लंघन करनेसे नामापराध दोष अनिवार्य हो जायगा। इसीलिये गोस्वामीजीने भी 'चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती' (रा०च०मा० ७।२१।२) और 'बरनाश्रम निज निज धरम निरत बेद पथ लोग ॥' इत्यादि वचनोंसे वेद और वेदोक्त कर्मोंका खूब सम्मान किया है। कल्प कल्प भरि एक एक नरका। परहिं जे दूषहिं श्रुति करि तरका॥ (रा०च०मा० ७।१००।४)

भक्तिसे ज्ञानद्वारा परम तत्त्वकी प्राप्ति

श्रीमद्भागवतादि सद्ग्रन्थोंमें भक्तिसे ज्ञानद्वारा ही परमतत्त्वकी प्राप्ति कही गयी है— एवं विशुद्धमनसो भगवद्भक्तियोगतः। भगवत्तत्त्वविज्ञानं मुक्तसङ्गस्य जायते॥ भगवद्भक्तियोगसे विशुद्धमनस्क निःसंग प्राणीको भगवत्तत्त्वका ज्ञान होता है। पुरेह भूमन् बहवोऽपि योगिन- स्त्वदर्पितेहा निजकर्मलब्धया। विबुध्य भक्त्यैव कथोपनीतया प्रपेदिरेऽञ्जोऽच्युत ते गतिं पराम् ॥ (श्रीमद्भा० १०।१४।५) अर्थात् हे भूमन् ! बहुत-से योगी आपके चरणोंमें निज कर्मोंको समर्पित करके विशुद्धान्तःकरण तथा विरक्त होकर आपकी कथा-श्रवणद्वारा प्राप्त भक्तिसे आपको जानकर प्राप्त कर लेते हैं। भगवत्कथा- श्रवणादि भागवतधर्मोंका सेवन करते-करते भक्ति, विरति, भगवत्प्रबोध प्राप्त करके आपको पा लेते हैं। 'भक्त्या मामभिजानाति' (गीता १८।५५) स्पष्ट ही है। भगवत्प्रेमसे ही भगवत्कृपा प्राप्त होती है और उनकी कृपासे ही प्राणी उन्हें जान सकता है। 'यमेवैष वृणुते तेन लभ्यः।' (मुण्डक० ३।२।३) सोइ जानइ जेहि देहु जनाई। जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई॥ तुम्हरिहि कृपाँ तुम्हहि रघुनंदन। जानहिं भगत भगत उर चंदन॥ (रा०च०मा० २।१२७।३-४)

इस तरह भगवद्भक्तिसे भगवत्कृपा और भगवान्‌का ज्ञान होता है। ज्ञानसे फिर भगवान्‌के सहजसिद्ध परमप्रेमका प्रकट होना स्वाभाविक ही है। भक्तिको कौन कहे, भगवान्‌के साक्षात्कारमें ही संसारबन्ध मिट जाता है। इस तरहसे भक्तिपक्षसे भी ज्ञानपक्षमें भगवान्‌की महिमा अधिक समझमें आती है। सोइ जानइ जेहि देहु जनाई। जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई॥ तुम्हरिहि कृपाँ तुम्हहिं रघुनंदन। जानहिं भगत भगत उर चंदन॥ हाँ, यह बात दूसरी है कि कोई भगवत्तत्त्वके ज्ञानकी भावनासे भगवान्‌की भक्ति करता है, कोई प्रेमसे ही भगवान्‌की भक्ति करता है। परंतु भगवत्तत्त्व ज्ञानरूप फल दोनोंको ही उसी तरह प्राप्त होता है, जैसे कोई पुण्यप्राप्त्यर्थ गंगा-स्नान करता है, उसे पुण्य तो प्राप्त होता ही है, परंतु तापादि-निवृत्ति भी आनुषंगिकी हो जाती है। कोई तापनिवृत्तिके लिये गंगा-स्नान करता है, पुण्यप्राप्ति उसे भी आनुषंगिकरूपसे होती है। इसी तरह कोई ज्ञानप्राप्तिद्वारा पाप-ताप मिटानेके लिये भक्तिगंगामें स्नान करता है, उसे भी भगवत्प्रेमानन्दका लोकोत्तर सुख मिलता है और जो भगवत्प्रेमानन्दके लिये ही भक्ति करते हैं, उन्हें भी ज्ञानप्राप्ति और पाप-ताप निवृत्ति एवं तन्मूलभूत ज्ञान प्राप्त होता है। इस तरह भक्तको ज्ञानप्राप्ति और मोक्ष अवश्य होता है। परंतु बिना ज्ञानके यदि किसी भी साधनसे मोक्ष मान लिया जाय तो बन्धकी सत्यता और मोक्षकी कृत्रिमता तथा अनित्यता अपरिहार्य हो जायगी, इसीलिये कर्मयोग या भक्तियोगसे ज्ञानप्राप्तिके बिना मोक्षका होना अत्यन्त अशास्त्रीय है। हाँ, जो मोक्ष चाहते ही नहीं, केवल प्रेम चाहते हैं, उनकी स्थिति दूसरी है। ताते उमा मोच्छ नहिं पायो। दसरथ भेद भगति मन लायो॥ सगुनोपासक मोच्छ न लेहीं। तिन्ह कहुँ राम भगति निज देहीं॥ (रा०च०मा० ६।११२।६-७) निर्गुण, निराकार, निर्विकार परब्रह्मकी उपासनामें बड़ी कठिनाई है, परंतु भगवान्‌का भक्त तो भगवान्‌के दिव्य चरणकमलका अवलम्बन करके अनायास ही

भवसागरको तर जाता है। इतना ही क्यों, फिर तो उसे भवसागर और उसका पार समान ही हो जाता है। भगवान्‌के श्रीचरण और उनकी मंगलमयी शक्तिकी महिमासे स्वर्ग, अपवर्ग, दिशाएँ-विदिशाएँ सब मंगलमय हो जाती हैं। उसकी छोड़ने और ग्रहण करनेकी भावना ही मिट जाती है। किसीकी क्षीरसागरको पार करनेकी रुचि होती है। यदि उसे तैरकर पार करना हो, तब फिर कठिनाईका ठिकाना ही क्या ? परंतु यदि उसे पार करनेके लिये दिव्य उपभोग-सामग्रीसम्पन्न सर्वांगसुन्दर नाव प्राप्त हो जाय और उसके संचालक अपने प्रियतम प्राणधन भगवान् हों, तब समुद्र पार करनेमें क्या कठिनाई है? आनन्दसे सर्वसुखका सम्भोग करते हुए और दिव्य शब्द, दिव्य स्पर्श, दिव्य गन्ध, दिव्य रसका आस्वादन करते हुए अर्थात् अपने प्रियतमके श्रीअंगके सौगन्ध-सुस्पर्शका अनुभव करते हुए प्रियतमके अमृतमय मुखचन्द्रका सौन्दर्य-माधुर्य सौरस्य सुधाका आस्वादन करते हुए प्रेमी विभोर हो जाता है। उसे भवसागर और उसके पारमें कुछ भी विशेषता नहीं रह जाती। भवसागरके पार जाकर भगवान्‌के जिन दिव्य माधुर्यादिकोंका अनुभव करता है, उनका अनुभव भवसागरमें ही होने लगता है। भवसागरके पाप-तापोंका उसे स्पर्शतक नहीं होता है। इसीलिये कहा जाता है कि भगवन्नामसे भवसागर सूख जाता है। इसीलिये भक्त वैकुण्ठ, कैलासादि पद पाकर भी लोक-कल्याणार्थ पुनः लौट आते हैं और जीवोंको उसी भक्तिरूपी दिव्य नावपर बिठाकर पार उतारते हैं। सगुणोपासना और निर्गुणोपासनाका तारतम्य यह कथन बहुत अंशोंमें ठीक है, परंतु यहाँ भी सगुणोपासना और निर्गुणोपासनाका ही तारतम्य कहा जा सकता है, ज्ञान और सगुणोपासनाका नहीं। गीताके बारहवें अध्यायमें अर्जुनने प्रश्न किया है कि 'जो आपके विश्वरूप या किसी भी सगुण साकार सच्चिदानन्दस्वरूपमें मन लगाकर आपकी उपासना करते हैं और जो अक्षर अव्यक्त स्वरूपकी उपासना करते हैं, उनमें कौन अतिशयेन योगवित् अर्थात् ब्रह्म- प्राप्तिके उपायज्ञ हैं'—'एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते। ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योग- वित्तमाः ॥' (गीता १२।१) श्रीभगवान्‌ने कहा कि 'जो मुझ सगुण साकार सच्चिदानन्दस्वरूपमें मनको सम्यक् आविष्ट करके नित्ययुक्त हो, परमश्रद्धासे मेरी उपासना करते हैं, वे मेरी दृष्टिमें अतिशयेन युक्त हैं। जो इन्द्रियग्रामका संयम करके अनिर्देश्य अक्षर, अव्यक्त-सर्वव्यापी-अचिन्त्य-कूटस्थ-अचल ब्रह्म- स्वरूपकी उपासना करते हैं, वे—'सर्वभूतहिते रताः' (गीता ५।२५; १२।४) महानुभाव मुझे ही प्राप्त होते हैं। फिर भी उनके (निर्गुणोपासकोंके) लिये क्लेश (कठिनाई) अधिकतर है; क्योंकि देहवानों (देहाभिमानियों)-के लिये अव्यक्तगति दुःखसे प्राप्त होती है।' यहाँ यह समझ लेना चाहिये कि देहवान्‌का अर्थ देहाभिमानी ही है, अन्यथा देहवान् पदका प्रयोग ही व्यर्थ होगा; क्योंकि जितनी भी उपासनाएँ हैं, वे सभी देहवान्‌के लिये होती हैं। जो अदेह है, उसके लिये तो उपासनाकी अपेक्षा और सम्भावना ही नहीं है। यह भी नहीं कहा जा सकता कि निर्गुणोपासना किसीके लिये सम्भव नहीं, क्योंकि ऐसी स्थितिमें उसका विधान ही व्यर्थ हो जाता है। अशक्यका उपदेश करनेवाले शास्त्रोंका शास्त्रत्व भी सन्देहमें पड़ जाता है। अतः यही अर्थ उचित है कि 'देहोऽस्त्यत्वेनास्येति देहवान्' अर्थात् देहात्माभिमानी ही देहवान् यह विवक्षित है। सर्वथापि यहाँ निर्गुणोपासना और सगुणोपासनाके उत्कर्षापकर्षका प्रश्न है और यहाँ सगुणोपासनाका उत्कर्ष है यही उत्तर है। यहाँ तत्त्वज्ञोंका कहना है कि अर्जुनके प्रश्नका उत्तर विकल्पपुरस्सर किया गया है। अर्थात् सरलताके अभिप्रायसे उत्कर्षापकर्षका प्रश्न है कि फलोत्कर्षके अभिप्रायसे उत्कर्षापकर्षका प्रश्न है ? पहले पक्षके अनुसार यह उत्तर है कि सगुणोपासना सरल होनेसे

ज्ञान और भक्ति ६८३

श्रेष्ठ है—'मय्यावेश्य मनो ये माम्' (गीता १२।२) द्वितीय पक्षको लेकर कहा गया है—'ते प्राप्नुवन्ति मामेव' (गीता १२।४) अर्थात् निर्गुणोपासना तो मुझे प्राप्त ही है। यहाँ 'एव' का सम्बन्ध 'प्राप्नुवन्ति' के साथ है; क्योंकि उपासनाके अनुसार उपासक उपास्यको प्राप्त होता ही है। अतः 'मां' के साथ 'एव' का सम्बन्ध व्यर्थ होकर 'प्राप्नुवन्ति' के साथ ही एवकार का सम्बन्ध होता है। तब उससे व्यवच्छेद होता है। तब सारांश यह निकलता है कि निर्गुणोपासक तो भगवान्‌को प्राप्त ही है, फिर भगवत्प्राप्तिके उत्कर्षापकर्षका क्या प्रश्न? यहाँ प्रसंगानुसार 'अस्मद्', 'मां' आदिका कहीं निर्गुण ब्रह्म और कहीं सगुण ब्रह्म अर्थ होता है; क्योंकि भगवान् निर्गुण भी हैं और सगुण भी हैं— एकु दारुगत देखिअ एकू। पावक सम जुग ब्रह्म बिबेकू॥ जो गुन रहित सगुन सोइ कैसें। जलु हिम उपल बिलग नहिं जैसें॥ (रा०च०मा० १।२३।४; १।११६।३) 'मय्यावेश्य' इत्यादि स्थलोंमें 'मयि' का अर्थ सगुण साकार सच्चिदानन्द ब्रह्म अर्थ है। 'ते प्राप्नुवन्ति मामेव' यहाँपर 'मां' पदका अर्थ निर्गुण ब्रह्म है। क्योंकि 'ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।' (गीता ४।११) सिद्धान्तके अनुसार सगुणोपासकोंको जैसे भगवान् सगुणरूपसे प्राप्त होते हैं, वैसे ही निर्गुणोपासकोंको निर्गुणरूपसे प्राप्त होते हैं। 'ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तम्' (गीता १२।३) इस प्रसंगमें निर्गुणोपासनाका प्रकृत होना स्पष्ट है। अतः वैसे उपासकको निर्गुणब्रह्मकी प्राप्ति युक्त ही है। इस दृष्टिसे यहाँ 'मां' का अर्थ निर्गुणब्रह्म मानना ही युक्त है। इसीलिये फलदृष्टिसे निर्गुणोपासना श्रेष्ठ है। सरलताकी दृष्टिसे सगुणोपासना श्रेष्ठ है। कुछ लोग कहते हैं कि यहाँका प्रश्नोत्तर ऐसा है, जैसे किसीने प्रश्न किया—'यमुनाजल श्रेष्ठ या गंगाजल?' इसका उत्तर दिया गया 'यमुनाजल श्रेष्ठ है।' जब फिर गंगाजलके बारेमें पूछा गया, तब कहा गया कि 'गंगाजल तो अमृत है।' जलोंमें यमुनाजल श्रेष्ठ है। ठीक वैसे ही सगुणोपासना श्रेष्ठ है या निर्गुणोपासना? इसके उत्तरमें कहा गया कि सगुणोपासना श्रेष्ठ है। निर्गुणोपासक तो उपास्यस्वरूप ही होता है। 'ते प्राप्नुवन्ति मामेव' अतः उसके उत्कर्षापकर्षका प्रश्न व्यर्थ है। ऐसे कालिदास और दण्डी कविके उत्कर्षके प्रश्नपर सरस्वतीने कहा—'कविर्दण्डी कविर्दण्डी।' कालिदासने जब पूछा कि मैं? तब तो सरस्वतीने कहा—'त्वन्त्वहमेव' तुम तो हमारे स्वरूप ही हो। इसी तरह सूरदाससे प्रश्न हुआ कि कविता आपकी श्रेष्ठ या तुलसीदासजीकी? उन्होंने उत्तर दिया—'हमारी कविता श्रेष्ठ है, तुलसीदासजीकी कविता तो कविता नहीं, अपितु मन्त्र है।' निर्गुणोपासनासे निर्गुणब्रह्मका ज्ञान फिर भी पृथक् ही है। निर्गुण ब्रह्म- ज्ञानका साक्षात्कार तो दोनों ही उपासनाओंका अन्तिम फल है। वेदान्तियोंका श्रवण, मनन और निदिध्यासन करके ब्रह्म-साक्षात्कारका पन्थ ज्ञानमार्ग है। तात्पर्य- निर्णय एवं मननादिमें प्रयत्न करके आचार्यमुखसे निर्गुण-स्वरूप जानकर श्रद्धासे उसीकी निरन्तर उपासना करना यह निर्गुणोपासना है। 'अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वान्येभ्य उपासते।' (गीता १३।२५) अतः यहाँ ज्ञान और भक्तिकी उत्कृष्टता- अपकृष्टताका प्रश्न ही नहीं है। साथ ही सांख्य और योगके भी उत्कर्षापकर्षका प्रश्न नहीं समझना चाहिये, क्योंकि सांख्यका अर्थ ज्ञाननिष्ठा और योगका अर्थ कर्मनिष्ठा है। अतः इनका भी विषय यहाँ नहीं है, बल्कि निर्गुणोपासना और सगुणोपासना दोनों ही यहाँ कर्मनिष्ठाके भीतर ही हैं; क्योंकि पुरुषतन्त्र मानसी ध्यानादि क्रिया भी कर्म है, अतः विद्यारण्यने अपनी पंचदशीमें इसे योग माना है। कहा भी है— 'यत्सांख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते' (गीता ५।५) अर्थात् ज्ञाननिष्ठोंको जो निर्गुण ब्रह्मपद प्राप्त होता है, योगियोंको भी अर्थात् निर्गुण ब्रह्मोपासकोंको भी साक्षात्कारक्रमेण वही पद प्राप्त होता है। निर्गुणोपासनाकी महिमासे भी निर्गुण ब्रह्मका साक्षात्कार माना जाता है। फिर भी वह विधुरपरिभावित कामिनीके

साक्षात्कारके समान भ्रमात्मक नहीं होता, किंतु प्रमाणसंवादी होनेसे प्रमात्मक ही होता है। कुछ लोग गन्धर्वशास्त्राभ्यासजन्य संस्कारप्रचयसव्यपेक्ष मनःसंयुक्त श्रोत्रसे षड्जत्वादिसाक्षात्कारके समान या रत्न- परिचायक शास्त्राभ्यासजन्यसंस्कारसंस्कृत मनःसव्यपेक्ष चक्षुसे रत्नसाक्षात्कारके समान, वेदान्ताभ्यासजन्य- संस्कार-प्रचयसव्यपेक्ष समाहित मनसे ब्रह्मसाक्षात्कार मानते हैं। हर तरहसे निर्गुण ब्रह्मोपासनामें कठिनाई है। किसी भी वस्तुका चिन्तन या तदाकाराकारित वृत्तिका प्रवाह तभी बन सकता है, जब उसकी प्रतीति हो। इधर हम देखते यह हैं कि मनमें शब्द, स्पर्श, रूप, रसादि कोई-न-कोई पदार्थकी स्फूर्ति अनिवार्य रूपसे बनी रहती है, किसी भी दृश्यकी स्फूर्ति रहते निर्विकल्प निर्दृश्य ब्रह्मकी स्फूर्ति असम्भव है। यह एक उपासनाका प्रकार दूसरा है कि जैसे 'आज एकादशी है' इस शब्दके आधारपर प्राणी एकादशी व्रत रहते हैं और उसका चिन्तन करते हैं। फिर भी उसके किसी स्वरूपविशेषका बोध नहीं होता। वैसे ही 'निर्गुण-निराकार निर्विकार ब्रह्म है' ऐसा परोक्षशब्दज्ञानके आधारपर स्वरूपविशेष बिना समझे भी चिन्तनरूप उपासना बन सकती है। फिर भी ठीक उपासना तो तभी बन सकती है, जब निर्विकल्पवस्तुकी स्फूर्ति हो। तब तदाकाराकारित वृत्तिसन्तान या धारा चलायी जा सकती है। अतः जैसे मृत्तिकादि मूर्त द्रव्योंका उत्सारण ही कूप-निर्माण है, किंवा घटसे जलादि निष्कासन ही उसको आकाशसे भरना है, वैसे ही चित्तसे दृश्य-विकल्पको निकालना ही उसे ब्रह्माकार बनाना है और उसे ही निर्गुणोपासना कहा जाता है। इस निर्गुणोपासनाका फल ब्रह्मसाक्षात्कार, अविद्या तत्कार्यात्मकप्रपंचकी निवृत्ति तथा प्रत्यक्- चैतन्याभिन्न ब्रह्मस्वरूपसे अवस्थिति है। बस, उसके अनन्तर कोई भी फल—अभ्युदय या निःश्रेयस अवशिष्ट नहीं रहता। निर्गुणोपासनाके संस्कार बने रहनेसे वेदान्त- श्रवण-मननादि द्वारा तत्त्वसाक्षात्कारमें भी सुविधा रहती है। कारण निरालम्ब या निर्विकल्पालम्ब मनका ही ब्रह्म-साक्षात्कारमें अधिक उपयोग है। यह सब होते हुए भी निर्गुणोपासना देहाभिमानियोंके लिये अत्यन्त कठिन है। वायुको बाँधना या भाद्रपदके अखण्ड गंगाप्रवाहको रोक देना जैसे कठिन है, वैसे ही प्रपंचोन्मुख वृत्तिप्रवाहको निरुद्ध करके निर्विकल्प निर्दिश्य ब्रह्माकारवृत्ति बनानी भी कठिन है। यह तो पूर्ण वैराग्यविवेकसम्पन्न पुरुषका ही विषय है। इसीलिये कहा गया है—'अत्यन्तवैराग्यवतः समाधिः समाहित- स्यैव दृढः प्रबोधः' यद्यपि सगुणोपासना भी कठिन है, उसमें भी तो बाह्य विषयोंसे मनका प्रत्यावर्तन करके भगवत्स्वरूपमें ही लगाना पड़ता है, फिर भी वह निर्गुणोपासनाकी अपेक्षा सरल है। कारण भगवान्के मंगलमय नाम, उनके परम पवित्र चरित्रके अभ्याससे भगवान्की मधुर मनोहर मंगलमय मूर्ति मनमें व्यक्त हो सकती है। फिर प्रेमसे तदाकाराकारित-वृत्तिप्रवाहरूप उपासना भी बन सकती है। भगवच्चरित्रादिकी मधुरतासे कभी-कभी प्राणियोंकी रागसे भी प्रवृत्ति हो जाती है। इस तरह सगुणोपासनामें सरलता और निर्गुणोपासनामें कठिनता है। इसलिये सगुणोपासना श्रेष्ठ है। सगुणोपासना सरल है यहाँ यह प्रश्न होता है कि जब निर्गुणोपासनाका फल बड़ा है, फिर भले ही वह कठिन हो, वही श्रेष्ठ है। बड़े फलके लिये कठिन परिश्रम—अधिकतर क्लेश, उसके अपकर्षका कारण नहीं हो सकता। बड़े फलके लिये अधिक क्लेश होना युक्त ही है। सगुणोपासना सरल होनेपर भी उसका फल ब्रह्मलोकादि है, जो कि एक तरह संसार ही है। वहाँ अविद्या तत्कार्यात्मक प्रपंचकी आत्यन्तिक निवृत्ति नहीं होती। निर्गुणोपासनासे निरावरण ब्रह्मका साक्षात्कार और तदात्मनावस्थान होता है, फिर निर्गुणोपासनासे सगुणोपासना कैसे श्रेष्ठ हुई ? इसका उत्तर यह है कि सगुणोपासना सरल है, साथ ही उससे अन्तरात्माकी शुद्धि, विवेक, वैराग्यादिकी प्राप्ति और श्रवणादिक्रमेण ब्रह्म-साक्षात्कारकी प्राप्ति और श्रवणादि भी हो जाता

है अथवा यहाँ भगवान्‌की कृपासे ही तत्त्वसाक्षात्कार और कैवल्य प्राप्त हो जाता है। भगवदुपासनासे भगवत्कृपा, उससे ज्ञानयोग्यता प्राप्त होनेपर तो एक ही महावाक्यसे तत्त्वसाक्षात्कार हो जाता है। यह बात स्वयं भगवान्‌ने मानी है कि जो लोग सर्वदा समाहित होकर प्रीतिपूर्वक मेरा भजन करते हैं, उन्हें मैं वह बुद्धियोग (ज्ञानयोग) देता हूँ, जिससे वे मुझे प्राप्त हो जाते हैं। जो मच्चित्त तथा मद्गतप्राण होकर मेरे ही कथन-प्रबोधनमें तुष्ट होकर रमण करते हैं, उनके ऊपर अनुकम्पा करके उनके आत्मभावसे स्थित होकर भासवान (प्रकाशयुक्त) ज्ञानदीपकसे उनके हृदयके अज्ञानरूपी अन्धकारको मैं नष्ट कर देता हूँ— मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम्। कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च॥ तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्। ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते॥ तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः। नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता॥ (गीता १०।९-११) इस तरह भगवत्कृपाविशेषसे सगुणोपासकोंको भगवान्‌के निर्गुणस्वरूपका साक्षात्कार हो जाता है। यदि श्रवणादिमें प्रवृत्ति या इस जीवनमें भगवत्कृपा द्वारा तत्त्वसाक्षात्कार न हुआ तो भी मरणकालमें तत्त्वसाक्षात्कार होना सम्भव होता है। यावज्जीवन प्राणीको प्रारब्धानुसार भटकना पड़ता है और पुरुषार्थकी योग्यता होनेसे भगवान् भी उसके पुरुषार्थकी प्रतीक्षा करते हैं; परंतु मरणावसरमें तो फिर भगवान् अपनी अनुकम्पाविशेषसे उसे सुलभ होते हैं। उस समय भगवान् जीवकी असमर्थताका अनुभव करते हुए जीवके प्राथमिक भावोंको देखकर अपनी सहज अनुकम्पासे जीवका कल्याण करते हैं। अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः। तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः॥ (गीता ८।१४) अर्थात् जो अनन्य मनसे सदा मेरा भजन करता रहता है, मैं अन्तमें उसे सुलभ होता हूँ। प्राणनिरोध, समाधि आदि न कर सकनेपर भी मृत्युकालीन विषम वेदनाके समयमें मैं अपनी कृपाविशेषसे उसे सुलभ होता हूँ। यदि ऐसा न हुआ तो भी मरणके अनन्तर उसे ब्रह्मलोककी प्राप्ति होती है। वहाँ अपनी भावनाके अनुसार शिव, विष्णु आदि स्वरूपकी प्राप्ति होती है। तरह-तरहका आनन्द मिलता है। वहाँ श्रवण- मननादिसे तत्त्वसाक्षात्कार होकर कल्पान्तमें कैवल्य पद प्राप्त हो जाता है। इस तरह फल वही मिलता है। फिर भी सगुणोपासनामें सरलता, निर्गुणोपासनामें कठिनता है। इसलिये सगुणोपासना श्रेष्ठ है। यही बात भागवतके दो पद्योंमें भी कही गयी है— पानेन ते देव कथासुधायाः प्रवृद्धभक्त्या विशदाशया ये। वैराग्यसारं प्रतिलभ्य बोधं यथाञ्जसान्वीयुरकुण्ठधिष्ण्यम्॥ तथापरे चात्मसमाधियोग- बलेन जित्वा प्रकृतिं बलिष्ठाम्। त्वामेव धीराः पुरुषं विशन्ति तेषां श्रमः स्यान्न तु सेवया ते॥ (श्रीमद्भा० ३।५।४५-४६) अर्थात् हे देव, जैसे सुधीगण आपकी कथा- सुधाका पानकर उससे ही प्रवृद्ध भक्तिद्वारा निर्मलाशय होकर, वैराग्यसार बोधको पाकर अकुण्ठधिष्ण्य आपको प्राप्त हो जाते हैं, वैसे ही दूसरे महानुभाव आत्मसमाधि- योगसे अर्थात् आत्माके श्रवण-विवेचनादिका क्रमेण साक्षात्कार करके बलिष्ठा प्रकृति (देहादिकी स्वाभाविकी प्रवृत्ति)-को जीतकर आपको ही प्राप्त होते हैं। आपकी प्राप्ति दोनोंको बराबर होनेपर भी द्वितीय पक्षके लोगोंको परिश्रम अधिक है। प्रथम पक्षके लोगोंको उतना परिश्रम नहीं है। प्रथम साधकको साधनरूपमें कथा-सुधा (अमृत)-का पान है, फिर उसीकी महिमासे भक्ति, अन्तःशुद्धि, वैराग्य और विज्ञानकी प्राप्ति होती है। दूसरोंको विवेक- वैराग्यादिसहित श्रवणादिद्वारा शरीर-त्रितय, कोशपंचकसे

६८६ भक्तिसुधा प्रत्यक्-चैतन्यका विवेचन, आन्तर-बाह्य, व्यष्टि- समष्टि प्रपंचसे प्रत्यक्-चैतन्याभिन्न शुद्ध ब्रह्मका अन्वेषण, योगाभ्यासद्वारा बाह्यवृत्तियोंका निरोध, अन्तःकरणमें सर्ववृत्तियोंका निरोध करना पड़ता है। इन श्लोकोंके अनुसार 'ते प्राप्नुवन्ति मामेव' (गीता १२।४)-का भी 'त्वामेव धीराः पुरुषं विशन्ति' (श्रीमद्भा० ३।५।४६)-के समान ही अर्थ होना चाहिये। अर्थात् सगुणोपासक उपासनाके प्रभावसे ज्ञानद्वारा जिन भगवान्‌को प्राप्त होते हैं, निर्गुणोपासक भी उन्हीं भगवान्‌को प्राप्त होते हैं। निर्गुणोपासक- प्राप्यतत्त्व, सगुणोपासक-प्राप्यतत्त्वसे पृथक् नहीं है। यही दोनों स्थलोंके 'एव' पदका स्वारस्य है। पुरेह भूमन् बहवोऽपि योगिन- स्वदर्पितेहा निजकर्मलब्धया। विबुध्य भक्त्यैव कथोपनीतया प्रपेदिरेऽञ्जोऽच्युत ते गतिं पराम्॥ (श्रीमद्भा० १०।१४।५) इस वचनसे भी भगवच्चरणसमर्पणबुद्ध्या कर्मानुष्ठान, कथासुधापान, उससे भक्ति और भक्तिसे ज्ञान प्राप्त करनेके बाद मोक्षप्राप्ति कही गयी है। यद्यपि कहा जा सकता है कि निर्गुणोपासनामें भी भगवत्कृपा अनिवार्य ही है—'यो ब्रह्माणं विदधाति.... 'मुमुक्षुर्वै शरणमहं प्रपद्ये॥' (श्वेताश्वतरो० ६।१८) 'तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये।' (गीता १५।४) इत्यादि वचनानुसार ज्ञानपक्षमें भी भगवच्छरणागति और भगवत्कृपाकी प्रतीक्षा होती है। भगवत्कृपा जैसे सगुणोपासनासे होती है, वैसे ही निर्गुणोपासनासे भी होती है। जब भगवान्‌के ही दोनों स्वरूप हैं, तब क्या कारण है कि निर्गुणोपासनासे कृपा न हो ? बल्कि जब निर्गुणस्वरूप अन्तरंग है और सगुण निर्मलसत्त्वसापेक्ष है, तब तो अन्तरंग प्रियतमनिरपेक्ष निर्गुणस्वरूपके उपासकपर और भी कृपा होनी चाहिये। फिर तो निर्गुणोपासनासे भी भगवत्कृपाद्वारा तत्त्वसाक्षात्कार होगा और इसी पक्षमें 'तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्।' (गीता १०।१०) 'मच्चित्ता मद्गत- प्राणाः' 'ददामि बुद्धियोगं तम्' 'तेषामेवानु- कम्पार्थम्' 'नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता॥' (गीता १०।९-११) ये सभी श्लोक लगाये जा सकते हैं। जैसे भगवच्चरित्रश्रवणसे भक्ति सम्भव है, वैसे ही वेदान्तद्वारा भगवान्‌के प्रत्यक्चैतन्याभिन्न ब्राह्म-स्वरूपश्रवणसे भी पूर्ण भक्ति उत्पन्न हो सकेगी। फिर निर्गुणोपासनासे सगुणोपासनाकी श्रेष्ठता कैसे हुई? बल्कि निर्गुणस्वरूप अन्तरंग निरपेक्ष होनेसे पूर्ण भक्तिका आस्पद होगा। निर्विशेष आलम्बसे चित्तकी निरालम्बतामें अधिक सहायता मिलेगी। तथापि यह तो मानना ही पड़ेगा कि निर्गुणोपासनासे सगुणोपासनामें सुगमता है। निर्गुणोपासना निर्गुण ब्रह्म-साक्षात्कारके अधिक अनुकूल है। ज्ञानकी प्राप्ति भी भगवत्कृपासे ही होती है। कुछ लोगोंका तो यह भी पक्ष है कि कृपा आदि जिसमें है वह सगुण ब्रह्म है। निर्गुणमें कृपा कैसी ? श्रीशंकराचार्य भगवान्‌ने निर्गुण ब्रह्मके प्रति कहा है— उदासीनः स्तब्धः सततमगुणः सङ्गरहितो भवांस्तातः कातः परमिह भवेज्जीवनगतिः। अकस्मादस्माकं यदि न कुरुषे स्नेहमथ तद् वसस्व स्वीयान्तर्विमलजठरेऽस्मिन्पुनरपि ॥ (प्रबोधसुधाकर २४५) 'हे देव! आप उदासीन, अनमन स्वभाव, कूटस्थ, निर्गुण, संगरहित हमारे तात-पिता हैं। फिर मेरी क्या गति है ? देव ! यदि आप हमपर निष्प्रयोजन स्नेह नहीं करते तो भी हमारा हृदय आपका भवन है, वहाँ आप निवास तो कीजिये।' इस तरहके स्तवनसे सिद्ध होता है कि निर्गुणमें दया, कृपारूप गुणोंका अस्तित्व नहीं होता। अतएव माया-मोहकी निवृत्तिके लिये भगवान्‌की मायाका वर्णन युक्त है—मायां वर्णयतोऽमुष्य ईश्वरस्यानुमोदतः। शृण्वतः श्रद्धया नित्यं माययाऽऽत्मा न मुह्यति॥ (श्रीमद्भा० २।७।५३) भगवान्‌की मायाका श्रद्धासे वर्णन, श्रवण, अनुमोदन करनेवाले पुरुषकी आत्मा मायासे मोहित नहीं होती। यहाँ भगवदीयत्वेन भगवद्वशीभूता मायाका वर्णन होता है। इसीलिये माया-मोहसे मुक्ति

मिलती है, उसी तरह भगवत्सापेक्ष भगवदीयसत्त्वके वर्णनसे सत्त्वसे ज्ञान द्वारा गुणोंकी निवृत्ति 'कण्टकेन कण्टकोद्धारः' न्यायसे प्राप्त होती है। इस तरह सगुणोपासनामें सरलता होती है और कृपाका अवकाश रहता है। तथापि जैसे भगवत्कृपासे भी भक्तिकृपाका महत्त्व अधिक समझा जाता है, वैसे ही निर्गुणोपासना ही स्वयं कृपाकर प्राणीका कल्याण कर सकती है और सगुण भगवान् ही अपने निर्गुणस्वरूपके उपासकपर पूर्ण कृपा करते हैं। फिर देहाभिमान मिटनेपर निर्गुणोपासना भी सरलतासे हो सकेगी, जैसे—'तयोस्तु कर्मसंन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते।।' (गीता ५।२) इस वचनसे कर्मसंन्याससे कर्मयोगका श्रेष्ठ होना सम्भव है, वैसे ही निर्गुणोपासनासे सगुणोपासनाको श्रेष्ठ कहना युक्त है। भले ही किसी दृष्टिसे संन्यास ही श्रेष्ठ हो, परंतु 'संन्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः।' (गीता ५।६) ' कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते।' (गीता ३।४) इत्यादि वचनोंसे यह भी सिद्ध ही है कि योग (कर्मयोग) बिना नैष्कर्म्य प्राप्त हो ही नहीं सकता। बिना योगके संन्यास केवल दुःखका मूल है। निर्गुण- निराकारकी उपासनासे सगुण-निराकारकी उपासना सरल है और सगुण-निराकारकी उपासनासे भी सगुण- साकार ब्रह्मकी उपासना सरल है। मनको प्रथम आकार और गुणोंके चिन्तनमें, पश्चात् निर्गुण-निराकार केवल ब्रह्ममें लगाता जाय। इस तरह अनायासेन चित्त परमतत्त्वमें प्रतिष्ठित हो जाता है। फिर जहाँ निर्गुण- निराकार परब्रह्म ही सगुण-साकार परब्रह्ममें व्यक्त है; वहाँ तो निर्गुण-सगुणमें भेद कुछ है ही नहीं। इतनेपर भी निर्गुणोपासनामें कठिनाई है और सगुणोपासनामें सरलता ही है। निर्गुणमें चित्तकी स्वारसिकी प्रवृत्ति नहीं होती; सगुणमें स्वारसिकी प्रवृत्ति होती है। इन दृष्टियोंसे सगुणोपासनाको श्रेष्ठ कहना युक्त ही है। इस तरह जब कर्म बिना संन्यास केवल दुःखका ही मूल है। सच्चा संन्यास उसीसे होता है। कर्मोंके आरम्भ बिना नैष्कर्म्य मिलता ही नहीं, तब फिर संन्याससे कर्मको श्रेष्ठ कहना युक्त ही है। इसी तरह जब सगुणोपासना बिना चित्तशुद्धि तथा निर्गुणोपासना बनती ही नहीं और उसके अनन्तर बड़ी सरलतासे निर्गुणोपासना और तत्त्वसाक्षात्कार हो जाता है, तब निर्गुणोपासनासे सगुणोपासनाको श्रेष्ठ कहना युक्त ही है। कुछ लोग 'वानरीवृत्ति एवं वैडालिकीवृत्ति' से भी भक्तिका महत्त्व कहते हैं। विडालशिशु स्वयं निश्चेष्ट रहता है, उसका भरण-पोषण, उत्थापन- स्थापन सब कुछ माताके ऊपर ही निर्भर रहता है। वानरशिशु स्वयं ही माँको सावधानीसे पकड़ लेता है। इसी तरह भक्त केवल भगवान्के आश्रित रहता है, उसकी रक्षाका भार भगवान् ही ग्रहण करते हैं। 'तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात्।' (गीता १२।७) परञ्च ज्ञानी स्वयं ज्ञान-बलके द्वारा, संसार- बन्धनसे मुक्त होता है। एक बालक स्वयं पिताका हाथ पकड़कर चलता है, उसके गिरनेकी सम्भावना हो सकती है, परंतु जिस बालकका हाथ पकड़कर पिता चलता है, वह तो कूद-फाँदकर चलता हुआ भी निर्भय ही रहता है। इसी तरह भगवान्को आत्मसमर्पण करके भक्त निर्भय हो जाता है— गह सिसु बच्च अनल अहि धाई। तहँ राखइ जननी अरगाई ॥ प्रौढ़ भएँ तेहि सुत पर माता। प्रीति करइ नहिं पाछिलि बाता ॥ मोरें प्रौढ़ तनय सम ग्यानी। बालक सुत सम दास अमानी ॥ जनहि मोर बल निज बल ताही। दुहु कहँ काम क्रोध रिपु आही ॥ (रा०च०मा० ३।४३।६-९) ज्ञानी और भक्त दोनोंको ही काम-क्रोधादि तरह- तरहके उपद्रव—बखेड़े होते हैं। वहाँ ज्ञानी भगवदाश्रित होकर उनसे बचनेका प्रयत्न करता है, परंतु भक्तको तो भगवान् ही बचाते हैं। इसी अभिप्रायसे यह भी कहा गया है कि ज्ञान-वैराग्य आदि पुरुषजातिके ऊपर मायाका प्रभाव पड़ता है, परंतु भक्ति तो मायाके समान ही नारिवर्गकी है। अतः उसपर मायाका प्रभाव नहीं चढ़ता— माया भगति सुनहु तुम्ह दोऊ। नारि बर्ग जानइ सब कोऊ॥ (रा०च०मा० ७।११६।३)

मोह न नारि नारि कें रूपा। पन्नगारि यह रीति अनूपा॥ (रा०च०मा० ७।११६।२) पुनि रघुबीरहि भगति पिआरी। माया खलु नर्तकी बिचारी॥ भगतिहि सानुकूल रघुराया। ताते ऐहि डरपति अति माया॥ (रा०च०मा० ७।११६।४-५) भक्तिपर मायाकृत उपद्रव व्यर्थ हो जाते हैं, इसीलिये उसे दिव्यमणि कहा है। ज्ञानपर उपद्रवोंके साफल्यकी सम्भावना होती है, इसीलिये उसे दीपक कहा है। श्रीभगवान्के शरण होकर उनमें आत्मसमर्पण करके प्राणी अत्यन्त निर्भय हो जाता है। फिर तो उसके रक्षक भगवान् ही हो जाते हैं। यहाँ ज्ञानपक्षके पोषकोंका कहना है कि ज्ञान दीपक भी नहीं, मणि भी नहीं, अपितु दिव्य सूर्य है। उसके उदय होते ही अविद्या, अन्धकार और उसके उपद्रव एवं तत्सम्बन्धी उलूकादि सब मिट जाते हैं। अविद्या, तत्कार्यात्मक प्रपंचके मिटनेका दूसरा उपाय ही नहीं है। शरणागति, आत्मसमर्पण भी पूर्णरूपसे ज्ञान पक्षमें ही बनता है। ज्ञान बिना प्राणी देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धितकका समर्पण कर सकता है, परंतु आत्माका तो समर्पण तभी बन सकता है, जब प्रत्यक्चैतन्याभिन्न परब्रह्मका बोध हो। जैसे घटाकाश महाकाशमें आत्मसमर्पण करता है, तरंग महासमुद्रमें आत्मसमर्पण करती है, वैसे ही जीवात्मा देह, इन्द्रिय, मन और बुद्धि अहंकारसे भिन्न चिदात्मरूपको शुद्धब्रह्ममें समर्पण कर देता है और तभी आश्रयत्वेन या संरक्षकत्वेन वरणरूप शरणागति प्राप्त होती है। इसी पक्षका समर्थन—'मामेकं शरणं व्रज।' (गीता १८।६६) 'मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते॥' (गीता ७।१४) इत्यादिमें किया गया है। भगवत्स्वरूप प्रपत्ति या शरणागतिमें मायाकी निवृत्ति होती है, तभी समस्त अनर्थोंकी निवृत्ति होती है। भगवान्की प्रीति, भक्ति परम कल्याणमयी होती है, इसमें सन्देह ही क्या? महानुभावोंने भक्ति और ज्ञानके साध्य, साधन और स्वरूपमें भेद कहा है। द्रवीभूत मनकी सगुण, साकार सच्चिदानन्दघन पर- ब्रह्माकाराकारित मानसीवृत्ति भक्ति है और द्रवानपेक्ष मनकी निर्विकार परब्रह्माकार मानसीवृत्ति ज्ञान है। भगवद् गुणगणालंकृत ग्रन्थोंके श्रवण, मननसे भक्ति होती है, साधनसम्पन्न होकर शुद्ध-बुद्धमुक्तब्रह्मबोधक वेदान्त ग्रन्थोंके श्रवणसे ज्ञान होता है। भक्तिमें प्राणि- मात्रका अधिकार है। ज्ञानमें साधनचतुष्टयसम्पन्न उच्च अधिकारीका ही अधिकार है। ज्ञानका फल निर्विकार ब्रह्मात्मनाऽवस्थान और निखिलरसामृतमूर्ति भगवान्के आकारसे आकारित मानसीवृत्तिरूपा भक्तिका फल भगवत्सायुज्यादिकी प्राप्ति है, परंतु साम्प्रदायिकोंकी दृष्टिमें तो भगवत्समीप्यादिकी प्राप्ति ही मुख्य फल है। भक्तिका फल भक्ति ही है, उससे बढ़कर कोई भी फल नहीं— मद्गुणश्रुतिमात्रेण मयि सर्वगुहाशये। मनोगतिरविच्छिन्ना यथा गङ्गाम्भसोऽम्बुधौ॥ (श्रीमद्भा० ३।२९।११) भगवान्के गुणगणश्रवणमात्रसे समुद्रोन्मुख गंगा- प्रवाहके समान सर्वगुहाशायी भगवान्में गंगाजलके समान द्रवीभूत निर्मल मनकी वृत्तिसन्तति ही भक्ति है— भगवान् परमानन्दस्वरूपः स्वयमेव हि। मनोगतस्तदाकाररसतामेति पुष्कलम्॥ परमानन्द रसात्मक भगवान् ही भक्तके द्रवीभूत मनपर व्यक्त होकर भक्तिपदसे कहे जाते हैं। कोमलचित्त प्राणी भक्तिका मुख्य अधिकारी है। यद्यपि साधनसे कठोर चित्तमें भी द्रवता होती है तथापि उसके लिये ज्ञान अच्छा है। ज्ञानी निर्गुण भक्तिके अतिरिक्त सगुण भक्ति भी करता है, परंतु उसको भक्तिका भगवत्प्रेमानन्दका रसास्वादनरूप दृष्ट ही फल है, मुक्तिरूप अदृष्ट फल तो ज्ञानसे ही उसे प्राप्त है। शिशुपालादि तामस, राजस भक्तोंको मुक्तिरूप अदृष्ट ही फल होता है, दृष्ट फल नहीं होता, परंतु भक्तको तो प्रेमानन्दमय दृष्ट फल और ज्ञानक्रमेण मुक्तिरूप अदृष्ट फल भी प्राप्त होता है। देवानां गुणलिङ्गानामानुश्रविककर्मणाम्। सत्त्व एवैकमनसो वृत्तिः स्वाभाविकी तु या॥