भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

पृष्ठ 697, कुल 778 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 697

मिलती है, उसी तरह भगवत्सापेक्ष भगवदीयसत्त्वके वर्णनसे सत्त्वसे ज्ञान द्वारा गुणोंकी निवृत्ति 'कण्टकेन कण्टकोद्धारः' न्यायसे प्राप्त होती है। इस तरह सगुणोपासनामें सरलता होती है और कृपाका अवकाश रहता है। तथापि जैसे भगवत्कृपासे भी भक्तिकृपाका महत्त्व अधिक समझा जाता है, वैसे ही निर्गुणोपासना ही स्वयं कृपाकर प्राणीका कल्याण कर सकती है और सगुण भगवान् ही अपने निर्गुणस्वरूपके उपासकपर पूर्ण कृपा करते हैं। फिर देहाभिमान मिटनेपर निर्गुणोपासना भी सरलतासे हो सकेगी, जैसे—'तयोस्तु कर्मसंन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते।।' (गीता ५।२) इस वचनसे कर्मसंन्याससे कर्मयोगका श्रेष्ठ होना सम्भव है, वैसे ही निर्गुणोपासनासे सगुणोपासनाको श्रेष्ठ कहना युक्त है। भले ही किसी दृष्टिसे संन्यास ही श्रेष्ठ हो, परंतु 'संन्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः।' (गीता ५।६) ' कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते।' (गीता ३।४) इत्यादि वचनोंसे यह भी सिद्ध ही है कि योग (कर्मयोग) बिना नैष्कर्म्य प्राप्त हो ही नहीं सकता। बिना योगके संन्यास केवल दुःखका मूल है। निर्गुण- निराकारकी उपासनासे सगुण-निराकारकी उपासना सरल है और सगुण-निराकारकी उपासनासे भी सगुण- साकार ब्रह्मकी उपासना सरल है। मनको प्रथम आकार और गुणोंके चिन्तनमें, पश्चात् निर्गुण-निराकार केवल ब्रह्ममें लगाता जाय। इस तरह अनायासेन चित्त परमतत्त्वमें प्रतिष्ठित हो जाता है। फिर जहाँ निर्गुण- निराकार परब्रह्म ही सगुण-साकार परब्रह्ममें व्यक्त है; वहाँ तो निर्गुण-सगुणमें भेद कुछ है ही नहीं। इतनेपर भी निर्गुणोपासनामें कठिनाई है और सगुणोपासनामें सरलता ही है। निर्गुणमें चित्तकी स्वारसिकी प्रवृत्ति नहीं होती; सगुणमें स्वारसिकी प्रवृत्ति होती है। इन दृष्टियोंसे सगुणोपासनाको श्रेष्ठ कहना युक्त ही है। इस तरह जब कर्म बिना संन्यास केवल दुःखका ही मूल है। सच्चा संन्यास उसीसे होता है। कर्मोंके आरम्भ बिना नैष्कर्म्य मिलता ही नहीं, तब फिर संन्याससे कर्मको श्रेष्ठ कहना युक्त ही है। इसी तरह जब सगुणोपासना बिना चित्तशुद्धि तथा निर्गुणोपासना बनती ही नहीं और उसके अनन्तर बड़ी सरलतासे निर्गुणोपासना और तत्त्वसाक्षात्कार हो जाता है, तब निर्गुणोपासनासे सगुणोपासनाको श्रेष्ठ कहना युक्त ही है। कुछ लोग 'वानरीवृत्ति एवं वैडालिकीवृत्ति' से भी भक्तिका महत्त्व कहते हैं। विडालशिशु स्वयं निश्चेष्ट रहता है, उसका भरण-पोषण, उत्थापन- स्थापन सब कुछ माताके ऊपर ही निर्भर रहता है। वानरशिशु स्वयं ही माँको सावधानीसे पकड़ लेता है। इसी तरह भक्त केवल भगवान्के आश्रित रहता है, उसकी रक्षाका भार भगवान् ही ग्रहण करते हैं। 'तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात्।' (गीता १२।७) परञ्च ज्ञानी स्वयं ज्ञान-बलके द्वारा, संसार- बन्धनसे मुक्त होता है। एक बालक स्वयं पिताका हाथ पकड़कर चलता है, उसके गिरनेकी सम्भावना हो सकती है, परंतु जिस बालकका हाथ पकड़कर पिता चलता है, वह तो कूद-फाँदकर चलता हुआ भी निर्भय ही रहता है। इसी तरह भगवान्को आत्मसमर्पण करके भक्त निर्भय हो जाता है— गह सिसु बच्च अनल अहि धाई। तहँ राखइ जननी अरगाई ॥ प्रौढ़ भएँ तेहि सुत पर माता। प्रीति करइ नहिं पाछिलि बाता ॥ मोरें प्रौढ़ तनय सम ग्यानी। बालक सुत सम दास अमानी ॥ जनहि मोर बल निज बल ताही। दुहु कहँ काम क्रोध रिपु आही ॥ (रा०च०मा० ३।४३।६-९) ज्ञानी और भक्त दोनोंको ही काम-क्रोधादि तरह- तरहके उपद्रव—बखेड़े होते हैं। वहाँ ज्ञानी भगवदाश्रित होकर उनसे बचनेका प्रयत्न करता है, परंतु भक्तको तो भगवान् ही बचाते हैं। इसी अभिप्रायसे यह भी कहा गया है कि ज्ञान-वैराग्य आदि पुरुषजातिके ऊपर मायाका प्रभाव पड़ता है, परंतु भक्ति तो मायाके समान ही नारिवर्गकी है। अतः उसपर मायाका प्रभाव नहीं चढ़ता— माया भगति सुनहु तुम्ह दोऊ। नारि बर्ग जानइ सब कोऊ॥ (रा०च०मा० ७।११६।३)