भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६८६ भक्तिसुधा प्रत्यक्-चैतन्यका विवेचन, आन्तर-बाह्य, व्यष्टि- समष्टि प्रपंचसे प्रत्यक्-चैतन्याभिन्न शुद्ध ब्रह्मका अन्वेषण, योगाभ्यासद्वारा बाह्यवृत्तियोंका निरोध, अन्तःकरणमें सर्ववृत्तियोंका निरोध करना पड़ता है। इन श्लोकोंके अनुसार 'ते प्राप्नुवन्ति मामेव' (गीता १२।४)-का भी 'त्वामेव धीराः पुरुषं विशन्ति' (श्रीमद्भा० ३।५।४६)-के समान ही अर्थ होना चाहिये। अर्थात् सगुणोपासक उपासनाके प्रभावसे ज्ञानद्वारा जिन भगवान्को प्राप्त होते हैं, निर्गुणोपासक भी उन्हीं भगवान्को प्राप्त होते हैं। निर्गुणोपासक- प्राप्यतत्त्व, सगुणोपासक-प्राप्यतत्त्वसे पृथक् नहीं है। यही दोनों स्थलोंके 'एव' पदका स्वारस्य है। पुरेह भूमन् बहवोऽपि योगिन- स्वदर्पितेहा निजकर्मलब्धया। विबुध्य भक्त्यैव कथोपनीतया प्रपेदिरेऽञ्जोऽच्युत ते गतिं पराम्॥ (श्रीमद्भा० १०।१४।५) इस वचनसे भी भगवच्चरणसमर्पणबुद्ध्या कर्मानुष्ठान, कथासुधापान, उससे भक्ति और भक्तिसे ज्ञान प्राप्त करनेके बाद मोक्षप्राप्ति कही गयी है। यद्यपि कहा जा सकता है कि निर्गुणोपासनामें भी भगवत्कृपा अनिवार्य ही है—'यो ब्रह्माणं विदधाति.... 'मुमुक्षुर्वै शरणमहं प्रपद्ये॥' (श्वेताश्वतरो० ६।१८) 'तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये।' (गीता १५।४) इत्यादि वचनानुसार ज्ञानपक्षमें भी भगवच्छरणागति और भगवत्कृपाकी प्रतीक्षा होती है। भगवत्कृपा जैसे सगुणोपासनासे होती है, वैसे ही निर्गुणोपासनासे भी होती है। जब भगवान्के ही दोनों स्वरूप हैं, तब क्या कारण है कि निर्गुणोपासनासे कृपा न हो ? बल्कि जब निर्गुणस्वरूप अन्तरंग है और सगुण निर्मलसत्त्वसापेक्ष है, तब तो अन्तरंग प्रियतमनिरपेक्ष निर्गुणस्वरूपके उपासकपर और भी कृपा होनी चाहिये। फिर तो निर्गुणोपासनासे भी भगवत्कृपाद्वारा तत्त्वसाक्षात्कार होगा और इसी पक्षमें 'तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्।' (गीता १०।१०) 'मच्चित्ता मद्गत- प्राणाः' 'ददामि बुद्धियोगं तम्' 'तेषामेवानु- कम्पार्थम्' 'नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता॥' (गीता १०।९-११) ये सभी श्लोक लगाये जा सकते हैं। जैसे भगवच्चरित्रश्रवणसे भक्ति सम्भव है, वैसे ही वेदान्तद्वारा भगवान्के प्रत्यक्चैतन्याभिन्न ब्राह्म-स्वरूपश्रवणसे भी पूर्ण भक्ति उत्पन्न हो सकेगी। फिर निर्गुणोपासनासे सगुणोपासनाकी श्रेष्ठता कैसे हुई? बल्कि निर्गुणस्वरूप अन्तरंग निरपेक्ष होनेसे पूर्ण भक्तिका आस्पद होगा। निर्विशेष आलम्बसे चित्तकी निरालम्बतामें अधिक सहायता मिलेगी। तथापि यह तो मानना ही पड़ेगा कि निर्गुणोपासनासे सगुणोपासनामें सुगमता है। निर्गुणोपासना निर्गुण ब्रह्म-साक्षात्कारके अधिक अनुकूल है। ज्ञानकी प्राप्ति भी भगवत्कृपासे ही होती है। कुछ लोगोंका तो यह भी पक्ष है कि कृपा आदि जिसमें है वह सगुण ब्रह्म है। निर्गुणमें कृपा कैसी ? श्रीशंकराचार्य भगवान्ने निर्गुण ब्रह्मके प्रति कहा है— उदासीनः स्तब्धः सततमगुणः सङ्गरहितो भवांस्तातः कातः परमिह भवेज्जीवनगतिः। अकस्मादस्माकं यदि न कुरुषे स्नेहमथ तद् वसस्व स्वीयान्तर्विमलजठरेऽस्मिन्पुनरपि ॥ (प्रबोधसुधाकर २४५) 'हे देव! आप उदासीन, अनमन स्वभाव, कूटस्थ, निर्गुण, संगरहित हमारे तात-पिता हैं। फिर मेरी क्या गति है ? देव ! यदि आप हमपर निष्प्रयोजन स्नेह नहीं करते तो भी हमारा हृदय आपका भवन है, वहाँ आप निवास तो कीजिये।' इस तरहके स्तवनसे सिद्ध होता है कि निर्गुणमें दया, कृपारूप गुणोंका अस्तित्व नहीं होता। अतएव माया-मोहकी निवृत्तिके लिये भगवान्की मायाका वर्णन युक्त है—मायां वर्णयतोऽमुष्य ईश्वरस्यानुमोदतः। शृण्वतः श्रद्धया नित्यं माययाऽऽत्मा न मुह्यति॥ (श्रीमद्भा० २।७।५३) भगवान्की मायाका श्रद्धासे वर्णन, श्रवण, अनुमोदन करनेवाले पुरुषकी आत्मा मायासे मोहित नहीं होती। यहाँ भगवदीयत्वेन भगवद्वशीभूता मायाका वर्णन होता है। इसीलिये माया-मोहसे मुक्ति