भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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है अथवा यहाँ भगवान्‌की कृपासे ही तत्त्वसाक्षात्कार और कैवल्य प्राप्त हो जाता है। भगवदुपासनासे भगवत्कृपा, उससे ज्ञानयोग्यता प्राप्त होनेपर तो एक ही महावाक्यसे तत्त्वसाक्षात्कार हो जाता है। यह बात स्वयं भगवान्‌ने मानी है कि जो लोग सर्वदा समाहित होकर प्रीतिपूर्वक मेरा भजन करते हैं, उन्हें मैं वह बुद्धियोग (ज्ञानयोग) देता हूँ, जिससे वे मुझे प्राप्त हो जाते हैं। जो मच्चित्त तथा मद्गतप्राण होकर मेरे ही कथन-प्रबोधनमें तुष्ट होकर रमण करते हैं, उनके ऊपर अनुकम्पा करके उनके आत्मभावसे स्थित होकर भासवान (प्रकाशयुक्त) ज्ञानदीपकसे उनके हृदयके अज्ञानरूपी अन्धकारको मैं नष्ट कर देता हूँ— मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम्। कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च॥ तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्। ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते॥ तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः। नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता॥ (गीता १०।९-११) इस तरह भगवत्कृपाविशेषसे सगुणोपासकोंको भगवान्‌के निर्गुणस्वरूपका साक्षात्कार हो जाता है। यदि श्रवणादिमें प्रवृत्ति या इस जीवनमें भगवत्कृपा द्वारा तत्त्वसाक्षात्कार न हुआ तो भी मरणकालमें तत्त्वसाक्षात्कार होना सम्भव होता है। यावज्जीवन प्राणीको प्रारब्धानुसार भटकना पड़ता है और पुरुषार्थकी योग्यता होनेसे भगवान् भी उसके पुरुषार्थकी प्रतीक्षा करते हैं; परंतु मरणावसरमें तो फिर भगवान् अपनी अनुकम्पाविशेषसे उसे सुलभ होते हैं। उस समय भगवान् जीवकी असमर्थताका अनुभव करते हुए जीवके प्राथमिक भावोंको देखकर अपनी सहज अनुकम्पासे जीवका कल्याण करते हैं। अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः। तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः॥ (गीता ८।१४) अर्थात् जो अनन्य मनसे सदा मेरा भजन करता रहता है, मैं अन्तमें उसे सुलभ होता हूँ। प्राणनिरोध, समाधि आदि न कर सकनेपर भी मृत्युकालीन विषम वेदनाके समयमें मैं अपनी कृपाविशेषसे उसे सुलभ होता हूँ। यदि ऐसा न हुआ तो भी मरणके अनन्तर उसे ब्रह्मलोककी प्राप्ति होती है। वहाँ अपनी भावनाके अनुसार शिव, विष्णु आदि स्वरूपकी प्राप्ति होती है। तरह-तरहका आनन्द मिलता है। वहाँ श्रवण- मननादिसे तत्त्वसाक्षात्कार होकर कल्पान्तमें कैवल्य पद प्राप्त हो जाता है। इस तरह फल वही मिलता है। फिर भी सगुणोपासनामें सरलता, निर्गुणोपासनामें कठिनता है। इसलिये सगुणोपासना श्रेष्ठ है। यही बात भागवतके दो पद्योंमें भी कही गयी है— पानेन ते देव कथासुधायाः प्रवृद्धभक्त्या विशदाशया ये। वैराग्यसारं प्रतिलभ्य बोधं यथाञ्जसान्वीयुरकुण्ठधिष्ण्यम्॥ तथापरे चात्मसमाधियोग- बलेन जित्वा प्रकृतिं बलिष्ठाम्। त्वामेव धीराः पुरुषं विशन्ति तेषां श्रमः स्यान्न तु सेवया ते॥ (श्रीमद्भा० ३।५।४५-४६) अर्थात् हे देव, जैसे सुधीगण आपकी कथा- सुधाका पानकर उससे ही प्रवृद्ध भक्तिद्वारा निर्मलाशय होकर, वैराग्यसार बोधको पाकर अकुण्ठधिष्ण्य आपको प्राप्त हो जाते हैं, वैसे ही दूसरे महानुभाव आत्मसमाधि- योगसे अर्थात् आत्माके श्रवण-विवेचनादिका क्रमेण साक्षात्कार करके बलिष्ठा प्रकृति (देहादिकी स्वाभाविकी प्रवृत्ति)-को जीतकर आपको ही प्राप्त होते हैं। आपकी प्राप्ति दोनोंको बराबर होनेपर भी द्वितीय पक्षके लोगोंको परिश्रम अधिक है। प्रथम पक्षके लोगोंको उतना परिश्रम नहीं है। प्रथम साधकको साधनरूपमें कथा-सुधा (अमृत)-का पान है, फिर उसीकी महिमासे भक्ति, अन्तःशुद्धि, वैराग्य और विज्ञानकी प्राप्ति होती है। दूसरोंको विवेक- वैराग्यादिसहित श्रवणादिद्वारा शरीर-त्रितय, कोशपंचकसे