भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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साक्षात्कारके समान भ्रमात्मक नहीं होता, किंतु प्रमाणसंवादी होनेसे प्रमात्मक ही होता है। कुछ लोग गन्धर्वशास्त्राभ्यासजन्य संस्कारप्रचयसव्यपेक्ष मनःसंयुक्त श्रोत्रसे षड्जत्वादिसाक्षात्कारके समान या रत्न- परिचायक शास्त्राभ्यासजन्यसंस्कारसंस्कृत मनःसव्यपेक्ष चक्षुसे रत्नसाक्षात्कारके समान, वेदान्ताभ्यासजन्य- संस्कार-प्रचयसव्यपेक्ष समाहित मनसे ब्रह्मसाक्षात्कार मानते हैं। हर तरहसे निर्गुण ब्रह्मोपासनामें कठिनाई है। किसी भी वस्तुका चिन्तन या तदाकाराकारित वृत्तिका प्रवाह तभी बन सकता है, जब उसकी प्रतीति हो। इधर हम देखते यह हैं कि मनमें शब्द, स्पर्श, रूप, रसादि कोई-न-कोई पदार्थकी स्फूर्ति अनिवार्य रूपसे बनी रहती है, किसी भी दृश्यकी स्फूर्ति रहते निर्विकल्प निर्दृश्य ब्रह्मकी स्फूर्ति असम्भव है। यह एक उपासनाका प्रकार दूसरा है कि जैसे 'आज एकादशी है' इस शब्दके आधारपर प्राणी एकादशी व्रत रहते हैं और उसका चिन्तन करते हैं। फिर भी उसके किसी स्वरूपविशेषका बोध नहीं होता। वैसे ही 'निर्गुण-निराकार निर्विकार ब्रह्म है' ऐसा परोक्षशब्दज्ञानके आधारपर स्वरूपविशेष बिना समझे भी चिन्तनरूप उपासना बन सकती है। फिर भी ठीक उपासना तो तभी बन सकती है, जब निर्विकल्पवस्तुकी स्फूर्ति हो। तब तदाकाराकारित वृत्तिसन्तान या धारा चलायी जा सकती है। अतः जैसे मृत्तिकादि मूर्त द्रव्योंका उत्सारण ही कूप-निर्माण है, किंवा घटसे जलादि निष्कासन ही उसको आकाशसे भरना है, वैसे ही चित्तसे दृश्य-विकल्पको निकालना ही उसे ब्रह्माकार बनाना है और उसे ही निर्गुणोपासना कहा जाता है। इस निर्गुणोपासनाका फल ब्रह्मसाक्षात्कार, अविद्या तत्कार्यात्मकप्रपंचकी निवृत्ति तथा प्रत्यक्- चैतन्याभिन्न ब्रह्मस्वरूपसे अवस्थिति है। बस, उसके अनन्तर कोई भी फल—अभ्युदय या निःश्रेयस अवशिष्ट नहीं रहता। निर्गुणोपासनाके संस्कार बने रहनेसे वेदान्त- श्रवण-मननादि द्वारा तत्त्वसाक्षात्कारमें भी सुविधा रहती है। कारण निरालम्ब या निर्विकल्पालम्ब मनका ही ब्रह्म-साक्षात्कारमें अधिक उपयोग है। यह सब होते हुए भी निर्गुणोपासना देहाभिमानियोंके लिये अत्यन्त कठिन है। वायुको बाँधना या भाद्रपदके अखण्ड गंगाप्रवाहको रोक देना जैसे कठिन है, वैसे ही प्रपंचोन्मुख वृत्तिप्रवाहको निरुद्ध करके निर्विकल्प निर्दिश्य ब्रह्माकारवृत्ति बनानी भी कठिन है। यह तो पूर्ण वैराग्यविवेकसम्पन्न पुरुषका ही विषय है। इसीलिये कहा गया है—'अत्यन्तवैराग्यवतः समाधिः समाहित- स्यैव दृढः प्रबोधः' यद्यपि सगुणोपासना भी कठिन है, उसमें भी तो बाह्य विषयोंसे मनका प्रत्यावर्तन करके भगवत्स्वरूपमें ही लगाना पड़ता है, फिर भी वह निर्गुणोपासनाकी अपेक्षा सरल है। कारण भगवान्के मंगलमय नाम, उनके परम पवित्र चरित्रके अभ्याससे भगवान्की मधुर मनोहर मंगलमय मूर्ति मनमें व्यक्त हो सकती है। फिर प्रेमसे तदाकाराकारित-वृत्तिप्रवाहरूप उपासना भी बन सकती है। भगवच्चरित्रादिकी मधुरतासे कभी-कभी प्राणियोंकी रागसे भी प्रवृत्ति हो जाती है। इस तरह सगुणोपासनामें सरलता और निर्गुणोपासनामें कठिनता है। इसलिये सगुणोपासना श्रेष्ठ है। सगुणोपासना सरल है यहाँ यह प्रश्न होता है कि जब निर्गुणोपासनाका फल बड़ा है, फिर भले ही वह कठिन हो, वही श्रेष्ठ है। बड़े फलके लिये कठिन परिश्रम—अधिकतर क्लेश, उसके अपकर्षका कारण नहीं हो सकता। बड़े फलके लिये अधिक क्लेश होना युक्त ही है। सगुणोपासना सरल होनेपर भी उसका फल ब्रह्मलोकादि है, जो कि एक तरह संसार ही है। वहाँ अविद्या तत्कार्यात्मक प्रपंचकी आत्यन्तिक निवृत्ति नहीं होती। निर्गुणोपासनासे निरावरण ब्रह्मका साक्षात्कार और तदात्मनावस्थान होता है, फिर निर्गुणोपासनासे सगुणोपासना कैसे श्रेष्ठ हुई ? इसका उत्तर यह है कि सगुणोपासना सरल है, साथ ही उससे अन्तरात्माकी शुद्धि, विवेक, वैराग्यादिकी प्राप्ति और श्रवणादिक्रमेण ब्रह्म-साक्षात्कारकी प्राप्ति और श्रवणादि भी हो जाता