भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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मोह न नारि नारि कें रूपा। पन्नगारि यह रीति अनूपा॥ (रा०च०मा० ७।११६।२) पुनि रघुबीरहि भगति पिआरी। माया खलु नर्तकी बिचारी॥ भगतिहि सानुकूल रघुराया। ताते ऐहि डरपति अति माया॥ (रा०च०मा० ७।११६।४-५) भक्तिपर मायाकृत उपद्रव व्यर्थ हो जाते हैं, इसीलिये उसे दिव्यमणि कहा है। ज्ञानपर उपद्रवोंके साफल्यकी सम्भावना होती है, इसीलिये उसे दीपक कहा है। श्रीभगवान्के शरण होकर उनमें आत्मसमर्पण करके प्राणी अत्यन्त निर्भय हो जाता है। फिर तो उसके रक्षक भगवान् ही हो जाते हैं। यहाँ ज्ञानपक्षके पोषकोंका कहना है कि ज्ञान दीपक भी नहीं, मणि भी नहीं, अपितु दिव्य सूर्य है। उसके उदय होते ही अविद्या, अन्धकार और उसके उपद्रव एवं तत्सम्बन्धी उलूकादि सब मिट जाते हैं। अविद्या, तत्कार्यात्मक प्रपंचके मिटनेका दूसरा उपाय ही नहीं है। शरणागति, आत्मसमर्पण भी पूर्णरूपसे ज्ञान पक्षमें ही बनता है। ज्ञान बिना प्राणी देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धितकका समर्पण कर सकता है, परंतु आत्माका तो समर्पण तभी बन सकता है, जब प्रत्यक्चैतन्याभिन्न परब्रह्मका बोध हो। जैसे घटाकाश महाकाशमें आत्मसमर्पण करता है, तरंग महासमुद्रमें आत्मसमर्पण करती है, वैसे ही जीवात्मा देह, इन्द्रिय, मन और बुद्धि अहंकारसे भिन्न चिदात्मरूपको शुद्धब्रह्ममें समर्पण कर देता है और तभी आश्रयत्वेन या संरक्षकत्वेन वरणरूप शरणागति प्राप्त होती है। इसी पक्षका समर्थन—'मामेकं शरणं व्रज।' (गीता १८।६६) 'मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते॥' (गीता ७।१४) इत्यादिमें किया गया है। भगवत्स्वरूप प्रपत्ति या शरणागतिमें मायाकी निवृत्ति होती है, तभी समस्त अनर्थोंकी निवृत्ति होती है। भगवान्की प्रीति, भक्ति परम कल्याणमयी होती है, इसमें सन्देह ही क्या? महानुभावोंने भक्ति और ज्ञानके साध्य, साधन और स्वरूपमें भेद कहा है। द्रवीभूत मनकी सगुण, साकार सच्चिदानन्दघन पर- ब्रह्माकाराकारित मानसीवृत्ति भक्ति है और द्रवानपेक्ष मनकी निर्विकार परब्रह्माकार मानसीवृत्ति ज्ञान है। भगवद् गुणगणालंकृत ग्रन्थोंके श्रवण, मननसे भक्ति होती है, साधनसम्पन्न होकर शुद्ध-बुद्धमुक्तब्रह्मबोधक वेदान्त ग्रन्थोंके श्रवणसे ज्ञान होता है। भक्तिमें प्राणि- मात्रका अधिकार है। ज्ञानमें साधनचतुष्टयसम्पन्न उच्च अधिकारीका ही अधिकार है। ज्ञानका फल निर्विकार ब्रह्मात्मनाऽवस्थान और निखिलरसामृतमूर्ति भगवान्के आकारसे आकारित मानसीवृत्तिरूपा भक्तिका फल भगवत्सायुज्यादिकी प्राप्ति है, परंतु साम्प्रदायिकोंकी दृष्टिमें तो भगवत्समीप्यादिकी प्राप्ति ही मुख्य फल है। भक्तिका फल भक्ति ही है, उससे बढ़कर कोई भी फल नहीं— मद्गुणश्रुतिमात्रेण मयि सर्वगुहाशये। मनोगतिरविच्छिन्ना यथा गङ्गाम्भसोऽम्बुधौ॥ (श्रीमद्भा० ३।२९।११) भगवान्के गुणगणश्रवणमात्रसे समुद्रोन्मुख गंगा- प्रवाहके समान सर्वगुहाशायी भगवान्में गंगाजलके समान द्रवीभूत निर्मल मनकी वृत्तिसन्तति ही भक्ति है— भगवान् परमानन्दस्वरूपः स्वयमेव हि। मनोगतस्तदाकाररसतामेति पुष्कलम्॥ परमानन्द रसात्मक भगवान् ही भक्तके द्रवीभूत मनपर व्यक्त होकर भक्तिपदसे कहे जाते हैं। कोमलचित्त प्राणी भक्तिका मुख्य अधिकारी है। यद्यपि साधनसे कठोर चित्तमें भी द्रवता होती है तथापि उसके लिये ज्ञान अच्छा है। ज्ञानी निर्गुण भक्तिके अतिरिक्त सगुण भक्ति भी करता है, परंतु उसको भक्तिका भगवत्प्रेमानन्दका रसास्वादनरूप दृष्ट ही फल है, मुक्तिरूप अदृष्ट फल तो ज्ञानसे ही उसे प्राप्त है। शिशुपालादि तामस, राजस भक्तोंको मुक्तिरूप अदृष्ट ही फल होता है, दृष्ट फल नहीं होता, परंतु भक्तको तो प्रेमानन्दमय दृष्ट फल और ज्ञानक्रमेण मुक्तिरूप अदृष्ट फल भी प्राप्त होता है। देवानां गुणलिङ्गानामानुश्रविककर्मणाम्। सत्त्व एवैकमनसो वृत्तिः स्वाभाविकी तु या॥